गृहशोभा विशेष

यूनिवर्सिटी औफ कोलंबिया में सालों मनोविज्ञान की विजिटिंग प्रोफैसर रह चुकीं बेला डी पाउलो फिलहाल वहां प्रोजैक्ट साइंटिस्ट हैं. वे 60 साल की हैं, मगर सिंगल हैं और इस बात का उन्हें तनिक भी पछतावा या अफसोस नहीं, क्योंकि वे अपनी इच्छा से सिंगल हैं.

बड़े ही उत्साहपूर्ण रवैए के साथ वे स्वीकार करती हैं कि वे सिंगल हैं, हमेशा रही हैं और आगे भी रहेंगी. वे कहती हैं, ‘‘मैं दिल से सिंगल हूं. सिंगल यानी मैं अपनी बेहतरीन और सब से अधिक मकसदपूर्ण जिंदगी जी रही हूं.’’

1994 में देश की पहली मिस यूनिवर्स बनी सुष्मिता सेन भी 2 बेटियों को गोद ले कर सिंगल लाइफ ऐंजौय कर रही हैं. एक इंटरव्यू में जब उन से सिंगल हुड के बारे में सवाल किया गया था, तो उन्होंने साफ स्वीकारा कि उन्हें जिंदगी में कभी शादी की हड़बड़ी नहीं रही है. ऐसा नहीं कि उन्हें प्रिंस चार्मिंग का इंतजार नहीं, मगर सही व्यक्ति न मिले तो पूरी उम्र सिंगल रह कर भी वे खुश रहेंगी. उन के पास किसी चीज की कमी नहीं है.

ऐसी ही एक अन्य इंडियन सैलिब्रिटी शैफ हैं रितु डालमिया जो अपने शो ‘ट्रैवलिंग दीवा’ के जरीए लोगों का दिल और स्वाद जीत चुकी हैं. वे पकवानों पर बहुत सारी किताबें भी लिख चुकी हैं. एक इंटरव्यू के दौरान शादी न करने के प्रश्न पर उन का जवाब था, ‘‘सिंगल वूमन के रूप में मुझे सब आसान लगता है. अपना परिवार होने और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम न बिता पाने का मुझे अफसोस नहीं होता, क्योंकि हर तरह के कौंटैक्ट्स मुझे मेरे रैस्टोरैंट से मिल जाते हैं.’’

ऐसे बहुत उदाहरण हैं ऊंचा मुकाम छू चुकीं 40+ सिंगल महिलाओं के, जिन्होंने अपनी इच्छा से सिंगल रहना स्वीकार किया और जो पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने सिंगल स्टेटस का आनंद ले रही हैं.

आज के समय में महिलाएं शादी करने की सामाजिक बाध्यता से आजाद हो रही हैं. वे अपनी जिंदगी की कहानी अपने हिसाब से लिखना चाहती हैं और ऐसा करने वाली महिलाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है.

9 जुलाई, 2015 को सोशल साइकोलौजिस्ट डी पाउलो ने औनलाइन ऐसे लोगों से आगे आने व अपने अनुभव शेयर करने को आमंत्रित किया, जो अपनी इच्छा से सिंगल थे और अपने इस स्टेटस से खुश थे. ‘कम्यूनिटी औफ सिंगल पीपुल’ नाम के इस गु्रप में 5 महीनों के अंदर अलगअलग देशों से 600 से ज्यादा लोग शामिल हुए. मई, 2016 तक यानी 1 साल बाद यह संख्या बढ़ कर 1,170 तक पहुंच गई. इस औनलाइन ग्रुप में सिंगल लाइफ से जुड़े सभी तरह के मसलों व अच्छे अनुभवों पर चर्चा की जाती है न कि किसी संभावित हमसफर को आकर्षित करने के तरीके बताए जाते हैं.

बदलती सोच

पिछले दशक से अमेरिका के जनगणना करने वाले यू.एस. सैंसस ब्यूरो द्वारा सितंबर के तीसरे सप्ताह को ‘अनमैरिड और सिंगल अमेरिकन वीक’ के रूप में मनाया जा रहा है. पिछले 10 सालों से तलाकशुदा, अविवाहित या विधवा/विधुरों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है. सिर्फ अमेरिका या अन्य विकसित देशों में ही नहीं, विकासशील देशों में भी स्थिति कमोबेश यही है.

दरअसल, अब विवाह को प्रसन्नता की गोली नहीं माना जाता. जरूरी नहीं कि हर शख्स विवाह कर परिवार के दायरे में स्वयं को सीमित करे. पुरुष हो या स्त्री, सभी को अपनी मंजिल तय करने का हक है. इस दिशा में कुछ हद तक सामाजिक सोच भी बदल रही है.

लोग मानने लगे हैं कि सिंगल एक स्टेटस नहीं वरन एक शब्द है, जो यह बताता है कि यह शख्स मन से इतना मजबूत और दृढ़संकल्प वाला है कि किसी और पर निर्भर हुए बगैर भी अपनी जिंदगी जी सकता है.

सामाजिक दबाव

वैसे ऐसा नहीं कि हर जगह सिंगल्स की भावनाओं को समझा जाता है. यूनिवर्सिटी औफ मिसूरी के शोधकर्ताओं के नए अध्ययन के मुताबिक भले ही मिड 30 की सिंगल महिलाओं की संख्या बढ़ी है, मगर सामाजिक अकेलेपन से जुड़ा खौफ कम नहीं हुआ है.

अविवाहित महिलाओं पर सामाजिक परंपरा को निभाने का सामाजिक दबाव कायम है.

टैक्सास यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा मध्यवर्ग की 32 अविवाहित महिलाओं का इंटरव्यू लिया गया. इन महिलाओं ने स्वीकारा कि विवाह या दूसरे इस तरह के मौकों पर उन के सिंगल स्टेटस को ले कर बेवजह भेदते हुए से सवाल पूछे जाते हैं, तो वहीं बहुत से लोग यह कल्पना भी करने लगते हैं, ‘जरूर वह झूठ बोल रही है. उस की शादी हो चुकी होगी’, ‘पति से नहीं बनती होगी’ या ‘वह तलाकशुदा होगी.’ कई लोग तो मुंह पर यह भी कह देते हैं कि शादी नहीं हुई तो जीवन बेकार है.

बिना पूछे ही सलाह देने वाले बहुत सी बातें याद दिलाते हैं. मसलन, ‘उम्र बढ़ने के साथ अच्छे लड़के मिलने बंद हो जाएंगे और फिर प्रैगनैंसी में भी दिक्कत होगी,’ ‘असुरक्षा और अकेलेपन के साथ जीना मुश्किल हो जाएगा,’ ‘आज तो मांबाप हैं, कल वे नहीं रहेंगे फिर कैसे जीओगी?’, ‘भाईबहन या रिश्तेदार किसी के नहीं होते जीवनसाथी ही साथ निभाता है.’

इस तरह के जुमलों के साथसाथ उन की स्थिति पर व्यंग्य भी किए जाते हैं, ‘तेरा सही है यार, कोई जिम्मेदारी, कोई टैंशन नहीं’, ‘तुझे नहीं पता आगे जा कर बहुत पछताएगी तू.’

स्वयं इस बारे में सोशल साइकोलौजिस्ट डी पाउलो ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा, ‘‘मैं ने अपनी पूरी जिंदगी सिंगल रह कर गुजारी है और इसे मैं पसंद करती हूं. मगर हां यह बात मैं ने महसूस की है कि सोशल इवेंट्स में सिंगल पर्सन के रूप में मुझे कम तवज्जो दी गई और मैं ही नहीं, मेरी दूसरी सहेलियों के साथ भी ऐसा ही बरताव हुआ है. तभी मैं ने तय किया कि मैं सिंगल हुड के बारे में विस्तार से शोध करूंगी जिन पर लोगों का ध्यान नहीं जाता.’’

हाल के एक शोध के मुताबिक अविवाहित महिलाओं को दुख इस बात का नहीं होता कि वे सिंगल हैं, बल्कि तकलीफ यह रहती है कि समाज उन के सिंगल स्टेटस को स्वीकार नहीं करता और उन पर लगातार किसी से भी शादी कर लेने का दबाव बनाया जाता है.

ब्रिटिश सोशियोलौजिकल ऐसोसिएशन कौन्फ्रैंस में किए गए एक अध्ययन में पूरे विश्व से 22,000 विवाहित और अविवाहित लोगों के प्रसन्नता के स्तर को मापा गया और पाया गया कि वे देश जहां विवाह से जुड़ी पारंपरिक सोच अधिक मजबूत थी, वहां अविवाहितों में अधिक अप्रसन्नता पाई गई, क्योंकि वहां शादी न करने वाली महिलाओं को दया की पात्र या नीची निगाहों से देखा जाता है.

शोध में पाया गया है कि 35 साल से ऊपर की सिंगल महिलाएं फिर भी अपनी स्थिति से संतुष्ट रहती हैं, जबकि युवा खासकर 25 से 35 साल की, जमाने से सब से ज्यादा खौफजदा रहती हैं, क्योंकि उन से सब से ज्यादा सवाल पूछे जाते हैं. 25 से पहले इस संदर्भ में चर्चा नहीं होती.

समय के साथ अब बहुत सी महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर अच्छा कमा रही हैं, अपनी जिंदगी अपने बल पर बेहतर ढंग से जीने के काबिल बन रही हैं, तो फिर यदि वे सिंगल रहने का फैसला लेती हैं तो लोगों को उन के इस फैसले का सम्मान करना चाहिए न कि उस पर एतराज. क्या जरूरी है कि प्रत्येक स्त्री के जीवन का मकसद एक परिवार बनाना और बच्चे पैदा करना ही हो? इस से हट कर कुछ अपनी रुचि और पैशन के नाम जिंदगी करने या फिर अपने वजूद को एक मुकाम तक पहुंचाने का हक उन्हें नहीं मिलना चाहिए?

कुछ तो लोग कहेंगे

सिंगल महिलाओं के लिए जरूरी है कि मुफ्त की सलाह देने वालों की बातों से दिलोदिमाग पर दबाव न बनने दें. आप जरा अपनी निगाहें घुमा कर देखिए, जो शादीशुदा हैं, क्या उन्हें हर खुशी मिल रही है? क्या उन की जिंदगी में नई परेशानियों ने धावा नहीं बोला? कोई भी काम करने से पहले घर वालों को सूचित करना, पैसों के लिए दूसरों का मुंह देखना,

1-1 पैसे का हिसाब देना, अपने वजूद को भूल कर हर तरह के कंप्रोमाइज के लिए तैयार रहना, घर संभालना, यह सब आसान नहीं होता. बहुत तालमेल बैठाना होता है, इन से जुड़े तनाव से सिंगल वूमन आजाद रहती है.

जो महिलाएं आप पर शादी करने का दबाव डाल रही हैं, वे दरअसल आप की स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और झंझटों से मुक्त जिंदगी से जलती हैं.

आप अपने दिल की सुनिए और यदि आप किसी ऐसे शख्स का इंतजार कर रही हैं, जो आप की सोच और नजरिए वाला हो तो इस में कुछ भी गलत नहीं. बस शादी करनी जरूरी है, इसलिए किसी से भी कर लो, भले ही वह आप के योग्य नहीं, इस बात का कोई औचित्य नहीं.

कुछ कर के दिखाना है

बहुत सी लड़कियों/महिलाओं में कुछ करने का जज्बा होता है, मगर शादी के बाद आमतौर पर वे ऐसा कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाती हैं. एक तरफ तो घरपरिवार की जिम्मेदारियां, दूसरी तरफ बच्चे. ऐसे में वे चाह कर भी अपने सपनों को नहीं जी पातीं. जिन लड़कियों की पहली प्राथमिकता अपना पैशन होता है, शादी नहीं वे सहजता से शादी न करने का फैसला ले पाती हैं या फिर शादी करती भी हैं तो अपने ही जैसा पैशन या हौबी रखने वाले से.

पछतावा कभी नहीं

जब तक आप स्वयं अपने फैसले से संतुष्ट और खुश नहीं, दूसरों को बोलने का मौका मिलता है. सोचसमझ कर फैसला लीजिए. अपनी परिस्थितियों को तोल कर देखिए फिर पछताइए नहीं.

गलत से बेहतर है, न हो जीवनसाथी

पेशे से पत्रकार 32 वर्षीय अनिंदिता कहती हैं, ‘‘गलत व्यक्ति के साथ आप जुड़ जाती हैं तो आप को धोखा मिलता है या फिर आप का जीवनसाथी गालीगलौज और मारपीट करता है तो क्या इस कदर अपने सम्मान को दांव पर लगा कर भी विवाह बंधन में बंधना जरूरी है.’’

सिंगल हुड इज वंडरफुल

कुछ महिलाएं परंपराओं और रीतिरिवाजों से अलग रह कर जीने का हौसला रखती हैं और सिंगल रहना पसंद करती हैं. ऐसा नहीं कि उन्हें कोई मिला नहीं या फिर उन के साथ कुछ इश्यू थे वरन इसलिए, क्योंकि वे ऐसा चाहती थीं.

सिर्फ इसलिए शादी कर लेना कि सब करते हैं, इस बात का कोई औचित्य नहीं. बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिन की जिंदगी का कोई खास मकसद होता है. अकेले रह कर वे अपनी क्रिएटिविटी को नए आयाम तक पहुंचाते हैं या फिर कुछ डिफरैंट काम कर सामाजिक क्रांति में योगदान दे सकते हैं. सिंगल व्यक्ति के पास मौका है कि वह अपनी ऊर्जा और समय का सर्वोत्तम उपयोग करे. सिंगल रहने का चुनाव उस का अपना होना चाहिए. आयु के 30 वर्षीय व्यक्ति को अपनी जिंदगी के मकसद तय करने में गुजारने होते हैं. 30 पार करतेकरते ही आप के अंदर पूरा आत्मविश्वास आता है.

बहुत से अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि विवाहितों की तुलना में सिंगल रहने का फैसला करने वालों में संपूर्ण स्वास्थ्य ज्यादा बेहतर पाया गया.

10 हजार से ज्यादा महिलाओं पर की गई एक आस्ट्रेलियन स्टडी के मुताबिक अपने जीवन के 70वें दशक में हमेशा सिंगल महिलाओं, जिन की कोई संतान नहीं थी, उन में बीमारियां बहुत कम पाई गईं. उन का बौडी मास इंडैक्स सब से बेहतर पाया गया. यही नहीं, उन में विवाहित महिलाओं की तुलना में स्मोकिंग और ड्रिंकिंग की आदत या डिप्रैशन की संभावना भी काफी कम पाई गई.

सिंगल होते हैं ज्यादा जिम्मेदार

एक बात जो अकसर मानी जाती है कि सिंगल व्यक्ति सैल्फ सैंटर्ड होते हैं, पर ऐसा नहीं है. सिंगल अपनी जिंदगी की स्क्रिप्ट स्वयं लिखते हैं. उन का दिलोदिमाग ज्यादा ओपन होता है. जब व्यक्ति शादी करता है तो उस का फोकस अपने परिवार और बच्चों तक सिमट कर रह जाता है. मगर सिंगल व्यक्ति दिल से मांबाप, दोस्तों, रिश्तेदारों व सभी करीबी व्यक्तियों के करीब होता है. सही अर्थों में वह स्वार्थ रहित और सब के लिए स्नेहपूर्ण व्यवहार कर पाता है.

ये हैं मिसाल

रीमा कागती, डायरैक्टर, हनीमून ट्रैवल्स प्रा. लि.

अपनी अलग नजर रखने वाली असिस्टैंट डायरैक्टर रीमा कागती ने ‘तलाश’ जैसी फिल्मों के जरीए अपनी पहचान बनाई पर अब तक शादी नहीं की.       

गृहशोभा विशेष

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

ममता बनर्जी की ताकत से कौन वाकिफ नहीं है. 15 साल की उम्र से राजनीति में प्रवेश करने वाली ममता आज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं.

तब्बू, अभिनेत्री

ऐक्टिंग के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाने वाली तब्बू आज तक सिंगल हैं. वे कई भाषाओं, हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली और अंगरेजी फिल्मों में काम कर रही हैं. पद्मश्री सहित कई अवार्ड जीत चुकी हैं.

जे जयललिता

6 दफा तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जे जयललिता की हाल ही में मृत्यु हो गई. 68 वर्षीया जयललिता को लोग प्यार से ‘अम्मा’ बोलते थे, वजह थी कि उन्होंने राज्य की खुशहाली के लिए करीब 18 लोक कल्याणकारी योजनाएं शुरू की थीं. फिल्मों के बाद राजनीति के क्षेत्र में अपूर्व ऐक्टिंग में सफलता पाने वाली जयललिता ने भी शादी नहीं की थी.

साक्षी तंवर, टीवी ऐक्ट्रैस

टीवी ऐक्ट्रैस ‘कहानी घरघर की’ धारावाही से पार्वती के रूप में पहचान बनाने वाली साक्षी ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ में बहुत पसंद की गईं. एक इंटरव्यू में शादी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने जबाव दिया था, ‘‘जब होनी होगी, मैं शादी कर लूंगी.’’

वैभवी मर्चेंट, कोरियोग्राफर

कौन भूल सकता है, ‘हम दिल दे चुके सनम’ फिल्म के लोकप्रिय गीत ‘ढोल बाजे…’ की कोरियोग्राफर वैभवी को. वैभवी द्वारा कोरियोग्राफ किए गए इस गाने ने बहुत वाहवाही बटोरी थी. वैभवी डांस शो की जज भी रह चुकी हैं. शादी के प्रश्न पर उन का जबाव था, ‘‘यदि मुझे मेरे मनलायक व्यक्ति नहीं मिला तो हो सकता है मैं शादी न भी करूं.’’

एकता कपूर, फिल्म निर्मात्री

अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘बालाजी टैलीफिल्म्स’ के साथ भारतीय टैलीविजन इंडस्ट्री में एक नई जान फूंकने वाली एकता कपूर एक जानामाना नाम हैं. क्रिएटिविटी में डूब कर जीने वाली एकता भी अपनी इच्छा से अब तक सिंगल हैं.

देबजानी घोष, एम.डी., इंटेल कौरपोरेशन

देबजानी 19 सालों से इस कंपनी को ऊंचाइयों तक पहुंचाने के सफर में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं.

किरण देसाई, मशहूर लेखिका

बूकर अवार्ड जीत चुकीं किरण देसाई ने साहित्य के क्षेत्र में अपना नाम रोशन किया और अपने बल पर कामयाबी हासिल की.

लता मंगेशकर, गायिका

अपनी मीठी आवाज से देश का नाम रोशन करने वाली लता को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जा चुका है. उन्होंने भी अपनी मरजी से शादी न करने का फैसला लिया था.

साइना नेहवाल, बैडमिंटन प्लेयर

अपने कैरियर के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहीं और भारत का नाम रोशन कर रहीं साइना ने भी अब तक शादी नहीं की है.

रितु डालमिया, शैफ

इंडियन सैलिब्रिटी शैफ रितु अपने ट्रैवलिंग शो ‘ट्रैवलिंग दीवा’ के जरीए लोगों का दिल जीत चुकी हैं. वे कुकिंग पर कई किताबें लिख चुकी हैं. शादी न करने के प्रश्न पर उन का जवाब था, ‘‘सिंगल वूमन के रूप में मुझे सब आसान लगता है. अपने परिवार के साथ क्वालिटी टाइम न बिता पाने का मुझे कोई अफसोस नहीं होता. हर तरह के कौंटैक्ट्स मुझे अपने रैस्टोरैंट से मिल जाते हैं.’’

थोड़े समय की खुशी है शादी

1,000 कपल्स पर 15 वर्षों तक किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि शादी जिंदगी में एक छोटे समय के लिए थोड़ी सी खुशी ले कर आती है, जोकि मैरिज ऐनिवर्सरी के आसपास होती है. इस के बाद लोग उसी तरह से जीने लगते हैं, जैसी शादी से पूर्व उन की जिंदगी थी.

शोधों के मुताबिक हम सभी के पास खुशी की एक बेसलाइन होती है और शादी साधारणतया इसे बदलती नहीं, उस अल्पकालीन खुशी के सिवा.

विशेषज्ञों के विचार

मनोचिकित्सक समीर पारीख के अनुसार, विशेषरूप से भारतीय संदर्भ में शादी या जीवन के अन्य महत्त्वपूर्ण पहलुओं के बारे में सामाजिक अपेक्षाएं बनी रहती हैं और फिर इन अपेक्षाओं को पूरा न करने पर चुनौतीपूर्ण एहसास का सामना करना पड़ता है. हालांकि यह ध्यान देना आवश्यक है कि हम में से प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को स्वयं स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार होता है. हालांकि, इस तरह के दबाव से निबटना दुखदाई हो सकता है. यदि इस से आप असहज महसूस करते हैं, तो इस बारे में अपनी राय जोर दे कर रखनी होगी. याद रखें, किसी भी प्रकार का दबाव मन पर न डालें, क्योंकि शादी अपने व्यक्तिगत जीवन का विकल्प है और आप को इस के लिए निर्णय लेने से पहले मानसिक रूप से तैयार होना जरूरी है.

मनोचिकित्सक डा. संदीप गोविल कहते हैं, ‘‘अकेला होना हमेशा नकारात्मक हो, यह जरूरी नहीं है. कई महिलाएं हैं, जिन्होंने शादी नहीं की है, लेकिन उन्होंने अपने अकेलेपन को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया, बल्कि जीवन की हर चुनौती का डट कर सामना करने से वे मानसिक रूप से अधिक मजबूत व दृढ़निश्चयी बन गईं. अगर आप भी अकेली हैं तो खुद को बेबस न समझें. अपने अकेलेपन को अपनी ताकत बना लें. अपने जीवन का कोई उद्देश्य आप के जीवन को एक दिशा देगा और उसे नई संभावनाओं से भर देगा.’’   

– समीर पारीख, मनोचिकित्सक

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