गृहशोभा विशेष

इस देश में औरतों की क्या स्थिति है, यह एक छोटी सी घटना से जाहिर है. दिल्ली जैसे शहर की एक कालोनी में यह घटना हुई, जो आदमियों और परिवारों की मानसिकता को बताती है. एक घर में पतिपत्नी का विवाद था तो पत्नी रूठ कर मायके चली गई. पीछे से पति ने आत्महत्या कर ली. पति के घर वालों को लगा था कि कम से कम अब तो पति का दुख जताने के लिए झूठे ही सही, पत्नी ससुराल रोनेधोने के लिए तो आएगी पर वह नहीं आई.

पति की मौत के 2 माह बाद पति के संबंधी पत्नीके घर गए और उन में से एक ने पत्नी की छुरे से हत्या कर डाली. सालभर पहले हुई शादी का अंत दोनों की मौतों से हो गया.

पतिपत्नी में झगड़ा हो तो मामला पतिपत्नी का है. अगर शादी साल भर पुरानी हो और कोई बच्चा न हो तो औरत को जबरन पति से नहीं बांधा जा सकता. न ही उस के मरने के बाद उसे छातियां पीटपीट कर रोने का नाटक करने पर मजबूर करा जा सकता है. पर आज भी परिवारों की सोच यही है कि पत्नी का जीवन तो पति के सहारे ही चलता है.

पत्नी ने मृत पति के लिए स्यापा नहीं किया तो पति व घर वालों को अपमान लगा और इस अपमान की जड़ में यही मान्यता है कि शादी के बाद तो पत्नी पति की गुलाम हो जाए. पति मर जाए तो पत्नी रोएधोए, विधवाओं की तरह रहे.

दुनियाभर के रीतिरिवाजों को पूरा करे. पति के घर वाले और पति खुद पत्नी को एक तरह से गुलाम मानने लगता है और यह किस्सा दिल्ली का है जहां की आबादी देशभर में सब से ज्यादा पढ़ीलिखी है. उसे सब से ज्यादा नई सोच मिलती है. वहां ऐसे लोग मौजूद हैं, जो हर डोर टूट जाने के बाद भी समझते हैं कि पत्नी को तो विधवा की तरह रहना ही होगा. शायद उन के मन में होगा कि पति की आत्मा को मुक्ति तभी मिलेगी.

हर औरत को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का हक है. यदि वह पति के साथ भरेपूरे घर में अपनी सहमति से आती है तो उसे सब मान लेना होगा पर जब वह घर छोड़ कर ही जा चुकी हो और पति की मृत्यु हो चुकी हो तो उस पर ससुराल वालों की जिद हरगिज नहीं थोपी जा सकती. आज भी यह सोच आखिर क्यों कायम है कि पत्नी की तो मृत देह ही पति के घर से निकलेगी?