कूदासन

By Avinash dattatreya kasture | 14 November 2017
कूदासन

ज्ञान विद्रोह भी है. ज्ञान की निरंतर प्राप्ति से आदमी ने नएनए आविष्कार किए और करता जा रहा है. साथ ही, जल्दी मरण न आए, इस के लिए भी तरहतरह के प्रयास कर रहा है.  नियमित दिनचर्या में लोग योग को अपना रहे हैं. योग के आसनों का महत्त्व है. लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान में आधी रात को भगदड़ मची तो लोगों ने देखा कि रामदेव मंच से कूद पड़े और जनता के बीच पहुंच गए.

रामदेव के कूदने को लोगों ने ‘कूदासन’ नाम दे दिया. इसे मजाक या व्यंग्य कुछ भी कहें, दरअसल, रामदेव को कूद कर जनता के बीच जाना जरूरी था. एक तो जनता को समझाना था और दूसरे, पुलिस से बचना था.

खैर, काफी लंबी चटपटी न्यूज बनी. कहते हैं, रामदेव के योगासनों में एक आसन ‘कूदासन’ शामिल हो गया है. वैसे ‘कूदासन’ सैकड़ों वर्षों से जारी है. इतिहास में लिखा है कि राजपूत राजाओं की पत्नियां अपने पति की हार की खबर सुनते ही धधकती आग में कूद कर प्राण त्याग देती थीं.

सती प्रथा के तहत पति की मृत्यु के बाद पत्नी उस की जलती चिता में कूद पड़ती थी तो जुए और सट्टे के अड्डे पर पुलिस का छापा पड़ने पर जुआरी व सट्टेबाज नजदीकी नालों में कूद जाते हैं या भवन के ऊपर से कूदते नजर आते हैं. वैसे भी लोगों का उछलकूद करना, कूदना, दीवार फांदना, नदीनालों में कूदना सामान्य बात है.  टैलीविजन पर प्रसारित हो रहे एक सीरियल में भाग लेने वाले युवकयुवतियों को तरहतरह से कूदनाफांदना पड़ता है. पैसा और शोहरत चाहिए तो जान को जोखिम में डालना ही पडे़गा.  मकड़जाली व्यवस्था में हर चीज से वंचित करोड़ों लोगों को भी अपने विचारों, सपनों, विश्वास, मूल्यों की जरूरत है, जिस के लिए वे भी विभिन्न स्रोतों की खोज में रहते हैं, पर उन की प्रक्रिया उन के लिए बहुत कठिन है, कहें तो असंभव सी है. सो, ‘कूदासन’ को अपनाया गया.

इस के लिए खास परिश्रमअभ्यास भी नहीं करना पड़ता. बस, कूदासन के समय दिमाग को संतुलित रखने का पूरा प्रयास करें. लेकिन कूदते समय आदमी दिमाग कहां शांत रख पाता है?  सेना में जवान को और्डर मिलता है, ‘कूदो’ तो कूदना पड़ता है न. जवान को क्या, वह तो पहले से जानता है कि जान की परवा नहीं करनी है. ‘कूदो’ कहा गया तो कूदना है, इस की ट्रेनिंग भी उन्हें दे दी जाती है.

‘कूदासन’ वह आसन है जो आप की जान की रक्षा तो करता है, इस से कूद कर दूसरे की जान भी बचाई जा सकती है. दूसरों की जान बचाने का कार्य पुण्य का कार्य  होता है.

मनुष्य ने सभ्यता की यात्रा में जब यह समझा कि जैसे मेरे सुखदुख हैं वैसे ही दूसरों के भी हैं. जैसी मेरी आशाआकांक्षा हैं वैसी ही दूसरोें की भी हैं तो उस ने सोचा कि अपने मंगल के साथ दूसरों का मंगल भी साधना चाहिए. तभी इन जीवन मूल्यों की स्थापना हुई, जो शाश्वत माने जाते हैं. सो, हम कह सकते?हैं कि बाबा का ‘कूदासन’ मानवमात्र  के कल्याण के लिए आवश्यक है, है न?

‘कूदासन’ के नियमित अभ्यर्थी में चरित्र की दृढ़ता, आत्मबल और जनकल्याणोन्मुखी दृष्टि होती है. वह खुद के वैभव को निजी वैभव नहीं मानता. संपूर्ण प्रजा में समान वितरण करता है. कूदासन का समर्थक अपने हितों की अपेक्षा दूसरों के हितों के लिए समर्पित रहता है.

‘कूदासन’ का समर्थक घायल तनमन वालों को ऊर्जा प्रदान करने वाली ‘कालिख’ जानबूझ कर पोतता है कि ‘सचाई’ उजागर करने को कूदो मैदान में.

कूदो, कूदते रहो, रुको मत, आगे बढ़ो. मनुष्य को सब से ज्यादा परेशानी है, दुख से. दुख उसे आलसी बना देता है. दुख भी ऐसा कि जितना सोचो, उतना ही बढ़ता है. मानव जीवन भी बड़ा बेहया है. आदमी को गहरे से गहरा दुख भी सहन हो जाता है.  पर, दुखी क्यों रहें? दुख को क्यों सहें? मानव जीवन क्या इसीलिए है? दुख क्यों? सो, कूदासन सब से श्रेष्ठ है. कूदतेफिरते रहो. नएनए अनुभव होंगे. दुख के बाद सुख आता है पर दुख में क्यों जीएं?

यदि आप चाहते हैं कि दुख फिर न आए तो तत्काल कूदासन का अभ्यास शुरू कर दें. 40 के नहीं हुए न अभी? तो अभी कूदतेफिरते रहो. उम्र बढ़ेगी तो इस आनंद का लाभ उठा पाओगे? नहीं न?

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