गृहशोभा विशेष

वैशाली अपने जीवन से बहुत सुखी व संतुष्ट थी. घर में पति, 2 प्यारे से बच्चे, धनदौलत, ऐशोआराम और सामाजिक जीवन में मानसम्मान. और क्या चाहिए था. उस दिन भी वह सुखसागर में डूबी आंखें बंद किए बैठी थी कि उस की प्रिय सहेली वसुधा ने आ कर ऐसा बम सा फोड़ा कि वैशाली हक्काबक्का रह गई. वह क्या कह रही थी उसे समझ में नहीं आ रहा था या समझने के बाद भी उस पर भरोसा करने का मन नहीं हो रहा था.

‘‘हो सकता है वसुधा, तुम्हें कोई गलतफहमी हुई हो. सुधीर ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं उन के बच्चों की मां हूं और उन्हें कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचाने में मदद करने वाली हमसफर हूं.’’ वैशाली ने विश्वास न करने वाले अंदाज में वसुधा की ओर देख कर कहा.

‘‘इतनी बड़ी बात बिना विश्वास के मैं कैसे कह सकती हूं. यदि मुझे यह बात किसी और ने बताई होती तो विश्वास नहीं होता पर यह सब मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है और एक नहीं, कई बार. तुम हो कि न जाने कौन सी दुनिया में खोई रहती हो,’’ वसुधा की आंखों में गहरा दुख और चिंता थी.

वैशाली तड़प उठी थी, ‘‘लेकिन सुधीर तो मेरे हैं, सिर्फ मेरे. मुझ से पूछे बिना तो वह एक कदम नहीं उठाते फिर इतना बड़ा कदम कैसे? नहीं, लोग जलते हैं मुझ से, सुधीर से और हमारी कामयाबी से. यह शायद उन्हीं की कोई चाल होगी.’’

‘‘नहीं, चालवाल कुछ नहीं. बस इतना समझ लो, मर्द का प्यार आखिरी नहीं होता,’’ वसुधा ने कहा.

वैशाली बेजान सी सोफे पर गिर पड़ी और माथा पकड़ कर बैठ गई. फिर बुझे से स्वर में बोली, ‘‘क्या वह बहुत खूबसूरत है?’’

‘‘नहीं, तुम से क्या मुकाबला? लेकिन वही बात है न कि गधी पे दिल आ जाए तो परी क्या चीज है. सुना है कि सुधीर उस से जल्दी ही शादी करने वाले हैं.’’

‘‘शादी, नहींनहीं, ऐसा कैसे हो सकता है. क्या कमी है मुझ में. मैं ने क्या नहीं किया उन के लिए. बिजनेस को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाने में मदद की. न दिन देखा न रात और फिर उन के घर को सजाया, संवारा. बच्चे, पैसा, शोहरत सबकुछ तो है, फिर?’’ वैशाली सुधीर की बेरुखी का कारण नहीं समझ पा रही थी.

‘‘शायद मर्द जात होती ही ऐसी है. मर्द कभी संतुष्ट नहीं होता. खैर, यह समय कमजोरी दिखाने का नहीं है. हमें खुद ही कुछ करना होगा और उस लड़की को डराधमका कर, बहलाफुसला कर किसी भी तरह सुधीर से दूर रखना होगा. और हां, सुधीर से इस विषय में अभी कुछ मत कहना वरना बात खुल कर सामने आ जाएगी. परदा पड़ा ही रहे तो अच्छा है.’’

वसुधा तो वैशाली को समझाबुझा कर चली गई पर वैशाली का दम घुट सा रहा था. वह तो समझती थी कि सुधीर अपनी जिंदगी से संतुष्ट है फिर उस दूसरी औरत की जरूरत कहां से निकल आई थी यही सब सोचतेसोचते उस के आगे अतीत का दृश्य घूमने लगा.

वैशाली का सुधीर से परिचय उन दिनों हुआ था जब वह अपनी विज्ञापन एजेंसी का काम जमाने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रहा था. वैशाली को उन दिनों काम की आवश्यकता थी और उसी सिलसिले में वह अपने किसी रिश्तेदार के माध्यम से सुधीर से मिली थी. सुधीर ने उसे साफसाफ कह दिया था कि वह अभी खुद ही संघर्ष कर रहा है. अत: ज्यादा वेतन नहीं दे सकेगा. अगर उसे कहीं और अच्छी नौकरी मिले तो वह जरूर कर ले. वैशाली इस बात पर हैरान थी पर उस ने बड़े विश्वास से कहा, ‘शायद इस की जरूरत ही न पड़े.’

और फिर कुछ ऐसा संयोग बना कि वैशाली के आते ही सुधीर को कामयाबी मिलती गई. वैशाली सुंदर होने के साथ मेहनती और समझदार भी थी. सुधीर ने उसे अपना दायां हाथ बना लिया था. जल्दी ही उन की एजेंसी का नाम देश भर में जाना जाने लगा था. सुधीर वैशाली से, और उस की कार्यपद्धति से बहुत प्रभावित था फिर एक दिन ऐसा भी आया जब सुधीर ने वैशाली के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया.

वैशाली को क्या आपत्ति हो सकती थी. सुधीर में कोई ऐब नहीं था. वह कम बोलने वाला, खुशमिजाज व चरित्रवान था. बस, कमी थी तो इतनी कि वैशाली के मुकाबले वह एक बहुत साधारण शक्लसूरत का इनसान था, लेकिन पुरुष कामयाब और मालदार हो तो उस की यह कमी कोई कमी नहीं होती और फिर सुधीर तो उस से प्यार भी करता था. एक खूबसूरत भविष्य तो उस के सामने खड़ा था. फिर भी वैशाली ने उस से पूछा था, ‘क्या आप को लगता है कि आप मुझ से विवाह कर के खुश रहेंगे?’

‘मैं ने तो सोच लिया है. तुम्हें सोचसमझ कर फैसला करना है. मुझे जल्दी नहीं है,’ सुधीर धीरे से मुसकराए थे.

‘पर मुझे है क्योंकि मेरी मां घर आए रिश्तों में से किसी को जल्दी ही ‘हां’ कहने वाली हैं,’ वैशाली शोख निगाहों से देखती मुसकराई थी.

‘ओह, तब तो फिर मुझे ही जल्दी कुछ करना होगा,’ उस के अंदाज पर वैशाली को हंसी आ गई थी.

दोनों जल्दी ही परिणयसूत्र में बंध गए थे. सारे शहर में इस विवाह की चर्चा रही और शायद उन के बीच बनने वाली दूरियों की नींव यहीं से पड़ गई थी. सुर्ख लहंगे, गहनों की चमक और मन की खुशी ने वैशाली की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए थे लेकिन उस के सामने सुधीर का व्यक्तित्व फीका पड़ रहा था. कुछ दोस्त ईर्ष्या छिपा नहीं पा रहे थे. ‘यार, किस्मत खुल गई तेरी तो, ऐसी खूबसूरत पत्नी? काश, हमारा नसीब भी ऐसा होता.’

तो कुछ दबी जबान से उस का मजाक भी उड़ा रहे थे, ‘हूर के पहलू में लंगूर’, और ‘कौए की चोंच में मोती’ जैसे शब्द भी उस के कान में पिघले शीशे की तरह उतर कर शादी के उत्साह को फीका कर गए थे.

शादी के बाद भी वैशाली आफिस जाती थी. सुधीर को भी उस की सहायता की जरूरत रहती थी. शहर के बड़े लोगों की पार्टियों में भी उन की उपस्थिति जरूरी समझी जाती थी. हालांकि वैशाली का संबंध मध्यम वर्ग से था लेकिन उस ने बहुत जल्दी ही ऊंचे वर्ग के लोगों में उठनाबैठना सीख लिया था. एक तो वह पहले से ही खूबसूरत थी उस पर दौलत व शोहरत ने उस पर दोगुना निखार ला दिया था. अच्छे कपड़ों, गहनों की चमक के साथ सुख और संतोष ने उस के चेहरे पर अजीब सी कशिश पैदा कर दी थी. मेकअप का सलीका, बातचीत का ढंग, चलनेबैठने में नजाकत, सबकुछ तो था उस में. लोग उस की तारीफ करते, उस के आसपास मंडराते और लोगों की निगाहों में अपने लिए तारीफ देख वह चहकती, खिलखिलाती घूमती. उसे इन सब बातों का नशा सा होने लगा था. कई दिनों तक कोई पार्टी नहीं होती तो वह अजीब सी बेचैनी महसूस करती.

‘कई दिनों से कोई पार्टी ही नहीं हुई. क्यों न हम ही अपने यहां पार्टी रख लें,’ वह सुधीर से कहती तो सुधीर संयत स्वर में उसे मना कर देता था.

वैशाली समझ नहीं पा रही थी कि पार्टियों में लोग उस की तारीफ करते हैं और उस के चारों तरफ मंडराते हैं वहीं दूसरी ओर सुधीर खुद को उपेक्षित महसूस कर हीनभावना में डूब जाता है और फिर उस का दिल पार्टी में नहीं लगता था. पिछले दिनों ऐसी ही किसी पार्टी में दोनों निमंत्रित थे. गहरी नीली शिफान की खूबसूरत सी साड़ी और सितारों से बनी चमकदार चोली और मैचिंग ज्वेलरी से सजी सब के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी.

‘वाह, क्या बात है. लगता ही नहीं कि आप 1 बच्चे की मां हैं और आप की शादी को 6 साल हो गए हैं. क्या राज है आप की खूबसूरती का?’ मिसेज चंदेल वैशाली से पूछ रही थीं.

‘इन का क्या है, ये तो एवरग्रीन हैं. इस का क्या राज है जरा हमें भी तो बताएं,’ मिसेज शर्मा मन में ईर्ष्या के साथ पूछ रही थीं.

‘अरे, राज की क्या बात है. नो टेंशन, सुकून की जिंदगी और भरपूर नींद, बस,’ वैशाली मन ही मन खुश होती बोली.

‘केवल इतना? यानी नो एक्सरसाइज, नो डायटिंग, न पार्लर के चक्कर?’ मिसेज चंदेल हैरान थीं.

‘अरे, और क्या?’ वैशाली साफ झूठ बोल गई. हालांकि अपनी खूबसूरती में चारचांद लगाए रखने के लिए वह नियम से महंगे ब्यूटीपार्लर में जाती थी. कम कैलोरी वाला संतुलित खाना और एक्सरसाइज सबकुछ उस के दैनिक जीवन में शामिल था.

‘किस्मत वाले हैं सुधीरजी, जो ऐसी खूबसूरत बीवी मिली.’

‘पता नहीं क्या देख कर शादी कर ली वैशाली ने सुधीर से?’

‘अरे, मर्दों का पैसा और साख देखी जाती है. बाकी बातों से क्या फर्क पड़ता है?’ ऐसी ही कुछ बातें चल रही थीं महिला मंडली में, जहां उस का ध्यान भी नहीं गया कि कब करीब से गुजर रहे सुधीर के कानों में ये बातें पड़ गईं और वह तरसता रह गया कि कब वैशाली उन को ऐसी बातों के लिए झिड़क दे या उस की तारीफ में कुछ कहे. और ऐसी ही बातों पर कई दिनों तक सुधीर का मूड उखड़ा ही रहता था.

जब वैशाली की दूसरी संतान के रूप में एक बेटी ने जन्म लिया तो उस ने चैन की सांस ली थी वरना उस का दिल धड़कता रहता था कि कहीं बच्चे पिता जैसी शक्लसूरत के हो गए तो…

बेटी के जन्म के कुछ समय बाद जब वैशाली आफिस जाने के लिए तैयार हुई तो सुधीर ने उसे मना कर दिया कि अब तुम घर रह कर ही बच्चों की देखभाल करो.

‘अरे, आया है न इस काम के लिए,’ वैशाली घर रुकने को तैयार नहीं थी.

‘पर मां से अच्छी देखभाल कोई नहीं कर सकता. दुनिया की तमाम स्त्रियां अपने बच्चों की देखभाल खुद करती हैं,’ सुधीर ने समझाया.

‘पर वे निचली, मिडिल क्लास की औरतें होती हैं,’ वैशाली जिद पर अड़ी थी.

‘तुम भी तो कभी उसी क्लास से आई थीं,’ सुधीर झुंझला कर कह गया.

वैशाली के आंसू बहने लगे, ‘क्या मुझे यही ताना देने के लिए बचा था?’

‘नहीं, नहीं, मेरा मतलब यह नहीं था. बच्चे थोड़े बड़े हो जाएं तो तुम फिर से काम शुरू कर देना,’ सुधीर हड़बड़ा गया था.

और फिर वैशाली घर तक ही सीमित रह गई. उस का समय काटना मुश्किल हो जाता था पर सुधीर ने उसे मजबूर सा कर दिया था. अब वसुधा की खबर ने उसे बुरी तरह बेचैन कर दिया. उसे कई दिनों से सुधीर का व्यवहार बदला सा लग रहा था. वह देर से घर आने लगा था, कभी वह दूसरे शहर के टूर पर बाहर रहने की बात करता था. बच्चे व वैशाली उसे बहुत मिस करते थे. शिकायत करने पर वह कह देता कि मेहनत व भागदौड़ नहीं करूंगा तो आगे कैसे बढ़ूंगा. हमारा काम कैसा है यह तुम जानती ही हो. अब वैशाली समझ रही थी कि उस का समय व प्यार अब किसी और के नाम हो गया है. पर वह चुप थी.

पर एक दिन वह बोल ही गई, ‘आजकल आप घर से बाहर कुछ ज्यादा ही नहीं रहने लगे हैं?’

‘क्या मतलब है तुम्हारा?’ चोर निगाहों से देखते हुए सुधीर बोले.

‘मतलब आप अच्छी तरह समझते हैं. मेरा चैन खत्म कर के आप ऐसे पूछ रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो.’

‘देखो, मेरा दिमाग खराब मत करो और मुझे सोने दो. न जाने क्या कहना चाह रही हो?’

‘आप जानते हैं कि मैं क्या कह रही हूं. बताओ क्या कमी है मुझ में जो आप को किसी और के बारे में सोचने की जरूरत पड़ गई.’

‘यह तुम्हारी गलतफहमी है. तुम जानती नहीं क्या कि हमारा काम ही ऐसा है कि जाने किसकिस से मिलनाजुलना पड़ता है और हमारी कामयाबी से जल कर लोग न जाने क्याक्या बातें उड़ा देते हैं,’ सुधीर जो अभी तक तैश में बोल रहा था एकदम ठंडा सा पड़ गया.

क्या वैशाली इतनी नादान थी कि उस के चेहरे के बदलते रंगों को समझ न पाती. हां, इतना अवश्य था कि अभी तक अपनी दुनिया में इतनी मग्न थी कि इस ओर सोच भी नहीं सकी थी. गुस्से व दुख में वह अपना तकिया ले कर दूसरे कमरे में जाने लगी इस आशा के साथ कि शायद सुधीर उसे रोक ले, पर कहां, सुधीर तो चैन से सो गया और वह दूसरे कमरे में जागी आंखों के साथ आंसू बहाती रही.

गृहशोभा विशेष

काफी दिन चढ़ आया था. चिडि़यों के चहचहाने से वैशाली की आंख खुली तो वह हड़बड़ा कर जाग उठी.

अगले दिन वैशाली ने वसुधा को घर बुलवाया और पूछा, ‘‘तुम उसे जानती हो?’’

‘‘हां, सुधीर के आफिस में मामूली सहायक है,’’ वसुधा ने बताया.

‘‘मैं उस से मिलना चाहती हूं, देखना चाहती हूं कि ऐसा क्या है उस में जो मुझ में नहीं है.’’

फिर शाम को दोनों उस मिडिल क्लास के तंग गली वाले महल्ले में पहुंचीं जहां अंदर तक उन की गाड़ी भी नहीं पहुंच सकी थी. दरवाजा खटखटाने पर एक बुजुर्ग औरत ने दरवाजा खोला तो पूछने पर पता चला कि शिल्पा अभी वापस नहीं आई है. वैशाली उसी महिला से, जो शिल्पा की मां थीं, उलझ पड़ी.

‘‘आफिस का समय तो कब का खत्म हो चुका है… क्या वह रोज ही इतनी देर से आती है?’’

‘‘नहींनहीं, कभीकभी आफिस में काम ज्यादा होता है तो देर हो जाती है. पर आप लोग कौन हैं?’’ शिल्पा की मां अचकचा सी गईं.

इस पर वसुधा ने जवाब दिया, ‘‘यह शिल्पा के बौस की पत्नी हैं. सुना है सुधीर यहां भी अकसर आते रहते हैं?’’

‘‘ज्यादा नहीं, 1-2 बार ही आए हैं.’’

‘‘तो क्या आप ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि एक कंपनी का मालिक एक मामूली कर्मचारी के घर क्यों आता है? खूब जानती हूं, आप जैसी मांएं ही अपनी आंखें बंद किए रखती हैं फिर चाहे किसी का घर बरबाद हो या उन्हें बदनामी मिले.’’

‘‘ये आप कैसी बातें कर रही हैं? शायद आप को कोई गलतफहमी हो गई है,’’ शिल्पा की मां के चेहरे का रंग उड़ने लगा था.

‘‘अगर गलतफहमी होती तो शायद हम यहां वक्त बरबाद करने न आते. आप अपनी बेटी को संभाल लीजिए वरना…’’ वसुधा जो बहुत तीखे शब्दों में कह रही थी, अचानक रुक गई क्योंकि आगे के शब्द शिल्पा बोल रही थी.

‘‘वरना क्या कर लेंगी आप. आप को मेरे घर आ कर हमारी बेइज्जती करने का कोई हक नहीं है. अच्छा होगा कि आप यहां से चली जाएं.’’

वैशाली हैरानी से उस साधारण सी लड़की को देख रही थी जो खुद को शिल्पा बता रही थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ऐसी कौन सी बात है जो सुधीर उसे छोड़ शिल्पा की ओर खिंच गए. उस की तंद्रा टूटी जब वसुधा और शिल्पा के बीच होने वाले वाक्युद्ध के स्वरों की तीव्रता बहुत बढ़ गई. वह वसुधा का हाथ पकड़ लगभग उसे घसीटती बाहर ले आई तो वसुधा उसी पर बरस पड़ी.

‘‘आप चुप क्यों खड़ी थीं, खरीखोटी क्यों नहीं सुनाईं? इज्जतदार होगी तो फिर सुधीर से मिलने की कोशिश नहीं करेगी.’’

‘‘इतना ही काफी है. पता नहीं सुधीर के संबंध इस से कहां तक हैं. उन्हें पता चलेगा तो कहीं बात और न बिगड़ जाए,’’ वैशाली धीरे से बोली.

कई दिनों तक सुधीर और वैशाली के बीच सन्नाटा सा पसर गया था. पहले वह आ कर बच्चों के हालचाल उस से पूछता था पर अब आ कर खाना खा कर चुपचाप सो जाता था. वैशाली सोच रही थी कि आज सुधीर से पूछेगी कि वह इतना क्यों बदल गया है? पर उस के कुछ कहने के पहले ही सुधीर उस से पूछ बैठा, ‘‘तुम शिल्पा के घर गई थीं?’’

‘‘क्यों, नहीं जाना चाहिए था?’’ सुधीर का सपाट सा चेहरा देख कर वह चौंक गई थी.

‘‘मुझ से पूछ तो लेतीं, मेरे खयाल में मैं कोई ऐसा काम नहीं कर रहा हूं जिस के लिए तुम इतना परेशान हो,’’ सुधीर उसी स्वर में बोला.

‘‘उस ने मेरी शांति भंग कर दी है. मेरा घर तोड़ने पर तुली है और तुम कह रहे हो कि कुछ हुआ ही नहीं,’’ वैशाली लगभग चीख उठी थी.

‘‘तुम्हारा घर कौन छीन रहा है. मैं उसे नया घर दे रहा हूं,’’ सुधीर ने उसी शांति से जवाब दिया.

वैशाली जैसे आसमान से नीचे आ गिरी, ‘‘यह क्या कह रहे हो? प्लीज सुधीर, मेरी गलती तो बताओ. तुम्हारे इस कदम से बच्चों पर क्या असर पड़ेगा?’’

‘‘क्या कहूं मैं? मैं ने बहुत सोचा पर यह कदम उठाने से खुद को रोक नहीं सका.’’

‘‘क्या वह मुझ से बहुत अच्छी है, सुंदर है, सलीके वाली है? क्या लोग मेरे से ज्यादा उस की तारीफ करते हैं?’’ वैशाली की आंखों में हार की नमी आ गई थी.

वैशाली के बहुत पूछने पर सुधीर धीरे से मुसकराया, ‘‘यही सब तो नहीं है उस में. वह एक आम सी लड़की है. मेरे साथ रहेगी तो लोग मुझे भूल कर भी उसे नहीं देखेंगे. कोई हमारी जोड़ी को बेमेल नहीं कहेगा. मेरी हीन भावना अंदर ही अंदर मुझे नहीं मारेगी.’’

वैशाली चौंक गई थी तो यह बात थी जो सुधीर पार्टी फंक्शन में जाने से कतराते थे. वह बोली, ‘‘तुम…तुम सुधीर, मुझे जरा सा इशारा तो करते. तुम्हारे लिए मैं खुद को पूरी तरह बदल देती, सादगी अपना लेती, पार्टी में जाना छोड़ देती.’’

‘‘मेरे खयाल से तुम इतनी नासमझ तो नहीं हो कि मेरी पसंद, नापसंद समझ नहीं सकीं. सच तो यह है कि तुम्हें भीड़, शोरशराबा, पार्टी बेइंतहा पसंद हैं. तुम चाहती हो कि तुम हर समय लोगों से घिरी अपनी तारीफ सुनती रहो. क्या तुम ने कभी चार लोगों में मेरी तारीफ की थी, बुराई को नापसंद किया, तुम सिर्फ अपने घमंड में जीती रहीं और मुझे नजरअंदाज करती रहीं, लेकिन शिल्पा में यह सब नहीं है. उस के साथ मुझे हीन भावना नहीं आएगी, क्योंकि उस के लिए सिर्फ मैं ही अहम हूं. लोगों की भीड़ की जगह उसे सिर्फ मेरा साथ पसंद है और मैं सिर्फ यही चाहता हूं.’’

‘‘ठीक है, अब से यही होगा. अपनी नादानी में मैं ने इस ओर ध्यान नहीं दिया पर अब जैसा तुम चाहोगे वैसा ही होगा. मुझे अपनी गलती सुधारने का एक मौका दो. मुझे माफ कर दो,’’ वैशाली के लाख माफी मांगने, आंसू बहाने पर भी सुधीर पर कोई असर नहीं पड़ा.

‘‘देखो, अब बहुत देर हो चुकी है. मैं शिल्पा से शादी कर के दूसरे घर में जा रहा हूं. तुम कहोगी तो तलाक दे दूंगा अन्यथा जैसे रह रही हो, बच्चों के साथ रहती रहो. तुम्हें बच्चों व घर का खर्च मिलता रहेगा. तुम्हारे व बच्चों के प्रति फर्ज पहले की तरह निभाता रहूंगा.’’

सुधीर की बातों से वैशाली का मन बुरी तरह सुलग उठा था. इतना तो समझ ही गई थी कि अब सुधीर का निर्णय बदलेगा नहीं. उस का मन हुआ था कि जोर से चिल्ला कर कह दे कि ठीक है, वह जहां जाना चाहे जाए, मुझ से कोई मतलब न रखे पर वह जानती थी कि वह भी मजबूर थी क्योंकि बच्चे जिस रहनसहन के आदी थे, वह अकेली कुछ नहीं कर सकती थी. अत: कुछ देर बाद वह शांति से बोली, ‘‘देखो, अब अगर इस घर से जाने का फैसला कर ही लिया है तो तुम्हारा संबंध बच्चों तक ही रहेगा. दूसरी पत्नी से बचेखुचे पल मैं तुम्हारे साथ शेयर नहीं कर सकूंगी.’’

?सुधीर कुछ देर तक कस कर होंठ भींचे एकटक आंखों से वैशाली को देखता रहा, फिर अपना सामान ले कर झटके से बाहर चला गया. वह बुत बनी खड़ी थी. उस की तंद्रा तब टूटी जब चिंटू उस से आ कर लिपट गया था, ‘‘मम्मी, पापा कहां चले गए? क्या अब वह कभी नहीं आएंगे?’’

वैशाली चौंक उठी थी, उस ने चिंटू के सिर पर हाथ फेरा और बोली, ‘‘नहीं बेटा, पापा आएंगे.’’

वैशाली जैसे सबकुछ हार चुकी थी. सारी कोशिशों के बाद भी सुधीर को वापस न लाने की असफलता का दुख उस के मन पर हिमखंड की तरह जम चुका था. घर छोड़ने के बाद सुधीर वैशाली के यहां जल्दीजल्दी चक्कर लगाता था, कभीकभी रुक भी जाता था. नियमित रूप से पैसे भी देता रहता था लेकिन जाने क्यों वैशाली के मन में जमी बर्फ की सतह और भारी हो जाती थी.

सुधीर को देख कर वह इधरउधर हो जाती, खुद को काम में व्यस्त कर लेती थी. सुधीर फोन करता तो वह ‘होल्ड करें’ कह कर बच्चों को फोन पकड़ा देती थी. कई बार सुधीर ने उस से सीधे बात करने की कोशिश भी की लेकिन न जाने क्यों वह उसे पथराई सी आंखों से देखती बुत सी बनी रह जाती.

अगर सुधीर गलती का एहसास कर के पूरी तरह से उस के पास वापस आने की बात करता तो शायद उस के मन में जमा दुख पिघल जाता पर कहां, अपनी हार के दुख से वह जैसे चलतीफिरती मशीन बन कर रह गई थी. नित नए मैचिंग कपड़े, गहने, ब्यूटीपार्लर के चक्कर, साजसिंगार, क्लब, पार्टीज, सबकुछ बंद हो गया था. लंबा समय गुजर गया, किसी ने उस को बाहर आतेजाते नहीं देखा था. पर एक दिन वसुधा जबरदस्ती उसे एक परिचित के यहां पार्टी में ले ही गई. हलकी हरी शिफान की साड़ी, सादगी से बना जूड़ा, साधारण से शृंगार में भी वह बहुत खूबसूरत लग रही थी.

तभी वैशाली कि निगाह सुधीर पर पड़ी, जो उसे ही एकटक देख रहा था और सोच रहा था कि यह इतनी खूबसूरत स्त्री कभी उस का हक थी और आज वह उस से कितनी दूर है. वसुधा का ध्यान सुधीर पर गया तो उस ने वैशाली को कोहनी मारी, ‘‘देख, सुधीर कैसी हसरत से तुम्हें देख रहे हैं. अपनी गलती पर पछता रहे होंगे.’’

‘‘गलती कैसी, मर्द हैं चाहे जो कर सकते हैं,’’ मन में उमड़ते दुख को दबा कर वैशाली बोली.

‘‘हां, यही काम कोई औरत करती तो बदचलन कहलाती,’’ वसुधा चिढ़ गई थी.

‘‘चलो उधर,’’ वैशाली उस का हाथ पकड़ दूसरी तरफ ले गई थी. वैशाली ने सुधीर को बहुत समय बाद देखा था पर एक ही नजर में उसे महसूस हुआ कि सुधीर शायद मौजूदा जिंदगी से खुश नहीं हैं. शायद मेरा वहम है, वैशाली का यही सोचना था पर यह उस का भ्रम नहीं था. वह सच में अपनी जिंदगी से नाखुश था. वैशाली की जिस बात से घबरा कर वह शिल्पा की ओर झुका था वही सबकुछ आज शिल्पा ने अपना लिया था. वैशाली खुद अपनी आंखों से देख रही थी कि कीमती साड़ी, गहनों से लदी पूरे साजसिंगार से सजी शिल्पा लोगों की भीड़ में घिरी कहकहे लगा रही थी. ऐशोआराम ने उस के चेहरे की रौनक ही बदल दी थी और खूबसूरत लग रही थी. वह पूरी तरह बदल गई थी और उस ने भी उस उच्च वर्ग की खासीयत को अपना लिया था जहां चमकदमक, दिखावट, शो, सजावट को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है. वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी थी और उसे ध्यान भी नहीं था कि सुधीर कहां खड़ा फिर से अपने अकेलेपन से जूझ रहा है.

यह देख कर वैशाली के मन का तपता रेगिस्तान मानो बारिश की बूंदों से ठंडक पा गया था. तभी उस की निगाहें सुधीर से टकराईं. उस ने सुधीर को देख कर एक गहरी निगाह शिल्पा पर डाली और फिर से सुधीर को देख कर व्यंग्य से मुसकराई, मानो कह रही हो कि क्या अब तुम फिर से नई शिल्पा ढूंढ़ोगे? क्योंकि यह शिल्पा भी आज लोगों की भीड़ में घिरी तुम्हारी हीन भावना की वजह बन तुम्हें अनदेखा कर रही है.

वैशाली की निगाहों की तपिश से घबरा कर सुधीर शर्मिंदा सा दूसरी ओर चला गया. वैशाली तो पति की जिंदगी में दूसरी औरत के दुख से हार गई थी पर सुधीर भी कहां जीत पाया था? नम आंखों और फीकी मुसकान के साथ वह सुधीर को जाता देखती रह गई.

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