गृहशोभा विशेष

यौन हिंसा की घटनाएं आजकल कुछ ज्यादा ही घट रही हैं. दुराचार, शायद अनियंत्रित कामवासना को संतुष्ट करने का एक जुगाड़ है.असल में बलात्कार या डेटरेप से पहले बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह से फैला हुआ संक्रमण होता है. लेकिन उस संक्रमण का शिकार बलात्कारी नहीं, पीडि़ता होती है. सहना पीडि़ता को ही पड़ता है. पीडि़ता को ही दोषी माना जाता है. समाज व खानदान के नाम पर उसे धब्बा भी कहा जाता है. इतना ही नहीं, उसे खानदान के नाम पर प्रताडि़त भी किया जाता है.  शादी का झांसा दे कर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, आजकल आम बात है.  क्या यह बलात्कार के दायरे में आता है, वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो? हम इसे शादी की आड़ में यौन शोषण कह सक सकते हैं. अधिकतर लड़के शादी का झांसा दे कर लड़कियों से शारीरिक रिश्ते बनाते हैं और तब तक कार्यक्रम चलता रहता है जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती. फिर आसान सा रास्ता सुझाया जाता है गर्भपात का. कुछ मामलों में गर्भपात कराना मुश्किल हो जाता है और आखिरकार  मामला परिवार व पड़ोसियों की नजर में आ ही आता है.

सहमति का संशय

अधिकतर मामलों में ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले बहुत कम दर्ज होते हैं. कारण, समाज का डर होता है. अगर मामला दर्ज हो भी, तो होता कुछ नहीं. लगभग रोज ही ऐसी कई घटनाएं घट रही हैं. कई बार सवाल उठाए गए हैं कि किसी लड़की से शादी का झूठा वादा कर के शारीरिक रिश्ते बनाना सहमति है या नहीं? यदि वह बलात्कार नहीं है तो धोखेबाजी है या नहीं?

ऐसे ही एक केस में कलकत्ता उच्च न्यायालय का मानना था, ’’अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर शारीरिक रिश्ते बनाने को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उस की ओर से स्वच्छंद संभोग के दायरे में आएगा. ऐसे में, तथ्यों को गलत इरादे से प्रेक्षित नहीं किया जा सकता. इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा-90 के तहत अदालत द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता. जब तक यह आश्वासन न मिले कि रिश्ते बनाने के दौरान आरोपी का इरादा आरंभ से ही शादी करने का नहीं था.‘‘

वहीं दूसरी ओर, बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बी बी वग्यानी ने एक सुनवाई के दौरान कहा, ’’शादी करने का झूठा वादा महज धोखाधड़ी है. भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में धोखाधड़ी के अपराध को परिभाषित किया गया है. बिना किसी संदेह के अपराधी का अपराध दंडनीय है, क्योंकि पीडि़ता को जानबूझ कर शादी करने के वादे के झांसे में रख कर, शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए उकसाया गया था. आरोपी ने लड़की से शादी करने का वादा किया और इसी प्रभाव में लड़की ने उस के साथ शारीरिक रिश्ते भी बना लिए. लड़की भी उस से शादी करने को उत्सुक थी, लेकिन लड़के ने जो वादा किया, वह झूठा था. यह विवाह करने के वादे को ले कर वादाखिलाफी का मामला प्रतीत होता है, न कि विवाह के झूठे वादे का मामला.‘‘

असल में यह भावनाओं और नाजुक पलों में जनून से जुडे़ मामले होते हैं. जब भी लड़कालड़की मिलते हैं, एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं. लड़की भी उस लड़के को काफी छूट देती है, जिस से वह बेहद प्यार करती है. लड़के के बुलाने पर चोरीछिपे लड़की सुनसान जगह पर चुपचाप मिलती भी है और संबंध भी बनाती है. जब दो जवान लोग हों, तो आमतौर पर यह होता ही है कि वे सभी अहम बातें भुला कर जनून में आ कर प्यार कर बैठें, खास कर तब जब वे कमजोर क्षणों में अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाते. ऐसे में, दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते कायम हो ही जाते हैं. लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ रिश्ते कायम करती है, वह उस से बेहद प्यार करती, इसलिए नहीं कि उस लड़के ने उस से शादी करने का वादा किया था, बल्कि इसलिए कि लड़की ऐसा चाहती भी थी.

गलतफहमी या धोखा

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र, उस की शिक्षा और उस के सामाजिक स्तर व लड़के के मामले में भी इन्हीं सब पर गौर किया जाना जरूरी है. वैसे तो लड़की स्वयं इस कृत्य में बराबर की भागीदार है पर वह समझ नहीं पा रही हो कि किन हालात के चलते वह ऐसे कृत्य में फंस गई और ऐसे में, लड़की के हामी भरने की कोई अहमियत नहीं है. उस से गलतफहमी में हामी भरवाना धोखा है. इसे लड़की की मंजूरी नहीं माना जा सकता.

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी के जैन ने 1 फरवरी, 2010 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए और ऐसे आपराधिक कृत्य की निंदा करते हुए कहा, ’’अदालत ऐसे मौकापरस्त लोगों को लड़की की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का लाइसैंस नहीं दे सकती. लड़कियों का शोषण करने वाले ऐसे लोगों को बेखौफ बच निकलना कानून का मकसद कभी नहीं हो सकता, जो इस घिनौने कृत्य के बाद ताउम्र जेल की सजा का हकदार है.‘‘

बंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बी यू वाहाने ने (1991) के एक मामले में सामाजिक अनुभव के आधार पर स्पष्ट किया कि वयस्क लड़की से चालबाजी से उस की सहमति ले ली जाए वह भी तब जब वह बेसहारा और सैक्स को ले कर असंतुष्ट हो, उसे पैसे की जरूरत हो, बहानों से उसे प्रभावित किया जाए या हामी भरने के हालात बनाए जाएं आदि में कानूनी राय और फैसले सीधेसीधे बंटे हुए हैं, सहमति और तथ्यों के उलझाव में उलझे हुए हैं, क्योंकि कानून पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और फैसले हर मामले के तथ्यों व हालात के आधार पर होते हैं.

हालांकि न्यायिक राय को ले कर आमराय यही है कि ऐसे मामलों में सब से कठिन काम यह साबित करना होता है कि लड़की का शारीरिक शोषण हुआ है. औरत के खिलाफ अपराध संबंधी किंतुपरंतु को ले कर जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, न्याय से जुड़े ऐसे कानूनी पेंच यों ही कायम रहेंगे. उदाहरण के लिए बाराबंकी में 9वीं क्लास की नाबालिक लड़की से उस के ही सहपाठी द्वारा एकांत पा कर बलात्कार किया गया. लेकिन पुलिस ने सिर्फ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया. मुरादाबाद और झांसी में भी कुछ ऐसा ही हुआ. सिर्फ फर्क इतना है कि संबंध सहमति से बने थे पर बाद में एक लड़की एमएमएस का शिकार हुई तो दूसरी गैंगरेप का और उस ने खुद को आग लगा ली. कानपुर और लखनऊ में भी बलात्कार की शिकार 2 नाबालिक लड़कियां मौत की नींद सो गईं.

सिर्फ सवाल जवाब नहीं

एक शोध के अनुसार दुनियाभर में हर 3 में से 1 महिला को शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है. यही नहीं, दुनियाभर में 30 प्रतिशत महिलाएं नजदीकी साथी द्वारा हिंसा या दुर्व्यवहार की शिकार होती हैं. एक और रिपोर्ट के मुताबिक, अपने साथी द्वारा शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार की शिकार होने वाली 42 प्रतिशत महिलाएं इस से चोटिल होती हैं. हजारों ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्ककुतर्क, जालजंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं.

अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घरपरिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे तक बहुत लंबीचौड़ी खाई है, जिसे पार कर पाना दुसाध्य काम है. अदालत के बाहर अंधेरे में खड़ी आधी दुनिया के साथ न्याय का फैसला कब तक सुरक्षित रहेगा या रखा जाएगा? कब, कौन, कहां, कैसे सुनेगा इन के दर्द की दलील और न्याय की अपील, ये सवाल समाज से जवाब मांग रहे हैं.