गृहशोभा विशेष

जब से अपर्णा अमन से लड़झगड़ कर अपने मायके चली गई थी तब से अमन खुद को दुनिया का सब से खुशहाल इनसान समझने लगा था. अब घर में न तो उसे कोई कुछ कहने वाला था और न ही हुक्म चलाने वाला. औफिस से आते ही आराम से सोफे पर पसर जाता. फिर कुछ देर बाद कपड़े उतार कर दरवाजे या डाइनिंग टेबल की कुरसी पर ही टांग देता. जूतों को भी उन के स्टैंड पर न रख कर डाइनिंग टेबल के नीचे सरका देता. खाना बनाने की तो कोई फिक्र ही नहीं थी. सुबह दूधब्रैड खा कर औफिस चला जाता और दोपहर का खाना औफिस की कैंटीन में खा लेता. रात के खाने की भी कोई चिंता नहीं थी. कभी बाहर से मंगवा लेता तो कभी एकाध दोस्त को भी अपने घर बुला लेता अथवा कभी किसी दोस्त के घर जा कर खा लेता था.

हमेशा की तरह आज अमन ने अपने दोस्त प्रेम को फोन कर के अपने घर बुलाया ताकि आराम से गप्पे मार सके. अपर्णा के जाने के बाद अमन की दिनचर्या कुछ ऐसी ही हो चुकी थी. बड़ा मजा आ रहा था उसे अपने मनमुताबिक जीने में. अपर्णा के रहते तो रोज किसी न किसी बात को ले कर घर में कलह होती रहती थी. मजाल जो अमन टीवी का रिमोट छू ले, क्योंकि अमन के औफिस से घर आने के समय अपर्णा का मनपसंद धारावाहिक चल रहा होता था. चिढ़ उठता था वह. उसे लगता जैसे यह घर सिर्फ अपर्णा का ही है और अपर्णा इस बात से चिढ़ उठती कि आते ही अमन अपने जूतेकपड़े खोल कर यहांवहां फैला देता.

‘‘यह क्या है अमन… देखो, तुम ने अपने कपड़े कहां लटका रखे हैं… तुम से

कितनी बार कहा है कि इस तरह कपड़े, जूते यहांवहां न रखा करो. पर तुम्हें समझाने का कोई फायदा नहीं,’’ कह अपर्णा ने अमन के जूते उठा कर जूता स्टैंड पर दे मारे.

‘‘अच्छा ठीक है कल से याद रखूंगा,’’ अमन अजीब सा मुंह बनाते हुए बोला.

‘‘तुम कभी याद नहीं रखोगे, क्योंकि तुम्हारी आदत बन चुकी है यह. अरे, कपड़े हैंगर में लगा कर रख दोगे तो क्या बिगड़ जाएगा… मोजे भी कभी दोनों नहीं मिलते… तंग आ गई हूं मैं तुम से… बीवी नहीं एक नौकरानी बना कर रख छोड़ा है तुम ने मुझे,’’ बड़बड़ाते हुए अपर्णा किचन में चली गई.

‘‘तो मैं क्या तुम्हारा नौकर हूं जो दिनरात तुम्हारी सुखसुविधा के लिए खटता हूं? अरे, मैं भी तो थक जाता हूं औफिस में… आ कर इसीलिए थोड़ा सुस्ताने लगता हूं. तुम्हारी तरह घर में आराम नहीं फरमाता हूं, समझी?’’ अमन भी गुस्से से बोला.

अपर्णा चाय के कप को लगभग टेबल पर पटकते हुए बोली, ‘‘क्या कहा तुम ने मैं घर में आराम फरमाती हूं? घर का काम क्या कोई और कर जाता है? तुम मर्दों को तो हमेशा यही लगता है कि औरतें घर में या तो टीवी देखती रहती हैं या फिर आराम. कभी एक रूमाल भी धोया है खुद? बस और्डर किया और सब हाजिर मिल जाता है… कितना भी खटो पर कोई कद्र नहीं है हमारी,’’ अपर्णा बोली.

अमन भी चुप रहने वाला नहीं था. बोला, ‘‘तो क्या घरबाहर सब मैं ही करूं? पता नहीं अपनेआप को क्या समझती है… जब देखो हुक्म चलाती रहती है. औफिस में बौस की सुनो और घर में बीवी की. सोचता हूं घर में चैन मिलेगा, पर वह भी मेरे हिस्से में नहीं है… इस से तो अच्छा है घर ही न आया करूं.’’

यह इन का रोज का झगड़ा था. प्रेम विवाह किया था दोनों ने. जीवन भर साथ जीनेमरने का वादा किया था. पर प्रेम तो कहीं दिख ही नहीं रहा था. बस विवाह किसी तरह निभ रहा था. इन का झगड़ा पासपड़ोस में चर्चा का विषय बन चुका था. हां, अमन था भी बेफिक्र इनसान. अपनी मस्ती में जीने वाला और उस की इसी बेफिक्री पर तो मरमिटी थी अपर्णा. तो आजक्यों उसे अमन की इस आदत से नफरत होने लगी? वैसे भी इनसान में सारी अच्छाइयां नहीं हो सकतीं न? अपर्णा को भी तो समझना चाहिए कि आखिर किस के लिए वह इतनी मेहनत करता… अपने परिवार के लिए ही न? क्या

कभी किसी बात की कमी होने दी उस ने अपर्णा को? बस जबान से निकली नहीं और खरीद लाता… कभीकभी तो वह इस बात केलिए भी अमन से झगड़ पड़ती थी कि क्या जरूरत थी इतने पैसे खर्च करने की? तब अमन कहता कि कमाता किस के लिए हूं, तुम्हीं सब के लिए ही न?

मगर अपर्णा को इस बात का जरा भी एहसास नहीं था. जराजरा सी बात पर चिड़चिड़ा उठती थी. बेचारा अमन औफिस से थकाहारा यह सोच कर घर आता कि थोड़ा रिलैक्स करेगा पर सब बेकार. अपर्णा के तानाशाह व्यवहार के कारण उसे लगने लगा था कि या तो अपर्णा कहीं चली जाए या फिर वह खुद अपर्णा से दूर हो जाए. वह हमेशा उस वक्त को कोसता रहता था जब उस ने अपर्णा से शादी करने का फैसला किया था. तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उसे लगा जैसे किसी अंधेरी गली से बाहर निकल आया हो.

‘‘आओआओ प्रेम, बड़ी देर लगा दी?’’ अमन ने कहा.

घर के अंदर कदम रखते ही प्रेम ने एक नजर अमन के पूरे घर पर दौड़ाई और फिरबोला, ‘‘सच में अमन तुम्हारा घर, घर नहीं कबाड़खाना लग रहा… क्या यार कैसे रह लेते हो इस घर में? छोड़ो गुस्सावुस्सा और जाओ जा कर भाभी और संजू को ले आओ… भाभी के लिए न सही पर संजू के लिए ही अपना गुस्सा थूक दो.’’

‘अकेले हैं तो क्या गम है…’ गाना गाते हुए अमन हंस पड़ा. फिर कहने लगा, ‘‘हां, सही कह रहा है तू… संजू के बिना मन कभीकभी बेचैन हो उठता है, पर अपर्णा… पागल हो गया है क्या? भले ही घर कबाड़खाना लगे पर मेरे मन को कितना सुकून मिल रहा है यह तू क्या जाने… बहुत घमंड था उसे कि उस के बिना मैं 1 दिन भी नहीं रह पाऊंगा… अरे जरा उसे भी तो पता चले कि उस के बिना भी मैं अच्छी तरह जी सकता हूं. चल, छोड़ ये सब… बता तेरा कैसा चल रहा है?’’

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प्रेम बोला, ‘‘मैं तो ठीक हूं पर तू कितनी अच्छी तरह जी रहा है वह मैं देख रहा हूं. पतिपत्नी में नोकझोंक चलती रहती है. इस का यह मतलब थोड़े न है कि दोनों अपनेअपने रास्ते बदल लें. अब भी कहता हूं जा कर भाभी को ले आओ.’’

थोड़ी देर बैठने के बाद प्रेम यह कह कर वहां से चला गया कि उस की पत्नी उस का इंतजार कर रही होगी. रात को अमन को नींद नहीं आ रही थी. वह सोच रहा था कि क्या उस ने अपर्णा को मायके जाने को मजबूर किया या वह खुद अपनी मरजी से गई? और संजू, वह बेचारा क्यों पिस रहा है उन के बीच? उस का कभी मन होता कि जा कर अपर्णा को मना कर ले आए, फिर मन कहता नहीं बिलकुल नहीं, खुद गई है तो खुद ही वापस आएगी. उसे फिर अपर्णा की जलीकटी बातें याद आने लगीं…

‘‘जब तुम्हारे औफिस में मीटिंग थी और डिनर भी वहीं था तो मुझे बताया क्यों नहीं? कब से भूखीप्यासी तुम्हारे इंतजार में बैठी हूं… और अभी आ कर बोल रहे हो कि खा कर आया हूं. आखिर समझते क्या हो अपनेआप को? क्या तुम मालिक हो और मैं तुम्हारी नौकरानी?’’

अमन के औफिस से आते ही चिल्लाते हुए अपर्णा ने कहा.

‘‘ऐसी बात नहीं है अपर्णा, मुझे तो पता भी नहीं था कि आज औफिस में डिनर का भी प्रोग्राम है. जब मुझे पता चला तो मैं तुम्हें फो  करने ही जा रहा था, पर नमनजी मुझे खींच कर खाने के लिए ले गए और फिर मेरे दिमाग

से बात निकल गई,’’ अमन ने सफाई देते हुए कहा. मगर अपर्णा कहां सुनने वाली थी. कहने लगी, ‘‘नहीं अमन, बात वह नहीं है. बात यह है कि तुम कमा कर लाते हो न इसलिए अपनी मन की करते हो… जानबूझ कर मुझे सताते हो… जानते हो जाएगी कहां?’’

‘‘अरे, मैं कह रहा हूं न कि मुझे पता नहीं था कि वहां डिनर का भी प्रोग्राम है. कब से दिमाग खराब किए जा रही हो… जाओ जो समझना है समझो,’’ अमन ने खीजते हुए कहा.

‘‘इस में समझना और समझाना क्या है? देखना, एक दिन मैं तुम्हें और इस घर को छोड़ कर चली जाऊंगी. तब तुम्हें पता चलेगा… तुम यह न समझना कि मेरा कोई ठिकाना नहीं है… क्योंकि अभी भी मेरा मायका है जहां मैं जब चाहूं जा कर रह सकती हूं,’’ अपर्णा गुस्से से बोली.

आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है. अब अमन का गुस्सा 7वें आसमान पर पहुंच चुका था. अत: बोला, ‘‘जाओ, मैं भी तो देखूं, मेरे अलावा कौन तुम्हारे नखरे उठाता है… मेरी भी जान छूटेगी… तंग आ गया हूं मैं तुम्हारे रोजरोज के झगड़ों से.’’

 

अपर्णा यह सुन कर अवाक रह गई, ‘‘क्या कहा तुम ने जान छूटेगी तुम्हारी

मुझ से? तो फिर ठीक है, मैं कल ही जा रही हूं अपनी मां के घर और तब तक नहीं आऊंगी जब तक तुम खुद लेने नहीं आओगे.’’

‘‘मैं लेने आऊंगा, भूल जाओ… खुद ही जा रही हो तो खुद ही आना… न आना हो तो मत आना,’’ अमन ने दोटूक शब्दों में कहा.

‘‘क्या तुम मुझे चैलेंज कर रहे हो?’’

‘‘यही समझ लो.’’

‘‘तो फिर ठीक है, अब मैं इस घर में तभी पांव रखूंगी जब तुम मुझे लेने आओगे,’’ कह वह दूसरी तरफ मुंह कर सो गई. पूरी रात दोनों दूसरी तरफ मुंह किए सोए रहे. सुबह भी दोनों ने एकदूसरे से बात नहीं की. अमन के औफिस जाते वक्त अपर्णा ने सिर्फ इतना कहा कि घर की दूसरी चाबी लेते जाना.

आज अपर्णा और संजू को गए 2 महीने हो चुके थे पर न तो अपर्णा की आने की कोई उम्मीद दिख रही थी और न ही अमन की उसे बुलाने की… पर तड़प दोनों रहे थे. और बेचारा संजू… उसे किस गलती की सजा मिल रही थी…

शाम को औफिस से आते ही अमन ने हमेशा की तरह अपने दोस्त को फोन लगाया, ‘‘हैलो विकास, क्या कर रहा है यार? अगर फुरसत हो तो आ जा… बाहर से ही कुछ खाना और्डर कर देंगे.’’

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ विकास बोला.

विकास ने भी आते ही यही बात दोहराई कि अपर्णा के न रहने से उस का घर घर नहीं लग रहा है.

थोड़ी देर बैठने के बाद वह भी जाने लगा तो अमन बोला, ‘‘अरे बैठ न यार… क्या जल्दी है… मैं ने पिज्जा और्डर किया है खा कर जाना.’’

तो विकास कहने लगा, ‘‘नहीं रुक पाऊंगा यार… तुम्हें तो पता है मेरी बेटी मेरे बगैर सोती नहीं है और पिज्जा तो मैं खाता ही नहीं हूं… चल गुडनाइट,’’ कह वह चला गया.

‘यही सब दोस्त, कभी घंटों मेरे घर में गुजार देते थे और आज एक पल भी रुकना इन्हें भारी पड़ने लगा है,’ किसी तरह पिज्जे का 1 टुकड़ा अपने मुंह में डाला, पर खाया नहीं गया. कितने प्यार से उस ने पिज्जा और्डर किया था पर अब खाने का मन नहीं कर रहा था. तभी उसे याद आ गया कि कैसे संजू पिज्जा खाने के लिए बेचैन हो उठता था.

बड़ी मुश्किल से देर रात गए अमन को नींद आई. सुबह वक्त का पता ही नहीं चला कि कब घड़ी ने 8 बजा दिए. जल्दी से तैयार हो कर बिना कुछ खाएपिए औफिस चल दिया. जातेजाते पलट कर एक बार पूरे घर को देखा और फिर कुछ सोचने लगा… शायद उसे भी अब यह एहसास होने लगा था कि अपर्णा के बिना यह घर कबाड़खाना बन चुका है. धिक्कार रहा था वह खुद को. शाम को जब वापस घर आया तो और दिनों के मुकाबले आज मन बिलकुल बुझाबुझा सा लग रहा था. न तो टीवी देखने का मन हो रहा था और नही कुछ और करने का. आज उसे अपर्णा और संजू की बहुत कमी खल रही थी. घर काटने को दौड़ रहा था. सोचा दोस्तों से ही बातें कर ले पर किसी का फोन नहीं लग रहा था, तो कोई फोन नहीं उठा रहा था. वह समझ गया, भले ही लोग बीवीबच्चों से परेशान हो जाते हों पर अगर वे न हों तो फिर जिंदगी बेमानी बन कर रह जाती है.

उधर अपर्णा भी कहां खुश थी. कहने को तो वह अपने मायके आई थी, पर यहां भी रोज किसी न किसी बात को ले कर उस की भाभी सुमन बखेड़ा खड़ा कर देती थी. बातबात पर यह कह कर उसे ताना मारती, ‘‘पता नहीं कैसे लोग लड़झगड़ कर मायके पहुंच जाते हैं… भूल जाते हैं कि यह उन का अपना घर नहीं है.’’

अपर्णा अपने पर झल्ला उठती कि आखिर वह यहां आई ही क्यों?

एक शाम अपर्णा पड़ोस की एक औरत से बातें कर रही थी. तभी सुमन बड़बड़ाती हुई आई और कहने लगी, ‘‘दीदीदीदी देखिए तो जरा, कैसे आप के संजू ने मेरे बबलू का खिलौना तोड़ दिया.’’

अपर्णा ने गुस्से से अपने बेटे की तरफ देखा और फिर उसे डांटते हुए बोली, ‘‘क्यों संजू, तुम ने बबलू का खिलौना क्यों तोड़ा? यह तुम्हारा छोटा भाई है न? चलो सौरी बोलो.’’

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‘‘मम्मी, मैं ने इस का खिलौना नहीं तोड़ा. मैं ने तो सिर्फ खिलौना देखने के लिए मांगा था और इस ने गुस्से से फेंक दिया… मैं तो खिलौना उठा कर उसे दे रहा था, पर मामी को लगा कि मैं ने इस का खिलौना तोड़ा है,’’ संजू रोते हुए बोला.

‘‘देखो कैसे झूठ बोल रहा है आप का बेटा… मैं बता रही हूं दीदी, संभाल लो इसे नहीं तो बड़ा हो कर और कितना झूठ बोलेगा और क्याक्या करेगा पता नहीं… अब क्या बबलू अपने घर में अपने खिलौने से भी नहीं खेल सकता? यह तो समझना चाहिए लोगों को.’’

सुमन की व्यंग्य भरी बातें सुन कर अपर्णा को लगा जैसे उस के दिल में किसी ने तीर चुभो दिया हो. जब उस ने अपनी मां की तरफ देखा, तो वे भी कहने लगीं, ‘‘सच में अपर्णा, तुम्हारा संजू बड़ा ही जिद्दी हो गया है… जरा संभालो इसे, बेटा.’’

अपर्णा स्तब्ध रह गई. बोली, ‘‘पर मां, आप ने देखेसुने बिना ही कैसे संजू को गलत बोल दिया?’’ उस की समझ में नहीं आ रहा था कि मां अचानक नातेपोते में इतना भेद क्यों करने लगीं.

अपर्णा संजू को ले कर अपने कमरे में जाने  ही लगी थी कि तभी सुमन ने फिर एक व्यंग्यबाण छोड़ा, ‘‘अब जब मांबाप ही आपस में झगड़ेंगे तो बच्चा तो झूठा ही निकलेगा न.’’

सुन कर अपर्णा अपने कमरे में आ कर रो पड़ी. फिर सोचने लगी कि सुमन भाभी ने इतनी बड़ी बात कह दी और मां चुप बैठी रहीं. कल तक मां मेरा संजू मेरा संजू कहते नहीं थकती थीं और आज वही संजू सब की आंखों में खटकने लगा? आज मेरी वजह से मेरे बच्चे को सुनना पड़ रहा है. फिर वह खुद को कोसती रही. संजू कितनी देर तक पापापापा कह कर रोता रहा और फिर बिना खाएपीए ही सो गया.

अपर्णा के आंसू बहे जा रहे थे. सच में कितने घमंड के साथ वह यहां आई थी और कहा था जब तक लेने नहीं आओगे, नहीं आऊंगी. पर अब किस मुंह से वह अपने पति के घर जाएगी… अमन तो यही कहेगा न कि लो निकल गई सारी हेकड़ी… ‘जो भी सुनना पड़े पर जाना तो पड़ेगा यहां से,’ सोच उस ने मन ही मन फैसला कर लिया. बड़ी हिम्मत जुटा कर अपर्णा की मां उस के कमरे में उसे खाने के लिए बुलाने आईं

और कहने लगीं, ‘‘अपर्णा, मुझे माफ कर देना… मैं भी क्या करूं… आखिर रहना तो मुझे इन लोगों के साथ ही है न… बेटा, मेरी बात को दिल से न लगाना,’’ और वे रो पड़ीं.

अपर्णा को अपनी मां की बेबसी पर दया आ गई. कहने लगी, ‘‘मां, आप शर्मिंदा न हों. मैं सब समझती हूं, पर गलती तो मेरी है, जो आज भी मायके को अपना घर समझ कर बड़ी शान से यहां रहने आ गई. सोचती हूं अब किस मुंह से जाऊंगी, पर जाना तो पड़ेगा.’’

रात भर यह सोच कर अपर्णा सिसकती रही कि आखिर क्यों लड़की का अपना कोई घर नहीं होता? आज अपर्णा अपनेआप को बड़ा छोटा महसूस कर रही थी. फिर सोचने लगी कि जो भी हो पर अब वही मेरा अपना घर है. यहां सब की बेइज्जती सहने से तो अच्छा है अपने पति की चार बातें सुन ली जाएं. फिर कहां गलत थे अमन? आखिर वे भी तो मेहनत करते हैं. हमारी सारी सुखसुविधाओं का पूरा खयाल रखते हैं और मैं पागल, बेवजह बातबात पर उन से झगड़ती रहती थी.

सच में बहुत कड़वा बोलती हूं मैं… बहुत बुरी हूं मैं… न जाने खुद से क्याक्या बातें

करती रही. फिर संजू की तरफ देखते हुए बड़बड़ाई कि बेटा मुझे माफ कर देना. अपने घमंड में मैं ने यह भी न सोचा कि तुम अपने पापा के बगैर कैसे रहोगे… पर अब हम अपने घर जरूर जाएंगे बेटा.

सुबह भी अपर्णा काफी देर तक अपने कमरे में ही पड़ी रही. शाम को ट्रेन से जाना

था उन्हें. अपना सारा सामान पैक कर रही थी कि तभी उस की मां आ कर कहने लगीं, ‘‘बेटा, मैं चाह कर भी यह नहीं कह सकती कि बेटा और कुछ दिन रुक जाओ.’’

अपर्णा मां को गले लगाते हुए बोली, ‘‘आप मेरी मां हैं और यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. रही जाने की बात, तो आज नहीं तो कल मुझे जाना ही था. आप अपने को दोषी न मानें.’’

दोनों बात कर ही रही थीं कि उधर से संजू, पापापापा कहते हुए दौड़ता हुआ आया.

‘‘क्या हुआ संजू? पापापापा चिल्लाता हुआ क्यों दौड़ा आ रहा..’’

अपर्णा अपनी बात पूरी कर पाती उस

से पहले ही उस की नजर सामने से आते अमन पर पड़ी तो वह चौंक उठी. बोली, ‘‘अमन आप?’’

अमन को देख अपर्णा के दिल में उस के लिए फिर वही पहले वाला प्यार उमड़ पड़ा. उस की आंखों से आंसू बह निकले. कहने लगी, ‘‘अमन, हम तो खुद ही आ रहे थे आप के पास.’’

अपर्णा का हाथ अपने हाथों में कस कर दबाते हुए अमन बोला, ‘‘अपर्णा, मुझे माफ कर दो और चलो अपने घर… तुम्हारे बिना हमारा घर घर नहीं लगता… तुम्हारे न होने से मेरे सारे दोस्त भी मुझ से किनारा करने लगे हैं. नहीं अब नहीं जीया जाता तुम बिन… हां मैं बहुत अव्यवस्थित किस्म का इनसान हूं पर जैसा भी हूं… अब तुम ही मुझे संभाल सकती हो. अपर्णा मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं,’’ कहतेकहते अमन की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘अमन, गलत आप नहीं मैं…’’

‘‘नहीं,’’ अमन ने अपना हाथ अपर्णा के होंठों पर रखते हुए कहा, ‘‘कोई गलत नहीं था, बस वक्त गलत था. जितना लड़नाझगड़ना था लड़झगड़ लिए, अब और नहीं,’’ कह कर अमन ने अपर्णा को अपने सीने से लगा लिया.

अपर्णा भी पति की बांहों के घेरे में सिमटते हुए बोली, ‘‘मैं भी तुम बिन नहीं जी सकती.’’