सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ जिसे लोगों ने बेहद दिलचस्पी से देखा. वीडियो में युवती एक समारोह में उभरते युवा धर्मगुरु से सवाल पूछती दिखाई दे रही है. युवती के हावभाव और सवाल दोनों आक्रामक हैं. पहली नजर में देखते ही आभास होता है कि वह धर्म के नाम पर बरबाद होती सामग्री को ले कर व्यथित और आक्रोशित है.

यह वीडियो एक धार्मिक चैनल का हिस्सा है जिस में सिंहासननुमा कुरसी पर बाबा विराजमान हैं और नीचे पांडाल में खासी तादाद में श्रद्धालु बैठे हैं. माइक युवती के हाथ में आता है और वह बाबा से सवाल करती दिखाई दे रही है कि इस साल होली पर एक जगह बहुत बड़ा पेड़ जलाया गया, आखिर क्यों? एक छोटे से पौधे को पेड़ बनने में सालों लग जाते हैं और लोग उसे धर्म के नाम पर कुछ मिनटों में जला डालते हैं. अगर होली जलानी ही है तो कम से कम लकडि़यों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? आखिर धर्म के नाम पर बरबादी क्यों?

बाबा इस सवाल पर सकपकाए से दिखते हैं, फिर थोड़ा संभल कर युवती का परिचय पूछते हैं. बाबा को सकपकाता देख युवती की हिम्मत बढ़ती है और वह फिर शिव अभिषेक में बड़े पैमाने पर की जाने वाली दूध की बरबादी पर सवाल दाग देती है.

चूंकि सवालों में दम है इसलिए पांडाल में खामोशी सी छा जाती है. इसी बीच, जादू के जोर से युवती का पिता प्रकट होता है और माइक के जरिए बाबा को बताता है कि यह उस की बेटी है जो धर्म के बारे में ऐसे ऊटपटांग यानी निरर्थक सवाल करती रहती है, इसलिए इसे आप की शरण में लाया हूं. युवती का पिता बाबा को जानबूझ कर बताता लगता है कि उस की बेटी कौन्वैंट स्कूल में पढ़ी है. इस पर बाबा ज्ञानियों की तरह मुसकरा कर कहते हैं कि तभी तो ऐसे सवाल कर रही है.

युवती की भड़ास निकल जाने के बाद बाबा थोड़ी श्रापनुमा आक्रामक मुद्रा में आ जाता है. वह युवती से मंदिर जाने के नियम पूछता है और उस के जवाबों की बिना पर मौजूद भक्तों को यह जताने में कामयाब रहता है कि यह नई पीढ़ी है ही नास्तिक और अज्ञानी, इसलिए वह ऐसे बेहूदे सवाल पूछती है. बातचीत के दौरान बाबा टूटीफूटी अंगरेजी का भी उपयोग करता नजर आता है और युवती को ‘यार’ संबोधन इस्तेमाल करने पर डपटता भी है. इस से सिद्ध हो जाता है कि युवती पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता से प्रभावित है, इसलिए नास्तिक सी है और हमारे धर्म व संस्कारों से नावाकिफ है.

अव्वल तो इतने से ही लोग मान जाते हैं कि लड़की नादान है पर युवती की जिज्ञासाओं का समाधान होना चाहिए, इसलिए इस डिबेट के क्लाइमैक्स पर सभी की नजरें बाबा पर ठहर जाती हैं. बाबा बताते हैं कि अगर तुम्हारे मांबाप ने जिंदगीभर लाखों रुपए कमाए हैं तो बुढ़ापे में तुम उन के इलाज पर उन के पैसों को खर्च करोगी या फिर गरीबों को दान दे दोगी. अपने जवाब को विस्तार देते बाबा शाश्वत और सनातनी मुद्दे की इस बात पर आ जाता है कि इस सृष्टि में जो भी कुछ है वह सबकुछ शिव का है. वह हम से कुछ मांगता नहीं, पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उस के सबकुछ में से कुछ हम उसे दें और ऐसा कर हम कोई उपकार नहीं करते बल्कि सृष्टि के रचयिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं और पाप की कमाई को पुण्य में तबदील करते हैं.

पांडाल में बैठे भक्त नास्तिक सी युवती को हारते देख तालियां पीटने लगते हैं जो इस बात पर बाबा से सहमत हो जाती है कि अब वह भी शिव अभिषेक करेगी क्योंकि वह उस का महत्त्व नहीं जानती और करने लगेगी तो ध्ीरेधीरे जान जाएगी.

यह वीडियो करोड़ों लोगों ने देखा और बाबा की खोखली तर्कशीलता के कायल हो गए कि क्यों खामखां के सवालों, जिज्ञासाओं और दलीलों में सिर खपाएं, बेहतर तो यही है कि चुपचाप पूरी आस्था से यह मान लें कि सबकुछ ऊपर वाले का है, वही हमें देता है. अब इस में से कुछ पूजापाठ, दानदक्षिणा और चढ़ावे के जरिए उस का उस को लौटा देना कोई गुनाह नहीं, बल्कि पुण्य का काम है. रही बात युवा पीढ़ी की, तो उस के बारे में बाबा ठीक कह रहे हैं कि वह भटकाव का शिकार हैं. वह गंदी फिल्में देखती है, इसलिए उस में धर्म के जरिए सुधार की जरूरत है जो कर्मकांडों से और श्रद्धा, आस्था से आ पाएगा.

मीडिया बना जरिया

मध्य प्रदेश के देवास जिले के एक धार्मिक समारोह का यह वीडियो एक खास मकसद से वायरल किया गया था जिस से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सस्पैंस और दिलचस्प तरीके से धर्म की उक्त बात ‘तेरा, तुझ को अर्पण’ वाली पहुंचाई जा सके जिस से लोग, खासतौर से युवा, मुंह मोड़ रहे हैं. इस का मकसद कर्मकांड, दानदक्षिणा, पूजापाठ और यज्ञहवन का माहौल बनाए रखना है. धर्मभक्त परेश रावल की फिल्म ‘ओह माई गौड’ का उद्देश्य भी धर्म की पोल खोलना नहीं था, धर्म की पोल खोलने वालों को कुछ तर्क दे कर मुंह बंद कराना था. इस फिल्म में ईश्वर की उपस्थिति दर्शा कर पहले दृश्य से ही यह सिद्ध कर दिया गया था कि ईश्वर तो है चाहे जो तर्क दे दो.

सोशल मीडिया किस तरह धर्मप्रचार का अड्डा या केंद्र बन चुका है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. मीडिया व्यावसायिक हो जाए, यह हर्ज की बात नहीं, चिंता की बात मीडिया का धर्म का मुहताज हो जाना है. इस से बड़ी तादाद में लोग गुमराह और अंधविश्वासी हो रहे हैं.

अखबार धर्म संबंधित समाचारों, भविष्यफल और धार्मिक रचनाओं से भरे पड़े हैं तो न्यूज चैनल भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं. कोई दिन ऐसा खाली नहीं जाता जब हिंदीभाषाई चैनल धर्मप्रचार नहीं कर रहे होते. तरस तो तब ज्यादा आता है जब वे धर्म को सनसनी बना कर परोसते हैं कि देखिए, यहां भगवान राम और उन के भाइयों ने शिक्षा ली थी और यह रहा वह पाताललोक, जहां अहिरावण का राज्य था. ये चीजें पूरी शिद्दत से इस तरह से परोसी जाती हैं कि देखने वालों को लगने लगता है कि कुछ न कुछ तो सच इस में है. रामायण में जो लिखा है वह कोई कोरी कल्पना नहीं है.

जबकि, होता कुछ नहीं है. अखबारों का मकसद अपनी प्रसार संख्या और चैनल्स का मकसद अंधभक्तों को आकर्षित करना व सूचना देना होता है. धर्म को शाश्वत बनाए रखने में मीडिया का योगदान बाबाओं से कमतर नहीं, जो बगैर सोचेसमझे बड़े पैमाने पर सामाजिक नुकसान का जिम्मेदार हो चला है जबकि उस की असली जिम्मेदारी सामाजिक जागरूकता लाने की है.

भोपाल में पिछली नवरात्रि के मौके पर एक नामी अखबार ने तो मशहूर राम कथावाचक मुरारी बापू का धार्मिक समारोह, जो हफ्तेभर चला, प्रायोजित कर डाला. शहर के हर चौराहे पर कथावाचक के बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगाए गए. अखबार में रोज विज्ञापन और समारोह के बड़ेबड़े समाचार छापे गए. रामकथा के इस धुआंधार प्रचार का नतीजा ही था जो लाखों लोग इस में शिरकत करने को टूट पड़े. करोड़ों रुपए इस आयोजन पर खर्च हुए. एवज में भक्तों को हासिल हुए वे प्रवचन जो सदियों से गुमराह करने के लिए परोसे जा रहे हैं.

कथा स्थल पर इफरात से धार्मिक साहित्य और सामग्री बिके. लोग, खासतौर से औरतें, प्रवचनों के दौरान नाचते नजर आए. यह नजारा सोचने को विवश कर गया कि आखिर इस माहौल का असर क्या होगा और समाज को किस दिशा की ओर मोड़ा जा रहा है.

गृहशोभा विशेष

खतरनाक असर

देश बहुसंख्य हिंदुओं का है जो कहने को ही धर्मनिरपेक्ष हैं. हिंदुओं में यों तो हर रोज कोई न कोई त्योहार होता है पर हर पखवाड़े एक ऐसा त्योहार भी पड़ता है जिसे धूमधाम से मनाया जाता है.

धर्म की गिरफ्त में आते समाज की हालत यह है कि लोग बगैर सोचेसमझे, बेमकसद झूम रहे हैं और कट्टरवाद बढ़ रहा है. सोशल मीडिया पर काम की और उपयोगी बातें कम होती हैं, रामराम, श्यामश्याम ज्यादा होती हैं.

इधर, बाबाओं ने भी रंग बदलते, अपने आयोजनों और प्रवचनों में नईनई बातें कहनी शुरू कर दी हैं ताकि नयापन दिखे. चालाकी दिखाते साधु, संत, बाबा और प्रवचनकर्ता अब सामाजिक सरोकारों पर जोर देने लगे हैं. मसलन, पर्यावरण के लिए पेड़ लगाओ और उन्हें काटो मत व कन्याभ्रूण की हत्या मत करो यह पाप है वगैरावगैरा. ये गौरक्षा की बात करते हैं उस में देवताओं का वास होने की दुहाई दे कर, पर यह नहीं कहते कि गाय का अपना अलग आर्थिक महत्त्व है, वह दूध देती है और उस का चमड़ा व्यावसायिक उपयोग में लाया जाता है. इसी तरह ये भविष्य के लिए पानी बचाने की बात नहीं कहते, बल्कि नदियों को पूजने के लिए उकसाते हैं ताकि पंडों को पैसा मिलता रहे.

हास्यास्पद बात यह है कि इन्हीं आयोजनों में यज्ञहवन के लिए इफरात से लकडि़यां जलाई जाती हैं. यानी धर्म और उस के दुकानदार कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं करते. उलटे, यह जताने की कोशिश करते हैं कि उन के भी सामाजिक सरोकार हैं और लोग इस की आड़ में भी धर्म से जुड़े रह सकते हैं.

एक पूरी पीढ़ी दिमागीतौर पर एक बार फिर अपाहिज बनाई जा रही है. कोई वीडियो इसीलिए जानबूझ कर एक साजिश के तहत वायरल किया जाता है कि जिस से लोग लकडि़यां फूंकते रहें. अभिषेक के नाम पर दूध बहाते रहें और यह न पूछें कि आखिर यह बरबादी क्योें? रही बात गरीबों की मदद की, तो इस बाबत प्रवचनों में स्पष्ट कर दिया जाता है कि यह सबकुछ माया और मिथ्या है. हर आदमी अपने कर्मों के मुताबिक फल भुगत रहा है. इस ईश्वरीय व्यवस्था में हस्तक्षेप से कोई फायदा नहीं. गरीबों की मदद ऐच्छिक बात है.

भोपाल में मोरारी बापू ने 7 दिनों तक तरहतरह से यही सुनाया कि सबकुछ करो पर धर्म और संस्कारों को मत छोड़ो. लड़कियां पढ़ें, यह हर्ज की बात नहीं पर उन्हें संस्कारों का ध्यान रखना चाहिए. युवा तकनीकी तौर पर शिक्षित हों पर धर्म को न भूलें, वरना भटकाव का शिकार हो जाएंगे. इन की नजर में संस्कार का एक ही मतलब होता है कि पूजापाठ करो, दक्षिणा देते रहो.

आत्मविश्वास छीनता धर्म

धर्म का प्रचारप्रसार, दरअसल, लोगों से आत्मविश्वास छीन रहा है. रोजमर्राई जीवन में अज्ञात आशंकाएं हावी होती जा रही हैं. लोगों ने मान लिया है कि उन की परेशानियों की वजह उन के कर्म हैं और प्रारब्ध को बदला नहीं सकता. जो लिखा है वह हो कर रहेगा. अब अगर किसी काल्पनिक अनिष्ट से बचना है तो दानदक्षिणा देते रहो और पूजापाठ में लगे रहो.

यह वह दौर है जिस में लोग सब से ज्यादा परेशानियों से जूझ रहे हैं. बेरोजगारी चरम पर है और धर्म के प्रभाव के चलते शिक्षा अपना प्रभाव, महत्त्व व उपयोगिता खो रही है. यदि शिक्षित हो गए तो वह भी ऊपर वाले की मेहरबानी है. आप को रोजगार मिल गया तो यह पूजापाठ और अभिषेकों का फल है. मकान, कार और दूसरी तमाम सुखसुविधाएं धर्म की देन हैं, उन में आप की मेहनत और काबिलीयत का कोई योगदान नहीं.

भेड़चाल चलते लोग कैसे इस सम्मोहन और भ्रम की गिरफ्त में लिए जाते हैं, यह बात कम ही लोग समझ पाते हैं. दरअसल, उन्हें तरहतरह से डराया जाता है. जीवन की नश्वरता और जगत का मिथ्या होना बारबार इतनी और इस तरह से दोहराया जाता है कि लोग अपनी स्वभाविक जिंदगी नहीं जी पा रहे. लोग तर्क नहीं करते, न ही अब सवाल पूछते हैं कि ऐसा क्यों और ऐसा क्यों नहीं, बल्कि धर्म के ग्लैमर की गिरफ्त में आ कर खुद को ही अज्ञात आशंकाओं से बचाने में भलाई समझते हैं.

यह बड़ा सस्ता सौदा है कि कमाई का कुछ हिस्सा इस माहौल को बनाए रखने वालों को दान में दे दो और भूल जाओ कि इस के नतीजे क्या निकलेंगे और कैसेकैसे निकल भी रहे हैं. मामूली सी परेशानी को झेलने की ताकत खोते लोग तुरंत मंदिर की तरफ भागते हैं. वहां उन्हें सुरक्षा महसूस होती है. वे परेशानी से लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. इस से होता यह है कि परेशानी ज्यों की त्यों रहती है जबकि उन में डर की मात्रा बढ़ती जाती है.

आत्मविश्वास खोने के मामले में महिलाएं तो पुरुषों से भी एक कदम आगे हैं. बच्चों की स्कूलबस 10 मिनट भी लेट हो जाए तो वे इस की वजहें समझने की कोशिश नहीं करतीं कि ट्रैफिक ज्यादा होगा, बस खराब भी हो सकती है और मुमकिन है किसी वजह से स्कूल से ही बस देर से चली हो. वे तुरंत बगल वाले मंदिर में बैठी मूर्ति को प्रसाद बोल देती हैं और जब कुछ देर बाद बस आती दिखती है तो भगवान को धन्यवाद देते प्रसाद चढ़ा भी देती हैं. यह एक छोटा सा उदाहरण है वरना तो परेशानी के दायरे के मुताबिक प्रसाद और दानदक्षिणा की राशि बढ़ती जाती है.

यह वह दौर है जिस में लड़कियों की शादी के लिए लड़के मन्नतों के जरिए ढूंढ़े जाते हैं. लड़कों की नौकरियों के लिए ब्रैंडेड बाबाओं के चक्कर काटे जाते हैं. बीमारी का इलाज तो डाक्टर से कराया जाता है पर मनाया भगवान को जाता है कि हे प्रभु, पति को जल्द ठीक कर दो, इतने व्रत रखूंगी और उतने का प्रसाद चढ़ाऊंगी.

इसलिए बढ़ रहा कट्टरवाद

इन छोटीमोटी रोजमर्राई बातों का असर बड़े खतरनाक तौर पर बड़े पैमाने पर देखने में आता है. ये अंधविश्वास, कट्टरवाद की जनक भी हैं. जब कहने को और मांगने को कुछ नहीं होता तो लोगों का धार्मिक चोला दूसरे धर्मों की आलोचना में जुट जाता है.

इसलामिक कट्टरवाद बढ़ रहा है, यह अकसर कहा जाता है क्योंकि इस के भी उदाहरण सहज मिल जाते हैं. अंदरूनी तौर पर बड़े पैमाने पर प्रचार यह होता है कि उदार आधुनिक और वैज्ञानिक सोच के दिखने के चक्कर में हिंदू अपने धर्म, संस्कृति, रीतिरिवाजों और पूजापाठ से कटते जा रहे हैं, इसलिए मुसलमान हावी हो रहे हैं, उन की जनसंख्या बढ़ रही है और वे पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं, इसलिए उन में एकता है.

पूजापाठ और धर्मांधता बढ़ने और बढ़ाए जाने की एक वजह दूसरे धर्मों से इस तरह बैर करना सिखाया जाना भी है कि एक दिन ऐसा आएगा जब तुम अपने ही देश में बेगाने, बेचारे और अल्पसंख्यक हो कर पहले की तरह गुलाम हो जाओगे.

इसलाम, ईसाई या दुनिया का कोई भी दूसरा धर्म इस मानसिकता का अपवाद नहीं है. अमेरिका में हो रही नस्लीय हिंसा इस की जीतीजागती मिसाल है. वहां डोनाल्ड ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद चुनचुन कर एशियाई मूल के लोगों को खदेड़ा जा रहा है, उन की हत्याएं की जा रही हैं. इन में भारतीय भी शामिल हैं. बहुत सपाट लहजे में कहें तो राम, हनुमान या शंकर अमेरिका में भारतीयों की रक्षा कर पाने में असमर्थ हैं. इसी तरह भारत में अफ्रीकी मूल के लोगों को प्रताडि़त किया जा रहा है. दलित और आदिवासी तो यहां के मूल निवासी हो कर भी सामाजिक व धार्मिक प्रताड़ना के शिकार और उपेक्षित हैं.

साबित यह होता है कि चैन कहीं नहीं है. धर्म के नाम पर फसाद हर जगह हो रहे हैं. इस मसले पर कोई किसी से पिछड़ना नहीं चाहता. आत्मविश्वास की कमी लोगों को दुनियाभर में हिंसक बना रही है जिस का जिम्मेदार धर्म ही है जिसे काल मार्क्स ने अफीम का नशा यों ही नहीं कहा था. एक विराम के बाद, प्रचार के जरिए धार्मिक कट्टरवाद फिर सिर उठा रहा है, तो यह दुनियाभर के लिए चिंता की बात है.

पोप, मुल्ले और पंडे बेफिक्र हैं जो इस खेल को धर्मप्रचार व धर्मग्रंथों की आड़ में खेल रहे हैं. उन का मकसद बगैर कुछ करेधरे पैसे बनाना और ऐशोआराम की जिंदगी जीना है. सो, वे तो जी रहे हैं, परेशानी आम लोग उठा रहे हैं जो उन के ग्राहक और मोहरे बने हुए हैं.

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