‘‘सुनो वह पौलिसी वाली अटैची तो लाना, जरा… रीमा सुन रही हो?’’ विवेक ने बैठक से पत्नी को आवाज लगाई.

‘‘क्या कह रहे हो… मुझे किचन में कुकर की सीटी के बीच कुछ सुनाई नहीं दिया. फिर से कहो,’’ रीमा अपने गीले हाथों को तौलिए से पोंछतेपोंछते ही बैठक में आ गई.

‘‘वह अटैची देना, जिस में बीमे की फाइलें रखी हैं… वैसे तुम कहीं भी रहो, कोई न कोई तुम्हें देख कर सीटी जरूर बजा देता है,’’ विवेक पत्नी को देख मुसकराते हुए बोला.

‘‘फालतू की बातें न करो. वैसे ही कितना काम पड़ा है… तुम्हें यह काम भी अभी करना था,’’ रीमा झुंझला पड़ी.

‘‘यह काम भी तो जरूरी है, जो पौलिसी मैच्योर हो रही है उस का क्लेम ले लूंगा.’’

‘‘तो सुनो कोई हौलिडे पैक लें? कहीं घूमने चलते हैं.’’

‘‘और रिनी की शादी का क्या प्लान है तुम्हारा?’’ रीमा की बात सुन विवेक ने पूछा.

‘‘अभी 22 साल की ही तो हुई है. अभी 2-3 साल और हैं हमारे पास.’’

‘‘उस के बाद कौन सी खजाने की चाबी हाथ लगने वाली है? जो भी पैसा है वह सब पौलिसी, शेयर, एफडी के रूप में बस यही है,’’ विवेक के अटैची खोलते हुए कहा, ‘‘अब चाहे खुद सैकंड हनीमून मना लो या बच्चों का घर बसा दो… 1-2 साल बाद तो रोहन बेटा भी शादी लायक हो जाएगा,’’ विवेक कागजों को उलटतेपलटते बोला, ‘‘अरे हां, कल छोटू भी मिला था जब मैं औफिस से निकल रहा था. बड़ा चुपचुप सा था पहले कितना हंसीमजाक करता था. चलो अच्छा है, उम्र के बढ़ने के साथ थोड़ी समझदारी भी बढ़ गई उस की.’’

रीमा कुछ न बोल कर चुपचाप रसोई में आ गई. फिर काम करते हुए सोच में पड़ गई कि समय कितनी तेजी से बीतता है, इस का आभास सिर्फ बीते पलों को याद करने पर ही होता है. उस की शादी को भी तो 27 साल हो गए. जब शादी तय हुई थी, तो मात्र 19 वर्ष की थी. सगाई से विवाह के बीच के 6 माह उसे कितने लंबे लगे थे. विवाह करूं या न करूं, सोचसोच कर पगलाने लगी थी. जहां एक ओर विवेक का व्यक्तित्व अपनी ओर आकर्षित करता, वहीं अपने लखनऊ शहर से मीलों दूर कानपुर के एक छोटे कसबे की कसबाई जिंदगी और उस का संयुक्त परिवार उस के सुनहरे सपनों में दाग की तरह छा जाता.

अपने सपनों के साथ अपनी अधूरी पढ़ाई के बीच विदा हो वह ससुराल आ गई. यहां के घुटन भरे माहौल से निकलने का एक यही रास्ता बचा था उस के पास कि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर ले. बस इसी बहाने मायके का रूख करने लगी. स्नातक की पढ़ाई खत्म कर कंप्यूटर डिप्लोमा में दाखिला ले लिया. विवेक ने उसे भरपूर आजादी दे रखी थी. जहां विवाह के 4 वर्ष पूरे हुए उस की झोली में स्नातक डिग्री के साथ डिप्लोमा इन कंप्यूटर और 2 नन्हेमुन्ने रोहन और रिनी भी आ गए. ससुराल में 2 जेठजेठानियां उन के 4 बच्चे, सासससुर, 1 घरेलू नौकर समेत कुल 14 सदस्य एक बड़े से घर में एक छत के नीचे जरूर थे, मगर एकसाथ नहीं. सांझा चूल्हा भी इसीलिए जल रहा था, क्योंकि अनाज, दूध, घी, दही, सब्जियां सभी तो अपने घर की ही थीं, कमीपेशी के लिए ससुरजी की पेंशन व घर खर्च के नाम पर चंद रुपए सास को पकड़ा कर उन के बेटे निश्चिंत हो जाते. बहुओं में सारा झगड़ा काम को ले कर रहता. वह फटाफट रसोई का काम निबटा कर घर आए मेहमानों का भी स्वागतसत्कार बहुत सम्मान के साथ करती. महल्ले में उस की बड़ी तारीफ होने लगी तो दोनों जेठानियां एक तरफ हो उस के काम में तरहतरह के नुक्स निकलने लगीं. इसी बीच विवेक का ट्रांसफर हैड औफिस दिल्ली हो गया. तब वह बहुत खुश हुई थी कि चलो अब तो कहीं अपने हिसाब से जिंदगी बिताएगी. किंतु विवेक ने यह कह कर साफ मना कर दिया कि दिल्ली में मकान, बच्चों के स्कूल सभी कुछ इतना आसान नहीं है. तुम्हें बाद में ले जाऊंगा.

विवेक दवा कंपनी में एरिया मैनेजर था. रीमा फिर से एक बार मन मार कर रुक गई. फिर जब ससुराल के पास ही एक नया स्कूल खुला तब स्कूल में बच्चों के एडमिशन के साथ ही उसे भी कंप्यूटर टीचर की जौब मिल गई. विवेक ने हमेशा की तरह उसे प्रोत्साहित ही किया. अब तो दोनों जेठानियों ने सास के कान भरने शुरू कर दिए कि घर के काम से बचने के लिए स्कूल चल दी महारानी. सास को सुबहशाम की रोटी से मतलब रहता जिसे रीना समय पर दे देती. दोनों बच्चे अभी छोटे ही तो थे. रोहन 4 साल का और रिनी 3 साल की. दोनों को स्कूल में दाखिल करा दिया. अब वह निश्चिंत थी. मगर घर का माहौल जमे पानी सा सड़न पैदा करता. ऐसे में छोटू की हंसीमजाक, भरपूर बातें उसे ठंडीताजी हवा के झोंके सी लगतीं.

छोटू मतलब बलवीर सिंह. इस नाम से उसे कोई नहीं पुकारता था. पूरे महल्ले का प्रिय समाजसेवक, बस पढ़ाईलिखाई में मन न लगता, न ही शांति से घर में बैठ पाता. किसी को बाइक से सब्जी मंडी पहुंचा देता तो किसी की बहू को कार से हौस्पिटल. उस की डिलिवरी के समय भी दोनों वक्त छोटू की कार काम आई थी. छोटू तो अपने पिताजी के रिटायरमैंट के बाद का अघोषित ड्राइवर हो गया था. घर में उस से बड़े

2 भाई और भी थे. मगर वे भी कार नहीं चला पाते थे. फिर जब दिन भर छोटू घर भर के कामों के लिए गाड़ी दौड़ा ही रहा था तो उन्होंने भी ड्राइविंग सीखने की जहमत न उठाई.

6 फुट लंबातगड़ा जींस और टीशर्ट पहने, आंखों में धूप के चश्मे के साथ हाथ जोड़ विनम्रता से जिस के भी आगे खड़ा हो जाता वही गद्गद हो जाता. उस की ससुराल तो दिन भर में एक चक्कर जरूर लगा जाता.

अकसर रीमा को छेड़ता, ‘‘भाभी, आप की उम्र और मेरी उम्र बराबर ही होगी. लेकिन आप को देखो कभी खाली बैठे नहीं देखा और मैं हर वक्त खाली रहता हूं.’’

‘‘तो कोई काम क्यों नहीं करते? स्कूल ही जौइन कर लो.’’

‘‘वाह भाभी, खुद तो 2 बार में इंटर पास कर पाया हूं दूसरों को क्या पढ़ाऊंगा?’’

‘‘प्राइवेट स्नातक कर लो. आजकल तरहतरह के कंप्यूटर कोर्स भी हैं. तुम्हारे लिए एक अच्छा ओप्शन मिल ही जाएगा.’’

‘‘ठीक हैं, आप भी कंप्यूटर पढ़ने में मदद करेंगी तो मैं जौइन करने की सोचूंगा.’’

‘‘अरे वहां बहुत अच्छी तरह बताते हैं. प्रैक्टिकल भी कराते हैं. फिर भी कुछ समझ न आया करे तो आ कर पूछ लिया करना.’’

‘‘मैं जानता हूं कि आप कभी मना नहीं करेंगी… आप हैं ही बहुत स्वीट.’’

वह हंस पड़ी.

‘‘आप को पता भी है कि आप की हंसी कितनी कातिलाना है? मैं ने तो आप को शादी के बाद जब हंसते हुए देखा था तो देखता ही रह गया था. विवेक भैयाजी से बड़ी जलन हो गई थी मुझे.’’

‘‘तुम कुछ भी कैसे बोल देते हो?’’ रीमा नाराजगी से बोली.

‘‘सच कह रहा हूं भाभी. आप की हंसी और आप की इन आंखों को जो कोई एक बार देख लेता होगा वह जिंदगी भर नहीं भूल सकता होगा.’’

‘‘बसबस, ज्यादा मक्खन न लगाओ… अब अपना कंप्यूटर कोर्र्स जौइन करने के बाद ही मेरा सिर खाने आना,’’ रीमा ने उसे टालना चाहा.

‘‘अरे आप मजाक समझ रही हैं क्या? मैं एकदम सच कह रहा हूं. आप ने क्या फिगर मैंटेन किया है… आप को तो कोई भी 2 बच्चों की मां तो दूर मैरिड भी नहीं समझ सकता. बिलकुल कालेजगोइंग स्टूडैंट लगती हैं.’’

‘‘हो गया पूरा पुराण? चलो, अब घर जाओ अपने,’’ वह रुखाई से बोली. फिर भी छोटू मुसकराते हुए एक गहरी नजर से उसे निहार गया.’’

अपनी तारीफ किसे अच्छी नहीं लगती. रीमा अपने बैडरूम में लगे आदमकद आईने के आगे खड़ी हो गई. बदन में जो चरबी बच्चों के पैदा होने पर चढ़ गई थी वह दिन भर की भागदौड़ में कब पिघल गई पता ही न चला उस की शादी न हुई होती तो वह भी अपनी सहेली सुमन की तरह पीएचडी करने कालेज जा रही होती. क्या गलत कहा छोटू ने, पर वह तो घरगृहस्थी की बेडि़यों में जकड़ी है. कालेज लाइफ की उन्मुक्त जिंदगी उस के हिस्से में नहीं थी. मन मसोस कर रह गई. सुमन ने ही उसे बताया था कि तुझे होली में बड़ा बढि़या टाइटिल मिला था, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं… तेरी अचानक शादी का तो बेचारे क्लासमेट्स को पता ही न था. कितने दिल तोड़े तू ने कुछ पता भी है? जब दोबारा कालेज जौइन किया था तब उसे ऐसी कितनी बातों से दोचार होना पड़ा था. शशि उसे देख उछल पड़ी थी कि अरे मेरी लाड्डो जीजाजी के साथ कैसी छन रही है? कुछ पढ़ाई भी की तुम ने?

उसे अपने विवेक के साथ बिताए अंतरंग पल याद आ गए और उस का मुखड़ा शर्म से गुलाबी हो गया. मानो उस के बैडरूम में वे सभी अचानक प्रविष्ट हो गई हों.

‘‘अरे इसे देखो… क्या रूप निखर आया है,’’ सुमन ने छेड़ा.

यह सुन अनीता चहक कर बोली, ‘‘मेरी शादी होगी न तब देखना मेरा रूप.’’

सभी उस के बड़बोलेपन पर हंस पड़े.

कभी कोई परीक्षा कक्ष में कोई छेड़ देता, ‘‘क्यों तेरी ससुराल में साससुर सब साथ रहते हैं क्या?’’

वह झुंझला कर बोल पड़ती, ‘‘कुछ नहीं पढ़ा है यार. जो थोड़ाबहुत याद है उसे भी तुम लोगों की बकवास सुन कर भूल जाऊंगी.’’

फिर एक गहरी सांस ली उस ने कि बीती बातें क्या याद करनी, पर मन था कि भटक कर उन्हीं लमहों में जा पहुंचा…

उन्हीं दिनों मायके में उस की चचेरी बहन का विवाह तय हो गया. तब अपनी शादी के 5 वर्षों के बाद पहली बार उस ने ब्यूटीपार्लर का रुख किया था. विवेक के लाख मना करने पर भी बालों को एक नया आकार दिया. इतनी तैयारी तो अपने विवाह के पूर्व भी न की थी. शायद वह अपनी दबी हसरतों को इस मौके पर पूरा कर लेना चाहती थी. हुआ भी वैसा ही. विवाह के दिन जब वह अपने शादी के लहंगे में सजधज कर विवेक के सम्मुख खड़ी हुई तो वह बौखला सा गया, ‘‘इतना सजनेधजने की क्या जरूरत थी… कोई तुम्हारी शादी है क्या?’’

‘‘न हो, मेरी बहन की तो है और वह भी मुझ से बस 1 साल छोटी है… कितने सारे कौमन फ्रैंड हैं हमारे… आज सब मिलेंगे वहां पर… और ये मम्मीपापा, बच्चे सब कहां हैं?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम्हें अपने बनाव शृंगार से फुरसत नहीं थी. वे सभी टैक्सी कर चले गए. कह गए तुम दोनों बाइक से घर को लौक कर आ जाना.’’

‘‘तो चलो फटाफट,’’ उस ने उतावलेपन से कहा.

‘‘पहले बाइक की चाबी तो ले कर आओ… वहीं ऊपर तुम्हारे बैडरूम में है,’’ उस का बैडरूम अब भी उसी के नाम से था मायके के… कितनी यादें जुड़ी हैं इस कमरे से रीमा की. अभी भाई की शादी नहीं हुई है तो पूरे घर में उसे अपना ही राजपाठ दिखाई देता है.

‘‘तुम ले आओ न प्लीज, यह लहंगे में सीढि़या चढ़नेउतरने में दिक्कत होती है,’’ उस ने लहंगे को सोफे पर फैला कर बैठते हुए कहा.

‘‘तो यहीं बैठी रहो… मुझे नहीं पता कि तुम ने बाइक की चाभी कहां रखी है,’’ विवेक भी वहीं सोफे पर बैठते हुए बोला.

रीमा एक झटके से उठी और लहंगे को संभालती बड़बड़ाते हुए सीढि़यां चढ़ने लगी कि अपनी बहन की शादी होती तो साहब सब से पहले पहुंच जाते तोरण बांधने… मेरे मायके की शादी है, तो जितना नाटक करें उतना ही कम है.

चाबी बैड पर ही रखी थी. जैसे ही उठा कर पलटी एक झटके में विवेक ने उसे बांहों में भर बैड पर गिरा दिया. इस से पहले कि वह कुछ बोल पाती उस के होंठ पर विवेक ने अपने प्यार का ताला जड़ दिया.

किसी तरह खुद को अलग कर बोली, ‘‘मेरा सारा मेकअप खराब कर दिया तुम ने… यह सब बंद करो. वहां सब हमारा इंतजार कर रहे होंगे.’’

‘‘करने दो इंतजार सब को… पर मुझ से इंतजार नहीं होगा,’’ विवेक उस के कान में फुसफुसाया.

रीमा अपनी बेकाबू धड़कनों को संभालते हुए बोली, ‘‘अभी चलो प्लीज… हम जयमाला होते ही लौट आएंगे.’’

‘‘नहीं पहले प्रौमिस करो… तुम मायके में इतनी रम जाती हो कि फिर कुछ याद नहीं रहता,’’ विवेक अपनी बांहों के घेरे को और तंग करते हुए बोला.

‘‘पक्का प्रौमिस, कह कर रीमा खिलखिलाई, तो विवेक ने एक बार फिर से उस की लिपस्टिक बिगाड़ दी.’’

‘‘चलो हटो… वहां शादी हो रही है और यहां…’’ उस ने विवेक को अपने से दूर करते हुए कहा.

शादी में भी जयमाला के बाद विवेक की घर चलो की जिद ने रीमा का कितना मजाक बनाया था. वह सब को सफाई देतेदेते थक गई थी कि ये आज सुबह ही दिल्ली से आए हैं… सफर में नींद पूरी नहीं हुई है, मगर सभी मुंह दबा कर हंसते रहे. उसे अच्छी तरह समझ आ गया कि विवेक को उस के शृंगार को ले कर इतनी आफत क्यों आई थी. दरअसल, वह चाहता ही नहीं था कि उस के अलावा किसी की नजर उस पर पड़े, लेकिन उस के मुंह से कभी तारीफ के शब्द नहीं निकलते.

कितना सूनापन लगने लगा था. विवेक के दिल्ली जाने के बाद… दिन तो स्कूल, बच्चों रसोई में बीत जाता. मगर रात बहुत लंबी लगतीं. फोन तो रोज ही आता, मगर तब लैंड लाइन फोन होने के कारण कभी मां, कभी पिताजी ही बात कर फोन रख देते. अगर रीमा ने उठाया तब तो ठीक वरना वे उसे बता कर मुक्ति पा जाते कि विवेक का फोन आया था.

उस दिन फोन पर विवेक ने बताया कि वह मंगलवार को 12 से 1 के बीच घर पहुंच जाएगा. अत: तुम स्कूल से आधे दिन की छुट्टी ले कर आ जाना. बच्चे स्कूल बस से बाद में अपनेआप आ जाएंगे.

उस का उतावलापन सुन कर वह बोल पड़ी, ‘‘दिन के बाद रात तो आ ही जाएगी.’’

तब विवेक गुस्से से बोला था, ‘‘रहने दो तुम, अब मैं बाद में छुट्टी लूंगा.’’

‘‘अच्छा, नाराज न हो. मैं हाफ डे ले लूंगी,’’ उस ने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ा कर कहा, ‘‘कमरे में कोई मौजूद नहीं था. उसे झुंझलाहट हो आई कि फोन तो घर के चौराहे पर रखा है और लाट साहब को रोमांस सूझता है.’’

उस दिन उस ने सुबह ही घर में बता दिया था कि लंच टाइम तक ये आ जाएंगे. स्कूल में मासिक परीक्षा चल रही है. अत: स्कूल जाना जरूरी है. स्कूल में प्रिंसिपल से कहा कि घर में फंक्शन है. आज फिर जल्दी जाना है. कंप्यूटर प्रैक्टिकल परीक्षा पहले 4 पीरियडों में ही निबटा दी.

छुट्टी की मंजूरी मिलते ही तुरंत स्कूल के गेट तक पहुंच गई. तभी न जाने कहां से भटकता आ गया. बोला, ‘‘घर जाना है क्या? आइए, मैं छोड़ देता हूं,’’ और फिर अपनी बाइक उस के आगे ला कर खड़ी कर दी.

उसे खुद घर जाने की जल्दी थी. कहीं देर हो गई सवारी ढूंढ़ने के चक्कर में तो विवेक फिर से गुस्से से लालपीला हो जाएगा.

‘‘क्या सोच रही हैं?

आज जल्दी कैसे आ गईं, स्कूल से बाहर?’’

तबीयत ठीक नहीं है.

‘‘अरे भाभी, अपना खयाल रखा करो,’’ बाइक स्टार्ट करते हुए बोला, ‘‘आप एकदम भोली हो… वहां तो भाई गुलछर्रे उड़ा रहा होगा और आप यहां अपने को कितना व्यस्त रखती हो.’’

‘‘क्या गुलछर्रे उड़ाते होंगे बेचारे… न ढंग का खाना, न देखभाल. घर से दूर हमारे लिए ही तो जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं… चार पैसे बचेंगे तो हमारे बच्चों के भविष्य के ही काम आएंगे.’’

‘‘कर दी न वही घिसीपिटी बात… वहां नाइट क्लब होते हैं… खूब शराब और शबाब का दौर चलता है… वहां किसे अपनी बीवी याद आएगी.’’

फिर उस का मन हुआ कि वह छोटू को बता दे कि उस का पति घर में कितनी बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा है… इन सब चक्करों से वह कोसों दूर है वरना आज उसे यों झूठ का सहारा ले कर आधे दिन की छुट्टी ले कर घर नहीं भागना पड़ता… पत्नी पति के हर परिवर्तन को झट भांप लेती है. मगर उस ने छोटू की बातों को कोई तवज्जो नहीं दी.

‘‘आओ चाय पी कर जाना,’’ उस ने अपने घर के गेट के आगे उतर कर छोटू से औपचारिकता निभाने को पूछा.

‘‘नहीं, फिर कभी… आज आप की तबीयत ठीक नहीं है, फिर आऊंगा. मुझे आप से कंप्यूटर की कुछ कमांड समझनी हैं.’’

‘‘ठीक है अगले हफ्ते आना… अभी बच्चों के टैस्ट चल रहे हैं.’’

‘‘जो हुकम स्वीट भाभी,’’ अपनी खीसें निपोरता हुआ बाइक को एक झटके से मोड़ कर वापस चला गया.

टीना ने चैन की सांस ली कि अगर अंदर आ जाता तो विवेक के प्रोग्राम का क्या होता?

सासससुर बरामदे में ही बैठे मिल गए, ‘‘आज जल्दी आ गई… विवेक आया है इसीलिए… अरे, हमारे साथ भोजनपानी कर लिया उस ने. तुझे इतनी चिंता क्यों हो गई,’’ ससुर ने कटाक्ष किया.

वह कुछ न बोल कर सिर झुकाए अपने कमरे की ओर बढ़ गई.

‘‘अरे बहू, वह तो सो भी गया होगा अब तक… तू हमारे लिए चाय बना.’’

कमरे में विवेक करवटें बदल रहा था. उसे देखते ही  खींच कर अपने सीने से लगा लिया मानो वह उसे सदियों के बाद मिल रहा हो.

‘‘कितने दिन बीत गए हैं पता है?’’ अपनी गरम सांसें उस के चेहरे पर टिकाते हुए विवेक ने कहा.

‘‘हां पूरा 1 महीना,’’ वह मुसकराई. विवेक ने उस पर अपने प्यार की बारिस कर दी.

‘‘अब तुम सोओगी क्या?’’ विवेक ने अपनी तृप्त आंखों से एक नजर उस पर डालते हुए कहा.

‘‘नहीं, नहाने जा रही हूं. बच्चे भी आते होंगे… देखना अभी तुम्हारी दोनों भाभियां मेरा कितना मजाक बनाने वाली हैं,’’ टीमा हंस कर बोली.

‘‘उन्हें क्या पता कि तुम ने क्या गुल खिलाएं हैं?’’ विवेक उस के हाथों को सहलाते हुए बोला.

‘‘हां, एक तुम्हीं तो हो कामदेव बाकी तो सब अज्ञानी हैं… छोड़ो मुझे तुम, अब चुपचाप सो जाओ. मैं नहा कर चाय बनाती हूं… 1 घंटा पहले ही ससुर फरमाइश कर रहे थे.’’

उस दिन सुबह से ले कर शाम तक कितने झूठ बोलने पड़े थे उसे… बच्चों को भी उसे जल्दी आने की अलग से सफाई देनी पड़ी.

ठीक 1 हफ्ते के बाद छोटू आ धमका. अपनी किताबे उठाए उस के बैडरूम में ही प्रवेश कर गया.

विवेक वापस जा चुका था. दोनों बच्चे बाहर खेल रहे थे… वह अपनी कपड़ों की अलमारी ठीक कर रही थी. उसे देख कर चौंक पड़ी. बोली, ‘‘चलो, बाहर बरामदे में बैठ कर पढ़ाई करते हैं.’’

‘‘हांहां, बाहर ही बैठ जाएंगे… वैसे आप का बैड भी बड़ा शानदार है,’’ उस ने बैड पर बैठते हुए कहा, ‘‘अकेले तो ऐसे गद्दों पर भी नींद नहीं आती होगी न?’’

रीमा कोई जवाब न दे कर कमरे से बाहर आ गई तो छोटू को भी पीछेपीछे आना पड़ा.

‘‘अरे भाभी, मैं तो मजाक कर रहा था… आप नाराज ही हो गईं.’’

जब से विवेक गए हैं तब से छोटू का मजाक कुछ ज्यादा ही सीमा लांघने लगा है… जितना उस से बचने की जुगत बैठाती, उतना ही कोई न कोई काम पड़ ही जाता. एक दिन रिनी सीढि़यों से लुढ़क गई. उस दिन भी उसी की कार से हौस्पिटल भागी. सिर्फ 3 टांके उस के माथे पर आए थे. मगर वह खून देख कर कितना घबरा गई थी, ऐसे में छोटू ने ही अपनी पहचान के डाक्टर से तुरतफुरत सब काम करवा दिए थे.

एक दिन आ कर बोला, ‘‘मैं बीमा पौलिसी का एजेंट बन गया हूं. एक पौलिसी तो आप को लेनी ही पड़ेगी.’’

रीमा ने रिनी के नाम से ले ली. जानती थी जब तक ले नहीं लूंगी तब तक पीछा नहीं छोड़ेगा. तब वह बहुत खुश हो गया.

‘‘यह हुई न बात स्वीट भाभी. भैया कब आ रहे हैं?’’ उस ने पूछा. इस पर रीमा तुनक पड़ी, ‘‘तुझे क्या काम याद आ गया उन से?’’

‘‘मुझे आप की तनहाईयां देख कर बहुत दुख होता है… यह भी कोई उम्र है तनहा रहने की?’’

‘‘तो क्या करूं… सब की अपनीअपनी मजबूरियां होती हैं.’’

‘‘अरे आप चाहो तो ऐश कर सकती हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’ उस ने जानबूझ कर छोटू के मन की थाह लेने को पूछा.

‘‘अरे भाभी, आप के पास तो डबल लाइसैंस हैं?’’

‘‘मजे लेने के लिए कौन से लाइसैंस?’’ आज वह सब कुछ साफ कर लेने के मूड में थी.

‘‘एक तो आप मैरिड हो दूसरा फैमिली प्लानिंग भी कर चुकी हो… अब तो आप आजाद हो आकाश में उड़ते पंछी की तरह.’’

‘‘इस का क्या मतलब है? मैं कुछ

समझी नहीं?’’

‘‘तुम्हारी यही मासूमियत तो पागल कर जाती है भाभी… अरे जैसे भाई दिल्ली में दूसरी लड़कियों के साथ मौज करते हैं. वैसे ही आप भी मेरे साथ मजे ले सकती हो.’’

‘‘यह मेरा अपने पति को धोखा देना नहीं कहलाएगा क्या?’’ उस ने अपने क्रोध को दबाते हुए पूछा.

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं. यह तो बस थोड़ा सा टाइमपास होता है जैसे तुम ने एक फिल्म देखी हो बस… फिल्म खत्म तुम अपने घर, मैं अपने घर.’’

‘‘अभी तुम्हारी शादी तो नहीं हुई है न, इसलिए तुम इस रिश्ते का महत्त्व नहीं जानते… जब तुम्हारी शादी होगी तब मैं तुम से कहूं कि एक फिल्म अपनी बीवी की विवेक को दिखा दो तो तुम्हें कैसा लगेगा?’’

‘‘अरे, मैं इतना दकियानूसी नहीं हूं… मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि मेरी बीवी क्या करती है,’’ छोटू खिसिया कर बोला.

‘‘तो ठीक है जब तुम अपनी बीवी को इतनी आजादी दोगे. तब मैं तुम्हें मान जाऊंगी,’’ रीमा ने उसे चुनौती देते हुए कहा.

साल भर बाद ही वह विवेक के साथ कानपुर चली गई. विवेक को भी

दिल्ली के मुकाबले कानपुर रास आ गया. एक दिन अचानक छोटू का फोन आ गया.

‘‘क्या बात है बड़े दिनों के बाद याद आई हम लोगों की?’’ रीमा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘क्या भाभी, आप लोग मेरी बरात में भी शामिल नहीं हुए,’’ उस ने नाराजगी दिखाई.

‘‘तुम ने हमें कार्ड ही नहीं भेजा… खैर कोई बात नहीं, तुम्हें और तुम्हारी दुलहन को बहुत सारी शुभकामनाएं.’’

‘‘भाभी, आप से एक काम था. इसीलिए फोन किया था… वह मेरी वाइफ का बीएड का रिजल्ट आ गया है, उसे कानपुर कालेज में दाखिला लेना है. आप की नजर में कोई अच्छा सा घर हो तो देखना…’’

‘‘अरे वाह, यह तो बहुत खुशी की बात है… घर की तुम बिलकुल चिंता न करो. यहां हमारे पास थ्री बैडरूम सैट है. तुम लोगों को कोई असुविधा नहीं होगी. अब फटाफट आ जाओ. तुम निश्चिंत रहो. यहां तुम्हारे भाई तो हैं ही उस की देखभाल को.’’

‘‘खटाक,’’ की आवाज के साथ फोन कट गया. छोटी की बीवी शायद उन के घर नहीं रहने आएगी.

रीमा हंस पड़ी कि वह तो सिर्फ मजाक कर रही थी और छोटू डर गया.

‘‘क्या बात है? अकेलेअकेले क्यों हंस रही हो,’’ विवेक रसोई में रखे फ्रिज से पानी की बोतल निकालते हुए बोला.

‘‘सुनो, छोटू से जो जीवन बीमा की पौलिसी ली थी. वह कब पूरी होगी?’’

‘‘अगले साल… 2 लाख मिलेंगे… वे सब बिटिया की शादी के बजट में काम आएंगे, पर तुम क्यों पूछ रही हो?’’

‘‘चलो कोई तो काम अच्छा किया छोटू ने.’’

‘‘कौन सा काम गलत किया उस ने? मुझे भी बताओ,’’ विवेक ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मैं ने यह तो नहीं कहा कि उस ने कोई गलत काम किया.’’

‘‘तुम औरतों से बात करना मतलब मुसीबत मोल लेना होता है.’’

‘‘हां, अब तुम ने एकदम सही बात की,’’ कह रीमा खिलखिला उठी.

VIDEO : रोज के खाने में स्वाद जगा देंगे ये 10 टिप्स

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