अजीअब अकेले में भी गुफ्तगू न कर सके तो लानत है ऐसी मर्दानगी पर और वैसी नाइटी वाली मुहतरमा के जुल्म ढाने वाले लापरवाह हुस्न पर. हम तो समझा करते थे नाइटी का मतलब-बेमतलब पोशाकों की उधेड़बुन से बच कर सस्ता टिकाऊ आवरण, जो स्त्री के लिए पहनना आसान भर हो. भई, हमें क्या मालूम था कि नाइटी की नटी हमारे जीवन में यों नाट्य भर जाएगी.

हमारी कयामत, जबान फिसल गई जी जरा. हमारी हुस्ने मलिका यानी हमारी श्रीमतीजी तो चौबीसों घंटे साड़ी में यों लिपटी रहती हैं जैसे खोल में गद्देदार तकिया. हिलाओडुलाओ तब भी न सरके.

अब बेचारी हमारी आंखें बटन तो नहीं. तरसती रहती हैं हुस्ने शबाब में गोते लगाने को. अब आप ही बताएं कि अगर ये दीदार वाली आंखें न हों तो हुस्न का काम ही क्या?

अजी साहब गुस्ताखी माफ. आज दरअसल बोलने का या कहूं श्रीमतीजी के पड़ोस में जाने से लिखने का मौका मिल गया तो हम भी बुक्का फाड़ के अपने दिल की निकालने लग पड़े.

सब्र का भी बांध होता है कोई जी. हर वक्त अब तो श्रीमतीजी का पहरा ही लग गया है हम पर. ‘यहां बालकनी में क्या कर रहे हो?’, ‘यहां छत पर क्या कर रहे हो?’, ‘खिड़की में क्या कर रहे हो?’, ‘दरवाजे पर क्या कर रहे हो?’ अजी इतना पूछेंगी तो हम भी न सोचेंगे कि आखिर है क्या इधर जो इतनी रोकटोक?

अब दिल तो बच्चा है न जी. सो हम ने भी बालकनी से, छत से, खिड़की से, दरवाजे से, आखिर वह राज जान ही लिया, जो हमारी कयामत श्रीमतीजी (लाहौल वला कूबत) ने छिपा कर रखना चाहा था.

चलो, अब और पहेलियां न बुझाएं वरना आप हम से खार खा जाओगे.

तो हुआ यों कि इस नई बसीबसाई सुसंस्कृत कालोनी के सिस्टम से बने सारे

बंगलों में से चुनचुन कर हमारे ही नए बंगले के सामने वाले बंगले में एक नवविवाहित जोड़ा रहने आया.

इन की शादी को मुश्किल से 4 महीने हुए होंगे. पहलेपहल तो इन दोनों की चुटिया तक न दिखती थी, मगर अब कुछ दिनों से तो हमारे पौबारह हैं. जब चाहो नजरें सेंक लो. सुना है लड़के के धनकुबेर ससुरजी से दामादबेटी को यह बंगला हासिल हुआ है. इस पतिपत्नी की उम्र करीब 25-30 के बीच होगी. उन के पतिदेव तो जाते अलसुबह चाकरी पर और हम जाते औफिस 10 बजे.

हमारी तकिए की खोल वाली मलिका खैर करें हमारी श्रीमतीजी जब तक रसोई में बरतन खटकातीं, हम अखबार पर आंखें रखते ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ के जुमले को चरितार्थ करते नजरों की भागदौड़ को मनमरजी भागने देते हैं. बेचारे एक ही कालकोठरी के गुलाम, कभीकभी दिल बिदक जाए तो कुसूर ही क्या.

तो बिदकते हुए वह हमारे सामने वाले बंगले की नवयौवना, नवप्रफुल्लिता, नवसमर्पिता के हृदय कोष्ठ तक पहुंच गया, जो सागर की दुर्दांत लहरों की तरह उछलउछल कर बरसों तक एक ही गागर का पानी पीतेपीते थक चुके नवरस के प्यासे को आलिंगन में भरने को उतावला हुआ जाता था.

40 पार के अधखाए इस गुठली सर्वस्व आम जैसे आम व्यक्ति के लिए यह तो वाकईर् बड़ी बात थी. सुदर्शना घर पर रहते वक्त बालकनी में, छत पर, खिड़की पर, दरवाजे पर यानी हर उस जगह पर जहांजहां मुझ पर पहरे थे, नाइटी में ही दिखती थीं.

 

एक से बढ़ कर एक नाइटी. कभी झीनी मिनी नाइटी, कभी स्लीवलैस नाइटी, कभी बैकलैस नाइटी, फुग्गेदार बांहों वाली फ्रंट कट नाइटी, कभी सुराहीदार कमर में लिपटी बलखाती नाइटी, कभी चिकने पैरों से नजरें फिसलाती नाइटी. इन रसास्वादन में डूब कर हम मन ही मन बटन बन चुकी आंखों से कुछकुछ दिवास्वप्न देखने लग गए थे. अब गुस्ताखी तो थी, मगर अपनी श्रीमतीजी से कह दें कि अजी तुम भी कुछ बदनउघाड़ू झीनी मिनी नाइटी पहन कर हमारे तनमन पर तितली जैसी उड़ चलो तो वे झाड़ू से हमारा जहर न झाड़ दें और तितली की तो क्या, कहीं गैंडे जैसी हमारे सिर पर सवार हो गईं तो लेने के देने न पड़ जाएं? ख्वामख्वाह ही कयामत नहीं बोलतेजी.

खैर, अब जब 50 मीटर की दूरी से दीदारे हुस्न ज्यादा ही मन को तरसाने लगा तो सोचा क्यों न पड़ोसी होने के नाते कुछ वादसंवाद ही स्थापित कर लिया जाए. सो हम ने श्रीमतीजी को ‘दिखाने के दांत’ बना कर साथ ले चलना ठीक समझा. ऐसे भी ठीक न समझ कर करते भी क्या?

उन के हुक्म के बिना हमारा तो पत्ते सा शरीर भी नहीं हिलता. तो ‘दिखाने के दांत’ के साथ जैसे ही हम उन के घर के दरवाजे पर पहुंचे हमारी सांसें तो थमने को हो गईं.

गोरी नारी छरहरे बदन पे मृदुल मांसल काया,

चपलाचंचला तू कामिनी, तेरी नाइटी की अजब माया.

मुखर यामिनी, मृदुहासिनी, मधुभाषिणी… हम तो सरपट कवि हुए जा रहे थे.

हमारी जबान ने जिस बात पर अब तक ताला जड़ रखा था वह बात भी अब खुशी के मारे हमारे फूले गुब्बारे से मुंह से बाहर निकलने लग पड़ थी. क्या है कि हमारी श्रीमतीजी की काया, काया क्या कहें साड़ी में लिपटी भैंसन सी पहलवानी तगड़ी काया के आगे बढ़ हम कभी एक छटांक भर का स्वप्न भी देखने की हिम्मत न कर पाए थे. मगर अब तो इस नाइटी की रासलीला ने हमारे अंदर साहस का दरिया ही नहीं पूरा समंदर भर दिया था कि अब हम इस आग के समंदर में बेझिझक तैरने वाले थे.

शाम हो चली थी. इच्छा तो नहीं थी कि उस स्वप्नसुंदरी के पतिदेव भी पधार जाएं, लेकिन जिस तरह ‘दिखाने के दांत’ हम साथ ले कर गए थे, वैसे ही उस के भी पहरेदार साथ हों तो जरा ‘रोके न रुकेगी’ वाली फील आ ही जाएगी, सोच हम इस अभियान में निकल लिए.

अंदर से स्विच औन करने की कड़क आवाज के साथ चेहरे के सामने 20 वाट के बल्ब वाली एक पुरानी लाल लाइट जल उठी. अंदर से एक कर्कश आवाज भी कानों में पड़ी, ‘‘देखो तो बाहर कौन बुला रहा है… जब देखो तब कोई न कोई मुंह उठाए चला आता है.’’

साहब ने दरवाजा खोला. सभ्यशिष्ट लगे. अंदर बैठक में ले जा कर सौफे पर बैठाया. बैठे रहे, बैठे रहे बंगले की खरीदारी से ले कर उन के ससुरालियों की खोजखबर, उन की नौकरीचाकरी, कैरियर, राजनीति, पार्टी, देशभक्ति… क्याक्या नहीं हम ने बोलते रहने की कोशिश की. कोशिश ही कर सकते हैं साहब, भैंसन सी श्रीमतीजी के आगे जबान जो सिल कर इतने वर्षों से बैठे थे और अब अचानक वक्त खपाने और जिया भरमाने के लिए सारे टौपिकों का जिम्मा हम पर ही आन पड़ा था. मगर जिस काव्यधारा की प्रेरणा से कामना की बाढ़ में बह कर हम इस ‘राम’ की देहरी तक आ जाने की हिम्मत कर पाए थे उस नाइटी सुंदरी सीता के रसपान को जिया हलक में ही अटका रहा. कोई अतापता नहीं. बगल में बैठी श्रीमती को हम ने कुहनी मारी. अकल की होशियार या अकल की दुश्मन वही जानें, पर श्रीमतीजी ने काम और दुश्वार कर दिया हमारा. सोचा था पूछ लेंगी कि आप की बीवी कहां है? बुलाइए उसे, पर यह न पूछ कर कहती हैं कि आज बड़ी देर हो गई. अब चलते हैं. आप की बीवी से फिर कभी मिल लेंगे.

अजी, यह तो हम पर जुल्म करने की इंतहा ही हो गई. अब तो फिर से हम बालकनी में बैठेबैठे पागल होते रहेंगे.

नहींनहीं, अब हमें ही कुछ करना होगा. अंतरात्मा की आवाज भी कभी हमारी इतनी जोर न पकड़ी होगी जितनी जोर दे कर हम ने यथेष्ट शालीन होते हुए कहा, ‘‘अरे, आप दोनों को जोड़ी में एक बार देख लें. फिर तो जाना ही है, क्योंजी?’’

श्रीमतीजी को देखा तो खा जाने वाली नजरों और होंठों की मुसकराहट के तालमेल का अजब प्रयोग करती नजर आईं. पर हमारी इस से निकल पड़ी.

नवयुवक को अतिथि की अंतिम इच्छा जैसी शायद फील आ गई थी, इसलिए अंदर की ओर आवाज दे कर कहा, ‘‘रंजना, इधर आओ. तुम से मिलना चाहते हैं.’’

हमारा तो जी, क्या कहूं, पहले प्रेम के चंचल हृदय की छटपटाहट सी सांसें मुंह को आने लगीं. क्या सचमुच उस सौंदर्य की बलिहारी को हम इतने निकट से देख पाएंगे? उन से कुछ देर बातें कर पाएंगे.

खुदा कसम इसी याद के साथ इस भरकम तकिए को जिंदगी भर झेल जाएंगे. परदे ठेल कर आ रही थीं हमारी हृदय की देवी.

हम ने नजरें उठाईं. यह क्या? यह मोटीताजी 6 गज की चटगुलाबी रंग की साड़ी में लिपटी चपटी नाक वाली घर में घुसते समय की कर्कश आवाज की मालकिन हमारी मनोहारिणी बलखातीइठलाती नाइटी सुंदरी?

नहींनहीं, हम चीखतेचीखते रह गए.

‘‘मिलिए, रंजना मेरी बीवी से,’’ युवक ने कहा.

हमारी अर्धांगिनी के सुखद आश्चर्य को हम बहुत शिद्दत से महसूस कर पा रहे थे. 14 साल तक धीरेधीरे यों ही न वे हमारी अर्ध अंग बनी थीं. भले ही यह आधा अंग अब हमारे पूरे अंग से भी ज्यादा भरापूरा क्यों न हो गया हो. मोटी भैंसन अभी खुशी से मन ही मन बल्लियों उछल रही थीं. हमारी खुशी पर तो उन के दिल पर सांप लौटने लगता है. अब हो गए श्रीमतीजी के सारे  अरमान पूरे.

यह तो वही कुछ सालों में होने वाली हमारी श्रीमतीजी की जिरौक्स. खुद पर क्या तरस खाएं अब तो इस युवक की ही हम सोचते रहे.

‘‘मगर आप की बीवी हम तो किसी और को समझ रहे थे?’’ हम ने घिघियाते हुए उस से स्पष्ट करवाना चाहा. आखिर गड़बड़ हुई तो कैसे?

‘‘अरे एक को आप ने देखा होगा… वह मेरी चचेरी बहन है…अमेरिका में एनआरआई लड़के से उस की शादी तय हो चुकी है. कुछ दिनों के लिए वह यहां घूमने आई थी. आज ही दोपहर को हम उसे दिल्ली फ्लाइट के लिए छोड़ आए. दिल्ली में उस का घर है. 10 दिन बाद उस की शादी है. फिर वह अमेरिका चली जाएगी.’’

आंखों के आगे मनोहारी पकवान अब भी घूम रहे थे. हम घर लौट रहे थे अपनी भूखे दांतों के बीच सूखी जीभ फिराते हुए.

दीपान्विता राय बनर्जी