बात उन दिनों की है जब मेरी नियुक्ति एक अच्छी कंपनी में एक अच्छे ‘पे पैकेज’ के साथ हुई थी और मैं कंपनी के गैस्टहाउस में रह रहा था. दिल्ली में वैसे भी मकान ढूंढ़ने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है.

एक दिन शाम को लगभग 7 बजे मेरे पास एक लड़की का फोन आया, ‘सर, मैं आशा बोल रही हूं. मैं आप से आज ही मिलना चाहती हूं. आप थोड़ा समय दे सकते हैं? मैं अगर आज आप से नहीं मिली तो बहुत देर हो जाएगी.’

मैं ने हामी भर दी और उसे आधे घंटे बाद किसी समय आने के लिए कह दिया. 8 बजे आशा मेरे पास गैस्टहाउस के रूम में थी.

‘‘सर, मैं आप की कंपनी में एक जूनियर औफिसर के पद के लिए इंटरव्यू दे चुकी हूं. अभी इस विषय में निर्णय लिया नहीं गया है. मेरे घर के हालात अच्छे नहीं हैं. मेरे पिता का निधन मेरे बचपन में ही हो गया था. मां ने मुझे बड़ी कठिनाइयों के साथ पाला है और मैं ही उन का एकमात्र सहारा हूं,’’ कह कर वह भावुक हो गई और उस की आंखों से आंसू छलक गए.

मैं उस की भावना से भरी बातचीत से प्रभावित हो चुका था. उस की सुंदरता पर मैं मुग्ध हो गया था. मेरी उम्र उन दिनों लगभग 30 की रही होगी और मैं अविवाहित भी था.

दूसरे ही दिन आशा का बायोडाटा मैं ने अपने औफिस में मंगा लिया. लेकिन उस की प्रतिभा के आधार पर उस का चयन हो चुका था. आशा को तो यही लगा कि उस का चयन मेरी वजह से हुआ है.

आशा का प्लेसमैंट मेरे ही विभाग में हो गया. उस की नजदीकियां जैसेजैसे बढ़ती गईं मुझे वह और भी अच्छी लगने लगी. अब तो वह बगैर किसी पूर्व सूचना के साधिकार गैस्टहाउस में मेरे कमरे में आने लगी थी. कभी चाय पर तो कभी डिनर पर. उस का साथ मुझे भाने लगा था.

हम दोनों की नजदीकियां जगजाहिर न होते हुए भी औफिस के कर्मचारियों को मन ही मन खटकती थीं. हम दोनों ने दफ्तर में पूरी सतर्कता रखी थी, लेकिन जब वह गैस्टहाउस में मेरे रूम में होती थी, तो हमें पूरी स्वतंत्रता होती थी. लेकिन दैहिक संबंध की दिशा में न बढ़ कर हम लोग अपने प्यार का इजहार एकदूसरे की पीठ थपथपा कर अकसर कर लिया करते थे. कभी चुंबन और आलिंगन से हम दोनों ने एकदूसरे को प्यार नहीं किया था. हां, अपनी कल्पना में मैं उसे कई बार चूम चुका था.

 

अचानक आशा का ट्रांसफर इलाहाबाद हो गया. फिर हम दोनों  एकदूसरे के संपर्क में नहीं रहे. दूरी चाहत बढ़ा देती है, लेकिन मैं अपने मन को अकसर समझाता था कि इस के बारे में ज्यादा मत सोचो, फिर वक्त गुजरता गया और आशा की यादें धीरेधीरे धुंधली पड़ती गईं.

आशा से बिछड़े 10 साल गुजर चुके थे. मेरा विवाह हो चुका था. मेरी पत्नी मधु बहुत सुंदर और सुशील है और वह सही माने में एक सफल गृहिणी है. शादी हुए अभी कुछ ही समय हुआ था, इसलिए संतान के विषय में मैं ने और मेरी पत्नी ने कोई जल्दबाजी न करने का फैसला किया हुआ था. अभी तो हम एकदूसरे का साथ ऐंजौय करना चाहते थे. मेरी नौकरी दिल्ली में ही जारी थी.

एक दिन एक पेस्ट्री की दुकान पर मैं पेस्ट्री लेने के लिए रुका था. तभी पीछे से आई एक महिला के स्वर ने मुझे चौंका दिया.

‘‘सर, नमस्ते, आप ने मुझे पहचाना?’’

मैं मुड़ा तो देखा आशा खड़ी थी.

‘‘नमस्ते, तुम्हारी याददाश्त की प्रशंसा करनी होगी. इतने अरसे बाद मिली हो और मुझे तुरंत पहचान भी लिया,’’ मैं ने कहा.

उस के साथ बिताए दिनों की स्मृति मस्तिष्क में पुन: जाग्रत हो चुकी थी. इतने अरसे बाद भी उसे देख कर मुझे लगा कि अभी भी उस की सुंदरता बरकरार है.

‘‘इतने दिनों बाद.. दिल्ली कब आईं?’’

‘‘मैं यहीं आ गई हूं और यहीं जौब कर रही हूं. आज घर के लिए कुछ केकपेस्ट्री वगैरह लेने आई हूं. मेरे हसबैंड और सास दोनों को पेस्ट्री बहुत अच्छी लगती है.’’

‘‘जो कुछ तुम ने पैक कराया है उस का पेमैंट मैं अपने सामान के साथ कर दूंगा,’’ कहते हुए मैं ने काउंटर पर पैसे दे दिए. आशा नानुकर करती रही. मैं ने आशा की पीठ सहलाते हुए कहा, ‘‘तुम मेरे साथ ही चलो मैं तुम्हें ड्रौप भी कर दूंगा और तुम्हारे घर के लोगों से मिल भी लूंगा.’’

थोड़ी ही देर में मैं आशा के घर पहुंच गया. आशा ने रास्ते में बताया कि उस के पति का नाम जतिन है. उन का अपना बिजनैस है. विवाह 3 वर्ष पूर्व हुआ था. अभी उन की कोई संतान नहीं हुई है.

आशा की सास ने घर का मुख्य द्वार खोलते हुए मेरा स्वागत किया. आशा ने मेरा परिचय कराया, ‘‘मम्मीजी, ये श्रीकांत हैं. 10 साल पहले मैं इन के दफ्तर में ही काम करती थी. इन्होंने मेरी बहुत सहायता की थी. बहुत अपनापन दिया था.’’

खैर, हम लोगों ने साथसाथ चाय पी. जतिन अभी अपने कामकाज से वापस नहीं आया था. मैं ने आशा की प्रशंसा करते हुए मांजी से कहा, ‘‘आप के घर व ड्राइंगरूम का इंटीरियर बहुत अच्छा है.’’

मांजी ने कहा, ‘‘यह सब तो आशा का कमाल है. आशा को घर सजाने का बहुत शौक है.’’

एक दिन मैं आशा के घर पहुंचा तो मांजी तो घर पर ही थीं पर जतिन अभी वापस घर नहीं पहुंचा था. जतिन अकसर अपने बिजनैस में ही व्यस्त रहता था. आशा मुझे बैठा कर चाय बनाने चली गई. मैं ड्राइंगरूम में मांजी के साथ बातचीत करता रहा.

जब आशा चाय ले कर आई तो मैं ने

मांजी से कहा, ‘‘आशा चाय बहुत अच्छी बनाती है.’’

‘‘तारीफ करना तो कोई श्रीकांतजी से सीखे. ये तो प्रशंसा करने में माहिर हैं. जतिन के पास तो इतना समय ही नहीं होता है कि वे कभी मेरी ओर गौर से देखें,’’ कहते हुए आशा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे दूसरे कमरे की ओर ले कर चली, ‘‘आइए, मैं आप को जतिन का कंप्यूटर दिखाती हूं.’’

यह तो मात्र बहाना था मुझे एकांत में ले जाने का. मांजी रसोई में व्यस्त हो चुकी थीं. ‘‘मम्मीजी का बहुत सहारा है. वैसे तो अच्छाखासा समय औफिस में गुजर जाता है पर आप यह तो मानेंगे ही कि प्यार और स्नेह की भूख अपनी जगह होती है. बड़ा मन करता है कोई अपनापन जताए, अपना सा लगे, मुहब्बत से गले लगाए. पर ऐसा कुछ जतिन के साथ कभी हो ही नहीं पाता…’’ कहतेकहते वह मेरे निकट आ गई.

प्यार से उस की पीठ सहलाते हुए मैं ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘मुझे तुम अपना ही  समझो. अब जब एक अंतराल के बाद हम दोबारा मिले हैं तो मैं प्यार की कमी तुम्हें कभी महसूस नहीं होने दूंगा.’’

मांजी के आने की आहट से हम दोनों सतर्क हो गए. आशा की पीठ पर जो हलका सा स्पर्श हुआ था उस से मेरे मन में कई प्रश्न उठ खड़े हुए. शायद आशा को मुझ से कहीं अधिक अपेक्षा रही होगी. इन एकांत के क्षणों में, कुछ भी हो सकता था.

एक दिन मेरी पत्नी मधु किटी पार्टी से लौट कर घर आई. बातचीत के दौरान मधु ने मुझे बताया, ‘‘किटी पार्टी में मिसेज चोपड़ा तुम्हारे बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक रहती हैं. वे तुम से बहुत इंप्रैस्ड हैं. अकसर तुम्हारी तारीफ करती हैं.’’

मैं ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘मधु मुझे पता चला है तुम भी मेरी तारीफ में अपनी सहेलियों से बहुत बातें करती हो.’’

मधु ने प्रतिक्रिया में बस इतना कहा, ‘‘मैं झूठी तारीफ नहीं करती. आप हर तरह से तारीफ के काबिल हैं,’’ फिर मेरी पीठ सहलाते हुए बड़े प्यार से कहा, ‘‘यू आर रियली स्वीट हसबैंड.’’

मैं फूला नहीं समाया और आत्मविभोर हो गया. आशा अकसर अपने औफिस से मेरे कार्यालय में आ जाती थी और मैं उसे उस के घर ड्रौप कर दिया करता था. अपनी कंपनी में आशा अपने मधुर व्यवहार और कार्यशैली में गुणवत्ता के कारण, कई प्रमोशन प्राप्त कर चुकी थी. उसे उस के दफ्तर में सभी बहुत पसंद करते थे.

एक दिन जब वह कार में मेरे साथ अपने घर की ओर जा रही थी तो मैं उस के मांसल शरीर पर मुग्ध हो उठा. मेरे मन में बिताए दिनों की नजदीकियां तरोताजा हो उठीं.

तब मन में खयाल आता था कि काश आशा के साथ मेरी नजदीकी कुछ इस तरह

बन सके कि मजा आ जाए. पर अकसर मुझे अपने इस विचार पर हंसी आती थी. आशा जैसी लड़की का निकट होना एक संयोग की ही बात थी.

कार में आशा को मेरा एकटक उसे देखना अच्छा भी लगता था, लेकिन मेरी नैतिकता इस वासना की चिनगारी को ठंडा कर देती थी. जब आशा खिलखिला कर हंसती थी तो मुझे बहुत अच्छी लगती थी. आशा के मन में मेरे लिए प्रेम पनप रहा है ऐसा मैं ने अकसर महसूस किया था. एक बार उस के घर गया तो उस के पति जतिन से मुलाकात हुई. वह एक सभ्य और सुलझा हुआ इंसान था.

मैं आशा के घर जाता रहता था. वह कभीकभी बच्चों जैसी मासूमियत के साथ हठ कर के मुझ से किसी चीज की मांग कर बैठती थी तो जतिन उसे समझाता था.

उत्तर में वह कहती थी, ‘‘तुम हम दोनों के बीच में मत पड़ो, जतिन. मैं सर से जो चाहती हूं साधिकार लूंगी. ये उम्र में हम से बड़े हैं और इन से हम लोग कुछ भी ले सकते हैं.’’

मैं ने आशा को उस की शादी की सालगिरह के मौके पर सोने का इयररिंग्स भेंट किया जिन्हें पहन कर उस ने कहा, ‘‘कैसी लग रही हूं इसे पहन कर?’’

मैं ने कहा, ‘‘बहुत सुंदर.’’

मेरे करीब आ कर उस ने मेरा एक हाथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया और बोली, ‘‘मुझे आप का आशीर्वाद चाहिए, सारी जिंदगी. बस ऐसे ही प्यार करते रहिएगा.’’

मैं ने कुछ नहीं कहा किंतु मन ही मन खुश था.

मेरी मर्यादा ने मुझे बांध रखा था. लेकिन अकसर आशा के मुख पर आतेजाते  हावभाव उस के दिल में छिपे तूफान को छिपाने में असमर्थ होते थे.

एक दिन किसी कार्यवश जतिन को लखनऊ जाना पड़ा. अपने औफिस से लौटते हुए आशा को ले कर मैं आशा के घर पहुंचा. रास्ते भर आशा बहुत प्रसन्न दिखाई दी. घर पहुंचने पर आशा ने अपने पर्स से घर की चाबी निकाली. मेरे पूछने पर आशा ने बताया, ‘‘2 दिन पहले मम्मीजी मेरे जेठ के यहां कानपुर गई हैं. वापसी में जतिन उन्हें कानपुर से ले आएंगे.’’

थोड़ी देर बाद जब मैं ने उस के घर से जाना चाहा तो आशा ने कहा, ‘‘आप रुक जाइए. ऐसी भी क्या जल्दी है? आज मैं घर पर आप को ट्रीट दूंगी. खाना हम साथ ही खाएंगे. अकेले रहने का मौका तो कभीकभी ही मिलता है,’’ कहते हुए उस ने मुझे बाहुपाश में लेने की चेष्टा की. मेरे समीप होने का वह पूरा लाभ उठाना चाहती थी. पहले तो मैं ने संकोचवश वहां से हटना चाहा किंतु उस का आकर्षण मेरी विवशता बन गया. ऐसे अंतरंग क्षणों में हम एकाकार हो गए. एक अलौकिक दुनिया में खोए रहे.

दूसरे दिन भी इसी आनंद की पुनरावृत्ति हुई. हम दोनों भोजन कर चुके थे. आशा ने कहा, ‘‘आप थोड़ी देर संगीत का आनंद लें. मैं बस थोड़ा फ्रैश हो कर आती हूं. वह आई तो हलके आसमानी रंग की साड़ी में थी और बहुत प्रसन्न थी, ‘‘अभी तो मैं आप को बिलकुल नहीं जाने दूंगी. बस थोड़ा समय ही तो लगेगा,’’ कह कर उस ने मेरा हाथ थाम लिया और दूसरे कमरे की ओर ले चली.

मंद स्वर में उस ने पूछा, ‘‘मैं दुलहन जैसी सुंदर लग रही हूं न?’’ फिर इतराते हुए कहा, ‘‘आज मैं ने शृंगार आप के लिए ही किया है. आप मुझे जी भर कर प्यार कर सकते हैं. मैं प्रेम की गहराई में डूब जाना चाहती हूं…’’ वह बोली.

बहकने लगी थी वह और मुझे बाहुपाश में लेने के लिए मचल रही थी. मैं कदम बढ़ा कर बहुत दूर तक जा सकता था. प्रलोभन चरम सीमा पर था. हालात विवश कर रहे थे देहसंबंध के लिए.

उसे बहुत आश्चर्य हुआ जब मैं एकाएक पलंग से उठ खड़ा हुआ, ‘‘जरा इधर आओ मेरे निकट,’’ मैं ने आशा से कहा, ‘‘मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूं, तुम्हारे व्यक्तित्व में कई अच्छी बातें हैं लेकिन जो प्रेम तुम मुझ में ढूंढ़ने का प्रयास कर रही हो वह जतिन के हृदय में भी हिलोरें मार रहा है. नदी को जानने के लिए गहराई में उतरना पड़ता है. किनारे पर खड़े हो कर नदी की गहराई पता नहीं चलती है. तुम्हारा समर्पण और सान्निध्य केवल जतिन के लिए है.’’

वह सब जो आसानी से उपलब्ध है उसे कोई इतनी आसानी से ठुकरा सकता है, ऐसा आशा ने कभी सोचा न था.

थोड़ी देर वह चुप रही फिर उस ने बहुत भावुक हो कर कहा, ‘‘आज की इस निकटता ने हमारे संबंधों को एक नया अर्थ दिया है. यह आप ने सिद्ध कर दिया है. आप ने मेरी नजदीकी से कोई लाभ नहीं उठाना चाहा. जो पवित्र प्रेम और सम्मान आप ने मुझे दिया है उसे मैं जिंदगी भर याद रखूंगी. आप हमारे घर आतेजाते अवश्य रहिएगा. आप को अभी भी रोकने की मेरी चाहत है लेकिन जाने का निश्चय आप कर चुके हैं.’’

लौटते वक्त मैं सोच रहा था कि एक सुंदर लड़की का रूप मेरी रूह में समा चुका है. वह भी मुझे पसंद करती है, लेकिन हमारी सोच के तरीके बदल चुके हैं.

सब से अधिक प्रसन्नता मुझे इस बात की थी कि मैं ने अपनी पत्नी के विश्वास को कोई चोट नहीं पहुंचाई थी. हमारा अपनेअपने हिस्से का जो प्यार होता है, हमें उसी पर गर्व महसूस करना चाहिए.