गृहशोभा विशेष

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तीनों सहेलियों में एक आभा ही थी,  जो अपने जीवन और परिवार से खुश थी. एक दिन आभा को शालिनी ने फोन पर बताया कि उस के पति पार्थ उस पर बेइंतहा जुल्म करते हैं, तो उस ने पार्थ को समझाना चाहा. पर वह उलटे ही आभा से लड़ पड़ा. उधर रितिका का भी अपने पति से रिश्ता सामान्य नहीं था. रितिका एक दिन गहरी मुसीबत में फंसी तो उस ने आभा से मदद मांगी.

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मैं ने तय कर लिया है कि मैं निरंजन से क्विक डाइवोर्स ले लूंगी. फिर इटली जाऊंगी और ऐंटोनियो से शादी कर लूंगी… फिर एक दिन आभा को अचानक फेसबुक पर रितिका की खबर मिली.जबशालिनी का पति वापस लौटा तो आभा ने उसे फोन किया.

 आप फिर हमें परेशान करने लगीं,’’ पार्थ का स्वर तीखा हुआ.

‘हां और ये मेरी आखिरी वार्निंग है. अगर मैं ने यह सुना कि आप ने फिर अपनी पत्नी को मारापीटा है तो मैं सीधे पुलिस के पास जाऊंगी. और मैं शालिनी के मांबाप को भी आप के बरताव के बारे में बताने वाली हूं.’’

‘‘शौक से. मैं तो यही चाहता हूं कि उन्हें मेरे बारे में पता चले और वे शालिनी को वापस बुला लें. मैं खुद उस औरत से पिंड छुड़ाना चाहता हूं.’’

आभा सकते में आ गई.

‘‘तो आप ने उस से शादी क्यों की?’’ उस ने सवाल किया.

‘‘यही तो मेरे जीवन की सब से बड़ी भूल है.’’ आभा निरुत्तर हो गई. एक दिन अचानक रितिका उस के यहां आ पहुंची.

‘‘अरे तू?’’ आभा हर्ष से चीखी.

‘‘हां मैं. कह रही थी न कि तुझ से मिलने आऊंगी सो देख आ धमकी.’’

आभा उस की ओर मंत्रमुग्ध सी देखती बोली, ‘‘तेरा रंग तो और भी निखर गया. खूबसूरत तो तू थी ही पर अब तो और ज्यादा आकर्षक हो गई है.’’ रितिका हंस दी.

आभा ने उसे बैठा कर उस की पसंद का खाना खिलाया. फिर दोनों सखियां बैडरूम में बैठ कर गपशप करने लगीं.

‘‘अब सुना तेरी कैसी निभ रही है?’’ आभा ने पूछा.

‘‘अब तक तो सब अच्छा ही चल रहा था पर आगे की नहीं कह सकती,’’ रितिका ने अपने कंधे उचकाए.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मुझे मेरे पति से कोई शिकायत नहीं थी सिवाए इस के कि वे अपने काम को ले कर बहुत व्यस्त रहते थे. उन के पास मेरे लिए बिलकुल समय नहीं था. पर इस बात को ले कर मैं ज्यादा परेशान नहीं थी, क्योंकि उन का काम ही ऐसा था. एक दिन में लाखों के वारेन्यारे होते थे. जब उन के पास पैसे होते थे तो वे मुझे नोटों की गड्डी पकड़ा कर कहते थे कि लो ऐश करो. पर अब अचानक एक नई समस्या खड़ी हुई है. निरंजन के ऊपर केस चलने वाला है.’’

‘‘ये क्या कह रही है तू?’’

‘‘हां, निरंजन ने जल्द से जल्द पैसा कमाने की जुगत में कुछ गलत काम कर दिया. क्या कहते हैं उसे…‘इनसाइडर ट्रेडिंग तू समझती है न? उन्हें पहले से खबर लग जाती थी कि किस शेयर का भाव बढ़ने या गिरने वाला है और वे चुपचाप अपने लिए शेयर खरीद या बेच लेते थे. इस तरह उन्होंने अच्छीखासी रकम खड़ी कर ली. पर आखिरकार पकड़े गए. चूंकि ऐसा करना कानूनन जुर्म है, वे कानून के शिकंजे में आ गए हैं. उन पर मुकदमा चलेगा?’’ आभा स्तंभित हुई, ‘‘यह तो बड़ा बुरा हुआ. अब क्या होगा?’’

‘‘निरंजन पर मुकदमा चलेगा. हार गए तो उन्हें जेल हो सकती है.’’

‘‘क्या कहती है तू?’’

‘‘सच कह रही हूं.’’

‘‘रितिका ये तो बड़ी बुरी खबर सुनाई तू ने. कितने मजे में तेरी जिंदगी गुजर रही थी. क्या इस मुसीबत से बचने का कोई रास्ता नहीं है?’’

‘‘लगता तो नहीं है.’’

रितिका उदास मुद्रा में बैठी कौफी के कप में चम्मच डुलाती रही.

‘‘अब तू क्या करेगी?’’

‘‘समझ में नहीं आता कि क्या करूं. सोचती हूं निरंजन को उन के हाल पर छोड़ दूं, उन्हें तलाक दे दूं और अपने घर का रास्ता नापूं.’’

‘‘क्या कह रही है तू? अपने पति को इस हालत में छोड़ देगी?’’

‘‘और मैं कर ही क्या सकती हूं, तू ही बता? जब वे सजा काटेंगे तो मैं अकेले कैसे निर्वाह करूंगी? मैं ने यहां आज तक नौकरी नहीं की है और कोशिश भी करूं तो मुझे एक मेड की नौकरी से अधिक कुछ नहीं मिलेगा.’’

‘‘तो?’’

‘‘मुझे लगता है कि घर ही लौटना पड़ेगा. इस के सिवा कोई चारा नहीं है. मेरे पिताजी का देहांत हो चुका है. मां बिलकुल अकेली पड़ गई हैं.’’ पहली बार आभा ने अपनी सखी को इतना उदास और मायूस देखा था. वह उस के लिए चिंतित हो गई.

थोड़ी देर बाद रितिका ने अपने आंसू पोंछे.

‘‘छोड़ भी यार,’’ उस ने अपने पहले वाले बिंदास अंदाज में कहा, ‘‘जो भी होगा देखा जाएगा. जब तक सांस तब तक आस. अभी से रोरो कर क्यों हलकान होऊं. चल जरा बाहर घूम कर आते हैं.’’ बाहर एक रेस्तरां में दोनों बैठ कर आपस में बतियाने लगीं. रितिका बोलने लगी, ‘‘तुझे एक भेद की बात बताऊं, मेरा एक नया दोस्त बन गया है.’’

‘‘अरे?’’ आभा उस का मुंह ताकने लगी.

‘‘हां, एक रोज मैं मौल के बाहर सड़क पर अपने खरीदे हुए सामानों से लदी खड़ी थी और टैक्सी की खोज में थी कि एक लाल रंग की स्पोर्ट्स कार मेरे पास आ कर रुकी. उस में बैठे युवक ने मुझ से पूछा कि मैडम आप को कहां जाना है? क्या मैं आप को कहीं ड्रौप कर सकता हूं?’’

‘‘मैं एक क्षण को चकरा  ई. फिर सोचा कि इस में हरज ही क्या है. वह नौजवान इतालवी बड़ा हैंडसम था और उस का नाम ऐंटोनियो था. उस ने मुझे घर छोड़ा और मैं ने शिष्टाचारवश उसे एक कप कौफी पीने का न्योता दिया. फिर हमारी बाकायदा मुलाकातें होने लगीं.’’

‘‘और तेरे पति को यह बात मालूम है?’’

‘‘नहीं, उन्हें ऐंटोनियो के बारे में कुछ नहीं मालूम. वे तो वकीलों और कोर्टकचहरी के चक्कर लगा रहे हैं. उन्हें खुद की भी सुध नहीं है. लेकिन मुझे ऐंटोनियो अच्छा लगने लगा था. वह करीब रोज ही मेरे यहां पहुंच जाता और अपनी कार में मुझे लौंग ड्राइव पर ले जाता. मेरा समय अच्छा गुजरता था. धीरेधीरे मुझे लगने लगा कि मैं और ऐंटोनियो एकदूसरे के करीब आ रहे हैं और अब ऐसा लगता है कि मैं उस के बिना रह नहीं सकती. ’’

‘‘अरे?’’

‘‘हां आभा, मैं उसे प्यार करने लगी हूं. पहली नजर में ही वह मुझे भा गया. तू उसे देखेगी तो गश खा जाएगी, इतना हैंडसम है वह. लंबाचौड़ा, भूरी आंखें, घनी बरौनियां, घुंघराले बाल और जब वह अपनी टूटीफूटी अंगरेजी में बात करता है तो और भी प्यारा लगता है.’’ आभा उसे एकटक देखती रही. फिर बोली, ‘‘ओह, रितिका तेरा क्या होगा? तू तो बचकानी हरकत कर रही है. तेरे इस प्यार का क्या अंजाम होगा कुछ सोचा भी है? जब निरंजन को इस बारे में पता चलेगा तो वे क्या कहेंगे?’’

‘‘पता नहीं, लेकिन मैं बस इतना जानती हूं कि ऐंटोनियो के बिना मेरा जीना मुश्किल है. निरंजन जब मेरे जीवन में आए तो वह महज एक समझौता था. वह शादी मैं ने सिर्फ पैसे के लिए की थी. लेकिन ऐंटोनियो के लिए मेरा प्यार एक जनून है, एक पागलपन है.’’

‘‘और तेरा ऐंटोनियो इस बारे में क्या कहता है?’’

‘‘वह भी मुझे जीजान से चाहता है. मुझ से शादी करना चाहता है.’’

गृहशोभा विशेष

‘‘शादी?’’ आभा चौंक पड़ी, ‘‘रितिका, शादी एक बहुत बड़ा कदम है. कहीं तू कुएं से निकल कर खाई में न गिर जाए. आखिर वह शख्स तेरे लिए अजनबी ही तो है. तू उस के बारे में कुछ भी तो नहीं जानती.’’ ‘‘जानती हूं. मैं ने सब पता लगा लिया है. ऐंटोनियो खानदानी रईस है. उस की रगों में शाही खून दौड़ रहा है. उस के पास बेशुमार दौलत है. इटली में रोम के पास ही एक टापू पर उस का महल है और वह अपने मातापिता का अकेला वारिस है. उस ने मुझे न्योता दिया है कि मैं इटली आऊं और उस के घर को देखूं, उस के परिवार से मिलूं.’’

‘‘और निरंजन का क्या होगा?’’

‘‘निरंजन को छोड़ना ही पड़ेगा. मैं ने तय कर लिया है कि मैं क्विक डाइवोर्स ले लूंगी जो फौरन मिल जाता है. फिर मैं इटली जाऊंगी और ऐंटोनियो से ब्याह कर लूंगी.’’ ‘‘देख रितिका जो भी करना जरा सोचसमझ कर करना और मुझ से वादा कर कि तू मुझे अपने बारे में खबर देती रहेगी.’’

‘‘अवश्य. तुझे नहीं बताऊंगी तो और किसे बताऊंगी? तू मेरी बैस्ट फ्रैंड है.’’ समय गुजरता रहा. आभा के यहां 2 प्यारेप्यारे बच्चे हो गए. वह अपनी घरगृहस्थी में पूरी तरह रम गई. अब उसे दम मारने की भी फुरसत नहीं थी. कभीकभी वह बुरी तरह थक जाती. जब राम घर आता तो वह शिकायत करती, ‘‘ओह, आज मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा है पूरे 3 घंटे किचन में खड़ी रही.’’

‘‘ओहो, किस ने कहा था तुम्हें इतने सारे और्डर लेने को? लाओ मैं तुम्हारे पैर दबा दूं.’’

‘‘हटो कोई देखेगा तो कहेगा कि मैं अपने पति से पैर दबवा रही हूं.’’ क्या हुआ? आज बराबरी का युग है. तुम मेरे पैर दबाओगी तो मुझे भी तुम्हारे पैर दबाने पड़ेंगे.’’ क्या राम जैसे पुरुष भी इस संसार में होते हैं? उस ने सोचा. यदि राम ने उस की भावनाओं को न समझा होता, यदि वह उस के प्रति संवेदनशील न हुआ होता तो क्या आभा अपने सगेसंबंधियों से दूर अमेरिका में इतने दिनों रह पाती? पर राम के साथ ये चंद साल पलक झपकते बीत गए थे. एक दिन वह किचन में खड़ी खाना बना रही थी. उस ने चूल्हे पर कड़ाही चढ़ा कर उस में तेल उड़ेल दिया और अपनी एक सहेली से फोन पर बातें करने लगी. तेल गरम हो गया तो अचानक उस में आग लग गई. रसोईघर की छत तक लपटें उठने लगीं. लकड़ी की छत धूधू कर के जलने लगी और स्मोक अलार्म बजने लगा. आभा की चीख निकल गई. वह अपने बच्चों को ले कर घर से बाहर भागी. उस ने राम को फोन किया तो फौरन वह घर आया. फिर दमकल की गाडि़यां आईं और आग पर काबू पा लया गया.

‘‘बस बहुत हुआ,’’ राम ने उसे झिड़का, ‘‘अब तुम्हारा घरेलू व्यापार बंद. इस के चलते हमारा आशियाना जल कर खाक हो गया होता. शुक्र है कि घर जलने से बच गया.’’

‘‘और मेरे पास इतने सारे जो और्डर हैं उन का क्या होगा?’’

‘‘वे सब कैंसल…और एक खुशखबरी है तुम्हारे लिए.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘मेरा प्रमोशन हो गया. अब मैं अपनी कंपनी का वाइस प्रैसिडैंट हूं.’’

‘‘अरे वाह. यह तो बड़ी अच्छी खबर है.’’

‘‘हां. इस का मतलब है कि अब तुम्हें इतनी मेहनत करने की जरूरत नहीं. यह काम बंद करो और जरा बच्चों पर ध्यान दो. वे बड़े हो रहे हैं.’’ ‘‘ठीक है. पर अब किचन की मरम्मत कराने का उपाय करो नहीं तो वहां खाना बनाना मुश्किल होगा.’’

‘‘वह सब छोड़ो. आज हम होटल में खाना खाऐंगे और अब हम नए घर में शिफ्ट होंगे. तुम्हारे लिए नई कार आएगी.’’ ‘‘सच? ओह राम तुम कितने अच्छे हो,’’ वह पति के गले से झूल गई, ‘‘पर पहले अपने लिए नई गाड़ी ले लो. तुम्हारी कार एकदम खटारा हो रही है.’’

‘‘नहीं, पहले मेमसाहब की गाड़ी खरीदी जाएगी.’’

‘‘लेकिन वाइस प्रैसिडैंट तो तुम बने हो.’’

‘‘वह ओहदा, रुतबा सब बाहर वालों के लिए. उन के लिए मैं मिस्टर राम कुमार हूं. अपनी कंपनी का कर्ताधर्ता. घर में तो तुम्हारा राज चलता है…मुझे यह बात कहने में जरा भी संकोच नहीं होता कि मेरी नकेल तुम्हारे हाथों में है. अगर तुम इस घर की बागडोर को कस कर नहीं पकड़तीं तो सब बिखर जाता. मैं भलीभांति जानता हूं कि इस घरपरिवार को सहेज कर रखने का और बच्चों की सही परवरिश का श्रेय तुम्हें ही जाता है. तुम सही अर्थों में मेरी सहधर्मिणी साबित हुईं और तुम्हारे इस सहयोग के लिए मैं हमेशा तुम्हारा आभारी रहूंगा.’’ आभा का तनमन पति के प्यार की ऊष्मा से ओतप्रोत हो गया. साल पर साल गुजरते गए.

 एक दिन राम ने दफ्तर से लौट कर उस से कहा, ‘‘तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है.’’

‘‘एक और प्रमोशन?’’ आभा चहकी.

‘‘नहीं, तुम तो जानती हो कि हम हिंदुस्तानियों को योग्य होने पर भी कंपनी का प्रैसिडैंट नहीं बनाया जाता. इस मामले में अमेरिकन बड़े घाघ होते हैं. खुशखबरी यह है कि हम इंडिया वापस जा रहे हैं.’’

‘‘अरे अचानक?’’

‘‘हां बहुत दिन वनवास काट लिया. अब अपनों के बीच दिन गुजारने की इच्छा हो रही है. मैं ने तय कर लिया है कि मैं रिटायरमैंट ले लूंगा. इतने दिनों अपने लिए खटता रहा अब दूसरों के लिए काम करूंगा.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि अब मैं अपने देशवासियों के लिए काम करूंगा. समाजसेवा. क्या समझीं? हमारे बच्चे बड़े हो गए हैं. अच्छा पढ़लिख रहे हैं. उन के बारे में हमें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं. हम उन्हें यहां छोड़ कर वापस घर जाएंगे. मेरे गांव में अपनी पुश्तैनी जमीन है, एक जीर्णशीर्ण घर है, वहां बस जाएंगे. मैं सोच रहा हूं कि उस जमीन में बच्चों के लिए एक छोटा सा प्राइमरी स्कूल खोल देंगे. मुझे हमेशा पढ़ाने का शौक रहा है. मैं उन्हें पढ़ाऊंगा.’’

‘‘और मैं क्या करूंगी?’’

‘‘तुम उन बच्चों के लिए दोपहर का खाना बना कर भेजना. मैं विद्यादान करूंगा, तुम अन्नदान करना. इस से बढ़ कर पुण्य का काम और कोई नहीं है. क्यों, क्या कहती हो?’’

‘‘मैं आप के साथ हूं.’’ फिर एक दिन आभा को अचानक फेसबुक पर रितिका की खबर मिली. उस ने लिखा था, ‘तुम्हारा नाम फेसबुक पर देखा तो तुम से फिर संपर्क करने की तमन्ना हुई. युगों बीत गए तुम से बात किए या मिले हुए. अपना हालचाल बताना.’ आभा खुशी से उछल पड़ी. इतने सालों बाद अपनी सखी का संदेश पा कर वह भावुक हो गई. उस ने फौरन रितिका को फोन लगाया.

‘‘रितिका,’’ वह फोन पर चीखी.

‘‘आभा माई डियर, मैं बयान नहीं कर सकती कि मुझे तुम से बात कर के कितनी खुशी हो रही है. मैं ने सुना कि तू इंडिया आ गई है.’’

‘‘हां, और तू कहां है? इटली में?’’

‘‘अरे नहीं यार, इटली तो छूट चुका.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘यह एक लंबी कहानी है, ऐंटोनियो बड़ा फरेबी निकला.’’

‘‘क्या कह रही है तू?’’

‘‘हां आभा. उस ने मुझे बड़ा धोखा दिया.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘वह बड़ा झूठा था. वह गले तक कर्ज में डूबा हुआ था. उस का महल भी गिरवी पड़ा था.’’

‘‘तो उस का काम कैसे चलता था?’’

‘‘पता नहीं. उस ने मुझे अपने महल में टिका दिया. शुरूशुरू में वह मुझ से बहुत प्यार जताता था. पर जब उसे पता चला कि मैं इंडियन हूं पर किसी रियासत की राजकुमारी नहीं और न ही मेरे पास अगाध दौलत है जिसे वह हथिया सके, तो उस ने मेरी ओर से आंखें फेर लीं. उस ने गिरगिट की तरह रंग बदला. वह महीनों घर से गायब रहता. न मेरा हाल पूछता न अपने बारे में कुछ बताता. धीरेधीरे मुझे उस की असलियत मालूम हुई. उस के पास आमदनी का कोई जरीया नहीं था. वह अमीर औरतों को अपने जाल में फांसता था और उन से पैसे ऐंठता था. यही उस की जीविका का आधार था और यही उस का पेशा था. दरअसल, वह एक जिगोलो था. वह पैसे के लिए अपना तन बेचता था. भला ऐसे आदमी के साथ मैं कैसे रह सकती थी? उस ने तो मुझे भी धंधे में झोंकने की कोशिश की.’’

‘‘ओह नो.’’

‘‘हां. जब मुझे उस के नापाक इरादों की भनक मिली तो मैं चौकन्नी हो गई. मैं ने वहां से भागने का प्लान बनाया. हालांकि यह काम इतना आसान नहीं था. फिर भी मैं ने घर की एक बुढि़या नौकरानी को अपने कुछ गहने दिए और उस की मदद से मैं ने एक नाव किराए पर ली और नदी पार की. रोम पहुंच कर मैं सीधे इंडियन ऐंबैसी की शरण में गई. वहां अपनी राम कहानी सुनाई और फिर भारत वापस पहुंची. अब मैं अपनी मां के साथ रहती हूं, बिलकुल अकेली. न कोई संगी न साथी,’’ उस ने बुझे स्वर में कहा. ‘‘रितिका तेरी कहानी सुन कर तो रोना आता है. अभी तेरी उम्र ही क्या है. ये पहाड़ जैसी जिंदगी किस के सहारे काटेगी? बुरा न मान तो एक बात कहूं, तू दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेती?’’

‘‘दूसरी शादी? राम भजो. 2 बार कर के तो पछता रही हूं. नहीं, शादी का सुख मेरी जिंदगी में नहीं है और इत्तफाक से बच्चे भी नहीं हुए, नहीं तो उन के लिए ही जी लेती. जब तक मां हैं हम दोनों एकदूसरे के सहारे दिन काट रही हैं. आगे की देखी जाएगी.’’

‘‘तब तेरा समय कैसे कटता है?’’

रितिका ने एक आह भरी और कहा, ‘‘कट ही जाता है किसी तरह. सुबह होती है शाम होती है, जिंदगी यों ही तमाम होती है. दरअसल, हालात ही कुछ ऐसे बने कि मेरी कायापलट हो गई. वैसे कहते हैं कि शादी एक जुआ है. पर मैं तो कहूंगी कि जिंदगी एक जुआ है. किसी को बैठेबिठाए, अनायास ही जीवन की हर खुशी मिल जाती है. उस के सिर पर जीत का सेहरा लग जाता है और कोई आजीवन झींकता रहता है, संघर्ष करता रहता है पर उस के मन की एक भी मुराद पूरी नहीं होती. कभीकभी लगता है कि दुनिया हमारी मुट्ठी में है पर दूसरे ही क्षण पारे की तरह सब हाथ से फिसल जाता है. हम सब एक कठपुतली समान हैं और कोई अदृश्य शक्ति हमें नचाती रहती है. खैर छोड़ न यार, कोई और बात कर. हां, अपनी सखी शालिनी की सुना. उस के क्या हालचाल हैं?’’

‘‘उस की कुछ न पूछ,’’ आभा ने एक आह भर कर कहा.

‘‘भला क्यों?’’

‘‘वह अब इस दुनिया में नहीं है.’’

‘‘ये क्या कह रही है आभा? क्या हुआ था उसे?’’

‘‘कोई बीमारी नहीं थी उसे. उस के पति ने बहलाफुसला कर उसे वापस इंडिया भेजा और उस के लौटने के तुरंत बाद उसे तलाक के कागजात भेज दिए. उस के मांबाप तलाक देने के पक्ष में नहीं थे. पर शालिनी ने कागजात पर दस्तखत कर दिए. इस के बाद वह बिलकुल टूट सी गई. पार्थ को वह बहुत चाहती थी. वह बहुत गुमसुम रहने लगी. वह डिप्रैशन का शिकार हो गई और ड्रग्स भी लेने लगी. उस के मांबाप ने उस के लिए वर ढूंढ़ना शुरू कर दिया और एक अधेड़, दुहाजू वर तलाश भी कर लिया. फिर शालिनी को समझाबुझा कर शादी के लिए राजी भी कर लिया. पर शादी के एक दिन पहले शालिनी ने किसी ड्रग का ओवरडोज ले लिया. रात को सोई तो सोई ही रह गई.’’

‘‘हायहाय ये तो बहुत बुरा हुआ. बेचारी शालिनी.’’ ‘‘हां, समझ में नहीं आता कि उस की असमय मौत के लिए किसे दोष दें. उस के मांबाप की दकियानूसी सोच को, जो ये सोचते हैं कि शादी के बिना एक स्त्री का निस्तार नहीं है या उस के कू्रर पति को जिस ने उस के साथ वहशियाना बरताव किया और उस का जीना दूभर कर दिया या अपने समाज के संकीर्ण दृष्टिकोण को जो लड़कियों के प्रति हमेशा असहिष्णु रहा है और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक समझता है. खैर यह तो हुई शालिनी की कहानी. अब किसी दिन तुझे फुरसत से अपने बारे में बताऊंगी. अब फोन रखती हूं.’’

‘‘ठीक है. पर तू मुझे जबतब फोन करती रहना. इस से मुझे बहुत आत्मबल मिलता है.’’

‘‘अवश्य,’’ कह कर आभा ने फोन रख दिया.

 उस की नजर बाहर बैठे राम पर पड़ी जो बड़ी लगन से बच्चों को पढ़ा रहे थे. वह मुग्ध भाव से उन का सौम्य मुखमंडल ताकती रही. यदि सहचर मन मुताबिक मिले तो एक स्त्री का जीवन सफल हो जाता है. अगर शादी के जुए में उस का पांसा सही पड़ गया तो समझो उस के पौबारह हैं, उस ने भावविभोर हो कर सोचा.