गृहशोभा विशेष

‘‘जरादेखना मेरे बाल ठीक हैं… ठीक लग रही हूं न मैं?’’ मैं ने नजरें उठा कर देखा. मेरी बूआ की लड़की पूछ रही थी.

‘‘किस तरफ से ठीक हैं, पूछ रही हो? मेरी तरफ से कुछ भी ठीक नहीं है. रूखेरूखे, उलझे से हैं… कटे भी इस तरह हैं मानों चुहिया कुतर गई हो…कंघी किए कितने दिन हो गए हैं?’’‘‘क्या बात करते हो?…अभीअभी क्व500 खर्च कर सैट करा कर आ रही हूं.’’

‘‘अच्छा, तो फिर खुद ही देख लो न… मेरी समझ से तो बाहर है तुम्हारा क्व500 खर्चना,’’ मैं हैरान रह गया था.

वह खीज गई, ‘‘तुम कैसे लड़के हो अजय? तुम्हें यह भी पता नहीं?’’

‘‘तुम मुझ से पूछती ही क्यों हो मनु? कल तुम अपनी फटी ड्रैस दिखा कर पूछ रही थी कैसी है… क्या इतने बुरे दिन आ गए हैं आप लोगों के कि तन का कपड़ा भी साबूत नहीं रहा? मैं कुछ कहता हूं तो कहती हो मैं कैसा लड़का हूं. कैसा हूं मैं? न तुम्हारे कपड़े मेरी समझ में आते हैं और न ही तुम्हारी बातें. ऊपर से मेरा ही दिमाग घुमाने लगती हो. तुम्हें जो अच्छा लगता है करो… मुझे बिना वजह गंवार, जाहिल क्यों बनाती जा रही हो? चिथड़े पहनती हो और कहती हो फैशन है. बाल बुरी तरह उलझा रखेहैं… ऐसा है देवीजी अगर इंसानों की तरह जीना पुराना फैशन है तो मुझे बख्शो…आईना देखो… जैसा सुहाए वैसा करो,’’ यह कह कर मैं चुपचाप कमरे से बाहर आ गया.

बूआ ने दूर से देखा तो बोलीं, ‘‘फिर से झगड़ा हो गया क्या तुम दोनों में?’’

‘‘झगड़ा नहीं बूआ इसे कहते हैं वैचारिक मतभेद. यह लड़की जो भी करती है करे उस पर मेरी स्वीकृति की मुहर क्यों चाहती है? क्या हो गया है इसे? पहले अच्छीभली होती थी… यह कैसी हवा लगी है इसे?’’

‘‘इसे फैशन कहते हैं बबुआ… इसे कहते हैं जमाने के साथ चलना.’’

‘‘जमाने के साथ जो चलते हैं वे क्या पागलों की तरह बालों की लटें बना कर रहते हैं? जगहजगह से फटी जींस में से शरीर नजर आ रहा था कल… मैं ने अचानक देखा तो घबरा गया. एकदम भिखारिन लग रही थी. एकाएक ऐसा रूप बूआजी? वह दिन न आए इस पर कि इतनी दयनीय लगने लगे.’’

‘‘बूआ हंसते हुए बोलीं, ‘‘बिलकुल अपने पापा की तरह बात कर रहे हो. तुम्हारी ही उम्र का था जब एक बार यहां आया था. तब उसे मेरा ब्लाउज जरा सा फटा नजर आया था.’’

बूआ साग बीन रही थीं. वे आम बूढ़ी औरतों जैसी झक्की नहीं हैं. तभी तो लाडली बेटी को इतनी छूट दे रखी है. बूआ ने मेरे पिता की जो बात शुरू की थी उसे मैं अपने घर पर भी कई बार सुन चुका था. मेरे पिता 4 भाई थे, 1 ही बहन थी बूआ. राखी, भैयादूज पर ही बूआ को 8 सूट या साडि़यां मिल जाती थीं. दादीदादा जो देते थे वह अलग. फिर बूआ का ब्लाउज फटा क्यों? आगबबूला हो गए थे पापा. अपने बहनोई से ही झगड़ पड़े थे कि मेरी बहन का ब्लाउज फटा हुआ क्यों है? तब उन का जवाब था कि गरमी में बबुआ घिसा कपड़ा अच्छा लगता है.

‘‘तब गरमी थी और अब फैशन…

बूआ तुम मांबेटी हमारा ही खून क्यों जलाती रहतीं? तुम ने फटा ब्लाउज पहना ही क्यों था?’’

‘‘फटा नहीं था घिस कर नर्म हो गया था. तेरा पापा उसी पल बाजार गया और चिकन की कढ़ाई वाले 12 ब्लाउज ला कर मेरे आगे रख गया.’’

‘‘और हां घर जा कर खूब रोए भी थे पापा… दादी सुनाया करती थीं यह कहानी. उन्हें शक हो गया था शायद आप लोगों के हालात अच्छे नहीं हैं. आप की भी 3 ननदें थीं. फूफा अकेले थे कमाने वाले. पापा ने सोचा था जो हम देते हैं उसे बूआ अपनी ननदों को दे देती होगी और खुद फटों से ही काम चलती होगी.’’

यह कहानी बहुत बार सुनी है मैं ने. फूफाजी के अहम को तब बहुत चोट लगी थी. बहन के लिए चिंता तो जायज थी लेकिन पति का मानसम्मान भी आहत हो गया था. कितने ही साल फूफाजी हमारे घर नहीं आए थे. घिसा ब्लाउज लड़ाई और मनमुटाव का कारण बन गया था. अपनीअपनी जगह दोनों ठीक थे. पापा बहन से प्यार करते थे, इसलिए असुरक्षा से घिर गए थे और फूफाजी इसलिए नाराज थे कि पापा ने उन पर शक किया कि वे अपनी पत्नी का खयाल नहीं रखते.

‘‘मायके का सामान कभी अपनी ननदों को नहीं दिया था मैं ने. तुम्हारे फूफा कभी मानते ही नहीं थे देने को. मेरे ट्रंक में हर पल 10-12 नए जोड़े रहते थे. कभी मैं भी कुछ खरीद लिया करती थी. 3 ननदें थीं और 3 ही बूआ. तुम्हारे फूफा की समझ लो 6-6 बेटियां थीं, जिन्हें इस चौखट से कभी खाली हाथ नहीं जाने दिया था मैं ने. देने का समय आता तो तुम्हारे फूफा सदा पहले पूछ लेते थे कि यह साड़ी या सूट तुम्हें कहां से मिला है? खुद खरीदा है या किसी भाईभाभी ने दिया है? कभी मैं कह भी देती कि क्या फर्क पड़ता है अब मेरी चीज है मैं जिसे मरजी दूं तो नहीं मानते थे. जैसे मैं चाहता हूं मेरा उपहार मेरी बहन पहने उसी तरह अपने भाई का उपहार भी सिर्फ तुम ही पहनोगी.’’

‘‘तुम ने वह घिसा कपड़ा पहना क्यों ही था बूआ जिस ने मेरे पापा को रुलारुला कर मारा…फूफाजी बेचारों का अपमान हुआ. मनमुटाव चलता रहा इतने साल. प्रश्न सिर्फ इतना सा था कि कोई भी अपनी बहनबेटी को फटेहाल नहीं देखना चाहता. ऐसा लगता है शायद हम ही नाकारा, नाकाबिल हैं जो उन के लिए कपड़े तक नहीं जुटा सके…तन का कपड़ा ऐसा तो हो जो गरिमा प्रदान करे. कपड़ों से ही तो हम किसी के व्यक्तित्व का अंदाजा लगाते हैं. मुझे तो बड़ा बुरा लगता है जब कोई शालीन कपड़े न पहने. आजकल जैसे चिथड़े लड़कियां पहन कर निकलती हैं मुझे सोच कर हैरानी होती है. क्या इन के पिता, इन के भाई देखते नहीं हैं? क्या उन के सिर शर्म से झुकते नहीं हैं?’’

‘‘जिन के भाई रोकते हैं उन की बहनें अपने घर से इस तरह के कपड़े पहन कर निकलती ही नहीं हैं. अपनी सहेली के घर जा कर बदल लेंगी या कालेज के टौयलेट में दिन भर उन में रहेंगी. घर लौटते वही पहन लेंगी जो घर से निकलते पहना था. अपने मन की कर लेंगी न…यही सोच तो मैं मना नहीं करती हूं…ठीक है कर अपने मन की, एक बार हमारी तरह चूल्हेचक्की में पिसने लगेगी तो कहां मन का कर पाएगी.’’

‘‘मन का करने के लिए क्या नंगा रहना जरूरी है? कपड़ों में पूरीपूरी पीठ गायब होती है, टांगें खुली होती हैं. क्याक्या नंगा है, क्या आप नहीं देखतीं बूआ? कैसीकैसी नजरें नहीं पड़तीं…फिर दोष देना लड़कों को कि राह चलते छेड़ दिया.’’

‘‘ढकीछिपी लड़कियों पर क्या कोई बुरी नजर नहीं डालता?’’

‘‘डालता है बूआ बुरे लोग अगर घर में हैं तो लड़कियां वहां भी सुरक्षित नहीं. मैं मानता हूं इस बात को पर नंगे रहना तो खुला निमंत्रण है न. जिस निगाह को न उठनी हो वह भी हैरानी से उठ जाए… टीवी और फिल्मों की बात छोड़ दीजिए. उन्हें नंगा होने की कीमत मिलती है. वे कमा कर चली गईं. रह गई पीछे परछाईं जिस पर कोई हाथ नहीं डाल सकता और हमारी लड़कियां उन्हीं का अनुसरण करती घूमेंगी तो कहां तक बच पाएंगी, बताइए न? पिता और भाई तो कुत्ते बन गए न जो रखवाली करते फिरें.’’

‘‘अरे भाई क्या हो गया? कौन बन गया कुत्ता जो रखवाली करता फिर रहा है?’’ सहसा किसी ने टोका.

हम अपनी बहस में देख ही नहीं पाए कि फूफाजी पास खड़े हैं जो सामान से लदेफंदे हैं. बड़े स्नेही हैं फूफाजी. आज सुबह ही कह रहे थे कि शाम को पहलवान हलवाई की जलेबियां और समोसे खिलाएंगे. हाथ में वही सब था. बूआ के हाथों में सामान दे कर हाथमुंह धोने चले गए. वापस आए तो विषय पुन: छेड़ दिया, ‘‘क्या बात है अजय, किस वजह से परेशान हो? क्या मनु के फैशन की वजह से? देखो बेटा, हमारे समझाने से तो वह समझने वाली है नहीं. मनुष्य अपनी ही गलतियों से सीखता है. जब तक ठोकर न लगे कैसे पता चले आगे खड्ढा था. फैशन पर बहस करना बेमानी है बेटा. आज ऐसा युग आ गया है कि हर इंसान अपने ही मन की करना चाहता है. हर इंसान कहता है यह उस की जिंदगी है उसे उसी के ढंग से जीने दिया जाए. तो ठीक है भई जी लो अपनी जिंदगी.

‘‘अकसर जो चीज घर के लोग या मांबाप नहीं सिखा पाते उसे दुनिया सिखा देती है. तरस तो मांबाप करेंगे न बाहर वालों को क्या पड़ी है. जब बाहर से धक्के खा कर आएंगे तभी पता चलेगा न घर वाले सही थे. मैं तो कहता हूं मांबाप को औलाद को पूरापूरा मौका देना चाहिए ठोकरें खाने का. तभी सबक पूरा होगा वरना कहते रहो दिनरात अपनी कथा. कौन सुनता है? अब बच्ची तो नहीं है न मनु. पढ़लिख गई है. अपना कमा रही है. हम क्यों टोकाटाकी करते रहें? अपना माथा भी खराब करें. क्या पता हम पिछड़ गए हों जो इसे समझ नहीं पा रहे…अब इस उम्र में हम तो बदल नहीं सकते न?’’

‘‘मैं तो पिछड़ा हुआ नहीं हूं न फूफाजी? मनु की ही पीढ़ी का हूं.’’

‘‘छोड़ो न बेटा क्यों खून जला रहे हो? मनु वही करेगी जो उस का मन कहेगा. तुम समोसा खाओ न. तुम्हारी बूआ चाय लाती होगी.

देखो बेटा, एक सीमा के बाद मांबाप को अपने हाथ खुले छोड़ देने चाहिए. हमारी बीत गई न. इन की भी बीत जाने दो. ऐसे या वैसे. जाने दो न…लो चाय लो.’’ फूफाजी का आचरण देख कर मैं चुप रह गया. बड़ी मस्ती से समोसे और जलेबियां खाने लगा. मनु उन के सामने ही मुझे हाथ हिलाती हुई निकल गई. उस का अजीबोगरीब पहनावा देख मेरा खून पुन: जलने लगा. मगर पिता हो कर जब फूफाजी कुछ नहीं कर पाए तो मैं उस का सिर तो नहीं न फोड़ सकता. मैं सोच रहा हूं अगर मनु मेरी अपनी बहन होती तो क्या कर लेता मैं? तब भी मैं मुंह से ही मना करता न? उसे पिंजरे में तो नहीं डाल पाता. भविष्य में अगर मेरी बेटी ही हो तो ज्यादा से ज्यादा क्या कर लूंगा मैं? शायद यही जो अभी फूफाजी कर रहे हैं. मुंहजोरी का भला क्या उत्तर हो सकता है.

बस भरोसा रखो अपने बच्चों पर कि वे कभी अपनी सीमा का अतिक्रमण न करें… विश्वास करो उन पर. उस के बाद यह बच्चों पर है कि वे अपनी परीक्षा में खरे उतर पाते हैं या नहीं. आप के भरोसे और विश्वास की कद्र कर पाते हैं या नहीं. तभी फूफाजी ने मेरा हाथ हिलाया, ‘‘समोसे ठंडे हो रहे हैं अजय…मनु अपनी सहेली के घर पार्टी में गई है. वहीं से खा कर आएगी…तुम खाओ न…’’ फूफाजी की मनुहार पर तो मेरा मन भीग रहा था पर मनु के प्रति उन का इतना खुला व्यवहार मेरी समझ में नहीं आ रहा था. यह उन का अपनी संतान पर विश्वास था या विश्वास करने की मजबूरी?

9 बजे के करीब मनु आई और सीधी अपने कमरे में चली गई. सुबह देर तक सोई रही.

‘‘क्या आज औफिस नहीं जाना है? बूआ ने नाश्ता लगा दिया है. चलो, उठो…तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ मैं पूछ आया, मगर बूआ और फूफाजी पूछने नहीं गए.

‘‘जब मरजी होगी उठ कर बना भी लेगी और खा भी. जब हमारी रोकटोक का कोई मोल नहीं है, तो हमारी देखभाल का भी क्या मतलब? प्यार को प्यार होता है और इज्जत को इज्जत. जब से इस ने मुंहजोरी पकड़ी है हम कुछ भी नहीं कहते हैं…इस उम्र में क्या हमें आराम नहीं चाहिए?

‘‘सुबह जल्दी उठ कर इस का नाश्ता बनाना मेरे बस का नहीं…नौकरी करनी है तो सुबह 6 बजे उठो, अपना नाश्ता बनाओ… नहीं बनता तो 8 तक सोना भी जरूरी नहीं. हमारी

सेवा मत करो कम से कम अपना काम तो खुद करो,’’ बूआ ने बड़बड़ाते हुए अपना आक्रोश निकाला. तब मैं सहज ही समझ गया उन का भी दर्द. मस्त रहने की कोशिश कर रहे हैं दोनों, मगर भीतर से परेशान हैं. फूफाजी नाश्ता कर के औफिस चले गए और बूआ बड़े स्नेह से मुझ से और खाने का अनुरोध करती रहीं. ‘‘बूआ, वह भूखी है और मैं खा रहा हूं.’’

‘‘तो क्यों भूखी है? क्या मजबूरी है? देर रात तक जागना जरूरी तो नहीं है न?’’

‘‘कल तो आप दोनों बड़े खुश लग रहे थे और…’’

‘‘खुश न रहें तो क्या करें, तुम्हीं बताओ मुझे? तुम्हारे फूफा ने एक दिन सख्ती से बात की तो जानते हो क्या कह रही थी? कह रही थी कि ज्यादा सख्ती की तो घर से हिस्सा मांग कर अलग रहने चली जाएगी… यह घर उस के दादाजी का है… बराबर की हकदार है… आजकल लड़कियां अपने अधिकारों के लिए बड़ी जागरूक हो गई हैं न, तो ले ले अपना अधिकार. मांबाप का प्यार भी जबरदस्ती ले ले मिलता है तो…’’

‘‘क्या?’’ मेरा मुंह खुला का खुला रह गया. मनु ने ऐसा किया… मेरी तो कल्पना से भी परे था ऐसा सोचना. लड़का हो कर कभी अपने पापा के आगे जबान नहीं चलाई हम दोनों भाइयों ने. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. मांबाप के साथ मर्यादित रिश्ता है हमारा और मनु ने लड़की हो कर अपना हिस्सा मांगा? अरे लड़कियां तो मांबाप के लिए एक भावनात्मक संबल होती हैं. लड़कों पर आरोप होता है कि शादी होते ही मांबाप को अंगूठा दिखा देते हैं और मनु ने लड़की हो कर ऐसा किया. बूआ की पीड़ा पर मैं भी आहत हो गया एकाएक. शायद इसीलिए पिछले दिनों पापा ने एक अच्छा रिश्ता सुझाया था तो बूआ ने साफ इनकार कर दिया था.

‘‘आजकल बच्चों की अपनी मरजी है… जहां मन हो करें. मेरी ही बेटी है पर मैं ही इस की गारंटी लेने को तैयार नहीं हूं. कल को ससुराल वालों को ही दहेज के नाम पर सूली पर लटका देगी. पति जरा सा नानुकर करेगा तो उसे भी पत्नी प्रताड़ना के कानून में फंसा देगी. जो अपने मांबाप की सगी नहीं वह पराए खून को दलदल में नहीं फंसाएगी, इस का क्या भरोसा? नफरत हो गई है मुझे मनु से. जरा भी प्यार नहीं रहा मेरे मन में इस लड़की के लिए. तुम भी इस की चालढाल पर परेशान हो न… कल को इस का पति भी होगा.

‘‘क्या यह लड़की घर बसाएगी जो बातबात पर अपने अधिकारों की बात करती है? गृहस्थी को सफल बनाने के लिए कई बार जबान होते हुए भी गूंगा बनना पड़ता है. सहना भी पड़ता है, कभी भी आती है कभीकभी, सदा एकजैसा तो नहीं रहता. ऊंचनीच सहनी पड़ती है और यह लड़की तो बातबात पर कानून का डंडा दिखाती है.’’

‘‘इतना कानून कहां से पढ़ लिया इस ने? कहीं वकीलों से दोस्ती ज्यादा तो नहीं बढ़ा ली? कानून तो हम भी जानते हैं बेटा, लेकिन यही कानून अगर बातबेबात गृहस्थी में घुस जाएगा तब क्या प्यार बना रहेगा पतिपत्नी में? पतिपत्नी के बीच किसी तीसरे का जो दखल होना ही नहीं चाहिए मांबाप तक को भी जरूरत पड़ने पर बोलना चाहिए कानून तो बहुत दूर की बात है. अधिकारों की बात करती है क्या अपने फर्जों के बारे में भी सोचा है इस ने? हमारे तो बेटे ने कभी इस जबान में हम से बात नहीं की जिस सुर में यह बोलती है. क्या चाहते हैं इस से? सिर्फ यही कि सलीके से रहे, मर्यादा में रहे, शालीनता से जीए… हमारे सिखाए सारे संस्कार इस ने पता नहीं किस गंदे पानी में बहा दिए.’’

‘‘नहीं बूआ ऐसा नहीं हो सकता. कुछ भी हो जाए संस्कारों का प्रभाव कभी नहीं जाता है. फैशन की दौड़ में भी एक सीमा ऐसी जरूरत आती है जब संस्कार जीत जाते हैं. किसी गलत संगत में हो सकता दिमाग घूम गया हो.’’ ‘‘गलत संगत में और भी क्या होता होगा, हमें क्या पता बेटा… क्या करें हम? कहां जाएं? पता होता पढ़लिख कर जमीन की मिट्टी सिर पर उठा लेगी तो मैं अनपढ़ ही रखती इसे,’’ बूआ का आक्रोश उन की आंखों से साफ फूट रहा था.

बूआ ईमानदार हैं जो अपनी संतान पर परदा नहीं डाल रहीं वरना हमारे समाज में मांबाप अकसर अपने बच्चों के ऐबों को छिपा जाते हैं. जहां तक मनु के ऐबों का सवाल है एक लड़की का मुंहफट होना और अपने घर के तौरतरीकों के खिलाफ जाना ही सब से बड़ा ऐब है. कहने को तो हम सब कहते हैं लड़कालड़की एकसमान हैं, लेकिन एकसमान हो कैसे सकते हैं? जो बुनियादी फर्क प्रकृति ने बना दिया है उस से आंखें तो नहीं न फेरी जा सकतीं? बूआ का मन समझ रहा हूं मैं. सत्य तो यही है कि कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता.

12 बज गए थे. मनु अभी अपने कमरे से बाहर नहीं आई थी. तब बूआ ने ही मुझे भेजा, ‘‘जरा देख तो…कहीं कोई नशावशा कर के मर तो नहीं गई.’’ ममत्व किस सीमा तक आहत हो चुका है, यह इन्हीं शब्दों से अंदाजा लगाया जा सकता है. मैं ने ही दूध का गिलास भरा और मनु के कमरे में जा कर उसे डठाने की सोची. ‘‘उठो मनु, 12 बज गए हैं,’’ कहते हुए मैं ने दरवाजा धकेला.

गृहशोभा विशेष

कुरसी पर चुपचाप बैठी थी आंखें मूंदे. मैं ने पास जा कर सिर पर हाथ रखा. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा कि उस में कुछ बदल गया है. कल जैसे भाव नहीं थे उस के चेहरे पर.

‘‘12 बज गए हैं… क्या नाश्ता नहीं करोगी? भूख नहीं लगी है क्या?’’

चुप रही वह. जब हाथ पकड़ कर उठाने का प्रयास किया तब मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया.

‘‘कुछ है क्या जो कहना चाहती हो? समझदार हो अपने अधिकार जानती हो… मेरे समझाने का कोई अर्थ नहीं है.’’

‘‘नाराज हो तुम भी?’’

‘‘तुम्हारे मातापिता से बढ़ कर मैं कैसे हो सकता हूं. उन की नाराजगी की जब तुम्हें परवाह नहीं तो मेरी तो बिसात ही क्या है? तुम्हारी भूख की चिंता थी मुझे, इसलिए दूध का गिलास ले आया.’’

जब मैं लौटने लगा तो उस ने मेरी बांह कस कर पकड़ ली. बोली, ‘‘मैं ने गलती की है, उस के लिए मां और पापा से माफी मांगना चाहती हूं… अजय मैं ही गलत थी, तुम सही थे. मुझे अपने साथ मां के पास ले चलो… पापा सही कहते थे मनुष्य शालीन न हो तो कोई भी गलत अनुमान लगा लेता है. चरित्र और व्यक्तित्व का पता पहनावे से भी लगता है. सही वेशभूषा न हो तो कोई कुछ भी समझने लगता है.’’

समझ गया मैं. ज्यादा खोल कर समझाने को था ही क्या. जो घरवाले न सिखा पाए लगता है किसी बाहर वाले ने सिखा दिया है. क्षण भर को चौंकना तो था ही मुझे, क्योंकि मनु को इतनी जल्दी अक्ल आ जाएगी, मुझे भी कहां उम्मीद थी.

‘अच्छा, क्या हुआ? सब ठीक तो है न?’’ चिंता तो जागती ही बहन के लिए. बड़े गौर से उस का चेहरा पढ़ना चाहा. लगता है किसी का अनुचित व्यवहार इसे बहुत कुछ समझा गया है. मर्यादा बहुत बारीक सी रेखा है, जिस का निर्वाह बेहद जरूरी है. चेहरे का भाव बता रहा था मर्यादा सहीसलामत है.

‘‘मुझे माफी मांगनी है मां से.’’

स्वर रुंध गया था मनु का. इतनी ऊंची नाक कहीं खो सी गई लगी.

‘‘किस मुंह से जाऊं?’’

‘‘अपने ही मुंह से जाओ माफ कर देंगे. तरक्की का सही मतलब तुम्हारी समझ में आ जाए इस से ज्यादा उन्होंने भी क्या चाहा है. उन की तो काफी बीत चुकी है. बाकी की भी बीत जाएगी. तुम्हारी सारी उम्र पड़ी है. सही मानदंड नहीं अपनाओगी तो सारी उम्र रास्ता ही ढूंढ़ती रह जाओगी… एक कदम गलत उठा तो समझो जीवन समाप्त… भाई हूं तुम्हारा, इसलिए कुछ बातें खोल कर समझा नहीं सकता… आशा है स्वयं ही समझने का प्रयास करोगी.’’

‘‘कह तो रही हूं मैं समझ गई हूं. मेरे साथ मां के पास चलो,’’ स्वर भारी था मनु का.

ढीलीढाली सलवारकमीज पहने बहुत अपनी सी लगने लगी थी मनु. गरिमामय भी लग रही थी और सुंदर भी. कौन कहता है तरक्की पाने और आधुनिक बनने के लिए नंगा रहना जरूरी है.

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