ऐसी भक्ति से तो गौ माता भी शरमा जाए

11 August 2017
ऐसी भक्ति से तो गौ माता भी शरमा जाए

पहले गली में कुत्तों को खुला छोड़ दो और जब वे 2-4 को काटकाट कर मार डालें तो भी उन्हें बजाय रस्सी से बांधने के केवल शूशू कर के चुप करा दो. यह सीन बहुत जगह देखा होगा. कुत्तों की मालकिनों को कुत्तों से इतना प्रेम होता है कि उन का कुत्ता किसी को काट ले तो भी वे दोषी दूसरे को ही ठहराती हैं कि उस ने ही कुत्ते को उकसाया होगा.

ऐसा ही सा कुछ गौरक्षकों के साथ भी हो रहा है. देश भर में गौरक्षकों को भगवा गमछा गले में लटका कर गायभैंस पालने वालों को मारनेपीटने का लाइसैंस दे दिया गया है. बीसियों तो जान गंवा चुके हैं इन गौरक्षकों के हाथों और सैकड़ों पिटे और लुटे हैं. न राज्य सरकारें, जिन का काम राज्य में कानून व्यवस्था कायम करना है इन गौरक्षकों को पकड़ रही हैं और न केंद्र सरकार. नरेंद्र मोदी ने इस पर चिंता व्यक्त कर दी, राज्य सरकारों को सलाह दे दी और बस.

गौभक्तों की इस देश में कमी नहीं. प्रचार और रीतिरिवाजों के गुलाम से गौभक्त गौरक्षकों को भरपूर समर्थन देते हैं. पढ़ेलिखे, कानून के बारे में समझ रखने वाले, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने वाले भी आस्था के पागलपन में बह कर ऐसे मामलों में चुप रह जाते हैं. नतीजा यह है कि ये गौरक्षक असल में पैरलल पुलिस फोर्स बनने लगे हैं और हरेक से गौशाला, गौपूजा और रात्रि जागरण के नाम पर चंदा वसूली भी करने लगे हैं.

इस चंदे का हिसाब तो किसी को नहीं देना होता. जो चाहे मरजी करो. ऊंची जातियों के लोग पहले घर में लठैत पालते थे, जो वसूलियां भी करते थे, अब गौरक्षक पालने लगे हैं. पुलिस भी इन से डरती है, क्योंकि इन की पहुंच मंत्रियों तक होती है.

गौरक्षा देश की अर्थव्यवस्था के किए कितनी जरूरी है या कितनी घातक या फिर गौपूजा का कोई तार्किक आधार है या नहीं, इस सवाल को छोड़ भी दें, तो भी सदियों से चले आ रहे गाय पर आधारित व्यापार को यों ही धर्म के नाम पर गौरक्षकों के सुपुर्द नहीं करा जा सकता. यही गौरक्षक सामाजिक नियमों के ठेकेदार बनने लगे हैं. कोई क्या पहने, क्या खाए, क्या बोले, क्या देखे, क्या पढ़े सब गौरक्षक सद्रश लोग तय करने लगे हैं.

देश ने बड़ी मुश्किलों से थोड़ाबहुत सामाजिक परिवर्तन देखा है. आज भी समाज की सोच 18वीं सदी की है, पूरी नहीं तो आधी की तो है ही. आज भी शादीब्याह, त्योहार, आनाजाना, कुंडली, मंत्रों, हवनों, माता की चौकियों, शुभ काल, देवों के जागनेसोने पर हो रहा है. ऊपर से ये गौरक्षक पुरातनपंथी लट्ठमार सोच थोपने लगे हैं. दुनिया भर में घूमने वाले, अंतरिक्ष में यान भेजने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन को मूक नहीं, सक्रिय समर्थन दे रहे हैं ताकि राजनीति पर पकड़ बनी रहे.

घरों की औरतों को इस से ज्यादा नुकसान होगा, क्योंकि एक कट्टरवादी सोच दूसरी कट्टरवादी सोच का सहारा बनती है. आज गौरक्षा के नाम पर लट्ठ चल रहे हैं कल संस्कृतिरक्षा के नाम पर विधवा विवाहों पर रोक लगने लगेगी.

पहले गली में कुत्तों को खुला छोड़ दो और जब वे 2-4 को काटकाट कर मार डालें तो भी उन्हें बजाय रस्सी से बांधने के केवल शूशू कर के चुप करा दो. यह सीन बहुत जगह देखा होगा. कुत्तों की मालकिनों को कुत्तों से इतना प्रेम होता है कि उन का कुत्ता किसी को काट ले तो भी वे दोषी दूसरे को ही ठहराती हैं कि उस ने ही कुत्ते को उकसाया होगा.

ऐसा ही सा कुछ गौरक्षकों के साथ भी हो रहा है. देश भर में गौरक्षकों को भगवा गमछा गले में लटका कर गायभैंस पालने वालों को मारनेपीटने का लाइसैंस दे दिया गया है. बीसियों तो जान गंवा चुके हैं इन गौरक्षकों के हाथों और सैकड़ों पिटे और लुटे हैं. न राज्य सरकारें, जिन का काम राज्य में कानून व्यवस्था कायम करना है इन गौरक्षकों को पकड़ रही हैं और न केंद्र सरकार. नरेंद्र मोदी ने इस पर चिंता व्यक्त कर दी, राज्य सरकारों को सलाह दे दी और बस.

गौभक्तों की इस देश में कमी नहीं. प्रचार और रीतिरिवाजों के गुलाम से गौभक्त गौरक्षकों को भरपूर समर्थन देते हैं. पढ़ेलिखे, कानून के बारे में समझ रखने वाले, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने वाले भी आस्था के पागलपन में बह कर ऐसे मामलों में चुप रह जाते हैं. नतीजा यह है कि ये गौरक्षक असल में पैरलल पुलिस फोर्स बनने लगे हैं और हरेक से गौशाला, गौपूजा और रात्रि जागरण के नाम पर चंदा वसूली भी करने लगे हैं.

इस चंदे का हिसाब तो किसी को नहीं देना होता. जो चाहे मरजी करो. ऊंची जातियों के लोग पहले घर में लठैत पालते थे, जो वसूलियां भी करते थे, अब गौरक्षक पालने लगे हैं. पुलिस भी इन से डरती है, क्योंकि इन की पहुंच मंत्रियों तक होती है.

गौरक्षा देश की अर्थव्यवस्था के किए कितनी जरूरी है या कितनी घातक या फिर गौपूजा का कोई तार्किक आधार है या नहीं, इस सवाल को छोड़ भी दें, तो भी सदियों से चले आ रहे गाय पर आधारित व्यापार को यों ही धर्म के नाम पर गौरक्षकों के सुपुर्द नहीं करा जा सकता. यही गौरक्षक सामाजिक नियमों के ठेकेदार बनने लगे हैं. कोई क्या पहने, क्या खाए, क्या बोले, क्या देखे, क्या पढ़े सब गौरक्षक सद्रश लोग तय करने लगे हैं.

देश ने बड़ी मुश्किलों से थोड़ाबहुत सामाजिक परिवर्तन देखा है. आज भी समाज की सोच 18वीं सदी की है, पूरी नहीं तो आधी की तो है ही. आज भी शादीब्याह, त्योहार, आनाजाना, कुंडली, मंत्रों, हवनों, माता की चौकियों, शुभ काल, देवों के जागनेसोने पर हो रहा है. ऊपर से ये गौरक्षक पुरातनपंथी लट्ठमार सोच थोपने लगे हैं. दुनिया भर में घूमने वाले, अंतरिक्ष में यान भेजने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन को मूक नहीं, सक्रिय समर्थन दे रहे हैं ताकि राजनीति पर पकड़ बनी रहे.

घरों की औरतों को इस से ज्यादा नुकसान होगा, क्योंकि एक कट्टरवादी सोच दूसरी कट्टरवादी सोच का सहारा बनती है. आज गौरक्षा के नाम पर लट्ठ चल रहे हैं कल संस्कृतिरक्षा के नाम पर विधवा विवाहों पर रोक लगने लगेगी.

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