गृहशोभा विशेष

“तुम कोई भी काम ठीक से कर सकती हो या नहीं? सब्जी में नमक कम है, दूध में चीनी ज्यादा है और रोटियां तो ऐसी लग रही हैं जैसे 2 दिन पहले की बनी हों,’’ अजय इतनी जोर से चिल्लाया कि रसोई में काम कर रही उस की पत्नी आभा के हाथ से बरतन गिर गए. बरतनों के गिरते ही अजय का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘जाहिल औरत, किसी भी काम को करने का सलीका नहीं है. कहने को एमए पास है, नौकरी करती है, पर है एकदम गंवार.’’

‘‘कभी अपने अंदर भी झांक कर देखो कि तुम कैसे हो. हर समय झगड़ा करते रहते हो. बात करने तक का सलीका तुम में नहीं है. माना मैं बुरी हूं पर अपने 10 साल पुराने दोस्त विक्रम से किस तरह रूठे हुए हो, यह सोचा है कभी. वह

6 बार घर आ चुका है, पर उस से बात करना तो दूर तुम उस से मिले तक नहीं. ऐसे नहीं निबाहे जाते रिश्ते, उन के लिए त्याग करना ही पड़ता है,’’ आभा औफिस जाने के लिए तैयार होते हुए बोली.

उन की शादी को 2 साल हो गए थे, पर एक भी दिन ऐसा नहीं गया था जब अजय ने झगड़ा न किया हो.

‘‘मुझ से ज्यादा बकवास करने की जरूरत नहीं है. मुझे किसी की परवाह नहीं है. तुम अपनेआप को समझती क्या हो? यह भाषण देना बंद करो.’’

‘‘मैं भाषण नहीं दे रही हूं अजय, सिर्फ तुम्हें समझाने की कोशिश कर रही हूं कि हमेशा अकड़े रहने से कुछ हासिल नहीं होता. ऐसा कर के तो तुम हर किसी को अपने से

दूर कर लोगे. इंसान को अपनी गलती भी माननी चाहिए.’’

‘‘बड़ी आई मुझे समझाने वाली. मुझे सीख मत दो. मैं कभी कोई गलती नहीं करता और अगर तुम्हें इतनी ही दिक्कत हो रही है

तो तुम भी जा सकती हो. मुझे किसी की परवाह नहीं,’’ बड़बड़ाते हुए वह घर से बाहर निकल गया.

आभा सकते में आ गई. क्या कह गया था अजय. वह 2 वर्षों से उसे बरदाश्त कर रही थी, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि अजय के स्वभाव में कभी तो बदलाव आएगा और वह रिश्तों की कद्र करना सीख जाएगा. लेकिन अजय था कि हर किसी से लड़ाई करने को तैयार रहता था. कोई भी बात अगर उस के मन की नहीं होती थी तो वह भड़क उठता था. लेकिन आज तो हद ही हो गई थी. आखिर वह कहना क्या चाहता था? आभा कुछ देर तक खड़ी सोचती रही और फिर उस ने निर्णय करने में पल भर की भी देर नहीं की.

अजय औफिस से फिल्म देखने चला गया. फिर रात को देर से घर लौटा तो घर उस समय अंधेरे में डूबा हुआ था. यह देख उसे झल्लाहट हुई.

‘‘पता नहीं क्या समझती है अपनेआप को. मेरे आने से पहले ही सो गई. कम से कम बालकनी की ही लाइट जला कर छोड़ देती,’’ अपनी आदत के अनुसार अजय बड़बड़ाया. फिर काफी देर तक कालबैल बजाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. आभा घर पर नहीं थी. हर तरफ एक सन्नाटा बिखरा हुआ था. ऐसा पहली बार हुआ था कि आभा उस के आने के समय घर पर न हो. तो क्या आभा सचमुच घर छोड़ कर चली गई है? पल भर को उसे अजीब लगा, लेकिन फिर वह सामान्य हो गया, ‘‘हुंह,

जाती है तो जाए, मैं उस के नखरे तो उठाने से रहा. अपनेआप 1-2 दिन में वापस आ जाएगी,’’ वह बड़बड़ाया और उस रात भूखा ही सो गया.

दिन, हफ्ते और फिर महीने बीतते गए पर आभा नहीं लौटी, न ही अजय ने उसे बुलाने की कोशिश की. इस बीच उस ने विक्रम को कई बार फोन किया, पर उस ने बिना बात किए ही फोन काट दिया. औफिस के अपने एक सहयोगी से जब उस ने विक्रम के व्यवहार के बारे में जिक्र किया तो वह मुसकराया और अपनी सीट पर जा कर बैठ गया. जब दूसरे सहयोगी ने उस के मुसकराने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘हमारे अजय को यह नहीं पता कि अपने जीवन से दोस्त को तो एकबारगी हटाना आसान है, पर अगर पत्नी ही चली जाए तो फिर दोस्त ही क्या किसी भी रिश्ते को संभाल कर रखना मुश्किल हो जाता है. अब देखना हर कोई इस से मुंह मोड़ लेगा.’’

आभा के जाने के बाद शुरूशुरू में तो अजय को अपनी आजादी बहुत अच्छी लगी. जब दिल करता घर आता, होटल में खाना खाता और सुबह देर तक सोता. लेकिन धीरेधीरे उसे घुटन सी होने लगी. रात को अंधेरे और सन्नाटे में डूबे घर में लौटना, खुद कच्चापक्का बनाना और अकेले बैठे टीवी देखते रहना. अब आभा तो थी नहीं, जिस पर वह अपनी झुंझलाहट उतारता, इसलिए कामवाली पर ही अपनी खीज उतारता. कभी उस के देर से आने पर तो कभी घर ठीक से साफ न करने पर.

कामवाली मालकिन के जाने के बाद अकेले साहब के लिए काम करने से कतरा

रही थी. उस ने एक दिन यह कह कर काम छोड़ दिया कि घर में कोई औरत नहीं है, इसलिए मेरे मर्द ने यहां काम करने से मना कर दिया है.

क्या करता अजय, उस ने एक लड़का नौकर रखा जो सारा दिन घर पर रहता था. लेकिन वह जितना सामान लाता था, वह कम पड़ने लगा. आज यह नहीं है, वह नहीं है, कह कर वह अजय की जान खाए रहता. उस के पड़ोसी उसे 1-2 बार चेतावनी भी दे चुके थे कि तुम्हारा नौकर दिन में अपने जानपहचान वालों को यहां बैठाए रखता है, पर अजय को लगा था कि उस पड़ोसी को उस के नौकर रखने से शायद जलन हो रही है.

एक दिन तबीयत खराब होने की वजह से अचानक अजय घर आया तो देखा कि उस के बैडरूम में नौकर एक लड़की के साथ है. यह देखते ही वह क्रोध से भड़क उठा और उस ने नौकर को घर से बाहर निकाल दिया.

अकेलापन उस पर हावी होने लगा था. उस ने कई बार अपनी मां से कहा कि वे उस के पास आ कर रह लें, पर उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, मेरी तबीयत खराब रहती है, उस पर से बहू भी नहीं है. कौन देखभाल करेगा मेरी? बेकार में मेरे आने से तेरा काम बढ़ जाएगा.’’

यहां तक कि अजय की बहनें, जो भाभी के होने पर महीने में 2-3 बार चक्कर लगा जाती थीं, उन्होंने भी आना छोड़ दिया. वे कहतीं कि भैया, अपनी ही गृहस्थी से फुरसत नहीं मिलती, अब वहां आ कर भी खाना बनाओ, यह बस में नहीं. भाभी थीं तो आराम था, सब कुछ तैयार मिलता था और हम भी मायके में 2-4 दिन चैन से बिता लेते थे. अजय उन की बातें सुन कर चिढ़ जाता था और उन्हें भी खरीखोटी सुना देता था, लेकिन अकेलेपन और नीरसता के समुद्र में डुबकी लगाने के कारण वह खामोशी से उन की बातें सुन लेता. उस का दिल रोने को होता.

आभा ने कैसे कुशलता और प्यार से सारे रिश्तों को जोड़ा हुआ था. तभी तो उस के जाने के बाद उस के अपनों ने ऐसे मुंह मोड़ा मानो वे आभा के रिश्तेदार हों. कुछ घंटों के लिए बहुत आग्रह करने पर बूआ आईं तो बहुत उदास होते हुए बोलीं, ‘‘अब मन नहीं करता तेरे घर आने को. मेरी बातें तुझे बुरी लग रही होंगी पर सच तो यह है कि तेरा लटका हुआ मुंह देखने को कौन आएगा? आभा थी तो कितनी आवभगत करती थी.

चाहे कितनी भी थकी हुई हो, पर कभी मुंह नहीं बनाती थी. औरत से ही घर होता है बेटा. वह नहीं तो जीवन बेकार हो जाता है. यारदोस्त, रिश्तेदार, सगेसंबंधी कब तक और कितना साथ देंगे? साथ तो पत्नी ही अंत तक निभाती है. पतिपत्नी की आपस में चाहे कितनी भी लड़ाई क्यों न हो जाए, पर वही ऐसा संबंध है, जो जीवन भर कायम रहता है.’’

क्या कहता अजय और कैसे रोकता उन्हें. उसे लगा कि बूआ सचमुच उसे आईना दिखा गई हैं. पिछले 6 महीनों में वह इतनी तकलीफ सह चुका था कि उस की अकड़ हवा हो चुकी थी.

होटल का खाना खातेखाते वह तंग आ चुका था और नौकर कोई घर पर टिकता नहीं था. उस ने यह सोच कर अपने दोस्त पीयूष को फोन किया कि आज रात उस के घर खाना खा लेगा. पर उस ने कहा, ‘‘यार, मेरे पिता की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए आज तो संभव नहीं हो पाएगा. मैं तुझे खुद फोन कर के बुलाऊंगा किसी दिन.’’

क्या करता अजय, रेस्तरां में ही खाने गया. वहां देखा कि पीयूष अपने परिवार के साथ आया हुआ है. एक कसक सी उठी उस के मन में कि उस के दोस्त भी उसे घर नहीं बुलाना चाहते.

पीयूष ने भी उसे देख लिया था, इसलिए अगले दिन फोन कर के उस से बोला, ‘‘यार, क्या करूं, तेरी भाभी कहती है कि अजय अकेला आ कर क्या करेगा. उसे

भी बहुत अनकंफर्टेबल फील होता है. आभा थी तो उसे कंपनी मिल जाती थी. ट्राई टू अंडरस्टैंड, फैमिली वाले घर में अकेले आदमी का आना जरा अखरता है. आई होप तू माइंड नहीं करेगा.’’

अब वह पहले वाला अजय तो रहा नहीं था, जो बुरा मानता. अकेलापन, दिनरात का तनाव और ठीक से खाना न मिल पाने के कारण उस की सेहत लगातार गिरती जा रही थी. आए दिन उसे बुखार हो जाता. उसे महसूस हो रहा था कि थकावट उस के शरीर में डेरा डाल कर बैठ गई है.

बाहर का खाना खाने और पानी पीने से उस के लिवर पर असर हो गया था. अब हालत यह थी कि वह कुछ भी खाता तो उसे उलटी हो जाती या फिर पेट दर्द से वह कराहने लगता. डाक्टर का कहना था कि उसे जौंडिस हो सकता है. तब से उसे लगने लगा  था कि उस की जिंदगी की तरह जैसे हर चीज पीली और मटमैली सी हो गई है.

उस की हालत पर तरस खा कर एक दिन पीयूष अपनी बीवी सहित उस से मिलने आया. उस की बीवी चाय बनाने रसोई में गई तो देखा हर चीज अस्तव्यस्त है. बदबू से परेशान वह चाय की पत्ती ढूंढ़ती रही. हार कर अजय को ही उठ कर चाय बनानी पड़ी. फुसफुसाते हुए वह पीयूष से बोली, ‘‘यहां मैं और एक पल के लिए भी नहीं ठहर सकती. घर है या कूड़े का ढेर.’’

अजय ने सुना तो मनमसोस कर निढाल हो कर पलंग पर लेट गया. किस से शिकायत करता, गलती तो उस की ही थी. आभा को कब उस ने मान दिया था. हर समय उसे दुत्कारता ही तो रहता था. उस के जाने के बाद हर किसी ने उस से मुंह मोड़ लिया था. आखिर क्यों कोई उसे बरदाश्त करे. एक वही थी, जो उस की हर ज्यादती को सह कर भी उस की परवाह करती थी. हर काम उसे परफैक्ट ढंग से किया मिलता था. पर तब वह कमियां ढूंढ़ता रहता था.

उस का गला सूख रहा था. जैसेतैसे उठा तो सामने लगे शीशे पर उस की नजर गई. आंखें अंदर धंस गई थीं, दाढ़ी बढ़ गई थी और दुर्बल शरीर से निकली हड्डियां जैसे उस की बेबसी का उपहास उड़ा रही थीं. पसीने से नहा उठा वह. सारी खिड़कियां

खोल दीं और पानी पीने के लिए फ्रिज खोला. खाली फ्रिज उस का मुंह चिढ़ा रहा था. उस की रोशनी को देख डर से उस ने आंखें बंद कर लीं.

उसे याद आया आज सुबह उस ने पीने का पानी भरा ही नहीं था. कांटे उस के गले

में चुभने लगे और वह उस चुभन के साथ रसोई में खड़ा पीली हो गई दीवारों को देखने लगा. यह पीलापन उसे धीरेधीरे अपने शरीर और मन पर हावी होता महसूस हुआ. उसे लगा उस की बोझिल पलकों पर मानो पीली दीवारें कतराकतरा उतर रही थीं.

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