बचपन से ही मैं बहुत नकचढ़ी व सिरफिरी थी. परंतु मेरी बेटी इस के एकदम विपरीत स्वभाव वाली थी. आज मेरी बेटी अनन्या के स्कूल में वार्षिकोत्सव था. वह अब तक स्कूल से वापस नहीं आई थी. अपनी लाडली की प्रतीक्षा में आतुर मेरा मन अब सशंकित हो चुका था. अब तक तो उसे अपनी गुलाबी स्कूटी पर स्कूलबैग लटकाए, पुरस्कारों के साथ वापस आ जाना चाहिए था. अंधेरा भी घिरने लगा था. पता नहीं दोस्तों में अटक गई या फिर…मैं चिंता में डूब गई थी. आज के अनाचारी तो रात की भी प्रतीक्षा नहीं करते. अब तो दिनदहाड़े दुराचार की घटनाएं होने लगी हैं.

अचानक दरवाजा हवा के झोंके से खुल गया और उस के साथ ही सुनाई दी मेरी लाडली की कातर चीख. क्या हुआ? क्या हो गया मेरी लाडली को और फिर वह हृदयविदारक दृश्य. चारों ओर बिखरे पारितोषिकों से घिरी, फर्श पर बैठी मेरी हंसमुख कली जोरजोर से सिसकियां भर रही थी. यह क्या? इस का शरीर इस मोटी चादर में क्यों? चादर का कोना जरा सा छुआ तो वह चिहुंक उठी.

‘‘ममा, ममा, आज अंकल न होते तो आप की यह अनन्या आप की आंखों की किरकिरी बन जाती. मैं मर जाती ममा. अब भी मर जाना चाहती हूं. वे घिनौने स्पर्श…’’

होश उड़ गए मेरे. किसी तरह उस ने अपने को संभाला, ‘‘ममा…जरा गाउन… यह चादर…बाहर अंकल…’’ उस की जबान अटक रही थी. जैसे ही उस ने चादर उतारी तो तारतार गुलाबी कुर्ती सिर्फ कंधे से अटकी रह गई. मैं लड़खड़ाई. उसी ने संभाला. मैं बाहर भागी…

अंदर आ कर मैं ने उस से पूछा, ‘‘बेटा, हुआ क्या? बता तो सही. तू इस तरह कांप क्यों रही है? कपड़े तारतार…कहीं…’’

 

वह घुटनों में मुंह छिपाए सिसकती रही. एक बार नजर ऊपर उठाई. मुद्रा ऐसी जैसे कोई अपराध किया हो. मैं ने जमीन पर बैठ कर उसे अपनी बांहों में समेटा.

‘‘बेटा, पूरी बात तो बता. मेरी बहादुर बेटी, ऐसे दुष्कर्मियों से अपनी इज्जत बचा लाई यह तो गर्व की बात है. तू रो क्यों रही है?’’

‘‘बस ममा, बच गई लेकिन वे घिनौने स्पर्श…’’

एक कप गरम चाय पिला कर मैं उसे उस के कमरे में ले आई. उस की सिहरन थम चुकी थी और वह काफी संभल चुकी थी. पलंग पर आराम से बैठी तब मैं ने देखा. हाथों में जगहजगह नील पड़े थे. पैर के एक अंगूठे में खून जमा था. होंठ सूज कर लटक रहे थे. मैं तो उस की यह हालत देख खुद ही सिहर उठी. कुछ देर बाद उस ने गरम शावर लिया और फिर मेरे गले में बांहें डाल कर बैठ गई.

‘‘ममा, आज मेरी कराटे की ट्रेनिंग काम आई वरना…’’

मैं अवाक् हो सुनती रही. उस के चेहरे पर उठतेगिरते भावों को पढ़ने की कोशिश करती रही. बोलतेबोलते कभी वह अपनी मुट्ठियां भींचतीखोलती. मैं चुपचाप उसे देखती और सुनती रही. अचानक उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. मैं अंदाजा लगाने की कोशिश करती रही कि किस पीड़ा, अपमान से गुजरी होगी यह…तभी अनन्या ने पलंग पर एक जोरदार घूंसा मारा  फिर उस ने अपनी आपबीती सुनानी शुरू की, ‘‘ममा, हमारा फंक्शन ठीक 5 बजे समाप्त हुआ. रोज की तरह मैं ने स्टैंड से अपनी स्कूटी निकाली और चल पड़ी. थोड़ा ही आगे गई थी कि एक कार ने मेरा रास्ता रोका. मैं ने रास्ता काट कर निकलना चाहा पर निकल नहीं पाई. कार से निकले 3 लफंगों ने मेरी स्कूटी गिरा दी और मुझे उठा कर कार में डाल लिया.’’

मैं तो यह सुन हक्कीबक्की रह गई.

‘‘पता नहीं वे किन अनजान सुनसान रास्तों से गुजरते रहे.’’

‘‘कार में कुछ किया तो नहीं?’’ मेरी सांस ऊपरनीचे होने लगी.

‘‘हां ममा, वह नटल्लू सा…लेकिन उस काली टीशर्ट वाले ने डांटा, ‘एकदम चुप बैठो. कार में जरा सा निशान मिल गया न पुलिस को तो बच्चू…’

‘‘मैं छटपटाती रही पर दोनों ओर की मजबूत गिरफ्त में फंसी थी. क्या करती. मेरे मुंह में बोल कहां? मैं तो बस उसे देखे जा रही थी. मैं ने कस कर दाहिनी ओर वाले की कलाई में नाखून चुभाया तो चीख कर उस ने अपने बूट से मेरे दाएं पैर का अंगूठा कुचल डाला. चीख सुन कर वह काली टीशर्ट वाले ने मुझे घुड़का, ‘ए लड़की, ज्यादा चींचपड़ की तो समझ ले, तेरी जान की खैर नहीं.’

‘‘मैं चुप ही रही. सुनसान सड़क में न कोई राहगीर न कोई सवारी. आखिर उन्होंने मुझे पार्क के एक सुनसान अंधेरे कोने में पटक दिया. पर ममा, मैं ने उन से दया की कोई भीख नहीं मांगी. सीधे उछल कर एक के पेट में लात का जबरदस्त वार किया और दूसरे के पैर में. जब तक वे दोनों संभले तब तक तीसरे से गुत्थमगुत्था हो गई. फिर तीनों मिल कर मेरे कपड़े तारतार कर के मुझे जमीन पर पटकने ही वाले थे कि मैं ने उछल कर अपना सिर काली टीशर्ट वाले की नाभि में जोर से मारा. बड़ा हीरो बन रहा था. उस का घुटना एक की आंख में लगा और दोनों चीख मार कर गिर पड़े और उन के ऊपर मैं…तभी न जाने कहां से एक अंकल वहां आ गए और उन्होंने अकेले ही उन तीनों गुंडों से जूझ कर मुझे बचाया.

‘‘ममा, उन्होंने तीनों को इतना मारा कि बस पूछो मत. फिर वे उन्हीं की कार में मुझे यहां छोड़ गए. कह रहे थे कि कार पुलिस चौकी में जमा कर देंगे.’’

 

मैं तो बदहवास सी सारा किस्सा उस से सुन रही थी. जैसे सारी घटना अपनी आंखों के सामने घटती हुई देख रही थी.

‘‘लेकिन ममा, एक बात बताइए. आप मुझे कराटे सीखने को मना कर रही थीं न. कह रही थीं कि यह खेल लड़कियों का नहीं. अब आप ही बताइए, अगर मैं आप की बात मान कर गाना सीखती तो क्या वह आज मुझे बचा पाता?’’

मैं तो चुप उसे बस देखे जा रही थी और वह थी कि बोलती ही जा रही थी.

‘‘स्पाइडरमैन बन कर आए थे ममा वह अंकल. आप ने तो उन्हें एक कप चाय भी नहीं पिलाई.’’

उस मददगार का नाम आते ही मेरी आंखों के सामने वह चेहरा फिर से कौंध गया. चेचक के दागों से भरे चेहरे पर जड़ी वे भूरी आंखें. एकदम उस अपराधी की हूबहू शक्ल. वे तो चले गए पर जातेजाते मुझे यादों की डोर पकड़ा गए. उसी डोर को थामे मैं ने स्मृतियों की इतनी ऊंची पींगें बढ़ा लीं कि सीधी अतीत के उस खारे समुद्र में जा गिरी.

पापा हरी सिंह चौधरी पूरे बिहार के नामी फौजदारी वकील थे. उन की बड़ी सी 18 कमरों वाली पुश्तैनी कोठी थी. उन का वह बड़ा सा दफ्तर और बाहर खड़ा नीले तुर्रेदार साफे वाला कड़क दरबान, ये सबकुछ मुझे एक विशेष प्रकार के गर्व से भर कर अपनी ही नजरों में विशेष बना देते थे. गुरूर था मुझे पापा पर, उन के ऐश्वर्य पर, उन की शानशौकत पर. खलती थी बस वे 2 बैंचें और उन पर टांग पसारे बैठे वे बलात्कारी, डाकू, चोर, अपहरणकर्ता, हत्यारे. पापा के वे चहेते मुवक्किल. सुबहशाम उन की बगल से हो कर गुजरना मुझे बैंच पर खड़े होने से भी बड़ी सजा लगती. मैं हमेशा मां से शिकायत करती और मां मुझे समझाने लग जातीं.

लेकिन उस दिन बात सहनशीलता की सीमा लांघ गई. सहेलियों के साथ बाहर निकलने ही वाली थी कि वह मेरे सामने आ गया. मुझे उस की शक्ल से भी नफरत थी. वह अपने हाथ में लिए डब्बे से उठा कर लड्डू मेरे मुंह में डालना चाहता था. मैं ने इतनी जोर से उस का हाथ झटका  कि पूरा का पूरा डब्बा ही दूर जा गिरा. तब जीवन में पहली बार पापा से डांट पड़ी थी.

‘यह क्या तरीका है बेबी? हत्या के झूठे अभियोग से बरी होने का प्रसाद ही तो दे रहा था न मुरलीधर. यही है तुम्हारे पब्लिक स्कूल का ‘सो कौल्ड’ हाई कल्चर? टू हेल विद दिस इन्ह्यूमन हाइहैंडेडनेस.’

मुझ 12 साल की छोटी बच्ची को भी पता था कि पापा बहुत गुस्से में हों तभी घर में अंगरेजी बोलते हैं. पर मुझ अकड़ू ने माफी मांगना तो दूर उन को सुना कर ही कहा था, ‘हुं, मुरलीधर. फणिधर है फणिधर.’ पापा ने बस मुड़ कर देखा था.

इसी तरह किलकारियों, मानमनौव्वल के बीच बचपन बीत गया. फिर एक दिन मेरी सपनीली आंखों में समाया राजकुमार भी मलय के रूप में मेरा हाथ थामने आ गया. लेकिन यह क्या? ऐन विदाई के समय मेरे ठीक सामने हाथ में लाल डब्बी पकड़े वही खड़ा था, मुरलीधर बनाम फणिधर. मन तो हुआ मुंह नोच लूं उस का. हिम्मत तो देखो इस की, पर मौके की नजाकत को समझ मैं ने बस मुंह फेर लिया.

‘बेबी आज मत ठुकराना. मेरी कोई बेटी नहीं, तुम्हें ही बेटी माना है. बहुत चाहता हूं तुम्हें. मेरा यह छोटा सा तोहफा ले लो. सदा खुश रहो. तुम दूधों नहाओ पूतों फलो.’

अब मेरा इतनी देर से संचित धैर्य चुक गया. इस से पहले कि वह मेरे सिर पर हाथ रखता, मैं ने डब्बी उस के हाथ से छीनी और अंदर रखे जड़ाऊ कंगन उस पर फेंक मारे. वह खून निकलता माथा पकड़े वहीं बैठ गया. मलय ने मुझे देखा, पापा ने भी मुड़ कर देखा पर बोले कुछ नहीं.

आज अतीत के शैल्फ से निकली पुरानी यादों की किताब के पन्ने अपनेआप पलटने लगे. मैं साफ पढ़ रही थी कि मुरलीधर के माथे पर लगी चोट से गहरी थी उस के दिल पर लगी चोट और इस चोट को महसूस करते हुए पापा के चेहरे पर खिंची दर्द की वह लकीर भी साफ दिखने लगी. अब समझ पाई कि संतान के सुखद भविष्य की कामना करने वाले मातापिता किसी भी अनिष्ट की आशंका से कैसे विचलित हो सकते हैं, चिंतित हो उठते हैं.

इस हादसे ने हिला कर रख दिया. उस मददगार ने हजारों प्रश्नों की चुभती शलाकाओं से मुझे आहत कर दिया है. आखिर वे थे कौन उस दिन जब बिटिया के याद दिलाने पर मैं बाहर भागी थी और लोट गई थी उन के चरणों में?

‘आप तो महान हैं. आप ने मेरी असहाय बेटी की लाज बचाई है. मैं कैसे ऋणमुक्त हो सकती हूं इस उपकार से.’

उन्होंने मुझे कंधे से पकड़ कर उठाया था और कहा था, ‘ना बेबी. मैं ने कोई उपकार नहीं किया, सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया है.’

चौंक कर देखा था तो डर गई थी. बेबी का संबोधन और वही चेचक के दागों से भरे चेहरे पर जड़ी भूरी आंखें. वही खुरदरी आवाज. पर मेरे कोई प्रश्न पूछने से पहले वे जा चुके थे.

फिर मैं ने अपने मन को समझा लिया था, ‘वे यहां जमशेदपुर में कहां से? आंखें और आवाज तो कइयों की एकजैसी हो सकती हैं और बेबी का संबोधन तो आम है. उम्र में बड़े थे. बेबी कह दिया.’

मन को समझा कर निश्ंिचत हो गई. मुरलीधर जैसा अपराधी और ऐसा महान कार्य? असंभव. थोड़ीबहुत जो ऊहापोह थी वह भी महीना बीततेबीतते समाप्त हो गई.

मैं अपनी लाडली को संभालने में लग गई. वह उस हादसे से बेदाग निकल तो आई थी पर बुरी तरह टूट चुकी थी. उस के जेहन से न वे दरिंदे निकल पाते थे न वह मददगार. धीरेधीरे बड़ी मुश्किल से वह सामान्य हो पाई.

 

गाड़ी पटरी पर से उतरतेउतरते लड़खड़ाती है, संभलती है और फिर सामान्य गति से चल पड़ती है. अब तो मेरी बेटी मैडिकल में है. पूरे 5 साल बीत चुके हैं उस हादसे को. गृहस्थी हंसीखुशी चल रही थी. लेकिन उस दिन पापा के फोन ने फिर से विचलित कर दिया.

‘‘बेबी, बेटा, तुम्हें मुरलीधर यादव याद है? वही जिस से तुम मन की अंदरूनी तहों से घृणा करती थीं, जिस का आशीर्वाद तुम ने फेंक कर मारा था.’’

मैं सन्न. तो मेरा संदेह सही था? इतने वर्ष बाद पापा मुझ पर व्यंग्यवर्षा कर रहे हैं? इसी के कारण मेरे और पापा के रिश्ते में एक गांठ पड़ गई थी. क्या पापा एक और गांठ लगा रहे हैं उस में? अब क्या करूं? मैं ने तो उस हादसे का जिक्र भी नहीं किया. न पापा से, न मां से. अब इतने सालों बाद पापा मुझे शर्मसार कर रहे हैं. मैं बिलख पड़ी.

‘‘पापा, मुझे पता नहीं चला. शक हुआ था पापा, पर वह यहां…’’

‘‘तू रो क्यों रही है बेटा. पुरानी बातों को भुला कर एक बार उस से मिल ले. मैं ने सोचा कि आयु की परिपक्वता के साथ तुझ में ठहराव आ गया होगा. कल वह यहां आया था. कोई 10 साल बाद मिला मुझ से. बस एक बार तुझे और नोनी को देखना चाहता है. अब मन का मैल छोड़ कर मिल ले. पकी आयु का क्या भरोसा. आएगी न बेटा?’’ पापा के स्वर में इसरार था. उन का गला रुंध गया था.

छाती पर से पत्थर हटा. मेरी शंका सही नहीं थी. पापा कोई व्यंग्य नहीं कर रहे थे. यह तो बस एक सहृदयी पुकार थी. मैं ने एकदम कहा, ‘‘हां पापा, आऊंगी. सच मानिए पापा, आप की यह अहंकारी बेटी बहुत बदल चुकी है. जिंदगी की पाठशाला ने उसे दर्प का, अहं का, संवेदनाशून्य अभिजात्य का असली अर्थ पढ़ा दिया है. मैं कल ही आ रही हूं पापा. ’’

घर से मुरलीधर के यहां जाते हुए पापा पूरे रास्ते बोलते रहे, ‘‘जानती है बेबी, कहते हैं तामसी त्याग से भी श्रेष्ठ होता है तापसी ग्रहण. मुरली ने दोनों किया है. पूरा जीवन लगा दिया मासूम कन्याओं को कू्रर बलात्कारियों से बचाने में, बेबस निरीहों को कठोर हत्याओं से छुड़ाने में, लोगों की मेहनत की कमाई को चोरों ठगों से वापस दिलाने में. पता नहीं कहांकहां भटकता रहा. महान हो गया है. लोग उस की इज्जत करते हैं. दीनबंधु है वह तो. बस एक ही रट है, मरने से पहले एक बार तुझ से और नोनी से मिलने की. पता नहीं क्या है उस के मन में.’’

दीनबंधु वह फणिधर…तो क्या उस शाम सचमुच…मैं अवाक् पापा को देखती रही. वे बोलते रहे, ‘‘तू ने उस की विनती स्वीकार नहीं की थी.

 

मैं ने कनखियों से मां को देखा. वे हैरान थीं. कभी मुझे देखतीं, कभी पापा को. पापा बोलते रहे, ‘‘उन दिनों उस पर डकैती का मुकदमा चल रहा था. मेरी दलीलें उसे बचाने में सफल हो चुकी थीं. सरकारी वकील ने घुटने टेक दिए थे. लेकिन ऐन फैसले के दिन वह खुद ही पलट गया. कठघरे में खड़ा मुरलीधर यादव अपने ऊपर लगे सारे आरोप स्वीकार कर रहा था :

‘‘‘जज साहब, यह डाका मैं ने ही डाला है. मुझे सजा दीजिए.’

‘‘‘तुम पर दबाव है किसी का?’ जज ने पूछा.

‘‘‘जी साहब, बहुत गहरा दबाव है.’

‘‘‘किस का? नाम बताओ उस का.’

‘‘वह मुसकराया, ‘मेरी यह आत्मा. बहुत गहरा दबाव है. अब और नहीं सहा जाता,’ और उस ने हृदय पर हाथ रखा. जज साहब हैरान, पूरा कोर्टरूम सन्नाटे में. मैं नजरें झुकाए खड़ा था और वह हंसताहंसता जेल चला गया. उड़तेउड़ते किस्से सुनता रहा उस की महानता के. 10 वर्षों के बाद कल आया, बस यही विनती ले कर…तुझ से मिलने की. एकदम कमजोर. मैं मना नहीं कर पाया, बेबी.’’

अब तक चुप बैठी अनन्या ने प्रश्न दागा.

‘‘नानाजी, यह तो मैं समझ गई कि वे एक अपराधी थे और अचानक उन का हृदय परिवर्तन हो गया पर यह मम्मी का चक्कर नहीं समझ में आ रहा. यह तो काबुलीवाला की कहानी जैसा लग रहा है.’’

‘‘ऐसा है बेटा, अब चल ही रहे हैं. खुद ही पूछ लेना.’’

मैं एकदम चुप. पूरा घटनाक्रम गहरे तक मेरे मन को खुरच गया. मेरे उस दिन किए गए घोर अपमान ने उन्हें ऐसा बदल दिया? मानवमन कितना विचित्र है. ऐसा धुर अपराधी इतना संवेदनशील भी हो सकता है? इतनी आत्मशक्ति, ऐसा मनोबल, विकट आत्मनियंत्रण, दृढ़ संकल्प हम शरीफों में होता है क्या?

 

स्वयं में खोई सी, संकोच का कवच ओढ़े मैं झिझकती हुई उस घर में घुसी. वह लंबातगड़ा पहलवान सा व्यक्ति चारपाई से लगा पड़ा था. एकदम जर्जर शरीर, शांत आंखें, संवेगआवेगशून्य शब्दहीन दृष्टि. पर स्वरहीन, शब्दहीन होंठों की भाषा मैं ने पढ़ ली थी. उन रंगहीन होंठों पर उभरी स्मित की वह रेखा. निर्जीव आंखों में उभरी वह अनदेखी चमक मैं ने देख ली थी. अनन्या बड़े ध्यान से देखतेदेखते अचानक उन से लिपट गई.

‘‘अंकल कहां चले गए थे आप. ममा यही तो हैं वे अंकल. अंकल, यह क्या हालत हो गई आप की? 5 साल पहले तो आप एकदम हट्टेकट्टे थे. चलिए, हमारे साथ. आप की यह बेटी डाक्टर बनने वाली है बस. बड़े से बड़े डाक्टर से आप का इलाज करवाऊंगी. ममा, ले चलेंगी न इन्हें अपने घर?’’ वह मेरी ओर मुड़ी.

‘‘हां बेटा, इन की नहीं तो और किस की सेवा करूंगी? महान हैं ये तो. मैं भी अपना जन्म सार्थक करूंगी.’’

पापा आंखों में प्रश्न सागर लहराते कभी मुझे तो कभी नोनी को देख रहे थे. अब मैं समझ पाई कि इस महान व्यक्ति ने उन की प्यारी नातिन के उद्धार की घटना का जिक्र भी उन से नहीं किया. सिहर उठी मैं. अनन्या के लिपटते ही उन की आंखें जो बंद हो गई थीं, जब उन्होंने आंखें खोलीं तो अविरल अश्रुधारा बह रही थी. स्वर एकदम क्षीण.

‘‘बेबी, तुम्हारी क्षमा पा कर मेरा जीवन सार्थक हो गया. एक उपकार और कर दो. मेरा आशीर्वाद ले लो.’’

रुलाई के आवेग को रोकते हुए मैं ने अपनी हथेली में उन का हाथ खींच लिया.

‘‘अंकल और मत गिराइए मुझे मेरी नजरों में. आप की क्षमा चाहिए इस अहंकारिनी को. आशीर्वाद तो सदा रहा आप का इस नादान बेबी पर,’’ मैं उन के चरणों में अपना माथा रगड़ रही थी.

‘‘बेबी, यह…’’

चौंक कर जो सिर उठाया तो उन के हाथ में वे ही जड़ाऊ कंगन थे. मैं ने दोनों कलाइयां आगे बढ़ा दीं. कांपते हाथों से उन्होंने कंगन मेरी दाईं कलाई पर टिकाया ही था कि उन की गरदन ढुलक गई.

डा. उषा अग्रवाल

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