सौरी पापा

17 June 2017
सौरी पापा

विचारों के भंवर में डूबतेउतराते अमन की पलकें भीग गईं. उस की जिंदगी को तो झंझावातों ने घेर रखा था. शुभि, उस की प्यारी सी बेटी...उस के दिल का टुकड़ा जिसे वह बेइंतहा प्यार करता था, स्याह अंधियारों में भटक रही थी और वह हर संभव कोशिश कर के भी उसे उजाले की ओर नहीं खींच पा रहा था.

रोज की तरह आज सुबह वह औफिस गया था. अभी वह अपनी टेबल पर बैठा जरूरी काम निबटा रहा था कि उस के पड़ोसी राजीव का फोन आ गया, ‘अमनजी, आप की बेटी शुभि की तबीयत अचानक खराब हो गई है. आप औफिस से सीधे सिटी अस्पताल पहुंचिए. हम शुभि को ले कर वहीं पहुंच रहे हैं.’

काल रिसीव करते समय उस ने मोबाइल कस कर न पकड़ा होता तो वह उस के हाथ से फिसल कर नीचे गिर गया होता. उस का दिमाग एकाएक सुन्न हो गया था.

किसी से बिना कुछ कहेसुने वह दौड़ता हुआ औफिस से बाहर आया और कार स्टार्ट कर फुल स्पीड पर दौड़ा दी. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि रास्ते में कहीं लालबत्ती नहीं मिली. मिलती तो भी वह सारे नियमकायदों को तोड़ता हुआ निकल जाता. इस वक्त वह जिस मनोस्थिति में था उस में जैसे भी हो मौत से संघर्ष करती शुभि के करीब जल्दी से जल्दी पहुंचने के अलावा कोई विकल्प नहीं था उस के पास.

सिटी अस्पताल के इमर्जैंसी वार्ड के बाहर कालोनी में रहने वाले अमन के शुभचिंतकों की खासी भीड़ जमा थी. उसे देखते ही राजीव लपक कर उस के पास आ कर बोला, ‘‘हम ठीक वक्त पर यहां पहुंच गए थे. डाक्टरों ने उपचार शुरू कर दिया है. अब चिंता की कोई बात नहीं है.’’

‘‘आप लोगों का यह उपकार मैं जिंदगीभर नहीं भूलूंगा,’’ वह भर्राए कंठ से हाथ जोड़ कर बोला.

‘‘आप हमें शर्मिंदा कर रहे हैं,’’ राजीव ने प्रतिरोध किया, ‘‘पड़ोसी होने के नाते यह तो हमारा फर्ज था.’’

आसपड़ोस में अच्छा व्यवहार रखने की अहमियत आज ठीक से समझ आ गई थी उसे. संकट की इस घड़ी में ये लोग साथ न होते तो पता नहीं क्या होता. उस का हलक सूखने लगा.

‘‘मैं शुभि को एक नजर देखना चाहता हूं,’’ उस ने राजीव से फरियाद की. लाख कोशिशों के बावजूद उस की आंखें झरने लगी थीं.

‘‘अभी यह ठीक नहीं होगा. डाक्टरों ने किसी को भी अंदर जाने से मना कर दिया है,’’ राजीव सहानुभूति से उस का हाथ दबा कर बोला, ‘‘प्लीज, संभालिए अपनेआप को. आप इस तरह होश खो देंगे तो आप की पत्नी का क्या होगा? उन का तो पहले से ही रोरो कर बुरा हाल हो गया है.’’

‘‘कहां है नेहा?’’ अमन चारों ओर देखता हुआ भरे स्वर में बोला.

राजीव उसे गैलरी के अंत तक ले गया. वहां कोने में पड़ी बैंच पर नेहा आंखें बंद किए अधलेटी सी बैठी थी. उस के गालों पर बहती ताजा आंसुओं की लकीर बता रही थी कि ऊपर से शांत सागर के भीतर ज्वारभाटे के कितने तूफान चल रहे थे.

अमन ने अपना कांपता हाथ नेहा के सिर पर रखा. नेहा की पलकों में हलकी सी जुंबिश हुई. अमन को देखते ही वह बिजली की गति से उठी और उस से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘थोड़ा सा जहर ला कर मुझे भी खिला दो.’’

वह जड़ हो कर रह गया.

‘‘मुझे मेरी बेटी सहीसलामत चाहिए,’’ वह हिचकियों के बीच बोली, ‘‘उसे कुछ हो गया तो मैं भी जीवित नहीं रहूंगी.’’

‘‘सब्र करो, नेहा. अभीअभी डाक्टर साहब से बात हुई है मेरी. वे बता रहे थे कि शुभि बिलकुल ठीक है. थोड़ी देर में हम उस के पास होंगे,’’ उस की विक्षिप्त सी हालत देख कर वह बड़ी मुश्किल से बोल पाया. य-पि किसी अनहोनी की आशंका से वह खुद कांप रहा था. सबकुछ घूमता हुआ सा लग रहा था उसे, फिर भी नेहा की खैरियत के लिए सफेद झूठ बोल गया था अमन.

‘‘सच कह रहे हैं आप,’’ उस की आंखों में निश्चयअनिश्चय के भाव घुमड़ने लगे थे.

‘‘बेटी की जितनी फिक्र तुम्हें है उतनी मुझे भी है. मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा.’’

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