गोवा के टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग मिनिस्टर विजय सरदेसाई ने  कहा है कि उत्तर भारतीय पर्यटक गोवा आ कर उसे गुरुग्राम जैसा गंदा बनाने की पूरी कोशिश करते हैं. वे सड़क पर कूड़ा फेंकते हैं, समुद्री तटों को गंदा करते हैं, बस में खड़े हो कर पेशाब तक कर डालते हैं.

16 लाख की आबादी वाले गोवा में 65 लाख यात्री सैर करने आते हैं. ये यात्री पूरी तरह से बिगड़ैल और असभ्य ही होते हैं और इन्हें गोवा को दूसरे राज्यों की तरह गंदा करने से कोई परहेज नहीं है.

नरेंद्र मोदी की 4 साल की स्वच्छ भारत कैंपेन को इस से अच्छा सर्टिफिकेट मिलना कठिन है, जब उन की ही पार्टी का एक मंत्री उन्हीं के नारों को खोखला बनाए. दरअसल, हमारे पूरे देश में सिविक सैंस की भारी कमी है और उस का कारण यह है कि हमारे नीतिनिर्धारक, शिक्षित, अमीर, सभ्य साफ कालोनियों में रहने वाले दूसरों को जानवर और गंवार समझते हैं.

हमारे यहां सफाई की जिम्मेदारी हमेशा दूसरों की रही है. सफाई की हजार चीजें उपलब्ध हों पर यहां बिकती झाड़ुएं ही हैं, क्योंकि अगर महंगी मशीनें अनपढ़ों को दे भी दी जाएं तो वे 4 दिन में ही खराब हो एंगी. चूंकि पढ़ेलिखों को झाड़ू नहीं चलानी आती, इसलिए बहुत थोड़े से घरों में वैक्यूम क्लीनर दिखेंगे.

सफाई का एक कल्चर होता है पर हमारे यहां तो कल्चर यह है कि सफाई करने वाला खुद गंदा रहे. अच्छे वेतन वाले सफाई कर्मचारी को साफसुथरा देख कर हमारे यहां आंखें चौड़ी कर ली जाती हैं. हमारे यहां सफाई रखना वर्ग विशेष का काम है, बाइयों का काम है. इसीलिए सारा देश गंदा रहता है. हम खुद साफ न करेंगे तो इस की महत्ता समझ न पाएंगे.

गोवा कई दशकों तक पुर्तगाली शासन में रहा जहां उन्होंने हरेक को बराबर का समझा और नतीजा यह है कि वहां की प्रति व्यक्ति आय भी अच्छी है और सफाई के प्रति हर जने की अवधारणा भी. और इलाकों से आने वाले भारतीय पर्यटक यह समझ नहीं पाते.

साफसफाई उत्पादकता बढ़ाती है, यह भेदभाव कम करती है, बीमारियां कम करती है, पर हमारे यहां घरों से ले कर नौर्थ ब्लौक (जहां केंद्र सरकार के कार्यालय हैं) तक सभी एकसमान गंदे हैं. डिगरी का फर्क हो सकता है पर मूलतया सफाई की जिम्मेदारी हमेशा किसी और की होती है.

गोवा के मंत्री का गुस्सा वाजिब है. उन के बयान पर थोड़ा हल्ला मचा है पर जब तक लोग खुल कर न बोलेंगे, देश सुधर नहीं सकता.

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