गृहशोभा विशेष

आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे और मैं भी इन्हें कहां थामना चाह रही थी. एक ऐसा सैलाब जो मुझे पूर्वाग्रहों की चुभन से बहुत दूर ले जाए, पर यह चाह कब किसी की पूरी हुई है जो मेरी होती. प्रश्नों के घेरे में बंध कर पांव उलझ गए और थम गई मैं, पर प्रश्नों का उत्तर इतना पीड़ादायक होगा, यह अकल्पनीय था.

‘आभाजी, यह निर्णय आसान नहीं है. किसी और की बच्ची को स्वीकारना सहज नहीं है. ऐसा न हो कि मां का साया देने की चाह में पिता की उंगली भी छूट जाए? मैं बहुत डरता हूं आप फिर सोच लीजिए.’ पर मैं कहीं भी सशंकित नहीं थी. मेरी ममता तो तभी हिलोरे मारने लगी थी जब आरती को पहली बार देखा था. दादी की गोद में सिमटी वह दुधमुंही बच्ची स्वयं को सुरक्षा के कवच में घेरे हुए थी. वह कवच जो मेरे विनय से सात फेरे लेने के बाद और आरती की मां बनने के बाद भी न टूटा.

‘‘मां, आप आरती को मुझे दे दीजिए, मैं इसे सुला दूंगी. आप आराम से मौसीजी से बातचीत कीजिए.’’

‘‘नहीं आभा, तुम आरती की चिंता मत करो, जाओ देखो, विनय को किसी चीज की जरूरत तो नहीं.’’

‘‘ठीक है, मां,’’ इस से अधिक कुछ नहीं कह पाई. कमरे से बाहर निकली तो मौसीजी की आवाज सुन कर पांव वहीं थम गए :

‘‘यह क्या विमला, तू ने आरती को आभा को दिया क्यों नहीं? जब से

आई हूं, देख रही हूं तू एक पल के लिए भी आरती को खुद से दूर नहीं करती. इस तरह तो आरती कभी आभा से जुड़ नहीं पाएगी. आखिर वह मां है इस की.’’

‘‘मां नहीं, सौतेली मां, कैसे सौंप दूं अपने कलेजे के टुकड़े को पराए हाथों में, मैं ने वृंदा को वचन दिया था कि मैं उस की बच्ची का खयाल रखूंगी.’’

‘‘तो तू ने विनय की दोबारा शादी की क्यों?’’

‘‘दीदी, अभी विनय की उम्र ही क्या है, सारा जीवन पड़ा है उस के सामने, तनमन की जरूरत तो पत्नी ही पूरी कर सकती है. अब दोनों मिल कर अपनी गृहस्थी संभालें.’’

‘‘और आरती?’’

‘‘न दीदी, आरती उन की जिम्मेदारी नहीं है. उस की दादी भी मैं और मां भी मैं. अपनी बच्ची को सौतेलेपन की हर छाया से दूर रखूंगी.’’

‘‘विमला, तू यह ठीक नहीं कर रही.’’

‘‘दीदी, ठीक और गलत का हिसाब आप रखो. आज तक कौन सी सौतेली मां सगी हुई है, जो आभा होगी.’’

‘‘ठीक है, विमला, तुझे जो उचित लगे वह कर पर देखना तेरी यह सोच एक दिन आरती को ही सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी,’’ मौसीजी कमरे से बाहर आ गईं.

‘‘तू यहीं खड़ी थी, आभा,’’ मुझे देख कर मौसीजी एक पल को सकपका गईं फिर संभलते हुए बोलीं, ‘‘तू परेशान मत हो, समय सब ठीक कर देगा.’’

उस समय के इंतजार में एकएक दिन बीतने लगा पर जैसे बंद मुट्ठी से रेत सरक कर बिखर जाती है, मां के दिल के बंद दरवाजों से मेरी ममता टकरा कर लौट आती.

‘‘मैं तुम्हारे दर्द को समझता हूं, आभा पर क्या करूं. मां का व्यवहार मेरी समझ से परे है. उन्होंने तो मुझे भी आरती से दूर कर दिया है. जब भी मैं आरती को गोदी में लेता हूं, वे किसी न किसी बहाने से उसे मुझ से वापस ले लेती हैं. क्या मेरा मन इस से आहत नहीं होता पर क्या करूं?’’

‘‘विनय, मुझे इस घर में आए 6 महीने हो गए हैं और मुझे वह पल याद नहीं जब आरती को मैं ने अपनी गोद में लिया हो. मां क्यों नहीं समझतीं कि रिश्ते बांधने से बंधते हैं. क्या यशोदा मां…’’

‘‘तुम खुद को समझा रही हो या मुझे? तुम भी जानती हो कि तुम्हारी ये उपमाएं निरर्थक हैं.’’

विनय की बात सुन कर मैं ने चुप्पी ओढ़ ली. धीरेधीरे समय सरक रहा था और मैं मां की कड़ी पहरेदारी में अपनी ममता को अपने ही आंचल में दम तोड़ते हुए देख रही थी. मेरी बेबसी पर शायद प्रकृति को तरस आ गया.

‘‘मां, बधाई हो, आप दादी बनने वाली हैं,’’ उत्साह भरे लहजे में विनय ने कहा.

‘‘मैं तो पहले ही दादी बन चुकी हूं, तू तो आभा को बधाई दे. चल अच्छा हुआ, अब कम से कम मेरी आरती से झूठी ममता का नाटक तो बंद करेगी,’’ मां के स्वर की कटुता दीवारों को भेदती हुई मुझ तक पहुंची और एक पल में ही खुशी के रंग स्याह हो गए. पलक अपने जन्म के साथ मेरे लिए ढेर सारी आशाएं भी लाई.

‘‘विनय, अब देखना मां कितना भी चाहें पर आरती अपनी बहन से दूर नहीं रह पाएगी.’’

‘‘काश, ऐसा हो,’’ विनय ने ठंडे स्वर में कहा.

जानती थी मैं कि विनय का विश्वास डगमगा चुका है. पिछले 3 सालों में उन्होंने अपनी बेटी के पास होते हुए भी दूर होने की पीड़ा को झेला है. खुद को समझातेसमझाते विनय थक चुके हैं. विनय की पीड़ा को जब मैं समझ पा रही हूं तो मां क्यों नहीं? 9 महीने अपने खून से सींचा है उन्होंने विनय को, फिर क्यों अपने बेटे को जानेअनजाने दुख पहुंचा रही हैं?

‘‘क्या सोच रही हो, आभा, पलक कब से रोए जा रही है?’’

‘‘आई एम सौरी,’’ मैं ने पलक को विनय की गोद से ले कर सीने से लगा लिया. पलक का स्पर्श मेरे तन और मन को तृप्त कर गया पर मन का एक कोना अब भी आशा और निराशा के बीच हिचकोले खा रहा था.

‘‘आरती बेटा, इधर आओ, देखो तुम्हारी छोटी बहन,’’ आरती पलक को दूर से ही टुकुरटुकुर देख रही थी पर मेरी आवाज में इतनी ताकत कहां थी कि वह आरती को अपने पास बुला सके. आरती बिना कुछ बोले मुड़ गई और मैं अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरो ही नहीं पाई. ?

मां के जीवन का एकमात्र ध्येय था आरती को असीम स्नेह देना, क्या कभी ममता भी नुकसानदायक हुई है? यह एक ऐसा सवाल है जिस का जवाब हां या न में देना कठिन है पर एक बात निश्चित है कि अगर ममता अपनी आंखों पर पट्टी बांध ले तो वह बच्चे के लिए घातक बन जाती है. आरती की हर चाह उस के बोलने से पहले पूरी कर देना मां की पहली प्राथमिकता थी.

मौसम के न जाने कितने रंग आतेजाते रहे पर मां ने घर में एक ऐसी रेखा खींच दी थी कि पतझड़ जाने का नाम ही नहीं ले रहा था और बसंत को लाने की भरसक कोशिश करती रही इस सच को भूल कर कि इंसान के लाख चाहने पर भी ऋतुएं प्रकृति की इच्छा से ही बदलती हैं. समय सरकता जा रहा था. अब पलक स्कूल जाने लायक हो गई थी.

‘‘विनय, पलक का ऐडमिशन उसी स्कूल में करवाना जहां आरती जाती है, क्या पता दोनों बहनें वहां एकदूसरे के करीब आ जाएं.’’

‘‘तुम्हें लगता है ऐसा होगा, पर मुझे नहीं लगता कि यह संभव है, मां ने आरती को किसी और रिश्ते को पहचानने ही कहां दिया है.’’

विनय की कही गई इस सचाई को मैं झुठला भी नहीं सकती थी. मेरे भीतर एक गहरी टीस थी कि अगर मैं विनय के जीवन में नहीं आती तो आरती अपने पिता से यों दूर न होती. इस ग्लानि से मैं तभी मुक्ति पा सकती थी जब आरती हमें अपने जीवन से जोड़ ले. और पलक ही मुझे वह कड़ी नजर आ रही थी पर यह इच्छा प्रकृति ने ठुकरा दी.

‘‘मम्मा, दीदी लंच टाइम में मुझ से बात नहीं करतीं. वे मुझे देख कर चली जाती हैं. मम्मा, दीदी ऐसा क्यों करती हैं? मेरी फ्रैंड की दीदी तो उस से बहुत प्यार करती हैं, अपना टिफिन भी शेयर करती हैं, दीदी मुझ से गुस्सा क्यों हैं?’’

क्या समझाऊं, कैसे समझाऊं समझ नहीं आ रहा था, ‘‘दीदी आप से नाराज नहीं हैं, बेटा, वे कम बोलती हैं न इसलिए,’’ मेरे इस जवाब को सुन कर पलक कुछ और पूछे बिना किचन में चली गई.

‘‘विनय, कल तुम मेरे साथ बाजार चलना, आरती के लिए कुछ कपड़े लाने हैं.’’

‘‘मां, पिछले महीने ही तो…’’

‘‘तो क्या हुआ, बच्ची को पहननेओढ़ने का शौक है और तू जो कल पलक के कपड़े ले कर आया है?’’

‘‘मां, नर्सरी क्लास में यूनीफार्म नहीं है इसलिए लाना जरूरी था वरना वह

तो आरती के पुराने कपड़े पहनती आ रही है.’’

‘‘तो इस में अनोखी बात कौन सी हो गई? हर छोटा बच्चा बड़े भाईबहन के कपड़े पहनता है. खबरदार जो मेरी बच्ची के साथ भेदभाव करने की कोशिश की, मां तो सौतेली है ही, अब बाप भी…’’ मां यह कहते हुए बरामदे में चली गईं.

विनय बुत बने मां को जाते देखते रहे.

‘‘विनय, तुम मां की बात को खामोशी से मान लिया करो. देखो, अब तुम्हारा मन भी दुखी हुआ और मां को भी गुस्सा आ गया.’’

गृहशोभा विशेष

‘‘आभा, क्या मां से इस घर की स्थिति छिपी है. तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा तो घर की किस्तों में ही निकल जाता है और यह कैसे संभव है कि रोजरोज…’’ विनय के स्वर की पीड़ा मेरे मन को बींध रही थी पर क्या करूं अपनी बेबसी और लाचारी पर कभीकभी गुस्सा आता, मन करता कि मां से चीखचीख कर कहूं कि वे घर को 2 हिस्सों में न बांटें.

किस अधिकार से उन्हें कुछ कहती, उन्होंने न तो मुझे अपनी बहू माना और न ही आरती की मां. मां आरती के जितने करीब थीं उतनी ही पलक से दूर. दादी और दीदी के द्वारा दी गई अवहेलना पलक के भीतर घाव कर रही थी, यह सच मेरी पीड़ा को गहराए जा रहा था. समय की सुइयां टिकटिक करते आगे बढ़ती गईं, धीरेधीरे न केवल पलक के घाव भर गए बल्कि उसे अपने और आरती के बीच का अंतर भी समझ में आ गया.

‘‘मां, आप ने आरती का रिजल्ट देखा है, थर्ड डिवीजन…’’

‘‘तो क्या हुआ? तुझे नौकरी करवानी है क्या उस से?’’

‘‘मां, आप क्यों नहीं समझतीं कि पढ़नेलिखने का संबंध सिर्फ नौकरी करने से नहीं है. विद्या अच्छी समझ और सोच देती है.’’

‘‘विनय, यह भी खूब रही. तू बता, मैं तो अनपढ़ हूं. तो क्या मुझ में अच्छी सोच और समझ नहीं है?’’

मां की इस बात को सुन कर विनय चुप हो गए पर मैं जानती थी कि उन का मन भीतर ही भीतर चीत्कार कर रहा था. कुछ देर की खामोशी के बाद वे बोल पड़े, ‘‘मां, आज से आरती को आभा पढ़ाएगी.’’

‘‘बहुत हो गया यह पढ़ाईलिखाई का रोना, जितना पढ़ना है, खुद पढ़ लेगी और अगर तुझे ज्यादा चिंता है तो घर पर ही इस का ट्यूशन लगा दे.’’

‘‘ठीक है, ऐसा ही सही,’’ विनय ने समर्पण कर दिया. दूसरे दिन से आरती को पढ़ाने के लिए ट्यूटर आने लगा. सिर्फ 2 दिन बाद ही मां बोलीं, ‘‘विनय, आरती को वह टीचर पसंद नहीं है. बातबात पर डांटता है.’’

‘‘ठीक है, मैं बात करूंगा उस से.’’

‘‘बात करने की कहां जरूरत है, निकाल दे उसे और कोई दूसरा रख ले.’’

‘‘ठीक है,’’ विनय ने बात खत्म करने की मंशा से तुरंत मां की बात पर अपनी सहमति जताई.

‘‘आभा, क्या टीचर…?’’

‘‘नहीं, विनय, यह सच नहीं है. आरती पढ़ाई में कम और इधरउधर ज्यादा ध्यान देती है. टीचर ने 2-3 बार प्यार से समझाया पर जब आरती नहीं मानी तो थोड़ा जोर से…’’ मैं कहतेकहते रुक गई कि कहीं मैं कुछ गलत तो नहीं कर रही.

‘‘मैं समझ रहा हूं पर किया क्या जाए, आरती को मां के लाड़प्यार ने इतना बिगाड़ दिया है कि उसे किसी की ऊंची आवाज सुनना तो दूर, बड़ों की सीख सुनना भी गवारा नहीं. मैं क्या करूं, कैसे समझाऊं मां को कि बच्चे की भलाई के लिए प्यार और दुलार के साथसाथ कठोरता की भी जरूरत होती है. आभा, मैं कैसे भूलूं कि ये वही मां हैं जो बचपन में मेरे पढ़ाई न करने पर पिटाई कर देती थीं और आज…’’

विनय की हताशा से मेरा मन मुरझा गया. मां के जोर देने पर टीचर बदल दिया गया और फिर कुछ दिनों के बाद आरती को वही शिकायत. विनय थकने लगे थे और मेरा अपराधबोध बढ़ता जा रहा था. बहुत ही खींचतान कर के आरती ने 12वीं पास की.

‘‘मां, आरती अगर पढ़ना नहीं चाहती तो कुछ सीख ले, ऐसा काम जिस में

उस की रुचि हो और थोड़ाबहुत घर का काम.’’

‘‘चुप कर आभा, तुझे शर्म नहीं आती जो बच्ची से घर का काम करवाना चाहती है. तेरे सौतेलेपन की डाह आखिर डंक मारने लगी मेरी आरती को. कान खोल कर सुन ले, यह घर मेरा है. अगर दोबारा ऐसी बात की तो तुम सब का बोरियाबिस्तर बांध दूंगी. बेचारी बच्ची पढ़ती कैसे, घर में पढ़नेलिखने का माहौल तो हो?’’

ऐसा लग रहा था कि मेरे गाल पर मां लगातार थप्पड़ मारे जा रही हैं पर यह चोट तो शारीरिक चोट से कहीं अधिक गहरी थी. पलक जो दरवाजे पर खड़ी थी, ये सारी बातें सुन कर सहम गई.

‘‘मम्मा, क्या दादी हमें घर से निकाल देंगी?’’

‘‘नहीं बेटा, वे तो ऐसे ही…’’ मेरे शब्द गले में अटक गए. एकाधिकार, एकाधिपत्य आरती के जीवन का हिस्सा बन चुके थे.

‘पलक मेरे लिए चाय बना दे, पलक पानी लाना, मेरा सूट प्रैस कर दे, पलक,’ आरती के आदेशात्मक स्वर पूरे घर में गूंजते रहते और पलक कभीकभी झुंझला जाती.

‘‘पलक, आरती तुम्हारी बड़ी बहन है और बड़ों का काम हमें खुश हो कर करना चाहिए.’’

‘‘पर मम्मा, दीदी तो बड़ों का काम नहीं करतीं, दादी तक उन का काम करती हैं.’’

‘‘वह दरअसल…’’ पलक मेरे जवाब से संतुष्ट हो सके मैं ऐसे शब्दों को ढूंढ़ ही रही थी कि ‘‘रहने दीजिए, जानती हूं, दादी को आरती दीदी का काम करना पसंद नहीं.’’

एक दिन…

‘‘विनय, तेरी मौसी का फोन आया था, आरती के लिए रिश्ता बताया है. शाम को जल्दी घर आ जाना, लड़के वालों के घर चल कर रिश्ते की बात चलानी है.’’

आरती की शादी? कैसे निभाएगी आरती शादी के उत्तरदायित्वों को. समझौता, त्याग, समर्पण ये शब्द तो आरती के शब्दकोष में हैं ही नहीं. और इन के बगैर परिवार के दायित्वों का वहन नहीं किया जा सकता. कहीं आरती जिम्मेदारियों से…नहींनहीं, मैं यह क्या सोचने लगी. मैं ने स्वयं को धिक्कारा. मां और विनय को घर और वर दोनों पसंद आ गए.

‘‘विनय, राज करेगी हमारी बेटी वहां, पैसों की तो कोई कमी ही नहीं है. तभी तो समधनजी ने दहेज के लिए साफ मना कर दिया,’’ मां खुशी से फूली नहीं समा रही थीं.

‘‘पर मां, उन्होंने यह भी तो कहा था कि आरती घर की बड़ी बहू बन कर सारे घर को संभाल ले. क्या आरती संभाल पाएगी?’’

‘‘मैं ने पहली बार ऐसा बाप देखा है जो अपनी बेटी के अवगुण ढूंढ़ रहा है. मांबाप तो वे होते हैं जो बच्चों के अवगुण होने पर भी उसे ढक दें पर तू क्यों ऐसा करेगा, आखिर आभा की छाया का असर तो आएगा ही,’’ मां के इस तीखे प्रहार से विनय सुन्न हो गए और मैं हमेशा की तरह आंसुओं के सैलाब में बह कर इन प्रहारों से दूर बहने की नाकाम कोशिश करने लगी.

वह घड़ी भी आ गई जब आरती घर से विदा हो गई. ऐसा लगा मां ने पहली बार खुली हवा में सांस ली हो, जैसे कह रही हों कि देख वृंदा, मैं ने तेरी बच्ची को सौतेली मां की छाया से कितना दूर रखा है. मेरी बेचैनी आरती के जाने के बाद बढ़ गई थी. हर समय मन शंकाओं से घिरा रहता था.

आखिर वही हुआ जिस का डर था, अभी आरती की शादी को 2 महीने भी नहीं बीते थे कि एक दिन सुबहसुबह आरती घर आ गई.

‘‘दादी, दादी,’’ वह दौड़ती हुई मां के कमरे में पहुंची. विनय और मैं भी उस के पीछेपीछे भागे.

‘‘दादी, मुझे उस घर में नहीं रहना. शेखर की मम्मी बातबात पर चिल्लाती हैं और मेरी ननद और देवर दिनभर मेरे कान खाए रहते हैं. कभी चाय बनाओ तो कभी घर की सफाई करो. क्या मैं नौकरानी हूं?’’

‘‘तू चिंता मत कर लाडो, मैं बात करूंगी उन लोगों से, तू जा नहाधो कर आराम कर ले.’’

आरती के कमरे में जाते ही मां बोलीं, ‘‘मैं जानती थी यह सब होगा. दहेज इसीलिए नहीं लिया कि घर के लिए नौकरानी चाहिए. विनय, चल उस शेखर को फोन मिला, खबर लेती हूं उस की.’’

विनय कुछ कहते कि दरवाजे पर घंटी बजी. देखा, सामने शेखर था, ‘‘मम्मी, आरती आई है क्या?’’

‘‘हां बेटा, क्या तुम्हें बिना बताए?’’

‘‘जी मम्मी,’’ विनय और मां भी कमरे में आ गए.

‘‘बेटा, तुम्हारे और आरती के बीच कुछ…’’ विनय के सवाल पर शेखर का चेहरा उतर गया.

‘‘मम्मीपापा, आरती की नासमझी ने घर के लोगों को बहुत ठेस पहुंचाई है. इस के तानाशाही व्यवहार से मेरी मम्मी बहुत दुखी हैं. क्या आप यकीन करेंगे कि यह पानी का गिलास भी अपने हाथ से नहीं लेना चाहती. सुबह यह आंखें तभी खोलती है जब मम्मी या मेरी बहन शशि इस के सामने चाय ले कर पहुंचें. पूरेपूरे दिन कमरे में अकेले बैठ कर टीवी देखना, घर के किसी काम में हैल्प करना तो बहुत दूर की बात, अपना काम तक खुद न करना, इस की आदत में शुमार है.

‘‘हम सब को लगता था कि समय के साथ यह अपनी जिम्मेदारी समझने लगेगी पर आरती का यह व्यवहार अब हम सब की परेशानी का सबब बन गया है. दुख तो मुझे इस बात का है कि पिछले 3-4 दिन से मेरी मम्मी की तबीयत बहुत खराब है. उन का खयाल तो रखना दूर की बात उन के कमरे में जा कर हालचाल तक पूछना आरती ने उचित नहीं समझा. मैं ने जब इस बात के लिए डांटा तो यह चीखचीख कर रोने लगी. अब आप ही बताइए, क्या मैं ने गलत किया?’’

‘‘तुम बिलकुल परेशान मत हो, शेखर. मैं तुम से आरती के व्यवहार के लिए माफी मांगती हूं, जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. एकदो दिन वह यहां रह ले फिर हम खुद ही उसे ले कर तुम्हारे घर आएंगे,’’ मेरे इस आश्वासन के बाद शेखर चला गया पर मां के लिए यह सब असहनीय था.

‘‘तू कौन होती है आरती को समझाने वाली, नहीं जाएगी आरती उस घर में. यहीं रहेगी इस घर में, मेरी बच्ची मुझ पर बोझ नहीं है.’’

‘‘नहीं मां, आरती यहां नहीं रहेगी. उसे अपने घर जाना होगा.’’

‘‘आभा, तेरी हिम्मत जो तू मेरे सामने…आखिर सौतेली मां जो ठहरी,’’ गुस्से में मां दांत किटकिटाने लगीं.

‘‘मां, क्या आप जानती हैं कि सौतेला किसे कहते हैं? दुख तो इस बात का है कि कुछ लोगों ने मिल कर मां जैसे पवित्र रिश्ते को सौतेलेपन का तमगा पहना दिया है पर कोई रिश्ता कभी सौतेला नहीं होता, सौतेला होता है हमारा व्यवहार जो कभी भी किसी भी रिश्ते में निभाया जा सकता है.

‘‘यह कैसी परिपाटी है, अगर मां जन्म देने वाली न हो तो उसे अविश्वास की दृष्टि से देखा जाए. एक जानवर के साथ जब हम कुछ सालों तक रह लेते हैं तो उस से भी घुलमिल जाते हैं तो फिर आरती तो एक जीतीजागती इंसान है. आज जो आरती की स्थिति है उस का कारण आप का अति स्नेह है. आप ने उसे इतनी गहरी छांव में रखा कि वह जान ही नहीं पाई कि जीवन का सच क्या है.

‘‘मां, क्या आप ने बरगद के पेड़ के नीचे किसी पौधे को पनपते हुए देखा है? नहीं न, आप वही बरगद की छांव हैं. प्यार और दुलार का मतलब यह बिलकुल नहीं कि बच्चों को उन की गलतियों पर डांटा न जाए. आंखें खोल कर देखिए और सोचिए, क्या आरती को बचपन से ही कभी उसे उस की जिम्मेदारियों को सिखाने की कोशिश की गई तो फिर एकाएक वह कैसे जिम्मेदार बन सकती है? अब क्या आप ट्यूटर की तरह शेखर को भी बदल देंगी?’’

‘‘यह क्या बकवास कर रही है, आभा? तू अपनी मर्यादा में रह.’’

‘‘मां, मर्यादा मैं नहीं आप तोड़ रही हैं, रिश्तों की हर मर्यादा आप ने आरती के मोह में तज दी. आज आप शेखर के परिवार को खरीखोटी सुनाने के लिए तैयार हैं. क्या आप ने आरती को बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्यार करना सिखाया? जबजब विनय या मैं ने कोशिश की तो आप ने हमें सौतेला कह कर दूर फेंक दिया. आरती ने सिर्फ शासन करना सीखा पर उस में उस की गलती नहीं है क्योंकि बच्चा हमेशा अपने बड़ों के व्यवहार को अपने जीवन में अंगीकार करता है. मां, शेखर या उस का परिवार क्यों आरती की हुकूमत बरदाश्त करेगा?

‘‘रिश्तों को जोड़ने के लिए प्यार और समर्पण देना होता है. हमारा जीवन हमारी ही प्रतिध्वनि है. हम जो देते हैं वही हम तक लौट कर आता है. आप ही बताइए, क्या शादी गुड्डेगुडि़यों का खेल है कि आज पसंद नहीं तो दूसरा ले आओ. मां, हमारी बच्ची हम पर बोझ नहीं है पर अपने अंतर्मन से पूछिए क्या वाकई गलती आरती की नहीं है? बच्चों की गलतियों को सुधारना और सही राह दिखाना ही तो मातापिता का दायित्व होता है. एक पल को मान लीजिए कि आरती सबकुछ छोड़ कर यहीं हमारे पास रह जाती है तो वह करेगी क्या? जब हम इस दुनिया में नहीं रहेंगे तो वह कैसे अपना जीवन बिताएगी? मां, आप ने तो उसे आत्मनिर्भर भी बनने नहीं दिया.

‘‘जीवन, पाने से अधिक, देने का नाम है. मैं हमेशा खामोश रही पर अगर आज भी मैं चुप रहती तो मैं स्वयं की नजरों में गिर जाती. सिर्फ इस डर से कि आप मुझे सौतेली मां कहेंगी. मैं आरती का जीवन बिखरने नहीं दूंगी. मां, सिर्फ जन्म देने वाली ही मां हो, ऐसा नहीं है. मां वह भी होती है जो बच्चे का हाथ थाम उसे जीवनपथ पर चलना सिखाए. उसे अच्छेबुरे का ज्ञान कराए और इन सब से बढ़ कर जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाए. मां, आरती को अपनी छांव से मुक्त कर दीजिए वरना मां, मेरी बच्ची का जीवन यों…’’ मैं बिलखबिलख कर रोने लगी.

मां खामोश थीं. उन की चुप्पी शायद आरती की गहरी छांव से मुक्ति और उस के जीवन की शुरुआत का संदेश थी.

– डा. ऋतु सारस्वत

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