गृहशोभा विशेष

सामने वाली कोठी में रंगरोगन हो रहा था. चारों ओर जंगली बेलों से घिरी वह कोठी किसी खंडहर से कम नहीं लगती थी. सालों से उस में न जाने किस जमाने का जंग लगा बड़ा ताला लटक रहा था. वैसे इस कोठी को देख कर लगता था कि किसी जमाने में वह भी किसी नवयौवना की भांति असीम सौंदर्य की स्वामिनी रही होगी. उस की दीवारें न जाने कितने आंधीतूफानों और वर्षा को झेल कर कालीकाली सी हो रही थीं. खिड़कियों के पल्ले जर्जर हो चुके थे, मगर न जाने किन कीलकांटों से जड़े थे कि अभी तक अपनी जगह टिके हुए थे.

तनीषा की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. कौन आ रहा है यहां रहने के लिए. क्या किसी ने इसे खरीद लिया है. कौन हो सकता है इस विशाल कोठी को खरीदने वाला. जबकि आजकल तो लोग फ्लैट में रहना ज्यादा पसंद करते हैं. यह कौन असाधारण व्यक्ति है, जो इतनी बड़ी कोठी में रहने के लिए आ रहा है.

उस का मन जिज्ञासा की सारी हदें पार करने को मचल रहा था. तभी एक नौजवान उस के घर की ओर आता दिखा. सोचा उसी से कुछ पता किया जाए किंतु फिर उस ने अपनी उत्सुकता को शांत किया, ‘‘छोड़ो होगा कोई सिरफिरा या फिर कोई पुरातत्त्ववेत्ता जिसे इस भुतही कोठी को खरीदने का कोई लोभ खींच लाया होगा. वैसे यह कोई ऐतिहासिक कोठी भी तो नहीं है. लेकिन किसी की पसंद पर कोई अंकुश तो नहीं लगाया जा सकता है न.’’

‘‘ऐक्सक्यूज मी,’’ आगंतुक उस के घर के गेट के सामने खड़ा था.

वह चौंक कर इधरउधर देखने लगी, ‘‘कौन हो सकता है? क्या यह मुझे ही बुला रहा है?’’ उस ने इधरउधर देखा, कोई भी नहीं दिखा.

‘‘हैलो आंटी, मैं आप से ही बात कर रहा हूं.’’ आगंतुक ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. आंटी उसे अजीब सा लगा. क्या मैं आंटी सी लगती हूं? उस का मन सवाल करने लगा. ठीक है कि मेरी उम्र 50 की हो रही है लेकिन लगती तो मैं 35 से ज्यादा की नहीं हूं. अभी भी शरीर उसी प्रकार कसा हुआ है. हां इक्कादुक्का बाल जरूर सफेद हो गए हैं. लेकिन आकल बालों का सफेद होना तो आम बात है.

वह थोड़ी अनमनी सी हो गई. तत्काल ही उसे गेट पर खड़े उस युवक का ध्यान आया. वह तुरंत उस की ओर बढ़ी. बड़ा ही सौम्य युवक था. बड़ी शिष्टता से उस युवक ने कहा, ‘‘जी मेरा नाम अनुज मित्तल है. क्या पानी मिलेगा? दरअसल घर में काम चल रहा है. पानी की लाइन शाम तक ही चालू हो सकेगी. लेकिन जरूरत तो अभी है न.’’

‘‘हां, हां आओ न अंदर. पानी जरूर मिलेगा,’’ उस ने अपने माली को आवाज दे कर कहा कि नल में पाइप लगा कर सामने वाले घर की ओर कर दो जितनी जरूरत हो पानी ले लें. फिर उस ने अनुज से कहा, ‘‘आओ बेटा, मैं चाय बनाती हूं. भूख भी लगी होगी, कुछ खाया तो होगा नहीं.’’

चायनाश्ता करते हुए उस ने अनुज व उस के परिवार के बारे में  पूरी जानकारी हासिल कर ली. अवनीश मित्तलजी की वह पुरानी खानदानी कोठी थी. बहुत पहले उन के पिता अभय मित्तल भारत छोड़ कर व्यवसाय के सिलसिले में नैरोबी में जा कर बस गए थे. अवनीश मित्तल भी उसी व्यापार में संलग्न थे. इसलिए बच्चों का पालन पोषण भी वहीं हुआ. अब वे अपनी बेटी की शादी भारत में अपने पुरखों की हवेली से ही करना चाहती थे इसलिए रंगरोगन कर के उस का हुलिया दुरुस्त किया जा रहा था.

‘‘विवाह कब है?’’ तनीषा ने पूछा.

‘‘जी अगले महीने की 25 तारीख को. अब ज्यादा समय भी नहीं बचा है. इसीलिए सब जल्दीजल्दी हो रहा है. मुझे ही इस की देखभाल करने के लिए भेजा गया है,’’ चायनाश्ता कर के वह चला गया. तनु भी तत्काल ही आईने के सामने जा कर खड़ी हो गई. उस ने मुझे आंटी क्यों कहा? सोचने लगी. क्या सच में मैं आंटी लगने लगी हूं. उस ने शीशे में खुद को निहारा. सिर में झिलमिलाते चांदी के तारों से भी उस की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई थी.

तनीषा अकेली ही रहती थी. आसपास के सभी लोग उसे जानते थे और यह भी जानते थे कि वह अविवाहित है. लोग इस विषय पर चर्चा भी करते थे. किंतु अप्रत्यक्ष रूप में ही, कारण भी कोई नहीं जानता था. किंतु तनीषा? वह तो अपने चिरकुंआरी रहने का राज बखूबी जानती थी. लेकिन दोष किस का था? नियति का, घर वालों का या स्वयं उस का? शायद उसी का दोष था. यदि उस की शादी हुई होती तो आज अनुज के बराबर उस का भी बेटा होता. उस ने एक गहरी सांस ली और बड़बड़ाने लगी, ‘कहां हो परख, क्या तुम्हें मेरी याद आती है या बिलकुल ही भूल गए हो?’ अतीत उसे भ्रमित करने लगा था…

‘‘तनु, आज क्लास के बाद मिलते हैं,’’  परख ने उसे रोकते हुए कहा. वह तनीषा को तनु ही पुकारता था.

‘‘ठीक है परख. लेकिन आज मेरा प्रैक्टिकल है वह भी लास्ट पीरियड में, उस के तुरंत बाद घर भी जाना है. जानते हो न जरा सी भी देर होने पर मां कितनी नाराज होती हैं.’’

‘‘परख को तनु की भावनाओं का बहुत अच्छी तरह भान था फिर भी उस ने मुसकराते हुए जाने के लिए अपने पैर आगे बढ़ाए.

‘‘ठीक है, पर मैं ने भी कह दिया. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ कहते हुए परख चला गया. तनीषा मन ही मन मुसकरा रही थी परख की बेसब्री देख कर.  तनीषा मानव विज्ञान में एम.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा थी. जबकि परख उस का सीनियर था. वह मानव विज्ञान में ही रिसर्च कर रहा था. अकसर पढ़ाई में उस की सहायता भी करता था. हालांकि तनु से एक वर्ष ही सीनियर था. किंतु जब कभी प्रोफैसर नहीं आते थे तब वही प्रैक्टिकल भी लेता था.

उस के समझाने का अपना एक अलग ही अंदाज था और उस के इसी लहजे पर तनु फिदा रहती थी. परख भी तनीषा के प्रति एक अव्यक्त सा आकर्षण महसूस करता था. उस का चंपई गोरा रंग, चमकती काली आंखें, लहराते काले बाल सभी तो उसे सम्मोहित करते थे. विभाग में सभी लोग इन दोनों के प्यार से वाकिफ  थे. कभीकभी छेड़ते भी थे. लेकिन कहते हैं न कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. तनीषा के मातापिता को भी इस की भनक लग गई और उन्होंने तनु से इस की पूछताछ शुरू कर दी.

‘‘तनु सच क्या है, मुझे बता. ये परख कौन है? क्यों शुभ्रा उस का नाम ले कर तुझे चिढ़ा  रही थी?’’

‘‘कोई नहीं मां, मेरा सीनियर है. हां, नोट्स बनाने या प्रैक्टिकल में कभीकभी हैल्प कर देता है. बस और कुछ नहीं,’’ तनु ने मां कि उत्सुकता को शांत करने का प्रयास किया.

‘‘अगर ऐसा है तो ठीक, अन्यथा मुझे कुछ और सोचना पड़ेगा,’’ मां ने धमकाते हुए कहा.

‘मां, ऐसा क्यों कह रही हैं? क्या सच में परख मेरी जिंदगी में कुछ माने रखता है,’ उस ने अपने मन से पूछा. ‘कुछ, अरे बहुत माने रखता है. कभी चेहरा देखा है आईने में अपना. कैसे उसे देखते ही लाल हो जाता है. क्यों तू हर पल उस की प्रतीक्षा करती रहती है और परख, वह भी तुझे ही पूछता रहता है. यह प्यार नहीं तो और क्या है?’ उस का मन उसी से उस की चुगली कर रहा था.

लेकिन यह राज अब राज न रहा था. एक दिन जब वह लाइब्रेरी में थी, तभी परख की आवाज सुन कर वह चौंक गई.

‘‘अरे तुम यहां? कुछ खास बात करनी है क्या?’’ वह अचंभित सी थी.

‘‘हां, कुछ खास बात ही करनी है. मुझे बताओ मैं तुम्हारी जिंदगी में क्या स्थान रखता हूं? परख के स्वर में उतावलापन था.’’

‘‘ऐसे क्यों पूछ रहे हो? क्या अब ये भी बताना पड़ेगा कि मेरी जिंदगी में तुम्हारी क्या अहमियत है. तुम्हारे बिना तो मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. परख है तो तनीषा है. क्या कभी पेड़ से लिपटी लता को भी यह बताना पड़ेगा कि उस के जीवन में उस पेड़ के क्या माने हैं,’’ तनीषा कहने को तो कह गई परंतु तुरंत ही उस ने अपनी जबान काट ली, ‘‘अरे, यह मैं ने क्या कह दिया. भला परख भी क्या सोचता होगा, कितनी बेशर्म लड़की है.’’

‘‘बोलोबोलो तनु चुप क्यों हो गईं. आखिर सच तुम्हारे मुंह से निकल ही गया. मुझे विश्वास तो था किंतु मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता था,’’ कहते हुए उस ने उसे अपनी बलिष्ठ भुजाओं में बांध कर उस के होंठों पर अपने प्यार की मुहर जड़ दी. तनीषा शर्म से दुहरी हुई जा रही थी. बिना कुछ कहे हौले से अपनेआप को छुड़ा कर वहां से भाग गई.

दोनों का प्यार परवान चढ़ता जा रहा था. लोग कहने लगे थे कि ये दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. उन के प्यार की गंभीरता को उन के मातापिता भी समझने लगे थे. उन्होंने दोनों का विवाह कर देना ही उचित समझा. परख भी अब तैयार था, क्योंकि उसे चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में लैक्चररशिप भी मिल गई थी. खुशी से तनीषा के पांव भी अब जमीन पर नहीं पड़ते थे. किंतु परख की दादी ने तनीषा और परख की जन्मपत्री मिलवाने की बात कही और जब कुंडली मिलवाई गई तो तनीषा घोर मांगलिक निकली.

उस के मातापिता को ये सब दकियानूसी बातें लगती थीं, इसलिए सच जानते हुए भी उन्होंने कभी कुंडली आदि के लिए कुछ सोचा भी नहीं. उन के हिसाब से ये सब खोखले अंधविश्वास हैं. पंडितों और पुरोहितों की कमाई का स्रोत हैं. लेकिन परख की दादी ने इस विवाह के लिए मना कर दिया, क्योंकि परख उन का इकलौता पोता था, उन के खानदान का अकेला वारिस. लेकिन परख आजकल का पढ़ालिखा युवक था. उस के दिल में तनीषा के सिवा किसी और के लिए कोई स्थान नहीं था. वह जिद पर अड़ गया कि यदि उस का प्यार उसे न मिला तो वह कभी विवाह नहीं करेगा.

जब तनीषा को ये सब बातें पता चलीं तो उस ने विवाह करने से ही मना कर दिया. उस ने परख से कहा, ‘‘यदि इस विवाह से तुम्हारी जान को खतरा है तो मैं तुम्हें आजाद करती हूं, क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ अपना पूरा जीवन बिताना है न केवल तुम्हें पाना. यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं तुम्हारे बिना क्या करूंगी?’’

परख को बड़ा ही आश्चर्य हुआ. उस ने कहा, ‘‘अब जब हम दोनों ही एकदूसरे को प्यार करते हैं तो फिर इन रूढि़वादी रिवाजों के डर से तुम अपने कदम पीछे क्यों कर रही हो? क्या तुम्हें तुम्हारी शिक्षा इन्हीं सब अंधविश्वासों को मानने के लिए ही मिली है? बी लौजिकल.’’

लेकिन तनीषा अपनी बात पर अडिग रही. उस ने परख को कोई उत्तर नहीं दिया. किंतु परख ने उस की बाएं हाथ की उंगली में अपने नाम की हीरों जड़ी अंगूठी पहना ही दी.

‘‘यह अंगूठी मेरी ओर से हमारी सगाई का प्रतीक है. मैं तुम्हारी हां की प्रतीक्षा करूंगा,’’ कह कर परख वहां से चला गया. तनीषा ने अब परख से मिलनाजुलना भी कम कर दिया था. डरती थी कि कहीं वह कमजोर न पड़ जाए और परख की बात मान ले. परख भी अब चुपचाप उस समय की प्रतीक्षा कर रहा था जब उस की तनु विवाह के लिए हां कर दे. इस बीच तनु को एक स्थानीय कालेज में लैक्चररशिप मिल गई और उस ने खुद को अध्यापन कार्य में ही व्यस्त कर लिया.

इधर परख भी एक फैलोशिप पा कर कनाडा चला गया था 2 वर्षों के लिए. फिर कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ कि उस के कनाडा प्रवास की अवधि बढ़ती ही चली गई. दोनों की फोन पर या व्हाट्सऐप पर ही बातें होती थीं. लेकिन धीरेधीरे वह भी कम होता चला गया और फिर एक दिन उस की सहेली शुभ्रा ने जोकि परख के मामा की ही बेटी थी, परख के ब्याह की खबर दे कर उसे अचंभित कर दिया.

उस ने यह भी बताया कि दादी मृत्यु शैय्या पर पड़ी थीं और परख का विवाह देखना चाहती थीं. उस ने दादी की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी रजामंदी दे दी थी. तनीषा ने अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को जबरन रोका और परख के नाम की अंगूठी को, जिसे पहन कर वह खुद को उस की वाग्दत्ता समझने लगी थी, अपने दूसरे हाथ से कस कर भींच लिया.

‘‘नहीं, मैं उस की हूं और वह मेरा है. भले ही उस का ब्याह किसी से हो जाए. मेरी उंगली में तो उसी के प्यार की निशानी है,’’ और इस प्रकार उस ने खुद को अकेले रहने को बाध्य कर लिया.

कुछ दिनों बाद उस के विवाह न करने के फैसले को देखते हुए उस के मातापिता ने उस के भाई का विवाह कर दिया. उन की मृत्यु के उपरांत वह भाईभाभी तथा उन के बच्चों के साथ रहने लगी. किंतु भाभी को अब उस का वहां रहना अखरने लगा था. जबतब वे उसे ताने सुना ही देती थीं, ‘‘भई अकेले की जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है. अपने घरपरिवार की जरूरत तो सभी को होती है.’’

तनीषा भलीभांति समझती थी कि वे ऐसा क्यों कहती थीं. पिछली बार जब वह 2 माह टायफाइड से पीडि़त रही तब भाभी को उस की सेवा करनी पड़ी थी. इसीलिए वे ये सब बातें सुना देती थीं. लेकिन शायद वे भूल जाती थीं कि उन की 3-3 जचगी में उस ने किस प्रकार उन की सेवा की थी. वे सो सकें इसलिए वह रातरात भर जाग कर बच्चों को संभालती थी और सवेरे घर का सारा काम निबटा कर क्लासेज लेने के लिए कालेज भी जाती थी. घरखर्च के रूप में वह भाभी के हाथ पर अपने वेतन का एक हिस्सा रख ही देती थी. जबकि भाभी बनावटी आंसू बहाते हुए कहती थीं, ‘‘अरे मेरा हाथ कट कर गिर जाए, अपनी बेटी सरीखी ननद से घरखर्च में मदद लेते हुए. लेकिन क्या करें महंगाई भी तो बढ़ती ही जा रही है.’’

तनीषा इन सब बातों का मतलब समझती थी और जब भाई ने अपना अलग फ्लैट लिया तब उसे यह समझने में देर न लगी कि अब वे लोग उस के साथ और नहीं रहना चाहते. बिना यह सोचे की वह अकेली रह जाएगी, उस का भाई अपने परिवार को ले कर चला गया और वह अब एकदम अकेली ही रह गई थी.

डौरबैल की आवाज से वह वर्तमान में लौटी और दरवाजे पर जा कर देखा अनुज ही था. बहन के विवाह का निमंत्रण ले कर आया था. ‘नीरजा परिणय प्रतीक’ उस ने कार्ड को उलटपलट कर देखा. वर के पिता का नाम परख जालान पढ़ कर वह चिहुंक सी गई.

‘तो क्या प्रतीक मेरे परख का ही बेटा है? नहींनहीं यह कोई और परख भी तो हो सकता है,’ उस ने अपने को आश्वस्त किया.

‘आंटी, आप को जरूर आना है,’ कह कर अनुज चला गया.  न जाने क्यों आज वह आईने में खुद को गौर से निहार रही थी. क्या सच में उसे वार्धक्य की आहट सुनाई दे रही है. वह सोचने लगी, ‘‘हां, समय ने उस पर अपना भरपूर प्रहार जो किया था. काश कि बीता समय लौट पाता तो वह परख को अपनी बांहों में कस कर जकड़ लेती,’’  ‘आ जाओ परख, तुम्हारी तनु आज भी तुम्हारा इंतजार कर रही है,’ उस के मुंह से एक निश्वास निकल गया.  आज 25 तारीख है. शाम को नीरजा की बरात आने वाली है. उस ने अपनी कोई भी तैयारी नहीं की थी. जाऊं या न जाऊं, वह उलझन में पड़ी हुई थी. अभी तो उस के लिए कोई गिफ्ट भी नहीं खरीदा था. आखिर कुछ न कुछ देना तो होगा ही. खैर कैश ही दे देगी उस ने सोचा.

बैंडबाजे की आवाज से उस की तंद्रा भंग हो गई. लगता है बरात आ गई  है. वह जल्दी से तैयार होने लगी. बालों को फ्रैंच बुफे स्टाइल में कानों के ऊपर से उठा कर प्यारा सा जूड़ा बनाया. हलके नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी, सफेद मोतियों का सैट पहना, उंगली में अंगूठी पहनने की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि वहां तो परख का प्यार पहले से ही अपना अधिकार जमाए हुए था.

पूरी कोठी दुलहन की तरह सजी हुई थी. बरात दरवाजे पर आ गई थी. तभी उस की नजर दुल्हे के पिता पर पड़ी. परख ही था. अपने समधी के किसी मजाक पर हंसहंस कर दुहरा हुआ जा रहा था. तनीषा की नजरें अपने परख को ढूंढ़ रहीं थीं जो कहीं खो सा गया था. उस के सिर के खिचड़ी हो गए बाल, कलमों के पास थोड़ीथोड़ी सफेदी उस की बढ़ती उम्र का परिचय दे रहे थे. तनिक निकली हुई छोटी सी तोंद उस की सुख तथा समृद्धि का प्रतीक थी. नहीं, यह मेरा परख नहीं हो सकता है. सोचते हुए वह घर के अंदर जाने के लिए मुड़ी कि तभी उस ने देखा सामने से नीरजा दुलहन बनी हुई अपनी सहेलियों के साथ जयमाला ले कर आ रही थी. उस ने तत्काल ही एक निर्णय लिया और आगे बढ़ कर नीरजा की उंगली में परख के नाम की अंगूठी पहना दी. जब तक नीरजा कुछ समझ पाती वह वहां से वापस लौट पड़ी. अब उस का वहां कोई काम नहीं था.

‘‘जब भी परख अपनी बहू की उंगली में यह अंगूठी देखेगा तो क्या उसे मेरी याद आएगी?’’ सोचते हुए वह नींद के आगोश में चली गई, क्योंकि अब उसे परख के लौटने की कोई उम्मीद जो नहीं थी. उसे एक पुराना गीत याद आ रहा था ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…’ और अब उस का मन शांत हो गया था.

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