लगभग सभी धर्मों व संप्रदायों के लोग, एक सांस में अपने धर्म को ईश्वर की ओर जाने वाले इकलौते रास्ते के रूप में पेश करते हैं. यह ऐसा रास्ता है जहां मोहमाया अर्थात भौतिक जगत, खासतौर से धनसंपत्ति के प्रति लोभ समाप्त हो जाता है और अंतत: भक्त और भगवान के बीच कोई भेद नहीं रह जाता. तब उस ‘सर्वोच्च सत्ता’ से साक्षात्कार होता है. धर्म बताता है कि पैसा उस रास्ते की एक रुकावट है क्योंकि यह मनुष्य को भौतिक मायाजाल में उलझाए रख कर ईश्वर का ध्यान करने में बाधा उत्पन्न करता है.

ऐसे लोगों को महान धार्मिक व्यक्तित्व के तौर पर सम्मान के साथ जनता के सामने रखा गया जिन्होंने आध्यात्मिक रास्ते की ओर बढ़ने के लिए भौतिक सुखसुविधा को लात मार दी. ये उदाहरण समाज के धनी और गरीब तबकों के लिए अलगअलग तरह से प्रेरणास्रोत का कार्य करते हैं. संपन्न लोगों के लिए संदेश है कि तुम्हारी भौतिक उपलब्धियां तुच्छ हैं क्योंकि ये ईश्वर से सामना होने के समय तुम्हारा साथ नहीं देंगी. सबकुछ पीछे छूट जाएगा, इसलिए भगवान, अल्लाह या गौड से डरो. वह तुम्हारे अच्छेबुरे कर्मों का हिसाब रखता है और उसी के अनुसार तुम्हारे बारे में आखिरी फैसला करेगा.

वास्तव में इस तरह की धार्मिक विचारधाराओं ने समाज के संपन्न तबके को काबू में रखने की कोशिश की. पैसे की ताकत के चलते हो सकने वाली उस की मनमानियों को रोकने का प्रयास किया. दूसरी तरफ गरीबों के लिए एक प्रतीकात्मक संवेदना थी कि गरीबी अभिशाप नहीं है. हिंदू धर्म में ऐसे दृष्टांतों, किंवदंतियों, दंतकथाआें की भरमार है कि गरीब भक्तों ने किस तरह धैर्यपूर्वक अपनी भक्ति से भगवान को प्रसन्न किया और वरदान हासिल कर के अपनी कायापलट कर ली या सीधे ‘बैकुंठ’ में वास करने लगे.

बाइबिल तो पूरी तरह से गरीबों के पक्ष में खड़ी है और दावा करती है कि गरीबों को प्रभु के राज्य में पहले प्रवेश मिलेगा. इसलामिक विचारधारा का ऐलान भी यही है कि अमीरी और गरीबी एक इम्तहान के सिवा कुछ नहीं है. अमीरों के लिए यह उन की उदारता का इम्तहान है कि वे अपने गरीब भाइयों को कितना दे सकते हैं और गरीबों के लिए गरीबी उन के ईमान की कसौटी है कि वे कितना सब्र रख सकते हैं.

बुनियादी रूप से धर्मों ने समाज के ऐसे आर्थिक ढांचे पर जोर दिया जहां अमीर पैसे के मद में अंधे हो कर मनमानियां करने के बजाय जरूरतमंदों की मदद करें और गरीबी से झुंझला कर कोई व्यक्ति अपना सब्र खो कर असामाजिक हरकतों पर न उतरे. सरसरी तौर से देखने पर यह एक आदर्श स्थिति लगती है लेकिन इस के परिणाम उलटे आए. ताकतवर और समर्थ लोगों ने सदा ही खूब मनमानियां कीं. पैसे के बूते पर धर्म के ठेकेदारों से अपने पक्ष में समर्थन भी जुटाया.

गरीबों ने यह होते देखा तो उन को अपना सब्र अजीब लगने लगा. अमीरों के पक्ष में खड़े धर्म ने उन को और अमीर बनने के आशीर्वाद दिए, कर्मकांड आयोजित कराए और गरीबों को पापपुण्य का, स्वर्गनरक का डर दिखला कर उन की ओर से बगावत का खतरा टाला. कालाबाजारी करने वाले किसी सेठ ने गौशाला, धर्मशाला, मंदिर, मठ आदि बनवाए और जनता ने पंडेपुजारियों की ओर से उस ‘धर्मात्मा’ की जयजयकार के साथ उस की ‘स्वर्ग’ में सीट पक्की होने की घोषणा होते देखी तो उसे यह प्रेरणा मिलनी स्वाभाविक थी कि इस दुनिया में पैसे के लिए कुछ भी करो, बाद में थोड़ा सा पूजापाठ और तीर्थयात्राएं कर के ‘पाप’ धोए जा सकते हैं और मोक्ष का रास्ता निकाला जा सकता है.

वैसे तो चंबल के कई बर्बर डकैत भी महान धार्मिक रहे हैं, जिन्होंने जंगलों में ‘भैरव’, ‘दुर्गा’ आदि के मंदिर बनवाए हैं. इन मंदिरों में स्थानीय जनता अपार श्रद्धापूर्वक पूजाअर्चना करती है शायद इस भावना के साथ कि जब इस पूजा की बदौलत भगवान डकैतों को सफल डकैतियां डालने का आशीर्वाद दे सकते हैं तो थोड़ीबहुत खुराफात करने के लिए हम को क्यों नहीं.

शुरुआती दौर में धर्म, प्राकृतिक शक्तियों पर आधारित था. मनुष्य ने इन चतुर शक्तियों को जीवन के लिए जरूरी भी महसूस किया और इन की विनाशकारी क्षमताआें को भी देखा. बेबस हो कर इन के आगे समर्पण करने की भावना ने उन में से चतुर लोगों को ऐसी पूजा पद्धतियों की खोज करने का रास्ता सुझाया, जिन्होंने आगे चल कर धार्मिक विधियों का आकार लिया. इन विधियों में एक चीज अनिवार्य रूप से शामिल थी, तंत्रमंत्र के विशेष तरीके.

अतिमानवीय शक्तियों से संबंध जोड़ने के लिए काल्पनिक माध्यमों की जरूरत थी, उन के सूत्र प्रकृति से ही लिए गए. ये शुरुआती धार्मिक प्रतीक थे जो प्रकृति में वनस्पतियों, पशुओं आदि के रूप में सहज ही उपलब्ध थे.

अलगअलग मानव समूहों ने अपनी खास पहचान कायम रखने के लिए समय के साथ इन प्रतीकों के अलगअलग रूपांतरण किए और उन में चमत्कारिक, अद्भुत दिखने वाले अंश जोड़ डाले. 8 हाथों वाली देवी, 4 मुंह वाले मनुष्यकृत देवता, ऐसे देवीदेवता जिन का आधा शरीर किसी पशुपक्षी का और आधा मानव का हो, या अन्य ग्रहों से संबंध दर्शाने वाले देवीदेवता आदि इस के उदाहरण हैं. ये भारत की वैदिक सभ्यता, सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया, यूनान व विश्व की दूसरी अन्य सभ्यताआें में मिलते हैं. इसलाम से पहले मध्य एशिया में भी इन्हीं का वर्चस्व था.

धर्म में अर्थशास्त्र की नींव

धार्मिक विधियों के संकलन के तहत जब धर्मग्रंथों को रचने की शुरुआत हो रही थी तब धर्म का सांगठनिक ढांचा नहीं बना था. कई पीढि़यों से गुजर कर जब धार्मिक विधियां कुछ निश्चित आकार ले सकीं तब धार्मिक शक्तियों ने संस्थाआें का रूप लेना शुरू किया और हर समुदाय के धार्मिक लोगों ने अपने लोगों को प्रेरित किया कि वे अपने जीवनयापन का बंदोबस्त करने के अलावा धार्मिक क्रियाकलापों को भी हर तरह से समर्थन दें, जिन में आर्थिक समर्थन मुख्य था. यहीं से धर्म के अर्थशास्त्र की नींव पड़ती है.

जीने के लिए अपनी दूसरी सभी गतिविधियों की तरह ही धार्मिक कारोबार को भी विकसित करने के लिए पूंजी की जरूरत पड़ी या यों कहिए कि इन चतुर लोगों को एहसास हो गया कि कर्मशील व्यक्तियों से चमत्कारी, अलौकिक, काल्पनिक किस्सों से काफी कुछ वसूला जा सकता है. इसे विशिष्ट रूप देने के लिए साधन तो चाहिए ही. पूंजी का अपना एक विशेष चरित्र होता है, जो अपने संपर्क में आने वाली हर चीज को अवश्य प्रभावित करता है.

राज्य की अवधारणा के विकास के साथ धार्मिक विकास ने भी जोर पकड़ा. हर राजसत्ता को किसी न किसी धर्म या संप्रदाय के चमत्कारी गुरुओं से लाभ मिलने लगा क्योंकि वे जनता को भड़काने का काम सफलता से करते थे. इन से राजगुरु, राजऋषि, खलीफा, पोप पैदा हुए. राजव्यवस्था के लिए पूंजी का बंदोबस्त अर्थात राजकोष भरे जाने के लिए तमाम तरह के कठोर नियम बनाना और उन्हें लागू करना जरूरी था. यह जबरदस्ती वसूली ज्यादातर मानवीय मूल्यों के खिलाफ थी. भारत में अतीत में रही लगान और दूसरे करों की कठोर व्यवस्था, बेगारी श्रम का प्रचलन, किसी भी मजबूरी के तहत कर न चुकता करने या बेगार करने से मना करने पर जमीन जब्त करना या शारीरिक दंड देना आदि को इस संदर्भ में देखा जा सकता है.

राज्य के तमाम वैध/अवैध कामों को न्यायसंगत ठहराने के लिए धार्मिक समर्थन बड़े काम का रहा. धार्मिक शक्तियों के सहारे वसूली आसान हो गई. बदले में इस  तरह से वसूले गए धन या लूटपाट से हासिल किए गए धन के एक हिस्से को भी धार्मिक आयोजनों, धार्मिक इमारतें आदि बनवाने व धार्मिक लोगों के मार्गनिर्देशन के अनुसार खर्च करने में राजाआें को कोई आपत्ति न रही. लुटेरे आपस में कम लड़ते हैं.

अतीत में धार्मिक वैभव कीप्रतीक जिन ढेरों इमारतों या उन के खंडहरों को आज हम देखते हैं उन का बनाया जाना राजकोष से मिलने वाली विपुल आर्थिक मदद के जरिए ही संभव था न कि धर्म- प्रचारकों द्वारा द्वारद्वार जा कर चंदा इकट्ठा करने से. मिस्र के पिरामिड, ग्रीस के पैथियन, भारत के मंदिर और स्तूप सब इसी तरह राजाओं ने धर्म के इशारे पर बनवाए और पैसा वसूला काम करने वाली जनता से.

वसूली व लूटपाट

हर धर्म शांतिपूर्ण होने का दावा करता है. अमानवीय वसूली और लूटपाट करने वाले ताकतवर लोगों की धर्मों ने न तो कभी प्रभावी आलोचनाएं कीं और न ही कभी इन को रोकने के लिए कुछ किया. धर्म के पैरोकार अपने में ही मस्त अध्यात्म और दर्शन के झूलों में झूलते हुए प्रवचन गुनगुनाते रहे या अपना ज्ञान पोथियों में उड़ेलते रहे, मनुष्य की आदर्शात्मक ऊंचाइयों के मानक तय करते रहे और अमानवीय रास्ते से आने वाले पैसे तथा बेगारी से निर्मित की गई धार्मिक इमारतों व दूसरी सुविधाआें का उपयोग करते हुए राजसत्ताओं की निरंकुशता को अपरोक्ष समर्थन देते रहे.

धर्मों के मामले में, दिलचस्प विरोधाभास यह है कि भौतिक सुख- सुविधा की जिस बुनियाद पर धर्मों की विशाल इमारतें खड़ी होती हैं वे उसी को नकार कर आध्यात्मिक या पारलौकिक उपलब्धियों की ओर जाने का दावा करते हैं जबकि धर्म हमेशा ही बड़ा महंगा सौदा रहा है. मायामोह की निंदा करने वाला धार्मिक समाज, ईश्वर तक पहुंचने के लिए जितना छटपटाता रहा उतना ही भौतिकता के दलदल में गहरे धंसता चला गया.

हिंदू धर्म में लक्ष्मी की पूजा इस का बेहतरीन उदाहरण है, जो दुनिया भर में अनोखा है. लोग पैसे कमाते हैं, उसे संजो कर रखते हैं, लेकिन दुनिया भर में कहीं भी पैसे की इस तरह पूजा नहीं की जाती जैसी हमारे यहां होती है. लोग चांदीसोने के सिक्कों और नोटों की गड्डियों को ही नहीं, उन बरतनों या संदूकों को भी पूजते हैं जिन में ‘लक्ष्मी’ को रखा जाता है.

जीवन को सुखसुविधा से जीने की इच्छा के चलते ही पैसे के प्रति लालच का जन्म होता है क्योंकि पैसे से उपभोग की सभी चीजें जुटाई जा सकती हैं. स्वार्थपूर्ण लालच और हिंसा, मनुष्य की मूल प्रवृत्तियां हैं. धर्म इन पर लगाम कसने की बात करता हैं और इतिहास को देखें तो पाएंगे कि मनुष्य की इन्हीं आदतों के सहारे ही धर्मों ने दुनिया भर में अपना विस्तार किया है. आध्यात्मिक उपलब्धियों की खोज, दरअसल हमारी भौतिक आकांक्षाआें का ही विस्तार है, इसीलिए धर्मों ने अपनी मजबूत अर्थ- व्यवस्थाएं बना रखी हैं. इन के किसी भी अभियान की सफलता के लिए आर्थिक मजबूती एक जरूरी शर्त है.

आर्थिक नजरिए और अनुयायियों के व्यवहार को नियंत्रित करने में धर्मों की भूमिका हमेशा बहुत विचित्र रही है. एक तरफ चर्च, गरीबी को पुण्य के रूप में पारिभाषित करता है. जैसा कि बाइबिल कहती है, ‘गरीबों को प्रभु का आशीर्वाद मिलेगा, स्वर्ग का राज्य उन का है, अमीर को स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी आदि.’

बौद्ध धर्म भी ऐसे भिक्षु संन्यासियों का प्रशंसक है, जो चिंतनमनन में लीन हो कर खुद को आर्थिक गतिविधियों से बिलकुल मुक्त कर लेते हैं. हिंदुओं में भी, त्यागियों और संन्यासियों को बड़ा आदर प्राप्त है. लोग उन के कदमों में गिरने को तत्पर रहते हैं. यह बात अलग है कि साष्टांग दंडवत करने वाले लोगों की ज्यादातर मनोकामनाएं भौतिक समृद्धियों से जुड़ी होती हैं.

मंदिरों के ठेके करोड़ों में

इस से भी मजेदार बात यह है कि इस सारे व्यापार में लोगों को थोक भाव में आशीर्वाद बांटने वाले महात्मागण लोगों के खूनपसीने की कमाई को आराम से खींच लेते हैं और मठमंदिरों को संपन्न बना लेते हैं. इस मामले में अतीत से ज्यादा बदलाव नहीं आए हैं. सोमनाथ जैसे वैभवशाली मंदिरों की संपन्नता, महमूद गजनवी जैसे लुटेरों की काररवाइयों के चलते ऐतिहासिक किंवदंतियां बन गईं. आज भी 100-100 एकड़ जमीन में फैले भव्य मंदिरों में सोनेचांदी के भंडार हैं. तिरुपति, मैहर और वैष्णोदेवी मंदिरों के ठेके करोड़ों में उठते हैं और आमदनी भी किसी अच्छीखासी कारपोरेट कंपनी जैसी है.

इसलाम में जकात का प्रावधान एक तरफ जन्नत में कमाऊ धनी लोगों का प्रवेश तय करता है तो दूसरी तरफ इस दुनिया में गरीबी और गरीब की उपस्थिति को अनिवार्य बताता है. अगर सभी लोग स्वाभिमानी, अपनी रोजीरोटी कमाने लायक या अपने परिवार के गैर कमाऊ सदस्यों का भरणपोषण करने लायक हो गए, कोई याचक ही न रहा तो बेचारा दाता क्या करेगा?

यह अकारण नहीं है कि सभी धार्मिक स्थलों पर उठाईगीरों की फौज दिखती है, जो बहुत बार दाता का सब- कुछ छीन लेने की फिराक में रहती है. सभी प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर पूजापाठ का एक ही मुख्य स्थान नहीं होता, आसपास गलियों में कितनी ही छोटीछोटी मूर्तियां, छोटेछोटे मंदिर और पवित्र स्थान निर्मित कर दिए जाते हैं. मुख्य मंदिर में जेब हलकी करने के बाद धर्मात्मा लोग इन रास्तों पर गुजरते हुए थोड़ाबहुत चढ़ावा सभी जगह चढ़ाते हैं. कभी अपने मन से, कभी जबरन रास्ता रोक लिए जाने पर.

गरीबी और गरीब को लाख प्रशंसनीय बताने के बावजूद हर धार्मिक समूह को धन की जरूरत पड़ती है. अनुयायियों से होने वाली धनवसूली इसीलिए जोर पकड़ती है ताकि धर्म ध्वजा अधिक ऊंची व अधिक चमकीली रहे. इसी वजह से दानदक्षिणा देने वाले लोग अपने धार्मिक समुदाय में खास सम्मान के हकदार बन जाते हैं.उन के नाम के पत्थर लगते हैं.

अन्य लोगों को भी जेब ढीली करने को पे्ररित करने के लिए उन के दृष्टांत और कहानियां बनाई जाती हैं. हिंदू धार्मिक मान्यता है कि सतयुग में तपस्या, त्रेतायुग में ज्ञान, द्वापर में श्रीहरिपूजन और कलियुग में दान सर्वोत्तम है. होमोसेपियंस के विकास का इतिहास जितना पुराना है उस से कई सदी पहले से हिंदू ग्रंथों में कलियुग की शुरुआत तय कर दी गई. लिहाजा, दान के सिवा मुक्ति का कोई रास्ता बचता ही नहीं.

दान की महिमा

ज्यादातर धर्मों में दान को पुण्य के साथ जोड़ कर तरहतरह से महिमामंडित किया गया है. हम भारत की ही बात करें तो सभी प्रमुख गुप्त, मौर्य, चोल, चेर, चंदेल, पांड्य, पल्लव आदि वंशों के राजा किसी न किसी एक धर्म या धार्मिक संप्रदाय के अनुयायी रहे हैं. इन पर इन के धर्मगुरुआें का जबरदस्त प्रभाव रहा, उस के चलते कितने ही गांव उजाड़ कर आश्रमों-विहारों-स्तूपों-मठों-मंदिरों आदि के लिए राजाआें द्वारा जमीन दी जाती रही. राजाआें और उन के सामंतों द्वारा धर्म के नाम पर मेहनतकश किसानों की जमीन जबरन छीन कर धर्म के नाम पर ‘दान’ में दे दी गई और अपना यह लोक और परलोक सुरक्षित किया गया. धार्मिक अहंकार के बेजान प्रतीकों के निर्माण में बंधुआ श्रमिक बेगार करतेकरते खप गए, कोड़े और घोड़े की ताकत के बूते पर मेहनतकश किसानों की गाढ़ी कमाई को लगान व करों के नाम पर चूस कर पहले राजकोष भरे गए और फिर इस पैसे ने धार्मिक प्रतीकों को मजबूत किया.

दान ने मंदिरों को किस तरह से समृद्ध बनाया, यह महमूद गजनवी द्वारा कई बार लूटे गए सौराष्ट्र के सोमनाथ मंदिर के वैभव की चर्चा के उदाहरण मेें देखा जा सकता है. कहा जाता है कि यह मंदिर उच्चकोटि के सफेद संगमरमर का बना था. सोनेचांदी से मढ़े और हीरा, माणिक्य, नीलम आदि रत्नों से पच्चीकारी किए गए 600 खंभों पर मंदिर का रंगमंडप टिका हुआ था, जिस में केवल ब्राह्मण जा सकते थे.

गर्भगृह की छत पर कीमती रत्न और जवाहरात जड़े थे तथा सोने के दीपकों में निरंतर घी जलता रहता था. किन्नरियों और अप्सराओं सी 500 देवदासी नर्तकियां लगातार नाचगाना करते हुए भगवान और भक्तों का मनोरंजन करती थीं. इस मंदिर के शिवलिंग का अभिषेक रोज चांदी के 100 बड़ेबड़े घड़ों के गंगाजल से किया जाता था, जो निरंतर हरकारों की डाक लगा कर 1 हजार मील दूर हरिद्वार से मंगवाया जाता था.

आंध्र प्रदेश में तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर, दुनिया का सब से धनी हिंदू मंदिर है. यहां दानियों का आलम यह है कि इस सदी के फिल्मी महानायक भी यहां करोड़ों रुपए का चढ़ावा चढ़ा कर चर्चा में आए थे. एक तमिल भक्त ने 450 हीरों से जड़ा, 50 लाख की कीमत का स्वर्ण धागा यहां चढ़ाया था. इस्ताम्बूल का सोफिया चर्च कैथोलिक ईसाइयों की गाथा गाता है जबकि बाद में वह कभी मसजिद बना तो कभी कुछ और. अब यह संग्रहालय बन चुका है. उस पर 1,500 साल पहले कितना खर्च किया गया होगा, इस की बस कल्पना ही की जा सकती है.

कमाई के नए तरीके

अब तो धर्म का अर्थशास्त्र पारंपरिक के साथ नए तरीकों से भी कमाई का बेहतरीन जरिया बन गया है. धर्म और इस से जुड़े अध्यात्म के नाम पर योग से ले कर जड़ीबूटी और ध्यान की सी.डी. से ले कर ‘मनी मेकिंग मंत्राज’ तक कुछ भी बेचा जा सकता है. बेवकूफ व डरपोक जनता खरीदने को तैयार बैठी है. अमेरिकन यूनाइटेड फौर सेपरेशन औफ चर्च एंड स्टेट के शोधकर्ताओं ने अमेरिकी धार्मिक संगठनों द्वारा उगाही गई रकमों का जिक्र किया है, जो करोड़ों डालर में है.

इंटरनेट पर खोजबीन करने पर आप को कई सारी ऐसी इसलामिक वेबसाइटें मिल जाएंगी जो विश्व की कई भाषाआें में हैं और मजहब के उत्थान के नाम पर ‘फंडिंग’ करती हैं. इन में आतंकियों का समर्थन करने वालों की वेबसाइटें भी शामिल हैं. ऐसा लगता है कि कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता. हिंदुत्व को बचाने और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने की बात करने वाले भी इंटरनेट पर दान की अपील कर रहे हैं. महंगी कारों, आधुनिक मोबाइलों और सुंदर लड़कियों के बीच रहने वाले आधुनिक बाबाआें ने तमाम सेलिब्रिटीज को अपना मुरीद बना रखा है. इन में मुख्यमंत्री व बड़े उद्योगपति भी शामिल हैं.

विभिन्न त्योहारों पर महंगे धार्मिक आयोजनों में अरबों रुपए बहाए जा रहे हैं, जिस के लिए केवल कोलकाता की दुर्गा पूजा का उदाहरण पर्याप्त है. दुर्गापूजा पर 100 करोड़ रुपए से अधिक विभिन्न ‘थीम पंडालों’ जैसे अक्षरधाम मंदिर पंडाल, सत्य साईं पंडाल आदि पर 50 करोड़ रुपए, विभिन्न प्रकार की दुर्गा मूर्तियों पर और 30 करोड़ रुपए बिजली की सजावट पर व्यय किए जाते हैं. दशहरा, दीवाली, ताजिया से ले कर तमाम छोटेमोटे स्थानीय त्योहारों में भी धूमधाम पर जम कर खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ इस खर्च के आंकड़े हर साल तेजी से बढ़ते जा रहे हैं.

राजकोष से धार्मिक खर्च की परंपरा अभी जारी है. यह कभी पर्यटन विकास के नाम पर तो कभी पुरातात्विक संरक्षण के नाम पर किया जाता है. धरोहरों को सहेजना एक अलग बात है, लेकिन धर्मपरायणों की दावेदारियां अपने समाज में अकसर तनाव फैला कर बेगुनाहों की जानमाल का खतरा बनती रही हैं. हिंदू धार्मिक चैनल गुरुओं को प्रवचन के लिए टाइमस्लौट बेच कर करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं, और ये गुरु लोग जिस कारोबारी अंदाज में अपना धंधा चला रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं है.

?आस्था, संस्कार, साधना, जागरण, शक्ति, अहिंसा आदि चैनलों में से कुछ जम चुके हैं, कुछ आने की तैयारी में हैं. ब्रिटेन का एंगल फाउंडेशन ‘गौड टीवी’ चैनल चलाता है और 40 फीसदी रकम केवल चर्चों के कार्यक्रम प्रसारण से कमाता है. भारत का कैथोलिक चर्च ‘जीवन’ चैनल चलाता है और ‘क्यूटीवी’, ‘अम्मा’, ‘ईटीवी खालसा’ आदि ने भी अपना एक ठोस दर्शक वर्ग तैयार कर लिया है. इन व्यावसायिक बुद्धि से भरपूर लोगों के लिए धर्म एक जादुई पिटारा है, जिस में से वे लगातार अपने उपभोक्ताआें को लुभाने के लिए कुछ न कुछ दिलचस्प निकाल ही लाते हैं.

पूरी तरह से आर्थिक आधार पर संचालित धार्मिक गतिविधियां और ‘इन्स्टेंट’ भक्ति के रंग में रंगे लोग, जिन्होंने अपने धर्मग्रंथों को कभी छू कर देखा तक नहीं, धर्म की दुहाई पर मरमिटने को तैयार हो जाने वाले उन्मादी लोग, धर्म के नाम पर देश की बेशकीमती संपत्तियों का दुरुपयोग और अपनी गाढ़ी कमाई को धार्मिक आडंबरों पर लुटाती पुण्य कमाती भीड़ और इस भीड़ की सुरक्षा तथा प्रशासनिक व्यवस्था में जुटी सरकारें, भगदड़ और जुलूस, दंगे और विरोध प्रदर्शनों से निबटती सरकारें और इन सब कारणों से प्रभावित होती अर्थव्यवस्था और प्रभावित होते बेगुनाह लोग…

इस पूरे परिदृश्य को देख कर क्या आप को लगता है कि धर्म वाकई एक ऐसा रास्ता है जो मनुष्य को आर्थिक मायाजाल से अलग शांति, सरलता, सहजता और जीवन के संतुष्टिदायक उद्देश्यों की ओर ले जाता है.