रचना चेहरे से जितनी शांत लग रही थीं, अंदर उतना ही तूफान था. भावनाओं की बड़ीबड़ी सूनामी लहरें बारंबार उन के मन पर आघात किए जा रही थीं. काया स्वस्थ थी, किंतु मन लहूलुहान था. फिर भी अपने अधरों पर मुसकान का आवरण ओढ़े घरगृहस्थी के कार्य निबटाती जा रही थीं. ठीक ही है मुसकराहट एक कमाल की पहेली है- जितना बताती है, उस से कहीं अधिक छिपाती है. शोकाकुल मन इसलिए कि इकलौती संतान लतिका की नईनई शादीशुदा जिंदगी में दहला देने वाला भूचाल आया और मुसकान की दुशाला इसलिए कि कहीं लतिका डगमगा न जाए.

कुछ ही दिन पहले ही रचना ने अखबार में पढ़ा था कि आजकल के नवविवाहित जोड़े हनीमून से लौटते ही तलाक की मांग करने लगे हैं और यह प्रतिशत दिनोंदिन बढ़ रहा है.

दरअसल, हनीमून पर पहली बार संगसाथ रह कर पता चलता है कि दोनों में कितना तालमेल है. धैर्य की कमी लड़कों में हमेशा से रही है और समाज में स्वीकार्य भी रही है, लेकिन बदलते परिवेश में धीरज की वही कमी, उतनी ही मात्रा में लड़कियों में भी पैठ कर गई है. अब जब लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से बराबरी कर रही हैं, तो उन के व्यवहार में भी वही बराबरी की झलक दिखने लगी है.

अखबार की सुर्खियों में खबर पढ़ कर मन थोड़ाबहुत विचलित हो सकता है, पर उस का प्रतिबिंब अपने ही आंगन में दिखेगा, ऐसा कोई नहीं सोचता. रचना ने भी नहीं सोचा था. धूमधाम से पूरी बिरादरी के समक्ष आनबान शान से रचना और वीर ने अपनी एकमात्र बेटी लतिका का विवाह संपन्न किया था. सारे रीतिरिवाज निभाए गए, सारे संबंधियों व मित्रगणों को न्योता गया. रिश्ता भी अपने जैसे धनाढ्य परिवार में किया था. ऊपर से लतिका और मोहित को कोर्टशिप के लिए पूरे

1 वर्ष की अवधि दी गई थी. उन दोनों की कोई इच्छा अधूरी नहीं छूटी थी. संगीत व मेहंदी समारोह में कलाकारों ने गानों की झड़ी लगा दी थी. विवाह में श्हार के ही नहीं देश भर के नामीगिरामी लोग पधारे थे. लतिका और मोहित भी तो कितने प्रसन्न थे. लेटैस्ट डिजाइन के कपड़े, गहने, शादियों में नवीनतम चलन वाली फोटोग्राफी, देशविदेश के तरहतरह के व्यंजन, कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी गई थी.

हनीमून का प्रोग्राम पूरे 20 दिनों का था. 21वें दिन लतिकामोहित से मिलने रचना और वीर एअरपोर्ट पहुंच गए थे. अपनी नवविवाहित बिटिया के चेहरे पर प्यार का खुमार और नईनई शादी की लाली देखने की और प्रतीक्षा नहीं हो पा रही थी उन से. हनीमून के शुरुआती दिनों में फेसबुक और व्हाट्सऐप पर उन दोनों की प्यार के नशे में डुबकी लगाती सैल्फी व फोटो देखदेख कर मां पिता हर्षित होते रहे. किंतु एक पक्ष बीतने पर अपने बेटी  दामाद से मिलने की इच्छा तीव्र होती गई. एअरपोर्ट पर दोनों से गले लगते ही लतिका ने ड्राइवर को आदेश दे डाला कि वह उस का बैग उठा कर मांपिता की गाड़ी में रख दे. मोहित चुपचाप दूसरे रास्ते चला गया.

धीरेधीरे बात साफ हुई. तब से रचना घर का माहौल खुशमिजाज रखने के प्रयत्न में अग्रसर रहतीं ताकि लतिका का मन शोकग्रस्त न रहे. अब वह जमाने तो हैं नहीं कि डोली में देहरी लांघी लड़की अर्थी पर ही लौटे. लेकिन परिणयसूत्र कोई कांच का गिलास भी तो नहीं कि जरा सा टकराते ही चटक जाए. रचना का मन द्रवित रहता. लतिका अपने मन की बात ढंग से बताती भी तो नहीं. बस सब से विमुख सी रहती है.

‘‘लतिका, मोहित का फोन है तुम्हारे लिए. तुम्हारा सैलफोन बंद क्यों है, मोहित पूछ रहा है,’’ रचना की पुकार सुन कर भी लतिका के मुखमंडल पर कोई तेज न आया. उलटा संदेह भरा दृष्टिपात करते हुए वह फोन तक गई. दोटूक बात कर फोन वापस अपनी जगह था. आज रचना ने सोचा कि लतिका के मन की थाह ली जाए. यदि वह भी अन्य सभी की भांति इस बात को यहीं छोड़ देगी, आगे नहीं टटोलेगी तो उस की बिटिया के शादीशुदा जीवन की इति दूर नहीं.

‘‘क्या बात है लतिका, क्यों नाराज हो तुम मोहित से? आखिर अपनी गृहस्थी शुरू करने में यह हिचक कैसी? ऐसी क्या बात हो गई कि तुम दोनों हनीमून के बाद घर बसाने के बजाय सारे प्रयत्न छोड़ कर वापस मुड़ चले हो?’’

‘‘मम्मा, मैं और मोहित बिलकुल भी कंपैटिबल नहीं हैं. उसे मेरी भावनाओं की जरा भी कद्र नहीं है. आखिर मैं किसी की बेकद्री क्यों सहूं? मेरे छोटेमोटे मजाक तक नहीं सह सकता वह. यदि मैं अपने दोस्तों के बारे में बात करूं, तो वह भी उसे नापसंद है. शादी से पहले मैं सोचती थी कि वह मुझे ले कर पजैसिव है, इसलिए उसे पसंद नहीं कि मैं अपने दोस्तों के बारे में बातें करती रहूं पर हमेशा तो ऐसा नहीं चल सकता न? उसे तो बस अपने परिवार की पड़ी रहती है. हूंह, हनीमून न हो गया, उस के परिवार में सैटल होने की मेरी ट्रेनिंग हो गई. अभी भी उस ने फोन पर यही कहा कि मुझे बात को समझना होगा और अपने तौरतरीके बदलने होंगे.’’

लतिका की बातों से एक बात साफ थी कि मोहित अब भी इस शादी की सफलता चाह रहा है. रचना को यह जान कर प्रसन्नता हुई. वे हमेशा से लतिका के लिए मां से अधिक एक अच्छी दोस्त रही हैं. तभी तो आज लतिका ने बिना किसी झिझक के उन से अपने मन की बातें साझा की थीं. अब रचना की बारी थी अपनी भूमिका निभाने की. जब उन्होंने अपनी बेटी का विवाह किया तो इसी आशय से कि बेटी का जीवन अपने जीवनसाथी के साथ सुखी रहे, आबाद रहे.

मोहित और लतिका खूब खुश रहे पूरी 1 साल की कोर्टशिप में. इस का तात्पर्य है कि जो कुछ अभी हो रहा है वह बस शुरू की हिचकियां हैं, जो हर रिश्ते के प्रारंभ में आती हैं.

रिश्ते मौके के नहीं, भरोसे के मुहताज होते हैं. भरोसे का पानी पीते ही ये हिचकियां आनी बंद हो जाएंगी. परिपक्वता के कारण रचना को मालूम था कि एक घर, एक बैडरूम में रहते हुए भी 2 लोगों के बीच मीलों की दूरियां आ सकती हैं जो फिर दोनों को मिल कर मिटानी होती हैं. एक के प्रयास से कुछ नहीं होता. जब किसी को दूसरे से इक्कादुक्का शिकायतें हों तो कोई बड़ी बात नहीं है पर जब शिकायतों का अंबार लग जाए, तो यह बड़ी परेशानी की बात बन जाती है. अभी शुरुआत है. यदि अभी इस समस्या का हल निकाल लिया जाए तो बात संभल सकती है.

रचना ने लतिका को समझाने का प्रयास किया, ‘‘बेटी, शादी कोई गुड्डेगुडि़यों का खेल नहीं है कि तुम अपनी सहेली के घर अपनी गुडि़या ले गईं, उस के गुड्डे से अपनी गुडि़या की शादी रचाई और पार्टी के बाद अपनी गुडि़या वापस ले अपने घर लौट आईं. यह असली जिंदगी की शादी है जहां एक लड़की का पूरा जीवन बदल जाता है. तुम्हारे अपने पराए और पराए अपने बन जाते हैं.’’

‘‘प्लीज मौम, आप के मुंह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं. आप की सोच इतनी संकुचित कब से हो गई? मैं कोई गुडि़या नहीं हूं, जिस की भावनाएं नहीं, मैं एक जीतीजागती लड़की हूं,’’ लतिका अभी कुछ भी समझने के मूड में नहीं थी, ‘‘मैं आप को हमेशा अपनी मौम से ज्यादा अपनी सहेली मानती आई हूं. मैं आप को ऐसे ही तो नहीं कूल मौम कहती हूं.’’

लतिका की बातें सुन रचना चुप हो गईं. कूल मौम के टैग तक ठीक था, किंतु इस स्थिति का हल तो खोजना ही होगा. रचना ने पहले मोहित से मिलना तय किया. उन के बुलाने पर बिना किसी नखरे के मोहित एक रेस्तरां में मिलने आ गया. कुछ तकल्लुफ के बाद रचना ने बात शुरू की. पहले उन्होंने लतिका की बात मोहित के समक्ष रखी, ‘‘क्योंकि मैं ने अभी तक सिर्फ लतिका की बात ही सुनी है. अब मैं तुम्हारा पक्ष सुनना चाहती हूं.’’

‘‘मम्मा, आप ही बताओ, जो बातें मैं ने पहले ही साफ कर दी थीं, उन्हें दोहराना क्या उचित है? लतिका को पहले से पता है कि मेरे परिवार में बहुत अधिक पार्टी कल्चर नहीं है. अभी हमारी शादी को दिन ही कितने हुए हैं. मुश्किल से 1 हफ्ता रही है वह हमारे घर हनीमून जाने से पहले. उस पर भी वह हर समय यही पूछती रही कि क्या इस पार्टी में भी नहीं जाएंगे हम, क्या उस पार्टी में भी नहीं जाएंगे हम? मैं ने पहले ही उस से कह दिया था कि शादी के

बाद उसे हमारे घर के रीतिरिवाज के अनुसार दादी और मम्मी की रजामंदी से चलना होगा… वैसे वे लोग कुछ अधिक चाहते भी नहीं हैं.

बस सुबह उठ कर उन्हें प्रणाम कर ले, खाने में क्या बनाना है, यह उन से पूछ ले. घर से बाहर जाए तो उन्हें बता कर जाए. ये तो साधारण से संस्कार हैं, जिन का हर परिवार अपनी बहू से अपेक्षा रखता है. फिर हमारे घर में 2 भाभियां हैं, जो यह सब करती हैं. इस के अलावा कोई रोकटोक नहीं, कोई परदा नहीं. पर वह है कि इस बात की जिद ले कर बैठ गई है कि वह अपनी मरजी से जीती आई है और अपनी इच्छानुसार ही चलेगी. मुझे तो लगने लगा है कि हम दोनों कंपैटिबल नहीं हैं.’’

लतिका और मोहित, दोनों के मुंह से कंपैटिबल न होने की शिकायत रचना को सोच में डाल गई. आखिर यह कंपैटिबिलिटी क्या है? हर शादी समझौते मांगती है, कुछ बलिदान चाहती है. एक ही घर में पैदा होने वाले एक ही मांबाप के 4 बच्चे भी आपस में कंपैटिबल नहीं होते हैं, उन में भी विचारभेद होते हैं, झगड़े होते हैं. पर भाईबहनों का तलाक नहीं हो सकता और पतिपत्नी फटाफट इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि हम कंपैटिबल नहीं हैं तो खत्म करो यह रिश्ता. हो सकता है कि मन की परतों में मोहित, लतिका को खोना नहीं चाहता हो पर अहं का क्या करे?

घर लौटने पर रचना ने पाया कि लतिका सोफे पर पसरी चिप्स के पैकेट पर पैकेट चट कर रही थी. वह जब कभी परेशान होती तो उस का तनाव खानेचबाने से ही हल होता. तनावग्रस्त दोनों ही थे- मोहित और लतिका. पर अहम की बेवजह खड़ी दीवार में रंध्र करने की जिम्मेदारी रचना ने खामोशी से संभाल ली थी. जरूरी नहीं कि हर लड़ाई जीती जाए. जरूरी यह है कि हर हार से सीख ली जाए. रिश्तों की टूटन से उपजा तिमिर केवल घरपरिवार को ही नहीं, अपितु पूर्ण जीवन को अंधकारमय कर देता है. अपनी बेटी के जीवन में निराशा द्वारा रचा तम वे कभी नहीं बसने देंगी.

‘‘हाय भावना, क्या हाल हैं?’’ लतिका अपनी सहेली से फोन पर बातें कर रही थी,

‘‘हां यार, मेरी मोहित से बात हुई है फोन पर लेकिन वह अपने घर की सभ्यता को ले कर

कुछ ज्यादा ही सीरियस है. ऐसे में मैं कितने दिन निभा पाऊंगी भला? सच कहूं तो मुझे लगता है मैं ने गलती कर दी यह शादी कर के. पता है, हनीमून पर एक रात हम दोनों में झगड़ा हुआ और गुस्से में मैं बिस्तर पर न सो कर सारी रात कुरसी पर बैठी रही. लेकिन मोहित आराम से बिस्तर पर सो गया. इस का यही निष्कर्ष निकला न कि उसे मेरी भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है…’’

शादी की शुरुआत में लड़कियां बहुत अधिक संवेदनशील हो जाती हैं. जन्म से जिस माहौल में लड़कियां आंखें खोलती हैं, उस माहौल को, अपने मांबाप, अपने घरआंगन को त्याग कर पराए संसार को उस की नई मान्यताओं, उस के तौरतरीकों सहित अपनाने की उलझन वही समझ सकता है, जो उस कठिन राह पर चलता है. लड़कों के लिए यह समझना मुश्किल है. वे बस इतना कर सकते हैं कि शुरूशुरू में अपनी पत्नी को जितना हो सके उतना कंफर्टेबल करें ताकि वह अपने नए वातावरण में जल्द से जल्द सैटल हो पाए. बस इसी प्रयास में पतिपत्नी का रिश्ता सुदृढ़ होता जाएगा, उन में अटूट बंधन कसता जाएगा. पति के प्रयत्न को पत्नी सदैव याद रखेगी, उस के प्रति नतमस्तक रहेगी. ये शुरू की संवेदनशीलताएं ही रिश्ते को बनाने या बिगाड़ने की अहम भूमिका निभाने में सक्षम हैं.

‘‘नहीं यार, मेरी मौम बहूत कूल हैं.’’

लतिका का अपनी सहेली से चल रहे वार्त्तालाप से रचना की विचारशृंखला भंग हो गई.

‘‘आई एम श्योर वे मेरे इस निर्णय में मेरा साथ देंगी,’’ लतिका को अपनी मां पर पूर्ण विश्वास था.

रचना दोनों पक्षों की बात सुन चुकी थी. सुन कर उन्हें और भी विश्वास हो गया था कि दोनों का रिश्ता सुदृढ़ बनाना उतना कठिन भी नहीं. बस कोई युक्ति लगानी होगी. युक्ति भी ऐसी कि न तो रचना का ‘कूल मौम’ का टैग बिगड़े और न ही लतिकामोहित का रिश्ता. फिर क्या खूब कहा गया है कि रिश्ते मोतियों की तरह होते हैं, कोई गिर जाए तो झुक कर उठा लेना चाहिए.

‘‘मेरे बच्चे, जो भी तुम्हारा निर्णय होगा, मैं तुम्हारे साथ हूं. आज तक हम ने वही किया, वैसे ही किया, जैसे तुम ने चाहा. आगे भी वही होगा जो तुम खुशी से चाहोगी. हम ने तुम्हारी शादी आज के आधुनिक तौरतरीकों से की, वैसे ही आगे की कार्यवाही भी हम आज के युग के हिसाब से ही करेंगे. तुम मोहित से शादी कर के पछता रही हो न? ठीक है, छोड़ दो मोहित को,’’ रचना की इस बात का असर ठीक वैसा ही हुआ जैसी रचना ने अपेक्षा की थी.

लतिका की आंखों के साथसाथ उस का

मुंह भी खुला का खुला रह गया, ‘‘छोड़ दूं मोहित को?’’

‘‘हां बेबी, ठीक सुना तुम ने. छोड़ दो मोहित को. मेरी नजर में एक और लड़का है फैशनेबल, अमीर खानदान, हर रोज पार्टियों में आनाजाना. जैसा तुम्हें चाहिए, वैसा ही. आए दिन तुम्हें तोहफे देगा.’’

रचना की बातें सुन लतिका के मुख पर संदेह की कालिमा छाने लगी. आहत, विस्मित दृष्टि से उस ने अपनी मां को देखा तो रचना की हिम्मत और बढ़ गई. बोलीं, ‘‘म्यूचुअल डिवोर्स में अधिक समय बरबाद नहीं होता है. जितने दिन तुम्हारी शादी नहीं चली, उस से जल्दी तुम्हारा तलाक हो जाएगा. सोचती हूं कैसे तुम ने मोहित को इतनी लंबे कोर्टशिप में बरदाश्त किया. चलो, तुम ने अपनी लाइफ का निर्णय ले लिया. अब मुझे भी एक पार्टी में जाना है. सी यू लेटर,’’ कह रचना अपना बैग उठा घर से बाहर निकल गईं.

मां का इस स्थिति में यों छोड़ कर पार्टी में चले जाना रचना को बहुत खला. क्या उस की मां उस की मानसिक स्थिति नहीं समझ सकतीं या उन के लिए अपनी बेटी से ज्यादा जरूरी उन की पार्टियां हैं? अचानक उसे वह दिन याद हो आया जब विवाह की रस्में निभाने के कारण थकीमांदी लतिका के सिर में शादी के दूसरे ही दिन दर्द उठा था और उस की सास ने मुंहदिखाई की रस्म अगले दिन के लिए टाल दी थी, जबकि कई औरतें घर में आ भी चुकी थीं.

‘‘हमारी लतिका के सिर में दर्द है. आज प्लीज माफी चाहते हैं. चायनाश्ता लीजिए पर लतिका से मुलाकात कल ही हो पाएगी,’’ लतिका की सास ने कहा था और फिर लतिका का पूरा ध्यान रखा था. पर उस की अपनी मां ने आज उसे हृदयपीड़ा के इस समय अकेला छोड़ पार्टी में जाना उचित समझा?

अगले दिन रचना को फिर घर में न पा कर लतिका ने उन्हें फोन किया. रचना ने फोन का कोई उत्तर नहीं दिया. कुछ देर बाद उन का मैसेज आया कि इस हफ्ते तुम्हारे पापा काम के सिलसिले में दुबई गए हैं. अत: मैं आज तुम्हारे मामा के घर आई हुई हूं. 2-4 दिनों में लौट आऊंगी.’ पढ़ कर लतिका अवाक रह गई. उस की मां उसे घर में अकेला छोड़ मामा के घर चली गईं और वह भी अकारण. उस ने भी प्रतिउत्तर में मैसेज भेजा.

इस पर रचना का फिर जवाबी मैसेज आया कि सब को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का हक है, बेबी. मैं तुम्हारी शादी तोड़ने के फैसले में तुम्हारे साथ हूं. क्या तुम्हें मेरे अपने मायके कुछ दिन बिताने पर भी ऐतराज है? दैट्स नौट फेयर.

4 दिन कुंठा में बीते. लेकिन बात 4 दिन की नहीं थी. यदि लतिका अपने दोस्तों से मिलती, किसी पार्टी में जाती तो सब तरफ एक ही चर्चा रहती कि इतनी जल्दी तलाक का कारण क्या है. जब लतिका और मोहित की कोर्टशिप साल भर चल सकती है तो हनीमून पर ऐसा क्या हो गया? इस के उत्तर में कोई ठोस वजह का न होना लतिका को और भी अवहेलित कर देता.

लतिका को आभास होता जा रहा था कि शादी के बाद वाकई एक लड़की की जिंदगी बदल जाती है, परिस्थितियां बदल जाती हैं. सभी रिश्तों के चाहे वे घर की चारदीवारी में अभिभावकों का हो या घर के बाहर मित्रों का- उन के रिएक्शन बदल जाते हैं. अपनी उन्हीं सहेलियों जिन के साथ कभी वह सारासारा दिन व्यतीत कर दिया करती थी, आज उन्हीं सहेलियों के पास उस के लिए समय की कमी थी. कभी किसी को अपने बौयफ्रैंड के साथ मूवी जाना होता तो कभी किसी को अपने मंगेतर के साथ समय बिताने की चाह रहती. शादी सचमुच गुड्डेगुडि़यों का खेल नहीं है. सोचसमझ कर जीवन में आगे बढ़ने का फैसला है.

‘‘हैलो,’’ मोहित के नंबर से फोन उठाते हुए लतिका ने धीरे से बुदबुदाया.

‘‘कैसी हो?’’ मोहित के स्वर भी कुछ ठंडे, सुस्त और उदास थे.

‘‘तुम कैसे हो?’’ लतिका अपने मन की खिन्नता मोहित से छिपाना चाहती थी. लेकिन इतना समय साथ बिताने के बाद अपने मन की परतों को एकदूसरे के समक्ष खोलने के बाद मोहित व लतिका दोनों ही एकदूसरे के शोकातुर सुर पहचानने में सक्षम थे.

‘‘बहुत दिन हो गए… तुम्हारी याद आ रही है. क्या हम कुछ समय के लिए मिल सकते हैं?’’ मोहित ने खुल कर अपने दिल की बात लतिका के सामने रख दी.

‘‘मैं आज शाम 5 बजे तुम से वहीं मिलूंगी…’’

लतिका के इतना कहते ही मोहित बीच में ही हंसते हुए बोला, ‘‘वहीं जहां हमेशा मिलते हैं रैड रोज कैफे.’’

मोहित के शुरुआत करने से लतिका के जीवन में एक बार फिर उल्लास की लहरें उठने लगीं और उस का मन उन में गोते लगाने लगा. शाम को निर्धारित समय पर कैफे पहुंचने हेतु वह तैयार होने लगी. तभी रचना वहां आईं. बोलीं, ‘‘लतिका, मैं ने जिस लड़के का तुम से जिक्र किया था, वह आज रात खाने पर घर आ रहा है. तुम तैयार रहना. उस से मिल कर तुम्हें अवश्य अच्छा लगेगा. एक बार तुम दोनों की मुलाकात हो जाए, फिर मोहित से तुम्हारा तलाक करवा कर तुम्हारी दूसरी शादी की तैयारी करेंगे. इस बार और भी धूमधाम से शादी करेंगे, ओके बेबी?’’

रचना की बातें सुन लतिका का मन कांपने लगा. मोहित से मनमुटाव का अंत तलाक में होगा, हो सकता है कि ऐसा उस के मुंह से गुस्से में कभी निकल गया हो, किंतु उस के मन ने इस बात को कभी स्वीकारा नहीं था. उस के मन की तरंगें जो एक बार फिर मोहित से जुड़ने लगी थीं, उन्हें उस की अपनी मां ही तोड़ने लगी थी. मां का कर्तव्य होता है बच्चों की गृहस्थी को जोड़े रखना, न कि आगे बढ़चढ़ कर उसे तोड़ने का प्रयास करना.

‘‘इतनी जल्दी क्या है, मौम? जब तलाक लेना होगा, मैं बता दूंगी आप को और वैसे भी आज शाम मैं बिजी हूं,’’ लतिका ने बात टालनी चाही.

‘‘देखो लतिका, हर समय तुम्हारी मरजी चले, सभी तुम्हारी मरजी से जिंदगी जीएं, ऐसा नहीं हो सकता है,’’ रचना अचानक सख्त लहजे में बात करने लगीं, ‘‘तुम ने मोहित से शादी करनी चाही, हम ने करवा दी. जैसी शादी चाही, वैसी करवा दी. अब तुम हनीमून के तुरंत बाद घर लौट आई हो, हम ने वह भी स्वीकार लिया. इस का अगला कदम तलाक ही है. तलाक लो, दूसरी शादी करो और जाओ अपने घर. हमें भी समाज में रहना है, लोगों की बातों का सामना करना है,’’ लतिका को लगभग डांटते हुए रचना कहे जा रही थीं. अपनी बेटी को उदास करना उन्हें जरा भी नहीं भा रहा था, किंतु लतिका के भले के लिए, अपना जी कड़ा कर वे सब बोलती जा रही थीं. उन्हें अपने पिता की बात याद आ रही थी कि जली तो जली, पर सिंकी खूब. चाहे लतिका उन की बात का बुरा मान ले, किंतु इन्हीं बातों से वह अपना जीवन व्यर्थ न कर के सही राह चुन पाएगी.

लतिका की भी समझ में आ रहा था कि उसे जो भी निर्णय लेना है, वह आज ही लेना होगा. शाम को उसे मोहित से मिलना है और आज रात को वह दूसरा लड़का खाने पर घर आ रहा है. अवश्य ही मां उस के सामने शादी की बात छेड़ेंगी. उस से पहले लतिका को अपना फैसला अपनी मां को बताना होगा.

नियत समय पर लतिका कैफे पहुंच गई. मोहित पहले से ही वहां प्रतीक्षारत था. मोहित ने दोनों की पसंदीदा चीजें और्डर कीं. दोनों कुछ असहज थे.

मोहित पहले बोला, ‘‘लतिका, प्लीज घर चलो. सब घर वाले तुम्हें कितना मिस कर रहे हैं. मां तो रोज तुम्हारे बारे में पूछती हैं. वह तो मैं ने ही उन्हें रोक रखा है कि तुम्हें कुछ समय और चाहिए वरना वे कब की तुम्हारे घर आ कर तुम्हें ले जाने की बात कर चुकी होतीं…’’

मोहित और कुछ कहता उस से पहले ही लतिका बोल उठी, ‘‘कब लेने आओगे मुझे?’’

एक हलकी सी मुसकान दोनों के अधरों पर खेल रही थी, नजरें भी मुसकराने लगी थीं. देखते ही देखते लतिका और मोहित अपने 1 वर्ष पुराने प्यार और उस में बिताए अनगिनत क्षण याद कर भावुक हो गए. उन्हें विश्वास होने लगा कि वे एकदूसरे के लिए बने हैं. आवश्यकता है तो बस इस प्यार को पनपने देने की.

शादी कभी एकतरफा रिश्ता नहीं होती. दोनों पक्ष इसे बराबर निभाते हैं. तभी गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ पाती है. देर शाम मायके से ससुराल के लिए विदा होने में लतिका व मोहित के साथ रचना की मुसकराहट भी नहीं थम रही थी.