आज बन कर आ ही गया मेरी शादी का वीडियो. सारे फंक्शन, 1-1 रीतिरिवाज सच कितना मजा आ रहा है देखने में… सब से आखिर में बिदाई की रस्म. ‘उफ, कितनी रोई हूं मैं…’ सोचतेसोचते मेरा बावला मन शादी के मंडप के नीचे जा खड़ा हुआ…

‘‘देख, अभी से समझा देती हूं कि बिदाई के वक्त तेरा रोना बहुत जरूरी है वरना हमारी बड़ी बदनामी होगी. लोग कहेंगे कि बेटी को कभी प्यार न दिया होगा तभी तो जाते वक्त बिलकुल न रोई. अच्छी तरह समझ ले वरना पता चला उस वक्त भी खीखी कर के हंस रही है,’’ मंडप के नीचे किसी बात पर मेरे जोर से हंसने पर मां का प्रवचन शुरू  था.

‘‘पर क्यों मां, अकेला लड़का वह भी मेरी पसंद का… अच्छी जौब और पैसे वाला. सासससुर इतने सीधे कि अगर मैं रोई तो वे भी मेरे साथ रोने लगेंगे. फिर क्यों न हंसतेहंसते बिदा हो जाऊं.’’

‘‘अरी नाक कटवाएगी क्या? शुक्ला खानदान की लड़कियां बिदाई के समय पूरा महल्ला सिर पर उठा लेती हैं. देखा नहीं था कुछ साल पहले अपनी शादी में तेरी बूआ कितनी रोई थीं?’’

‘‘मां, बूआ तो इसलिए रोई थीं कि तुम लोगों ने उन की शादी उन की पसंद से न करा कर दुहाजू बूढ़े खड़ूस से करवा दी थी… बेचारी बुक्का फाड़ कर न रोतीं तो क्या करतीं?’’

‘‘अपनी मां की सीख गांठ बांध ले लड़की… हमारे खानदान में बिदाई में न रोने को अपशकुन मानते हैं,’’ दादी ने भी मां की बात का समर्थन करते हुए आंखें तरेरीं.

मरती क्या न करती. बिदाई का तो मालूम नहीं पर फिलहाल मुझे यह सोच कर ही रोना आ रहा था कि बिदाई पर कैसे रोऊंगी.

‘‘बता न रिंकू, क्या करूं जिस से मुझे रोना आ जाए?’’ मैं ने अपनी सहेली को झंझोड़ा.

‘‘अरे यह भला मैं कैसे बता सकती हूं… थोड़ी सी प्रैक्टिस कर शायद काम बन जाए.’’

‘‘क्या बताऊं, कई बार आईने में देख कर रोने की प्रैक्टिस कर चुकी हूं, मगर हर बार नाकाम रही. क्या करूं यार, नहीं रोई तो बड़ा बवाल मच जाएगा. दादी, बूआ, चाची यहां तक कि मम्मी ने भी खास हिदायतें दी हैं कि स्टेज पर बैठी खाली खीसें न निपोरती रहूं, बल्कि बिदाई पर कायदे से रोऊं भी.’’

‘‘यह कायदे से रोना क्या होता है? रोना तो रोना होता है और फिर मैं ने रोने के विषय पर कोई पीएचडी थोड़े ही कर रखी है, जो तुझे टिप्स दूं,’’ रिंकू चिढ़ गई.

‘‘कुछ तो कर यार, अगर बिदाई में न रोई तो बड़ी जगहंसाई होगी. मेरे यहां जब तक महल्ले के आखिरी घर तक रोने की चीखें न पहुंच जाएं तब तक बिदाई की रस्म पूरी नहीं मानी जाती. मेरी मामी की लड़की तो गए साल इतना रोई

ी कि सुबह की बरात दोपहर तक बिदा हो पाई थी. हां, यह बात अलग है कि उस का लफड़ा कहीं और चल रहा था और शादी कहीं और हो रही थी. पर मैं क्या करूं, मेरी तो शादी भी मेरी पसंद से हो रही है. कहीं कोईर् रुकावट नहीं, कोई जबरदस्ती नहीं. तो आखिर रोऊं कैसे मैं?’’ मैं ने अपना दुखड़ा सुनाते हुए उस से विनती की. ‘‘ठीक है देखती हूं कि क्या किया जा सकता है,’’ रिंकू ने सीरियस होते हुए कहा.

2 दिन बाद ही रिंकू ने चहकते हुए घर में प्रवेश किया, ‘‘खुशखबरी है तेरे लिए. मिल गई रोने की जादुई चाबी. चल मेरे साथ. वैसे तो 7 दिन की ट्रेनिंग है, पर मैं ने बात की है कि हमें थोड़ी जल्दी है. लिहाजा, डबल चार्ज पर वे हमारा रजिस्ट्रेशन कर लेंगी.’’ ‘‘क्या बात कर रही है ट्रेनिंग और वह भी रोने की?’’ मेरा मुंह हैरानी से खुला का खुला रह गया.

‘‘हां मेरी जान,’’ हंसी से रिंकू दोहरी हुई जा रही थी, ‘‘बिदाई में सही से रोने की यह समस्या अब सिर्फ तुम्हारी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है… आजकल दुलहनों को अपनी पसंद के दूल्हे जो मिलने लगे हैं. अब उन्हें रुलाई आए भी तो कैसे? इसी समस्या से छुटकारा दिलाता यह ट्रेनिंग सैंटर. यह दुलहन के साथसाथ उस की सखियों को भी सिखाता है कि बिदाई पर कैसे रोना है.’’

‘‘इस का मतलब अब मैं सही से रो सकूंगी,’’ मेरी खुशी का कोई ठिकाना न था. कुछ ही देर में हम शहर के मशहूर मौल के अंदर खुले उस ट्रेनिंग सैंटर में थे.

‘‘देखिए, सब से पहले इस चार्ट को अच्छी तरह स्टडी कीजिए. इस में रोने के कई तरीकों का उल्लेख है. हर रुलाई का अलगअलग चार्ज है,’’ रिसैप्शन पर बैठी मैडम ने मुसकराते हुए हमें एक चार्ट पकड़ाया.

रोने के तरीकों को देख कर हमारी आंखें चौड़ी होती चली गईं: सिंपल रुलाई यानी शालीनता से धीरेधीरे रोना. चार्ज 5000. मगरमच्छी रुलाई यानी बिना एक भी आंसू टपकाए सिर्फ रोने की आवाज निकालना. चार्ज 4000. सैलाबी रुलाई यानी इतने जोर से रोना मानो सैलाब आ गया हो. चार्ज 3500. दहाड़ेंमार रुलाई यानी रुकरुक कर दहाड़ें मारना जैसे कहीं बम के धमाके हो रहे हों. चार्ज क्व3000.

सिसकी रुलाई यानी सिसकते हुए रोना. चार्र्ज 2500. मिलीजुली रुलाई यानी सभी सखियों सहित एकसाथ रोना. चार्ज 2000. बहुत देर विमर्श करने के बाद मैं ने मगरमच्छी रुलाई का चुनाव किया, क्योंकि मेरा तो लक्ष्य ही आवाज कर के रोने

का था. अपने कीमती आंसू तो मैं एक भी नष्ट नहीं करना चाहती थी. अत: डबल चार्ज यानी क्व8000 जमा कर मैं ने रोने का अभ्यास शुरू कर दिया.

एक बड़े हौल में शीशे के पार्टीशन थे. बनने वाली दुलहनें उन में अपनेअपने तरीके से रोने में लगी थीं. एक बात तो पक्की थी कि बहुतों की फूहड़ रुलाई देख सामने वाली की हंसी छूटना तय था. खैर, मुझे इस से क्या…

आखिर बिदाई का वह शुभ दिन आ गया. लेकिन शादी की सभी रस्में निभाने और रातभर जागते रहने के कारण मेरी हालत पहले ही इतनी खराब हो गई थी कि रोना आने लगा. अगर उसी वक्त बिदाई का समय तय होता तो कसम से मैं बेपनाह रोती, लेकिन बिदाई के मुहूर्त में अभी कुछ समय शेष था.

एहतियातन मैं ने तय कर रखा था कि बिदाई के वक्त मेरा घूंघट खूब लंबा रहेगा ताकि मैं आराम से रोने की आवाजें निकाल सकूं.

ऐन बिदाई के वक्त मां रोती हुईं मुझ से लिपट कर मुझे भी रोने के लिए उकसाने लगीं. मैं ने भी अचानक भरपूर आवाज में रोना शुरू कर दिया पर वौल्यूम कुछ अधिक होने से लोगों के साथसाथ मुझे भी अपनी आवाज थोड़ी अजीब लगी. अत: 1-2 लोगों से मिल कर थोड़ी देर बाद मैं चुप हो गई.

तभी 8-10 साल के एक शैतान बच्चे ने कमैंट किया, ‘‘अभी तो आप इतनी जोर से रो रही थीं… अब क्यों नहीं रो रहीं?’’

शायद मेरे रोने पर उसे मजा आ रहा था. गुस्सा तो उस के ऊपर इतना आया कि एक तो इतनी मुश्किल से रो रही और उस का भी यह मजाक उड़ा रहा सब के सामने. पर वक्त की नजाकत देख मैं ने कोई प्रतिक्रिया न दी.

तभी अचानक चाची ने खींच कर मुझे अपने सीने से चिपटा लिया और आ… आ… आ… की आवाजों के साथ मैं चीख पड़ी.

‘‘इतना न रो मेरी लाडो, हम तुझे जल्द ही बुलवा लेंगे,’’ कहते हुए चाची ने देर तक मुझे अपने से लिपटाए रखा बिना यह जाने कि उन की साड़ी में लगी सेफ्टीपिन इतनी तेजी से मुझे चुभे जा रही है… जैसेतैसे उन से जान छूटी और मैं पलटी तो देखा वही शैतान बच्चा मेरे घूंघट के अंदर झांक रहा है. मैं ने उसे घूर कर भगाने की कोशिश की कि कहीं फिर से कुछ उलटासीधा न बक दे, पर वह मुझ से डरने के बजाय उलटा मुझे घूर कर देखता रहा.

आखिरकार मैं वहां से चल दी. तभी उस ने टंगड़ी फंसा कर मुझे मुंह के बल गिरा दिया. अब मेरी बहुत भद्द उड़ चुकी थी. मुझे गिराने के बाद वह जोरजोर से हंस रहा था.

उसे हंसता देख मुझे अपनी हार का दर्दनाक एहसास हुआ और चोट भी काफी लग चुकी थी. अत: अब मुझे असली रोना आने लगा और मैं बुक्का फाड़ कर रोने लगी. लोग आते गए और गले लगा कर मुझे चुप कराते गए, पर मुझे न चुप होना था और न हुई.

सब से ज्यादा आश्चर्य मेरी सखी रिंकू को हो रहा था कि सब के रोने पर ठहाका लगा कर हंसने वाली मैं आखिर अपनी बिदाई पर इतना रियल कैसे रो पाई. लेकिन उस वक्त जो भी हुआ भला हो उस बच्चे का कि मेरी बिदाई को उस ने यादगार बना दिया और फिर हमारा वीडियो भी क्या खूब बना.