किराएदार (अंतिम भाग)

By Bela Mukherjee | 10 November 2017
किराएदार (अंतिम भाग)

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किराएदार (भाग-1)

पूर्व कथा

परले दरजे के कंजूस शिवनाथजी अपने बड़े से बंगले में नौकर मदन के साथ रहते थे. घरगृहस्थी के जंजाल में व्यर्थ पैसा खर्च होगा, यह सोच कर उन्होंने शादी तक नहीं की. हालांकि उन के पास बापदादा की छोड़ी हुई जायदाद और मां के लाखों के आभूषण थे, पर उन का मानना था कि पैसा बचा कर रखना बेहद जरूरी है. यह बुढ़ापे का सहारा है. नौकर मदन को भी वे मात्र 100 रुपए महीना तनख्वाह देते थे और साल में 2 जोड़ी कपड़े. बदले में वह सारे घर का काम करता था और बगीचे में अपने पैसों से ला कर खाद और बीज डालता था. एक दिन एक नवयुगल उन के घर आया और ऊपर का हिस्सा किराए पर रहने के लिए मांगा. पैसों के लालच में शिवनाथजी ने उन्हें किराएदार रख लिया. पति का नाम अमित व पत्नी का नाम आरती था. मदन ने उन के साथ जा कर ऊपर के हिस्से की साफसफाई करा दी.

अब आगे...

‘‘बाबूजी, आप का एडवांस.’’

शिवनाथजी ने रुपए गिने, पूरे 3 हजार, खुश हुए. फिर बोले, ‘‘देखो, किराया समय पर देते रहे तो कोई बात नहीं, मैं तुम को हटाऊंगा नहीं पर मेरी कुछ शर्तें हैं. एक तो बिजली का बिल तय समय पर दोगे. ज्यादा लोगों का आनाजाना मुझे पसंद नहीं. ऊपर जाने के लिए तुम बाहर वाली सीढ़ी ही इस्तेमाल करोगे और रात ठीक 10 बजे गेट पर ताला लग जाएगा, उस से पहले ही तुम को घर आना होगा. किसी उत्सव, पार्टी में जाना हो तो मदन से दूसरी चाबी मांग लेना. तुम नौकरी कहां करते हो?’’

‘‘मेरे दोस्त की एक फर्म है. कल से काम पर जाऊंगा. फर्म का नाम याद नहीं है.’’

‘‘तुम साथ में कोई सामान क्यों नहीं लाए?’’

‘‘घर मिलेगा या नहीं, यह पता नहीं था.’’

‘‘अब क्या करोगे?’’

‘‘रसोई का सामान खरीदने जा रहे हैं.’’

‘‘ठीक है.’’

अमित व आरती चले गए और 2 घंटे के बाद लौटे तो उन के हाथों में गृहस्थी का सामान था. रात को आरती नीचे आई तो तौलिए से ढका थाल ले कर आई और बोली, ‘‘बाबूजी, खाना...’’

शिवनाथजी उस समय समाचार देख रहे थे. मदन रात के खाने के लिए आलू काटने बैठा था. वे अवाक् रह गए.

‘‘आज मेरी गृहस्थी में पहली बार खाना बना है. हमारे यहां बड़ों को भोग लगाने का नियम है.’’

‘वाह, लड़की तो संस्कारी लगती है,’ शिवनाथजी ने मन ही मन सोचा, ‘अवश्य अच्छे घर की होगी.’

मदन ने उठ कर थाल लिया. आलू- टमाटर की डोंगा भर कर सब्जी थी. साथ में हलवा और पूरी. पूरे कमरे में खाने की सुगंध छा गई.  आरती चली गई. आज बहुत दिन बाद शिवनाथजी को जल्दी भूख लगी.

‘‘मदन, खाना लगा दे.’’

घर का काम जैसेतैसे निबटा कर मदन बाग में आ जाता और काम करने लगता. आरती भी घर का पूरा काम कर के बाग में मदन का हाथ बंटाती. पौधों में पानी डालती, छंटाई कर देती, बेलों को लपेट कर सहारा देती, झुकी डाल में डंडी लगा कर उन्हें खड़ा कर देती. मदन खुश होता. फिर अपने बचपन की बात, बड़े मालिक और मालकिन की बात, आरती को बताता.

‘‘बहूरानी, ऐसा इंसान तुम ने कहीं देखा है जो पत्नी को खिलाने के डर से शादी ही न करे.’’

आरती हंसतेहंसते लोटपोट हो जाती.  ‘‘दादाजी, शादी तो आप ने भी नहीं की.’’

‘‘मेरी बात और है बिटिया,’’ मदन दुखी हो सिर हिलाता, ‘‘होश संभालते ही अपने को नौकर पाया. बड़े मालिक सड़क से उठा कर लाए थे. मैं जानता भी नहीं कि मेरे मांबाप कौन थे. बस, मां की हलकी सी याद है. दूसरे के अन्न पर, पराए घर में जो जीवन काटे उसे कौन अपनी बेटी देगा?’’

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