गृहशोभा विशेष

उस का नाम मेघा न हो कर मल्हार होता तो शायद मेरे जीवन में बादलों की गड़गड़ाहट के बजाय मेघमल्हार की मधुर तरंगें हिलोरें ले रही होतीं. परंतु ऐसा नहीं हुआ था. वह काले घने मेघों की तरह मेरे जीवन में आई थी और कुछ ही पलों में अपनी गड़गड़ाहट से मुझे डराती और मेरे मन के उजालों को निगलती हुई अचानक चली गई.

मेघा मेरे जीवन में तब आई जब मैं अधेड़ावस्था की ओर अग्रसर हो रहा था. मेरी और उस की उम्र में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं था. मैं 30 के पार था और वह 20-22 के बीच की निहायत खूबसूरत लड़की. वह कुंआरी थी और मैं एक शादीशुदा व्यक्ति. उस से लगभग 10 साल बड़ा, परंतु उस ने मेरी उम्र नहीं, मुझ से प्यार किया था और मुझे इस बात का गर्व था कि एक कमसिन लड़की मेरे प्यार में गिरफ्तार है और वह दिलोजान से मुझ से प्यार करती है और मैं भी उसे उसी शिद्दत से प्यार करता हूं.

मेरे साथ रहते हुए उस ने मुझ से कभी कुछ नहीं मांगा. मैं ही अपनी तरफ से उसे कभी कपड़े, कभी कौस्मैटिक्स या ऐसी ही रोजमर्रा की जरूरत की चीजें खरीद कर दे दिया करता था. हां, रेस्तरां में जा कर पिज्जा, बर्गर खाने का उसे बहुत शौक था. मैं अकसर उसे मैक्डोनल्ड्स या डोमिनोज में ले जाया करता था. उसे मेरे साथ बाहर जानेआने में कोई संकोच नहीं होता था. उस के व्यवहार में एक खिलंदरापन होता था. बाहर भी वह मुझे अपना हमउम्र ही समझती थी और उसी तरह का व्यवहार करती थी. भीड़ के बीच में कभीकभी मुझे लज्जा का अनुभव होता, परंतु उसे कभी नहीं. ग्लानि या लज्जा नाम के शब्द उस के जीवन से गायब थे.

वह असम की रहने वाली थी और अपने मांबाप से दूर मेरे शहर में पढ़ाई के लिए आई थी. होस्टल में न रह कर वह किराए का मकान तलाश कर रही थी और इसी सिलसिले में वह मेरे मकान पर आई थी. अपने घर में मैं अपनी पत्नी और एक छोटे बच्चे के साथ रहता था. उसे किराए पर एक कमरे की आवश्यकता थी. हमारा अपना मकान था, परंतु हम ने कभी किराएदार रखने के बारे में नहीं सोचा था. हमें किराएदार की आवश्यकता भी नहीं थी, परंतु मेघा इतनी प्यारी और मीठीमीठी बातें करने वाली लड़की थी कि कुछ ही पलों में उस ने मेरी पत्नी को मोहित कर लिया और न न करते हुए भी हम ने उसे एक कमरा किराए पर देने के लिए हां कर दी. वह मेरे घर में पेइंगगेस्ट की हैसियत से रहने लगी. एक घर में रहते हुए हमारी बातें होतीं, कभी एकांत में, कभी सब के सामने और पता नहीं वह कौन सा क्षण था, जब उस की भोली सूरत मेरे दिल में समा गई और उस की मीठी बातोें में मुझे रस आने लगा. मैं उस के इर्दगिर्द एक मवाली लड़के की तरह मंडराने लगा. पत्नी को तो आभास नहीं हुआ, परंतु वह मेरे मनोभावों को ताड़ गई कि मैं उसे किस नजर से देख रहा था.

यह सच भी है कि लड़कियां पुरुषों के मनोभाव को बहुत जल्दी पहचान जाती हैं. उस ने एक दिन बेबाकी से पूछा, ‘‘आप मुझे पसंद करते हैं?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, तुम एक बहुत प्यारी लड़की हो,’’ मैं ने बिना किसी हिचक के कहा.

‘‘तुम एक पुरुष की दृष्टि से मुझे पसंद करते हो न?’’ उस ने जोर दे कर पूछा.

मैं सकपका गया. उस की आंखों में तेज था. मैं न नहीं कह सका. मेरे मुंह से निकला, ‘‘हां, मैं तुम्हें प्यार करता हूं,’’ मैं सच को कहां तक छिपा सकता था.

‘‘आप का घर बिखर जाएगा,’’ उस ने मुझे सचेत किया. मैं चुप रह गया. वह सच कह रही थी. परंतु प्यार अंधा होता है. मैं उस के प्रति अपने झुकाव को रोक नहीं सका. वह भी अपने को रोकना नहीं चाहती थी. उस के अंदर आग थी और वह उसे बुझाना चाहती थी. वह मुझ से प्यार न करती तो किसी और से कर लेती. लड़कियां जब घर से बाहर कदम रखती हैं तो उन के लिए लड़कों की कोई कमी नहीं होती.

हम दोनों जल्द ही एक अनैतिक संबंध में बंध गए. हमें इस बात की भी कोई परवा नहीं थी कि हम एक ही घर में रह रहे थे, जहां मेरी पत्नी और एक छोटा बच्चा था, परंतु हम सावधानी बरतते थे और अकसर एकांत में मिलने के अवसर ढूंढ़ निकालते थे.

एक दिन वह बोली, ‘‘अभय,’’ अकेले में वह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी, ‘‘हमारे संबंध ज्यादा दिनों तक किसी की नजरों से छिपे नहीं रह सकते हैं.’’

‘‘तब…?’’ मैं ने इस तरह पूछा जैसे समस्या का उस के पास समाधान था.

‘‘मुझे आप का घर छोड़ना पड़ेगा,’’ उस ने बिना हिचक के कहा.

‘‘तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी?’’ मैं आश्चर्यचकित रह गया.

‘‘नहीं, मैं केवल आप का घर छोड़ूंगी, आप को नहीं… मुझे आप दूसरा घर किराए पर दिलवा दो. हम लोग वहीं मिला करेंगे. हफ्ते में 1 या 2 बार… आपस में सलाह कर के.’’

‘‘मैं शायद इतनी दूरी बरदाश्त न कर सकूं,’’ मेरे दिल के ऊपर जैसे किसी ने एक भारी पत्थर रख दिया था. हवा जैसे थम सी गई थी. सांस रुकने लगी थी. प्यार में ऐसा क्यों होता है कि जब हम मिलते हैं तो हर चीज आसान लगती है और जब बिछड़ते हैं तो हर चीज बेगानी हो जाती है. समय भारी लगने लगता है.

उस का स्वर सधा हुआ था, ‘‘अगर आप चाहते हैं कि हमारे संबंध इसी तरह बरकरार रहें तो इतनी दूरी हमें बरदाश्त करनी ही पड़ेगी. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’

वह अपने इरादे पर दृढ़ थी और मैं उस के सामने पिटा हुआ मोहरा…पत्नी को उस ने उलटीसीधी बातों से मना लिया और वह इस प्रकार अपने कालेज के पास एक नए घर में रहने के लिए आ गई. मैं ने अपना परिचय वहां उस के स्थानीय गार्जियन के तौर पर दिया था. इस प्रकार मुझे उस के घर आनेजाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी. किसी को शक भी नहीं होता था.

परंतु अलग घर में रहने के कारण मैं मेघा से रोज नहीं मिल पाता था. औफिस की व्यस्तताएं अलग थीं. फिर घर की जिम्मेदारियां थीं. मैं दोनों से विमुख नहीं होना चाहता था, परंतु मेघा का आकर्षण अलग था. मैं उस के हालचाल जानने के बहाने छुट्टी में उस से मिलने चला जाता था. परंतु हर रविवार जाने से पत्नी को शक भी हो सकता था. कई बार तो वह भी साथ चलने को तैयार हो जाती थी. एकाध बार उसे ले कर भी जाना पड़ा था. तब मैं मन मसोस कर रह जाता था.

हमारे संबंधों के बीच अनजाने ही अनचाही दूरियां व्याप्त होती जा रही थीं. मैं उस से विरक्त नहीं होना चाहता था, परंतु शायद इन दूरियों और न मिल पाने की मजबूरियों की वजह से मेघा मुझ से विरक्त होती जा रही थी.  अब वह मेरे फोनकौल्स अटैंड नहीं करती थी, अकसर काट देती थी. कभी अटैंड करती तो उस की आवाज में बेरुखी तो नहीं, परंतु मधुरता भी नहीं होती. पूछने पर बताती, ‘‘फाइनल ऐग्जाम्स सिर पर हैं, पढ़ाई में व्यस्त रहती हूं, टैंशन रहती है.’’

उस का यह तर्क मेरी समझ से परे था. परीक्षाएं तो पहले भी आई थीं परंतु न तो कभी वह व्यस्त रहती थी, न टैंशन में. मैं जानता था, वह झूठ बोल रही थी. इस का कारण यह था कि बहुत बार जब मैं फोन करता तो उस का फोन व्यस्त होता. स्पष्ट था कि वह पढ़ाई में नहीं किसी से बातों में व्यस्त रहती थी, परंतु किस से…? यह पता करना मेरे लिए आसान न था. वह कालेज में पढ़ती थी. किसी भी लड़के से उसे प्यार हो सकता था. यह नामुमकिन नहीं था.

मैंस्वयं तनावग्रस्त हो गया. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ गया. औफिस के काम में मन न लगता. पत्नी द्वारा बताए गए कार्य भूल जाता.  ऐसी तनावग्रस्त जिंदगी जीने का कोई मकसद नहीं था. मुझे कोई न कोई फैसला लेना ही था. बहुत दिनों से मेघा से मेरी मुलाकात नहीं हुई थी. हम आपस में तय कर के ही मिला करते थे, परंतु इस बार मैं ने अचानक उस के घर जाने का निर्णय लिया.

एक शाम औफिस से मैं सीधा मेघा के कमरे में पहुंचा, 2 मंजिल का साधारण मकान था. उसी की ऊपरी मंजिल के एक कोने में वह रहती थी. जब मैं उस के मकान में पहुंचा तो वह कमरे में नहीं थी.

मैं उस के कमरे के दरवाजे पर पड़े ताले को कुछ देर तक घूर कर देखता रहा, जैसे वह मेरे और मेघा के बीच में दीवार बन कर खड़ा हो. दीवार ही तो हमारे बीच खिंच गई थी. वह दीवार इतनी ऊंची और मजबूत थी कि हम न तो उसे पार कर के एकदूसरे की तरफ जा सकते थे, न तोड़ कर.  बुझे मन से मैं सीढि़यां उतर कर गेट की तरफ बढ़ रहा था कि मकानमालिक मनदीप सिंह अचानक अपने ड्राइंगरूम से बाहर निकले और तपाक से बोले, ‘‘अभयजी, आइए, कहां लौटे जा रहे हैं? बड़े दिन बाद आए? सब ठीक तो है?’’

जबरदस्ती की मुसकान अपने चेहरे पर ला कर मैं ने कहा, ‘‘हां मनदीपजी, सब ठीक है. आप कैसे हैं?’’

‘‘मैं तो चंगा हूं जी, आप अपनी सुनाइए. मेघा से मिलने आए थे?’’ उन्होंने उत्साह से कहा, परंतु मेरे मन में खुशियों के दीप नहीं खिल सके.

‘‘हां,’’ मैं ने भारी आवाज में कहा, ‘‘कमरे में है नहीं,’’ मैं ने इस तरह कहा, जैसे मैं जानना चाहता था कि वह कहां गई है.

‘‘आइए, अंदर बैठते हैं,’’ वे मेरा हाथ पकड़ कर अंदर ले गए. मुझे सोफे पर बिठा कर खुद दीवान पर बैठ गए और जोर से आवाज दे कर बोले, ‘‘सुनती हो जी, जरा कुछ ठंडागरम लाओ. अपने अभयजी आए हुए हैं.’’

‘‘लाती हूं,’’ अंदर से उन की पत्नी की आवाज आई. मैं चुप बैठा रहा. मनदीप ने ही बात शुरू की, ‘‘मैं तो आप को फोन करने ही वाला था,’’ वे जैसे कोई रहस्य की बात बताने जा रहे थे, ‘‘अच्छा हुआ आप खुद ही आ गए. आप बुरा मत मानना. आप मेघा के लोकल गार्जियन हैं. जरा उस पर नजर रखिए. उस के लक्षण अच्छे नहीं दिख रहे.’’

‘‘क्यों? क्या हुआ?’’ मेरे मुख से अचानक निकल गया.

‘‘वही बताने जा रहा हूं. आजकल उस का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा. शायद प्यारव्यार के चक्कर में पड़ गई है.’’

‘‘क्या?’’ मुझे विश्वास नहीं हुआ. मेघा का मेरे प्रति जिस प्रकार का समर्पण था, उस से नहीं लगता था कि वह देहसुख की इतनी भूखी थी कि मुझे छोड़ कर किसी और से नाता जोड़ ले, परंतु लड़कियों के स्वभाव का कोई ठिकाना नहीं होता. क्या पता कब उन्हें कौन अच्छा लगने लगे?

‘‘हां जी,’’ मनदीप ने आगे बताया, ‘‘एक लड़का रोज आता है. उसी के साथ जाती है और देर रात को उसी के साथ वापस आती है. छुट्टी वाले दिन तो लड़का उस के कमरे में ही सारा दिन पड़ा रहता है. मैं ने 1-2 बार टोका, तो कहने लगी, उस का क्लासमेट है और पढ़ाई में उस की मदद करने के लिए आता है, परंतु भाईसाहब मैं ने दुनिया देखी है. उड़ती चिडि़या देख कर बता सकता हूं कि कब अंडा देगी. अकेले कमरे में घंटों बैठ कर एक जवान लड़का और लड़की केवल पढ़ाई नहीं कर सकते.’’

मेरे दिमाग में एक धमाका हुआ. लगा कि दिमाग की छत उड़ गई है. कई पल तक सांसें असंयमित रहीं और मैं गहरीगहरी सांसें लेता रहा.

तो यह कारण था मेघा का मुझ से विमुख होने का. अगर उस की जिंदगी में कोई अन्य पुरुष या युवक आ गया था तो यह कोई अनहोनी नहीं थी. वह जवान और सुंदर थी, चंचल और हंसमुख थी. उसे प्यार करने वाले तो हजारों मिल जाते, परंतु मुझे उस की तरह प्यार देने वाली दूसरी मेघा तो नहीं मिल सकती थी. काश, मेघों की तरह वह मेरे जीवन में न आती, मल्हार बन कर आती तो मैं उस की मधुर धुन को अपने हृदय में समा लेता. फिर मुझे उस से बिछड़ जाने का गम न होता.

मनदीप के घर पर मैं काफी देर तक बैठा रहा. ठंडा पीने के बाद इसी मुद्दे पर काफी देर तक बातें होती रहीं. उन की पत्नी बोली, ‘‘भाईसाहब, आप मेघा को समझाइए. वह मांबाप से दूर रह कर पढ़ाई कर रही है. प्यारमुहब्बत के चक्कर में उस का जीवन बरबाद हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन भाभीजी, यह उस का कुसूर नहीं है. जमाना ही कुछ ऐसा आ गया है कि हर दूसरा लड़कालड़की किसी न किसी के साथ प्यार किए बैठे हैं. यह आधुनिक युग का चलन है. किसी पर अंकुश लगाना संभव नहीं है.’’

‘‘आप बात तो ठीक कहते हैं परंतु उसे समझाने में क्या हर्ज है? एक बार पढ़ाई पूरी कर ले, फिर जो चाहे करे. मांबाप की उम्मीदें, उन का भरोसा, उन का दिल तो न तोड़े.’’

‘‘मैं उसे समझाने का प्रयास करूंगा,’’ मैं ने उन से कह तो दिया, परंतु मैं अच्छी तरह जानता था कि मेघा से अब मेरी कभी मुलाकात नहीं होगी. मेरे मन के आसमान में अब किसी मेघ के लिए जगह नहीं थी.

उस दिन मन बड़ा उदास रहा. बीवी ने पूछा तो काम का बहाना बना दिया. रात लगभग 11 बजे मेघा का फोन आया. मैं ने नहीं उठाया, पता नहीं मैं गुस्से में था या उस से नफरत करने लगा था. उस ने अचानक फोन क्यों किया था, यह मैं अच्छी तरह समझ रहा था. मनदीप ने उसे मेरे उस के यहां आने की बात बताई होगी. उसे भय होगा कि मैं उस के बारे में सबकुछ जान गया हूं. परंतु उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं थी. आज के बाद मुझे उस के किसी भी काम से कुछ लेनादेना नहीं था. मैं उस के जीवन में दखल देने वाला नहीं था.

मैं ने मोबाइल साइलैंट मोड पर रख दिया, ताकि घंटी की आवाज से मुझे परेशानी न हो और पत्नी के अनावश्यक सवालों से भी मैं बचा रहूं.

रात में नींद ठीक से तो नहीं आई परंतु इस बात का सुकून अवश्य था कि एक बोझ मेरे मन से उतर गया था.

सुबह देखा तो मेघा की 19 मिस्डकाल थीं. शायद बहुत बेचैन थी मुझ से बात करने के लिए. मेरे मन में जैसे खुशी का एक दरिया उमड़ आया हो. जो हमें दुख देता है, उसे दुखी देख कर हम सुख की अनुभूति करते हैं. यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है.

गृहशोभा विशेष

मेघा ने एक मैसेज भी किया था, ‘मैं आप से मिलना चाहती हूं.’ मैं ने इस का कोई जवाब नहीं दिया. मैं उसे उपेक्षित करना चाहता था. प्यार के मामलों में ऐसा ही होता है. एक बार मन उचट जाए तो मुश्किल से ही लगता है.

मैं ने मेघा की उपेक्षा की और उस का फोन अटैंड नहीं किया, न उसे कोई मैसेज भेजा, तो उस ने मेरी पत्नी अनीता को फोन किया. उन दोनों के बीच क्या बातें हुईं, इस का तो पता नहीं, परंतु अनीता ने मुझ से पूछा, ‘‘मेघा से आप की कोई बात हुई है क्या?’’

‘‘क्या?’’ मैं उस का आशय नहीं समझा.

‘‘बोल रही थी कि आप उस से नाराज हैं.’’

‘‘अच्छा, मैं उस से क्यों नाराज होने लगा. उसे खुद ही वक्त नहीं मिलता मुझ से बात करने का. वह मेरा फोन भी अटैंड नहीं करती. उस के पंख निकल आए हैं,’’ मैं ने तैश में आ कर कहा. अनीता हैरानी से मेरा मुख निहारने लगी. मेरा चेहरा तमतमा रहा था और उस में कटुता के भाव आ गए थे.

‘‘ऐसा क्या हो गया है? इतनी प्यारी लड़की…’’ अनीता पता नहीं क्या कहने जा रही थी, परंतु मैं ने उस की बात बीच में ही काट दी, ‘‘हां, बहुत प्यारी है. उस के लक्षण तुम नहीं जानतीं. पता नहीं किसकिस के साथ गुलछर्रे उड़ाती फिर रही है.’’

‘‘अच्छा,’’ अनीता के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुसकराहट बिखर गई, ‘‘आप को उस से इस बात की शिकायत है कि वह दूसरों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है. आप के साथ उड़ाती तो ठीक था, तब आप गुस्सा नहीं करते.’’

क्या अनीता को मेरे और मेघा के संबंधों के बारे में पता चल गया है? मैं ने गौर से उस का चेहरा देखा. ऐसा तो नहीं लग रहा था. अनीता सामान्य थी और उस के चेहरे पर भोली मुसकान के सिवा कुछ न था. अगर उसे पता होता तो वह इतने सामान्य ढंग से मेरे साथ पेश नहीं आती. मेरे दिल को राहत मिली.

‘‘छोड़ो उस की बातें, वह अच्छी लड़की नहीं है बस,’’ मैं ने बात को टालने के इरादे से कहा.

‘‘अरे वाह, जब तक हमारे घर में थी, हम सब से हंसतीबोलती थी, तब तक वह एक अच्छी लड़की थी. जब वह दूर चली गई और आप से उस का मिलनाजुलना कम हो गया, तो वह खराब लड़की हो गई,’’ अनीता के शब्दों में कटाक्ष का हलका प्रहार था.

मुझे फिर शक हुआ. शायद अनीता को सबकुछ पता है या यह केवल मेरा शक है. अगर पता है तो मेघा ने ही आजकल में पिछली सारी बातें अनीता को बताई होंगी. मेरे दिल में खलबली मची हुई थी, परंतु मैं अनीता से कुछ पूछने का साहस नहीं कर सकता था. अभी तक हमारे दांपत्य जीवन में कोई कटुता नहीं आई थी और मैं नहीं चाहता था कि जिस संबंध को मैं खत्म करना चाहता था, उस की वजह से मेरे सुखी घरपरिवार में आग लग जाए.

‘‘मैं उस के बारे में बात नहीं करना चाहता,’’ कह कर मैं उठ कर दूसरे कमरे में चला आया. अनीता मेरे पीछेपीछे आ गई और चिढ़ाने के भाव से बोली, ‘‘भागे कहां जा रहे हैं? सचाई से कहां तक मुंह मोड़ेंगे? आप मर्दों को घर भी चाहिए और बाहर की रंगीनियां भी. यह तो हम औरतें हैं, जो घर की सुखशांति के लिए अपना स्वाभिमान और व्यक्तिगत सुख भूल जाती हैं.’’

मैं पलटा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘मतलब बहुत साफ है. मेघा ने बहुत पहले ही मुझ से आप के साथ अपने संबंधों का खुलासा कर दिया था. वह जवानी के आंगन में खड़ी एक भावुक किस्म की लड़की है. दुनिया के चक्करदार रास्तों में वह भटक रही थी कि आप उसे मिल गए. हर लड़की एक पुरुष में पिता और प्रेमी दोनों की छवि देखना चाहती है. आप में उस ने एक संरक्षक की छवि देखी और इसी नाते प्यार कर बैठी. बाद में उसे पछतावा हुआ तो घर छोड़ कर चली गई. आप से दूर होने के लिए आवश्यक था कि वह किसी लड़के से दोस्ती कर ले ताकि वह पिछली बातें भूल सके. बस, इतनी सी बात है,’’ अनीता ने कहा.

मैं अवाक् रह गया. अनीता को सब पता था और उस ने आज तक इस बारे में बात करनी तो दूर, मुझ पर जाहिर तक नहीं किया और मैं काठ के उल्लू की तरह 2 औरतों के बीच बेवकूफ बना फिरता रहा.  मेरी नजर में अनीता की छवि एक आदर्श पत्नी की थी, तो मेघा की छवि उस बादल की तरह जो वर्षा कर के दूसरों की प्यास तो बुझाते हैं परंतु खुद प्यासे रह जाते हैं. अनीता के सामने मैं नतमस्तक हो गया.

किसी एक जगह नहीं ठहरते. ये निरंतर चलते रहते हैं और बरस कर तपती हुई धरा को तृप्त करते हैं, मानव जीवन को सुखमय बनाते हैं. उसी प्रकार मेघा भी चंचल और चलायमान थी. वह बहुत अस्थिर थी और ढेर सारा प्यार न केवल बांटना चाहती थी, बल्कि सब से पाना भी चाहती थी.

वह मेरे जीवन में आई और अपने प्यार की वर्षा से मुझे तृप्त कर गई. उतना ही प्यार मेरे जीवन में लिखा था. अब वह किसी और को अपना प्यार बांट रही थी. आप बताइए, क्या उस ने मेरे साथ विश्वासघात किया था?

काश, वह मेघमल्हार होती और मैं उसे आजीवन सुना करता.

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