‘‘चल न शांता, बड़ी अच्छी फिल्म लगी है ‘संगीत’ में. कितने दिन से घर से बाहर गए भी तो नहीं हैं…इन के पास तो कभी समय ही नहीं रहता है,’’ पति के कार्यालय तथा बच्चों के स्कूल, कालेज जाते ही शुभ्रा अपनी सहेली शांता के घर चली आई.

‘‘आज नहीं शुभ्रा, आज बहुत काम है. फिर मैं ने राजेश्वर को बताया भी नहीं है. अचानक ही बिना बताए चली गई तो न जाने क्या समझ बैठें,’’ शांता ने टालने का प्रयत्न किया.

‘‘लो सुनो, अरे, शादी को 20 वर्ष बीत गए, अब भी और कुछ समझने की गुंजाइश है? ले, फोन उठा और बता दे भाईसाहब को कि तू आज मेरे साथ फिल्म देखने जा रही है.’’

‘‘तू नहीं मानने वाली…चल, आज तेरी बात मान ही लेती हूं, तू भी क्या याद करेगी,’’ शांता निर्णयात्मक स्वर में बोली.

निर्णय लेने भर की देर थी, फिर तो शांता ने झटपट पति को फोन किया. बेटी प्रांजलि के नाम पत्र लिख कर खाने की मेज पर फूलदान के नीचे दबा दिया और आननफानन में तैयार हो कर घर की चाबी पड़ोस में देते हुए दोनों सहेलियां बाहर सड़क पर आ गईं.

‘‘अकेले घूमनेफिरने का मजा ही कुछ और है. पति व बच्चों के साथ तो सदा ही जाते हैं, पर यह सब बड़ा रूढि़वादी लगता है. अब देखो, केवल हम दोनों और यह स्वतंत्रता का एहसास, मानो हर आनेजाने वाले की निगाह हमें सहला रही हो,’’ शुभ्रा चहकते हुए बोली.

‘‘पता नहीं, मेरी तो इतनी उलटीसीधी बातें सोचने की आदत ही नहीं है,’’ शांता ने मुसकरा कर टालने का प्रयत्न किया.

‘‘अच्छा शांता, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ समय के लिए हमारी किशोरावस्था हमें वापस मिल जाए. फिर वही पंखों पर उड़ते से हलकेफुलके दिन, सपनीली पलकें लिए झुकीझुकी आंखें…’’ शुभ्रा, अपनी ही रौ में बोलती चली गई.

‘‘शुभ्रा, हम सड़क पर हैं. माना कि तुझे कविता कहने का बड़ा शौक है, पर कुछ तो शर्म किया कर…अब हम किशोरियां नहीं, अब हम किशोरियों की माताएं हैं. कोई ऐसी बातें सुनेगा तो क्या सोचेगा?’’ शांता ने उसे चुप कराने के लिए कहा.

‘‘तू बड़ी मूर्ख है शांता, तू तो किशोरा- वस्था में भी दादीअम्मां की तरह उपदेश झाड़ा करती थी, अब तो फिर भी आयु हो गई, पर एक राज की बात बताऊं?’’

‘‘क्या?’’

‘‘कोई कह नहीं सकता कि तेरी 17-18 वर्ष की बेटी है,’’ शुभ्रा मुसकराई.

‘‘शुभ्रा, तू कभी बड़ी नहीं होगी, यह हमारी आयु है, ऐसी बातें करने की?’’

‘‘लो भला, हमारी आयु को क्या हुआ है…विदेशों में तो हमारे बराबर की स्त्रियां रास रचाती घूमती हैं,’’ शुभ्रा ने शरारत भरा उत्तर दिया.

इस से पहले कि शांता कोई उत्तर दे पाती, आटोरिकशा एक झटके के साथ रुका और दोनों सहेलियां वास्तविकता की धरती पर लौट आईं.

गृहशोभा विशेष

टिकट खरीदने के लिए लंबी कतार लगी थी. शुभ्रा लपक कर वहां खड़ी हो गई और शांता कुछ दूर खड़ी हो कर उस की प्रतीक्षा करने लगी. रंगबिरंगे कपड़े पहने युवकयुवतियों और स्त्रीपुरुषों को शांता बड़े ध्यान से देख रही थी. ऐसे अवसरों पर ही तो नए फैशन, परिधानों आदि का जायजा लिया जा सकता है.

फिल्म का शो खत्म हुआ. शांता भीड़ से बचने के लिए एक ओर हटी ही थी कि तभी भीड़ में जाते एक जोड़े को देख कर मानो उसे सांप सूंघ गया. क्या 2 व्यक्तियों की शक्ल, आकार, चालढाल इतनी अधिक मेल खा सकती है? युवती बिलकुल उस की बेटी प्रांजलि जैसी लग रही थी. ‘कहीं यह प्रांजलि ही तो नहीं?’ एक क्षण को यह विचार मस्तिष्क में कौंधा, पर दूसरे ही क्षण उस ने उसे झटक दिया. प्रांजलि भला इस समय यहां क्या कर रही होगी? वह तो कालेज में होगी. वह युवती कुछ दूर चली गई थी और अपने पुरुष मित्र की किसी बात पर खिलखिला कर हंस रही थी. शांता कुछ देर के लिए उसे घूर कर देखती रही, ‘नहीं, उस की निगाहें इतना धोखा नहीं खा सकतीं, क्या वह अपनी बेटी को नहीं पहचान सकती?’

पर तभी उसे खयाल आया कि प्रांजलि आज स्कर्टब्लाउज पहन कर गई थी और यह युवती तो नीले रंग के चूड़ीदार पाजामेकुरते में थी. शांता ने राहत की सांस ली, पर दूसरे ही क्षण उसे याद आया कि ऐसा ही चूड़ीदार पाजामाकुरता प्रांजलि के पास भी है. संशय दूर करने के लिए उस ने उस युवती को पुकारने के लिए मुंह खोला ही था कि शुभ्रा के वहां होने के एहसास ने उस के मुंह पर मानो ताला जड़ दिया. शुभ्रा लाख उस की सहेली थी पर अपनी बेटी के संबंध में शांता किसी तरह का खतरा नहीं उठा सकती थी. प्रांजलि के संबंध में कोई ऐसीवैसी बात शुभ्रा को पता चले और फिर यह आम चर्चा का विषय बन जाए, यह वह कभी सहन नहीं कर सकती थी. अत: वह चुपचाप खड़ी रह गई.

‘‘क्या बात है शांता, तबीयत खराब है क्या?’’ तभी शुभ्रा टिकट ले कर आ गई.

‘‘पता नहीं शुभ्रा, कुछ अजीब सा लग रहा है. चक्कर आ रहा है. लगता है, अब मैं अधिक समय खड़ी नहीं रह सकूंगी,’’ शांता किसी प्रकार बोली. सचमुच उस का गला सूख रहा था तथा नेत्रों के सम्मुख अंधेरा छा रहा था.

‘‘गरमी भी तो कैसी पड़ रही है…चल, कुछ ठंडा पीते हैं…’’ कहती शुभ्रा उसे शीतल पेय की दुकान की ओर खींच ले गई.

शीतल पेय पी कर शांता को कुछ राहत अवश्य मिली किंतु मन अब भी ठिकाने पर नहीं था. कुछ देर पहले के हंसीठहाके उदासी में बदल गए थे. फिल्म देखते हुए भी उस की निगाह में प्रांजलि ही घूम रही थी. किसी प्रकार फिल्म समाप्त हुई तो उस ने राहत की सांस ली.

अब उसे घर पहुंचने की जल्दी थी लेकिन शुभ्रा तो बाहर ही खाने का निश्चय कर के आई थी. पर शांता की दशा देख कर शुभ्रा ने भी अपना विचार बदल दिया और दोनों सहेलियां घर पहुंच गईं.

शांता घर पहुंची तो देखा, प्रांजलि अभी घर नहीं लौटी थी. उस की घबराहट की तो कोई सीमा ही नहीं थी. सोचने लगी, ‘लगभग 3 घंटे पहले प्रांजलि को देखा था, न जाने किस आवारा के साथ घूम रही थी? लगता है, यह लड़की तो हमें कहीं का न छोड़ेगी,’ सोचते हुए शांता तो रोने को हो आई.

जब और कुछ न सूझा तो शांता पति का फोन नंबर मिलाने लगी, लेकिन तभी द्वार की घंटी बज उठी. वह लपक कर द्वार तक पहुंची. घबराहट से उस का हृदय तेजी से धड़क रहा था. दरवाजा खोला तो सामने खड़ी प्रांजलि को देख कर उस की जान में जान आई, पर इस बात पर तो वह हैरान रह गई कि प्रांजलि तो वही स्कर्टब्लाउज पहने थी जो वह सुबह पहन कर गई थी. फिर वह नीले चूड़ीदार पाजामेकुरते वाली लड़की? क्या यह संभव नहीं कि उस ने प्रांजलि जैसी शक्लसूरत की किसी अन्य लड़की को देखा हो.

‘‘क्या बात है, मां? इस तरह रास्ता रोक कर क्यों खड़ी हो? मुझे अंदर तो आने दो.’’

‘‘अंदर? हांहां, आओ, तुम्हारा ही तो घर है,’’ शांता वहां से हटते हुए बोली, पर प्रांजलि के अंदर आते ही उस ने शीघ्रता से बेटी के कंधे पर लटकता बैग उतारा और सारा सामान उलट दिया.

नीला चूड़ीदार पाजामाकुरता बैग से बाहर पड़ा शांता को मुंह चिढ़ा रहा था. प्रांजलि भी मां के इस व्यवहार पर स्तब्ध खड़ी थी.

‘‘इस तरह छिपा कर ये कपड़े ले जाने की क्या आवश्यकता थी?’’ शांता का स्वर आवश्यकता से अधिक तीखा था.

‘‘मैं क्यों छिपा कर ले जाने लगी?’’ प्रांजलि अब तक संभल चुकी थी, ‘‘पहले से ही रखा होगा.’’

‘‘तुम अब भी झूठ बोले जा रही हो, प्रांजलि. कालेज छोड़ कर किस के साथ फिल्म देख रही थीं, ‘संगीत’ में? वह तो शुभ्रा मेरे साथ थी और मैं नहीं चाहती थी कि उस के सामने कोई तमाशा खड़ा हो, नहीं तो यह प्रश्न मैं तुम से वहीं करती,’’ शांता गुस्से से चीखी.

‘‘वहीं पूछ लेना था, मां. शुभ्रा चाची तो बिलकुल घर जैसी हैं. फिर एक दिन तो सब को पता चलना ही है.’’

‘‘अपनी मां से इस तरह बेशर्मी से बातें करते तुम्हें शर्म नहीं आती?’’

‘‘मैं ने ऐसा क्या किया है, मां? सुबोध और मैं एकदूसरे को प्यार करते हैं और विवाह करना चाहते हैं…साथसाथ फिल्म देखने चले गए तो क्या हो गया?’’

‘‘शर्म नहीं आती, ऐसा कहते? तुम क्या समझती हो कि तुम मनमानी करती रहोगी और हम चुपचाप देखते रहेंगे? आज से तुम्हारा घर से निकलना बंद…बंद करो यह कालेज जाना भी, बहुत हो गई पढ़ाई,’’ शांता ने मानो अपना आज्ञापत्र जारी कर दिया.

प्रांजलि पैर पटकती अपने कमरे में चली गई और स्तंभित शांता वहीं बैठ कर फूटफूट कर रो पड़ी.

शांता के पति राजेश्वर ने जब घर में प्रवेश किया तब घर का वातावरण अत्यंत बोझिल था. प्रांजलि अपने कमरे में मुंह फुलाए बैठी थी और शांता बदहवास सी अपने कमरे में.

‘‘क्या बात है? सब कुशल तो है? फिल्म अच्छी नहीं लगी क्या?’’ वे शांता की अस्तव्यस्त दशा देख कर बोले.

‘‘यह मुझ से क्या पूछते हो, पूछो अपनी लाड़ली बेटी से. मैं तो केवल शुभ्रा का साथ देने के लिए ही सिनेमाघर में बैठी रही, नहीं तो इतना होश किसे था कि फिल्म अच्छी है या बुरी,’’ शांता का स्वर भर्रा गया.

‘‘बात क्या है, शांता? तुम तो बहुत परेशान लग रही हो.’’

फिर तो शांता ने अथ से इति तक पूरी बात बता दी और यह ऐलान भी कर दिया कि अब प्रांजलि का घर से बाहर निकलना बंद और कालेज जाने की भी उसे कोई आवश्यकता नहीं.

‘‘इतनी सी बात में घर सिर पर उठाने की क्या जरूरत है, शांता? लाओ, एक प्याला चाय तो पिलाओ. फिर सोचेंगे कि समस्या क्या है,’’ राजेश्वर घर के वातावरण को सामान्य करने का प्रयत्न करते हुए बोले.

फिर वे चाय पीतेपीते ही बेटी के कमरे में पहुंचे, ‘‘क्या बात है, प्रांजलि? तुम दोनों तो ऐसे मुंह फुलाए बैठी हो कि मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा.’’

‘‘मैं सुबोध के साथ फिल्म देखने गई थी. वहां मां ने मुझे देख लिया. तभी से वे परेशान हैं और मुझे बुराभला कहे जा रही हैं,’’ प्रांजलि सहमे स्वर में बोली.

‘‘यह सुबोध कौन है?’’ राजेश्वर ने जोर दे कर पूछा.

‘‘मेरे कालेज में बी.एससी. अंतिम वर्ष का छात्र है. हम दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते हैं और विवाह करना चाहते हैं,’’ प्रांजलि ने पुन: पूरी बात दोहरा दी.

‘‘देखो बेटी, अपने मित्र के साथ फिल्म देखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब भी कोई काम चोरीछिपे किया जाए तो वह अवश्य ही बुरा कहलाता है. यदि तुम मित्र के साथ फिल्म देखने जाना चाहती थीं तो हम लोगों को सूचित कर के भी तो जा सकती थीं.’’

‘‘जी,’’ प्रांजलि ने अपना सिर नीचे झुका लिया.

‘‘रही विवाह की बात…तो यह क्या कोई हंसीखेल है कि आज साथ फिल्म देखी और कल विवाह कर लिया?’’ उन्होंने बेटी से प्रश्न किया.

‘‘हम दोनों एकदूसरे को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं,’’ प्रांजलि का उत्तर था.

‘‘अच्छा?’’ राजेश्वर व्यंग्य से मुसकराए, ‘‘अच्छा बताओ, सुबोध के कितने भाईबहन हैं?’’

‘‘शायद 3.’’

‘‘शायद…अच्छा, वह किस धर्म व जाति का है?’’

‘‘धर्म तो शायद हिंदू है, जाति मुझे नहीं मालूम,’’ प्रांजलि बोली.

‘‘उस के मातापिता आधुनिक हैं या पुरातनपंथी?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘वे लोग क्या तुम्हें पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करेंगे?’’

‘‘कह नहीं सकती.’’

‘‘अभी वह बी.एससी. कर रहा है, व्यवस्थित होने में उसे 3-4 वर्ष लग जाएंगे. ऐसे में विवाह के चक्कर में पड़ कर क्या तुम अपना और उस का भविष्य दांव पर नहीं लगाओगी?’’

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं, पिताजी?’’ प्रांजलि रुंधे स्वर में बोली.

‘‘यही कि तुम तो स्वयं वैज्ञानिक बनना चाहती हो, उस का क्या होगा?’’

‘‘आप की कोई भी बात मुझे अपने निश्चय से नहीं डिगा सकती,’’ प्रांजलि दृढ़ स्वर में बोली.

‘‘मुझे प्रसन्नता है कि तुम इतनी बड़ी हो गई हो कि अपने लिए स्वयं निर्णय ले सकती हो और वैसे भी हमें क्या चाहिए? केवल तुम्हारी खुशी, पर जल्दबाजी में कोई भी ऐसा निर्णय तुम ले लो कि जीवन भर पछताना पड़े, यह भी मैं नहीं चाहूंगा,’’ कह कर राजेश्वर कमरे से बाहर निकल गए. वे अचानक ही बेहद गंभीर हो उठे थे.

पति को इतनी गंभीर मुद्रा में देख कर शांता का भी कुछ कहनेसुनने या पूछने का साहस नहीं हो पा रहा था.

उधर, अपने कमरे में प्रांजलि स्तब्ध बैठी थी. पिता ने इतना रूखा व्यवहार उस से पहले कभी नहीं किया था. किंतु उस से भी अधिक चिंता उसे सुबोध को ले कर थी. वह तो सोचती थी कि सुबोध के संबंध में वह बहुत कुछ जानती है, पर कहां? वह तो अपने पिता के आधे प्रश्नों का भी उत्तर नहीं दे सकी थी. सुबोध से संबंधित कितनी ही बातें न कभी उस ने सोची थीं न ही सुबोध ने बताई थीं. पढ़ाई में सदा सब से आगे रहने वाली प्रांजलि अब पढ़ाई की ओर से बिलकुल उदासीन हो कर सुबोधमयी हो उठी थी. उस का मन बेहद ग्लानि से भर उठा.

दूसरे दिन राजेश्वर जल्दी ही कार्यालय से लौट आए. शांता मन ही मन मुसकराई कि चलो, बेटी की चिंता में इतना परिवर्तन तो हुआ पर वे तो चाय का प्याला ले कर प्रांजलि के कमरे में ऐसे घुसे कि वहीं रम गए. नाराजगी दिखाने के लिए शांता बेटी से बात नहीं कर रही थी, इसलिए उस के कमरे में भी जाना नहीं चाहती थी. किंतु पितापुत्री बातों में ऐसे खोए कि उस की सुध ही भूल गए. पढ़ाई, कालेज, पत्रपत्रिकाओं और न जाने कितनी तरह की बातें दोनों करते रहे, पर सुबोध का उस चर्चा में कहीं नामोनिशान न था.

अब तक घर का हर सदस्य अपने ही दायरे में घूम रहा था. शांता की अपनी सहेलियां थीं, रुचियां थीं, वीडियो फिल्में थीं. प्रांजलि के मित्रों का अपना अलग संसार था.

जीवन के रंगीन सपने, भविष्य की रूपरेखा, पौप संगीत, फिल्मी सितारे तथा खेलजगत के प्रसिद्ध खिलाडि़यों के झूठेसच्चे किस्से उन की गपशप का आवश्यक अंग होते थे. राजेश्वर का कार्यालय था, मित्र थे तथा मन में उन्नति की महत्त्वाकांक्षा थी. प्रांजलि के स्कूल छोड़ कर कालेज में जाते ही दोनों ने उस के प्रति कर्तव्य की इतिश्री समझ ली थी.

पर सुबोध वाली घटना ने उन्हें सोते से जगा दिया था. अब कार्यालय से छूटते ही राजेश्वर घर भागने की ताक में रहते. न मित्रमंडली उन्हें खींच पाती न कोई अन्य आकर्षण. तब उन्होंने अनुभव किया कि कितने लंबे समय से उन्होंने या शांता ने प्रांजलि से ढंग से बात भी नहीं की थी. उस के पास कितना कुछ कहनेसुनने को था, पर अभी भी संशय की दीवार बीच में थी. सुबोध का प्रसंग बीच में आते ही वह बात का रुख मोड़ देती या फिर चुप हो जाती.

एक दिन शांता, राजेश्वर तथा प्रांजलि पिकनिक पर गए थे. वहां से लौटकर राजेश्वर अपनेआप में खोए बैठे थे कि शांता के स्वर ने उन्हें चौंका दिया, ‘‘क्या सोच रहे हैं?’’

‘‘कुछ नहीं…यों ही…मैं सोच रहा था कि क्या हम ने प्रांजलि को बहुत उपेक्षित नहीं कर दिया था? क्या इसी कारण वह सुबोध के प्रति आकर्षित नहीं हो गई थी?’’

‘‘मैं नहीं मानती यह बात. क्या नहीं दिया हम ने उसे, कौन सी सुविधा नहीं दी? आप यह सोचते हैं कि आप की मीठी बातों में आ कर उस का मन सुबोध की ओर से हट जाएगा? क्यों सुबोध की बात आते ही वह चुप हो जाती है? क्या आज तक उस ने सुबोध से संबंधित एक भी बात आप को बताई है? मुझे तो ऐसा लगता है कि वह कालेज में छिप कर अवश्य उस से मिलती है. मैं ने कहा था कि उस की पढ़ाई छुड़ा कर घर बिठा लो, पर मेरी बात सुनता ही कौन है.’’

‘‘उसे विद्रोही बनाने का यत्न मत करो, शांता. पशु को बांधा जा सकता है, मनुष्य को नहीं. मैं तो केवल यह प्रयत्न कर रहा हूं कि किसी प्रकार वह यह समझ सके कि क्या सही है और क्या गलत. फिर भी यदि वह कुछ ऐसावैसा कर लेती है तो मैं यही समझूंगा कि मेरे प्रयत्न में ही कोई कमी रह गई थी.’’

‘‘जैसी आप की मरजी, पर कहे देती हूं, एक दिन सिर पर हाथ रख कर रोना पड़ेगा,’’ शांता नाराज हो उठी.

‘‘देखता हूं, मांबेटी के बीच अब भी तलवारें खिंची हुई हैं. शांता, प्रांजलि की मित्र बनने का प्रयत्न करो, जिस से कि वह अपनी अंतरंग बातें भी तुम से कर सके,’’ राजेश्वर ने पत्नी को समझाया.

‘‘अंतरंग बातें? मुझ से तो वह सीधे मुंह बात ही नहीं करती,’’ शांता व्यंग्यात्मक स्वर में बोली.

दूसरे दिन प्रांजलि घर लौटी तो बहुत उद्विग्न थी.

‘‘क्या बात है प्रांजलि, बहुत उदास हो? क्या हुआ?’’ शांता ने प्रश्न किया.

‘‘कुछ नहीं मां, मुझे अकेला छोड़ दो,’’ कहती हुई पैर पटकती प्रांजलि अपने कक्ष में जा कर फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘प्रांजलि कहां है?’’ कुछ ही देर में राजेश्वर ने घर में प्रवेश किया.

‘‘अंदर है, अपने कमरे में. न जाने क्या बात है, कुछ बताती ही नहीं. मुझे तो बहुत डर लग रहा है,’’ शांता ने धीरे से कहा.

‘‘क्या बात है प्रांजलि?’’ वे तुरंत प्रांजलि के पास जा पहुंचे.

‘‘यह सुबोध अपनेआप को समझता क्या है?’’ उस ने आंसुओं से भरा चेहरा ऊपर उठाया, ‘‘आज मेरी सहेलियों के सामने कहने लगा कि मैं ने उस के मातापिता से कहा है कि वह मुझ से विवाह करेगा और यह कि वह मेरी तरह विवाह को ही अंतिम लक्ष्य नहीं मानता…उस के सामने पूरा भविष्य है. कुछ बन जाने के बाद ही वह विवाह जैसी फालतू बातों के संबंध में सोच सकता है. फिर कहने लगा कि आजकल लड़कियों के साथ जरा घूमेफिरे, 1-2 फिल्में देखीं तो वे विवाह के सपने देखने लगती हैं,’’ प्रांजलि गुस्से से बोली.

‘‘उस का इतना साहस? फिर तुम ने कुछ कहा नहीं?’’

‘‘मैं ने कहा कि वह स्वयं को समझता क्या है? केवल उस के सामने ही भविष्य का प्रश्न है, मेरे सामने नहीं? मैं उस से कहीं अधिक परिश्रम कर के उसे ऐसा मुंहतोड़ जवाब दूंगी कि वह सदा याद रखेगा.’’

‘‘लेकिन तुम तो कह रही थीं कि तुम उस के बिना नहीं रह सकतीं,’’ राजेश्वर मुसकराए.

‘‘पिताजी, उस की बात मत कीजिए, वह सब तो केवल बचपना था. उस ने मेरे मित्रों के सामने मुझे बुराभला कहा…न जाने वे सब क्या सोचते होंगे.’’

‘‘दूसरे क्या सोचते हैं, यह सब भूल कर यदि तुम पढ़ाई में जुट जाओगी तो अवश्य ही अपने प्रति उन के विचारों में परिवर्तन ला सकोगी.’’

राजेश्वर पत्नी की ओर मुड़े, ‘‘शांता, चलो, चाय के साथ कुछ गरमागरम बना लो, तब तक प्रांजलि भी हाथमुंह धो कर आती है.’’

शांता ने आंखों ही आंखों में प्रश्न किया कि यह सब कैसे हुआ तो वे केवल मुसकरा दिए. वे कैसे बताते कि सुबोध के मातापिता को संपूर्ण प्रकरण की जानकारी वही दे कर आए थे.

राजेश्वर ने अब निश्चय कर लिया था कि वे भविष्य में कभी प्रांजलि के साथ संवादहीन की स्थिति नहीं आने देंगे.

जब 3 वर्ष बाद बी.एससी. में प्रांजलि विश्वविद्यालय में प्रथम आई तो शांता ने भी स्वीकार किया कि उस के पति के प्रयत्न सफल हुए हैं. प्रांजलि तो पिता की पूर्ण रूप से ऋणी हो गई थी.

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