दरअसल, मजहब कुछ नहीं सिखाता, अगर सिखाता होता तो हजारों   साल से चले आ रहे इस देश में धर्म के नाम पर इतने दंगेफसाद न होते, इतने जानलेवा हमले न होते. इतने वर्षों से सुनाए जा रहे ढेरों उपदेशों का कहीं कुछ तो असर होता.  अद्भुत बात यह है कि हमारा देश धर्मपरायण भी है और धर्मनिरपेक्ष भी, यहां एकदेववाद भी है और बहुदेववाद भी, ‘जाकी रही भावना जैसी.’ जो जिस के लिए लाभकारी है वह उस का सेवन करता है. राजनीति के लिए धर्म बीमारी भी है और दवा भी. धर्म को चुनाव के समय जाति के साथ मिलाया जाता है और दंगों के समय उसे संप्रदाय नाम दिया जाता है.

हमारा देश धर्मप्राण देश कहलाता है क्योंकि यहां धर्म की रक्षा के लिए प्राण लेने और देने का सिलसिला जमाने से चला आ रहा है. बलिप्रथा आज भी बंद नहीं हुई है. धर्म के लिए बलिदान लेने वालों की व देने वालों की आज भी कमी नहीं है. भाई के लिए राजगद्दी छोड़ने वाला धर्म जायदाद के लिए भाई पर मुकदमा करना, उस का कत्ल करना सिखा रहा है. जिस धर्म ने धन को मिट्टी समझना सिखाया वही धर्म मिट्टी को धन समझ कर हड़पना, लूटना, नुकसान पहुंचाना सिखा रहा है.

हमारा देश धर्मनिरपेक्ष भी कहलाता है, लेकिन यह कैसी निरपेक्षता है कि हम अपने धर्म वाले से अपेक्षा करते हैं कि वह दूसरे धर्म वाले की हत्या करे. दूसरे धर्म वाले का सम्मान करने के बजाय अपमान करने के नएनए तरीके ढूंढ़ते रहते हैं. सुबह से शाम तक ‘रामराम’ करने वाले ऐसेऐसे श्रेष्ठ लोग हैं, जिन के कुल की रीति है, ‘वचन जाए पर माल न जाए.’ ऐसे ही श्रेष्ठ भक्तों के लिए कहावत बनी है, ‘रामराम जपना, पराया माल अपना.’ ऐसे ही श्रेष्ठ लोग मंत्रियों को गुप्तदान देते हैं. उन के शयनकक्ष से किसी भी पार्टी का कोई नेता खाली ब्रीफकेस ले कर नहीं लौटता. अपनेअपने धर्माचार्यों की झोली भी वही भरते जाते हैं. झोली इसलिए कि वे धन को हाथ से छूते तक नहीं.

धर्म का सब से प्रमुख तत्त्व सत्य होता है और यही सब प्रचारित भी करते हैं. अत: धर्मप्रेमियों को इस तत्त्व से सब से ज्यादा प्रेम होना चाहिए, लेकिन उन्हें इसी से सब से ज्यादा चिढ़ होती है क्योंकि उन के व्यवसाय में यही सब से ज्यादा आड़े आता है. सच बोलेंगे तो मिलावटी और नकली माल कैसे बेचेंगे? धर्म कहता है, ईमानदारी रखो, लेकिन व्यापार तो ईमानदारी से चल ही नहीं सकता. हां, दो नंबर में ऐसे लोग पूरी ईमानदारी बरतते हैं.

धर्म कहता है, त्याग करो और व्यवसाय कहता है, कमाई ही कमाई होनी चाहिए. धर्म कहता है, उदार बनो, लेकिन धर्म के ठेकेदार कट्टरपंथी होते हैं. इस की 2 शाखाएं हैं, एक पर उदारपंथी व्यवसायी बैठते हैं, दूसरे पर कट्टरपंथी जो दंगों का धंधा करते हैं. दरअसल, धर्म के नियमों में धंधों के हिसाब से संशोधन होते रहते हैं, तभी वह शाश्वत रह सकता है.

धर्मप्रेमी कहते हैं, ईश्वर एक है, हम सब उसी परमपिता की संतान हैं. फिर भाईभाई की तरह प्रेम से रहते क्यों नहीं? कहते हैं, वह हमारे पास ही है. फिर उसे चारों ओर ढूंढ़ते क्यों फिरते हैं? वे कहते हैं, ईश्वर सबकुछ करता है अर्थात जो खूनखराबा हो रहा है, इस में उन का कोई हाथ नहीं है. ये सब ईश्वर के कारनामे हैं, वे तो पूर्ण निष्काम हैं.

वे कहते हैं, ईश्वर बहुत दयालु है अर्थात तुम कितने भी दुष्कर्म करो, कृपा तो वह कर ही देगा. फिर चिंता की क्या बात. अत: डट कर चूसो, काटो, मारो. ‘पापपुण्य’ का हिसाब करने वाला तो ऊपर बैठा है. वस्तुत: उन का परमात्मा या तो उन की तिजोरी में होता है या ब्रीफकेस में. वे तो हमें बहकाने के लिए उसे इधरउधर ढूंढ़ने का नाटक करते हैं.  कहते हैं, किसी जमाने में शुद्ध संत हुआ करते थे, केवल धार्मिक. फिर मिलावट होनी शुरू हुई और संत राजनीतिबाज भी होने लगे. गुरु गद्दी को ले कर झगड़े पहले भी होते थे, तभी तो हर बाबा का अलग आश्रम और अलग अखाड़ा होता था. उन में धार्मिक कुश्तियां होती थीं. अब के संत अपनेअपने नेताओं को दंगल में उतारते हैं. चुनावी मंत्रतंत्र सिखाते हैं.  नकली संत तुलसीदास के जमाने में भी होते थे, तभी तो उन्होंने कहा था, ‘नारि मुई घर संपत्ति नासी, मूंड मुड़ाए भए संन्यासी.’ अब के संतों को शिष्याएं चाहिए, संपत्ति चाहिए, बड़ीबड़ी सुंदर जुल्फें चाहिए, मूंड़ने को अमीर चेले चाहिए. तब संतन को ‘सीकरी’ से कोई काम नहीं था, अब सारा ध्यान सीकरी पर ही रहता है कि कब वहां से बुलावा आए. वे एक तंत्र से दूसरे तंत्र की उखाड़पछाड़ के लिए तपस्या में लीन रहते हैं. ब्रह्मचारी विदेश जा कर अपनी सचिव के साथ हनीमून मनाते हैं. योगी योग के माध्यम से भोग की शिक्षा देते हैं. ऐसे धर्मात्मा संतों की जयजयकार हो रही है. सब की दुकानदारी खूब चल रही है.

आजकल धर्म के निर्यात का धंधा भी जोरों से चल निकला है. धर्म के देसी माल की विदेशों में मांग बढ़ रही है. अत: धर्म का बड़े पैमाने पर निर्यात होता है. इस धंधे में अच्छी संभावनाएं छिपी हुई हैं. सब अपनीअपनी कंपनी के धर्म की गुणवत्ता का गुणगान करते हैं, जिन्हें प्रार्थनाएं कहा जाता है.

यहां विशेष योग्यता वाले विक्रेता ही सफल हो पाते हैं. विदेशियों की आत्मा शांत करने के खूब ऊंचे दाम मिलते हैं. इस धंधे में लगे लोगों का यह लोक ही नहीं ‘दूसरा लोक’ भी सुधर जाता है. धर्म के धंधे से पर्याप्त विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है, लेकिन फिर भी हमारा देश दरिद्र रहना पसंद करता है. शायद हमारे देश के गरीबों और अमीरों के देवता अलगअलग हैं. शायद दोनों में पटती नहीं है.

कहते हैं, हमारा देवता बड़ा दानी है, अत: हमारे मांगते रहने में ही उस की दानवीरता सिद्ध होती है. हम उस राम से सिंहासन मांगते हैं जिन्होंने वचनपालन के लिए राजत्याग किया था. जो हनुमानजी सीता को माता मानते थे उन्हीं से नारियां संतान मांगती हैं और वह भी पुत्र.

राम द्वारा ली गई हर परीक्षा में बजरंग- बली सफल हो गए थे. शायद यही सोच कर परीक्षार्थी मंगलवार को सवा रुपए का प्रसाद चढ़ा कर परीक्षा में नकल करने की शक्ति मांगते हैं. दुष्टदमन करने वाली दुर्गा से दूसरों की संपत्ति लूटने का वरदान मांगते समय दुष्ट लोग बिलकुल नहीं डरते. जो शिवजी भभूत रमाते थे और  शेर की खाल लपेटते थे, उन्हीं की तसवीर धर्मात्मा लोग अपनी कपड़े की दुकान में सजाते हैं.

निष्काम कर्म का उपदेश देने वाले कृष्ण से लोग ऊपरी कमाई वाली नौकरी मांगते हैं. शादी में शराब पी कर पहले ब्रेकडांस करते हैं, फिर हवन में बैठ कर ‘ओम भूर्भुव: स्व…’ का खुशबूदार मंत्रोच्चार करते हैं. अहिंसा और करुणा का उपदेश देने वाले धर्मप्रेमी अपने स्कूल की अध्यापिकाओं का शोषण करते हैं. चींटियों को चीनी खिलाने वाले मैनेजर मास्टरनियों को पूरे वेतन पर हस्ताक्षर करवा कर आंशिक वेतन देते हैं. धर्म का चमत्कार यही है कि धर्म फल रहा है और धर्मात्मा फूल रहा है.

जिस धर्म का सर्वप्रमुख व आधारभूत सिद्धांत सत्य रहा हो उस धर्म की सचाई कहो या लिखो तो धर्म का अपमान होता है. धर्मविरुद्ध आचरण से धर्म का अपमान नहीं होता.

मातृभूमि के प्रेम के गीत गाने वाले ऊंचे दामों पर मातृभूमि बेचते हैं तो उस का अपमान नहीं होता. ‘देवी स्वरूपा’ नारी को नौकरानी बना कर शोषण करने से देवी का अपमान नहीं होता.  एकपत्नीव्रत धर्मपालक पांचसितारा होटल में रात बिता कर लौटते हैं, तब धर्म का अपमान नहीं होता. चरबी मिला कर घी बेचने से धर्म का अपमान नहीं होता. शांति का संदेश बांटने वाला धर्म हथियार बांट कर दंगे करता है, तब धर्म का अपमान नहीं होता. ऐसे धर्म की जयजयकार.  ऐसे महान धर्माचार्यों के धर्म को ‘करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी.’