गृहशोभा विशेष

‘‘मम्मा आज मैं अपनी नई वाली बोतल में पानी ले जाऊंगी,’’ नन्ही खुशी चहकते हुए मुझ से बोली. ‘‘ओके,’’ कहते हुए मैं ने उसे स्कूल के लिए तैयार किया.

‘‘मीनू पार्लर की लिस्ट मैं सतीश को दे आया था. 11-12 बजे तक सामान पहुंचा देगा. तुम चैक कर लेना,’’ ऋ षभ ने नाश्ता करते हुए कहा. ठीक है आप चिंता न करें, ‘‘मैं ने कहा, फिर खुशी और ऋ षभ के चले जाने के बाद मैं आरामकुरसी पर निढाल हो गई. यह तो अच्छा था कि ऋ षभ के औफिस के रास्ते में ही खुशी का स्कूल पड़ता था और वे उसे स्कूल ड्रौप करते हुए अपने औफिस निकल जाते थे वरना तो उसे स्कूल छोड़ने भी मुझे ही जाना पड़ता. दोपहर 1 बजे तक उस का स्कूल होता था. तब तक मैं अपने सभी काम निबटा कर उसे ले आती थी. तभी अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया. मैं ने दरवाजा खोला, तो सामने पड़ोसिन ममता हांफती हुई दिखाई दी.

‘‘क्या हुआ? कहां से भागतीदौड़ती चली आ रही है?’’ मैं ने पूछा, क्योंकि मैं उसे अच्छी तरह जानती थी कि उसे तिल का ताड़ बनाना बहुत अच्छी तरह आता है. ‘‘यार बुरी खबर है. मयंक की बीवी ने आत्महत्या कर ली.’’

‘‘क्या? क्या कह रही है तू?’’ ‘‘हां यार सभी सकते मैं हैं,’’ वह बोली और फिर पूरी बात बताने लगी.

उस के जाने के बाद मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया. उफ पूजा ने यह क्या कर लिया. अपने 2 साल के बच्चे को यों छोड़ कर… लेकिन वह तो प्रैगनैंट भी थी. मतलब उस ने नन्ही सी जान को भी अपनी कोख में ही दफन कर लिया. आखिर ऐसा उस ने क्यों किया… मैं जानती थी, फिर भी हैरान थी. दिमाग में बहुत से प्रश्न हथौड़े की तरह चलते जा रहे थे… मयंक को तो मैं अच्छी तरह जानती थी. उस की शादी में नहीं गई थी, लेकिन लोगों से सुना अवश्य था कि बहुत खूबसूरत व समझदार है उस की पत्नी. बाद में तो यह तक सुनने में आया था कि बातबात पर वह पत्नी को मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देता है. उसे उस के मायके नहीं जाने देता. यहां तक कि उस के मातापिता के लिए अपशब्द भी कहता है.

एक बार एक आयोजन में उस की पत्नी से मुलाकात हुई थी, तो आंखों में आंसू भर कर उस ने मुझ से यही 2 शब्द कहे थे कि दीदी, काश हम भी आप की तरह खुशहाल होते. हां खुशहाल ही तो थी मैं कि मयंक के चंगुल से बच निकली थी. वाकई अगर ऋ षभ ने न संभाला होता, तो मैं कतराकतरा हो कर कब की टूट कर बिखर गई होती. सोचतेसोचते मेरा मन अतीत की गहराइयों में विचरने लगा…

‘‘भाभी यह रंग आप पर बहुत खिल रहा है,’’ कुछ गहरे गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर घर के बाहर सब्जी खरीदते समय किसी ने मुझे पीछे से आवाज दी. हम नएनए ही शिफ्ट हुए थे. मयंक हमारे पड़ोसी का लड़का था. 23-24 की उम्र में उस का शारीरिक सौष्ठव कमाल का था.

जी थैंक्स, कह कर मैं अपनी ओर एकटक निहारते मयंक को देख थोड़ी असहज हो गई. मयंक ने कहना जारी रखा, ‘‘सच कुछ लोगों को कुदरत ने फुरसत में बनाया होता है और आप उन में से एक हो?’’

‘‘यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया क्या?’’ मैं कहते हुए हंस दी. अंदर आ कर खुद को शीशे में निहारते हुए मैं खुद भी बुदबुदा उठी कि सच में कुदरत ने मुझे फुरसत में बनाया है. दूध सी मेरी काया और उस पर तीखे नैननक्श मेरी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. उस पर कपड़ों का मेरा चुनाव लोगों के बीच मुझे चर्चा का विषय बना देता था.

वैसे तो ऐसी तारीफें सुनने की मुझे आदत सी पड़ गई थी, लेकिन मयंक द्वारा की गई तारीफ से मुझ में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई. उस का मेरी आंखों में गहरे झांक कर देखना फिर अर्थपूर्ण तरीके से मुसकराना मुझे अच्छा लगा. सच कहूं तो उस के शब्दों से ज्यादा उस की मोहक मुसकान ने मुझे लुभाया. पड़ोसी होने के नाते गाहेबगाहे उस से मेरी मुलाकात होती रहती थी. उस वक्त खुशी बहुत छोटी थी और मेरे पार्लर के भी ढेर सारे काम होते थे. ऐसे में कभीकभी मैं झुंझला उठती थी. एक दिन मैं ऋषभ से अपनी परेशानी का रोना ले कर बैठी ही थी कि मयंक आ गया. बातों ही बातों में उस ने मुझे मदद की पेशकश की, जिसे मुझ से पहले ऋ षभ ने स्वीकार कर लिया.

अब मयंक तकरीबन रोज मेरे छोटेमोटे कामों में हाथ बंटाने के लिए आने लगा. उस की गाड़ी पर बैठतेउतरते समय जब कभी मेरा हाथ उस से टच होता तो वह बड़ी ही शरारत से मुसकरा उठता. मन ही मन उस की यह शरारत मुझे अच्छी लगती, पर ऊपर से मैं उसे बनावटी गुस्से से देखती तो झट से सौरी बोल कर अपना मुंह घुमा लेता. धीरेधीरे मुझे उस के साथ की आदत पड़ गई.

उधर ऋ षभ की प्राइवेट जौब थी. वे देर रात घर आते थे. कई बार तो उन्हें औफिस के काम से शहर के बाहर भी रहना होता था. वैसे भी ऋ षभ मेरे लिए एक बोरिंग इंसान थे, जिन्हें मेरी खूबसूरती से ज्यादा औफिस की फाइलों से प्यार था. हां, मेरी और खुशी की जरूरतों का वे पूरा ध्यान रखते थे.

पर उम्र का जोश कहें या वक्त की कमजोरी, मेरा चंचल मन इतने भर से संतुष्ट नहीं था या यों कह लें कि मयंक ने किसी शांत झील की तरह पड़ी मेरी सोई हुई कामनाओं को अपने आकर्षण के जादू का पत्थर फेंक जगा दिया था. मयंक की छेड़छाड़, जानेअनजाने उस का छू जाना, उस का जोशीला साथ अब मुझे रोमांचित करने लगा था. मयंक तो पहले से ही बेपरवाह और दुस्साहसी किस्म का इंसान था,

मेरे मौन में उस ने मेरी रंजामंदी शायद महसूस कर ली थी. अब अधिकतर वह मेरे साथ ही रहने लगा.

खुशी को स्कूल छोड़ना व लाना, जब मैं पार्लर में व्यस्त रहूं तो उसे पार्क घुमाना, मेरे पार्लर का सामान लाना, शौपिंग में मेरी मदद करना आदि काम वह खुशीखुशी करता था. ऋ षभ के शहर से बाहर रहने पर भी वह हमारा बहुत खयाल रखता था. मैं उस जगह नई थी और ऋषभ किसी से सीधे मुंह बात भी नहीं करते थे, इसलिए लोगों की निगाहें हमें देख कर भी अनदेखा करती थीं. हालांकि पार्लर में कई महिलाएं हमारे बीच क्या चल रहा है, इस खबर को जानने के लिए उत्सुक नजर आती थीं, लेकिन मैं मस्त हो कर अपना काम करती थी. लेकिन इतना तय था कि मैं और खुशी दोनों ही मयंक के मोहपाश में बंधी जा रही थीं. खुशी तो बच्ची थी पर मैं बड़ी हो कर भी बहुत नादान.

ऐसी ही एक शाम ऋ षभ चेन्नई में थे. मैं और मयंक पार्लर का कुछ सामान लेने गए थे. खुशी को मैं ने ऋ षभ की रिश्ते में लगने वाली एक मौसी (जो हमारे घर के पास ही रहती थीं) के यहां छोड़ दिया था. बाजार से लौटते हुए हमें देर हो चुकी थी. बारिश और हलकी फुहारों ने हमें कुछ भिगो भी दिया था. उस की गाड़ी से उतरते समय तेज ब्रेक लगने के कारण मैं उस से जा चिपकी और मेरे दोनों हाथ उस के कंधों पर जा टिके. वाकई यह बहुत खूबसूरत सुखानुभूति थी, जिस ने मुझे रोमांचित कर दिया. बहरहाल ताला खोल कर हम अंदर आ गए. ‘‘मयंक अब तुम जाओ. काफी देर हो चुकी है. मैं खुशी को ले कर आती हूं,’’ मेरे कहने पर भी वह सोफे पर बैठा रहा.

‘‘अगर रात यहीं रुक जाऊं तो?’’ उस की आंखों में फिर वही शरारत थी. चाह कर भी उसे इनकार न कर सकी. मौसम की खुमारी कहें या गीले तन की खुशबू, हम दोनों ही बहकने लगे. मयंक ने मेरा हाथ खींच कर मुझे सोफे पर बैठा लिया. पूरी रात न मुझे खुशी की याद रही न अपने पत्नीधर्म की.

रात के उस व्यभिचार के बाद भी मैं सुबह बड़े ही सहज भाव से उठी और खुद को तरोताजा महसूस किया. मयंक के साथ ने जैसे जीवन में एक उमंग भर दी थी. उस वक्त मेरे मन में कोई अपराधबोध या आत्मग्लानि नहीं थी. मैं बहुत खुश थी और खुशी को मौसी के घर से यह बहाना कर के ले आई कि रात बहुत हो चुकी थी तो मैं ने आप को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा. मौसी ने फौरन मेरी बात पर विश्वास भी कर लिया. अपने सभी काम समय पर निबटा कर पार्लर खोलते वक्त मैं यही सोचने लगी कि ऋ षभ तो कल आने वाले हैं यानी आज रात भी… और मैं सुर्ख होने लगी. जल्दी से सारे काम निबटाने के बाद उम्मीद के मुताबिक अंधेरा होते ही मयंक आ गया. खुशी को सुला कर हम दोनों एक बार फिर प्यार में डूब गए. मुझे पता नहीं था कि मेरी यह खुमारी आगे क्या गुल खिलाने वाली है.

ऋ षभ के चेन्नई से आ जाने के बाद हमारी मुलाकात उतनी आसान न रही और न ही हमारे मिलने की कोई उपयुक्त जगह. 10-12 दिनों में ही हमारे बीच में जिस्मानी दूरी आने से हम बौखला उठे और फिर आपसी रजामंदी से भाग जाने का निर्णय ले लिया, किसी भी अंजाम की परवाह किए बगैर. मयंक का तो पहले ही अपने परिवार से कोई खास जुड़ाव नहीं था. इधर उस के शारीरिक आकर्षण में बंधी मैं भी घायल हिरनी सी उस के साथ चलने को तत्पर हो उठी.

एक दिन खुशी के स्कूल की छुट्टी थी. तब ऋषभ के औफिस जाने के बाद मैं ने खुशी को खिलापिला कर सुला दिया और चल पड़ी अपने नए सफर की ओर.

अब सोचती हूं तो बहुत धिक्कारती हूं खुद को परंतु उस वक्त वासना की आंधी के आगे मेरा सतीत्व और ममत्व दोनों हार गए थे. गोवा के एक रिजोर्ट में 2-3 दिन रहने के बाद जब हमारी खुमारी कुछ उतरी, तो समझ आया कि जीवन में शारीरिक जरूरतों के अलावा भी बहुत कुछ जरूरी होता है. उस का कारण यह था कि मयंक जो 10-15 हजार रुपए अपने घर से लाया था, वे खत्म होने को थे. मेरे पास जो भी कैश था, मैं ने मयंक के हाथ में रख दिया.

‘‘इस से क्या होगा?’’ उस के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे. ‘‘तो मैं क्या करूं, जो मेरे पास था तुम्हें दे दिया. अब क्या करना है तुम जानो,’’ मैं गुस्से में बोली.

‘‘अच्छा तो क्या सारी जिम्मेदारी मेरी है. तुम भी तो कुछ ला सकती थीं?’’ उस ने झुंझला कर कहा.

‘‘तो प्यार का दम भरते ही क्यों थे जब तुम्हारी जेब खाली थी? बहुत बड़े मर्द बनते थे न? अब कहां गई तुम्हारी मर्दानगी? बातें तो चांदसितारों की करते थे. क्या तुम्हें इन खर्चों के बारे में पहले नहीं सोचना चाहिए था?’’ मैं ने गुस्से में अपने पहने हुए गहने उतार कर उस के हाथों में रख दिए. ‘‘मुझ पर चीखने की बजाय अपने गरीबान में झांको और देने ही हैं तो सारे गहने दो… यह मंगलसूत्र भी,’’ मयंक ने उतावलेपन से मेरी ओर बढ़ते हुए कहा.

‘‘नहीं इसे मैं नहीं दूंगी. यह ऋ षभ के प्यार की निशानी है,’’ मैं ने भावावेश में कहा. ‘‘वाह रे सतीसावित्री. पति और बच्ची को छोड़ते समय तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजा और अब उस की निशानी को रखने का नाटक कर रही हो,’’ मयंक अब बेशर्मी पर उतर आया था.

‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… आज मैं तुम्हारे कारण ही अपनी हरीभरी गृहस्थी को छोड़ कर यहां हूं. यहां तक कि अपनी बेटी खुशी को भी छोड़ दिया मैं ने तुम्हारे लिए,’’ मैं लगभग चीखते हुए बोली. ‘‘तो कोई एहसान नहीं किया. तुम्हारा पति तुम्हें जो नहीं दे पाया, वह मैं ने दिया है. बड़े मजे किए हैं तुम ने मेरे साथ मैडम,’’ मयंक ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया था.

मयंक के इस बदले रूप को देख कर मैं हैरान रह गई. मन का क्षोभ, बेबसी और ठगे जाने की पीड़ा आंखों से बह निकली. मन के किसी कोने में घर से भागने का मलाल भी हुआ और अपनी नामसझी पर गुस्सा भी आया. मुझे रोता देख मयंक मेरे पास आया और हमेशा की तरह मुझे दुलारने की कोशिश की, लेकिन आज उस की यह हरकत मुझे बहुत नापाक लगी. आवेश में आ कर मैं ने उस के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया, ‘‘दूर हो जा मुझ से, मेरे पास आने की हिम्मत भी मत करना.’’

‘‘अरे पागल हो गई है क्या? क्यों चिल्ला रही है? भीड़ इकट्ठी हो जाएगी. मत भूल कि हम यहां भाग कर आए है… तुम्हारी जो मरजी आए करो,’’ कह कर मयंक पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर चला गया. उस वक्त अपनी हालत के लिए अपने सिवा किसे कोसती. ऋ षभ ने 1-2 बार अप्रत्यक्ष रूप से मुझे समझाने की कोशिश भी की थी, परंतु उस समय मुझ पर मयंक के प्यार का ऐसा भूत सवार था कि बिना कोई आगापीछा सोचे मैं यह काम कर बैठी. अब मैं अपनी उसी करनी पर शर्मिंदा हो कर रोए जा रही थी.

शाम हो गईं मयंक नहीं लौटा. अब मैं और घबरा गई. अगर उस ने भी मुझे छोड़ दिया तो मैं क्या करूंगी, कहां जाऊंगी? एक तो अनजानी जगह उस पर हाथ में दो पैसे भी नहीं… शायद सच्चे रिश्तों को नकारने की मुझे सजा मिली थी. मेरी बरबादी की शुरुआत हो चुकी थी. ऋ षभ जैसे सच्चे जीवनसाथी और अपनी मासूम बच्ची को धोखा दे कर मैं ने जो वासनाजनित गलत राह चुनी थी उस की भयावहता का यह सिर्फ आगाज था. मयंक को मैं कौल पर कौल किए जा रही थी, पर उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. वहां इसी तरह ऋ षभ भी तो परेशान हो रहे होंगे, यह विचार आते ही उन्हें फोन लगाना चाहा, पर फिर रुक गई कि किस मुंह से और क्या सफाई दूंगी मैं? मयंक द्वारा लाई गई इस नई सिम में और कोई भी नंबर सेव नहीं था. रात होने को थी. मेरा सारा धैर्य जवाब दे चुका था.

तभी दरवाजे पर हुई आहट से दौड़ कर दरवाजा खोला तो हैरानपरेशान ऋ षभ को देखते ही चौंक पड़ी. मन चाहा कि लिपट जाऊं उन से और जी भर कर रो लूं, पर अपनी करतूत याद आते ही मुझ पर मानो घड़ों पानी पड़ गया. मयंक के पापा भी उन के साथ थे, पर मुझे कमरे में अकेली पा कर वे बाहर ही बैठ गए मयंक के इंतजार में. ऋ षभ ने पास आ कर स्नेह से मेरी पीठ पर हाथ रखा तो मैं पिघल कर उन के सीने से लग गई, ‘‘मुझे माफ कर दो ऋ षभ, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई,’’ मैं ने हिचकियां लेते हुए कहा.

काफी देर तक खड़े रह ऋ षभ अपनी मूक संवेदनाएं प्रकट करते रहे, फिर बोले, ‘‘घर चलो मीनू, खुशी तुम्हारी राह देख रही है.’’ ‘‘नहीं ऋ षभ अब मैं वहां क्या मुंह ले कर जाऊंगी. खुशी से क्या कहूंगी? मैं ने जो भी किया है, उस की कोई माफी नहीं,’’ कह मैं सिसक उठी.

ऋ षभ काफी देर तक मुझे समझाते रहे. उन्होंने बताया कि किस तरह मयंक के किसी दोस्त से हमारी जानकारी निकाल कर बड़ी मुश्किल से यहां आए हैं. मैं मन ही मन और भी लज्जित हो गई. आखिरकार मैं लौटने को तैयार हो गई. करती भी क्या. मयंक का असली रंग तो देख ही चुकी थी. ‘‘अंकलजी, आप मयंक से बात कर उसे ले आना, मैं मीनू को ले कर जा रहा हूं,’’ चिंतित बैठे मयंक के पिता से ऋ षभ ने कहा और मेरा हाथ पकड़ कर बाहर आ गए.

घर पहुंचते ही दादी के हाथों से छिटक कर खुशी मम्मामम्मा कहते हुए मेरे गले आ लगी. मैं उसे जोर से छाती से लगा कर प्यार करने लगी. वहां मौजूद सभी लोगों को शायद यह प्यार बनावटी लग रहा हो, पर मैं वास्तव में शर्मिंदा थी. ऋ षभ की वजह से सभी ने ज्यादा रिएक्ट नहीं किया, पर उन की निगाहों में खासी नाराजगी दिखी. मेरा अपना भाई भी मुझ से दूर खड़ा था. मुझे लौटे 2-3 दिन बीत चुके थे. सारा समय मैं अपने कमरे में ही रहती थी. ऋ षभ आ कर मुझे खाना खिला जाते. नन्ही खुशी तो जैसे चहक उठी थी. पर मेरे सासससुर व भाई ने अभी तक मुझ से कोई बात नहीं की थी.

ऐसे ही एक रात अचानक मेरी नींद खुली तो देखा ऋ षभ मेरे पास नहीं हैं, हां खुशी मेरी ही बगल में सोई थी. मैं उठ कर उन्हें पुकारती हुई बाहर निकली ही थी कि बैठक से आती आवाजों ने मुझे ठिठकने को मजबूर कर दिया. ये आवाजें मेरे भाई की थीं. वह कह रहा था, ‘‘जीजाजी मैं आंटीअंकलजी की बात से सहमत हूं. यह रिश्ता अब सामान्य नहीं हो पाएगा. यह दीदी की गलती नहीं शर्मनाक हरकत है, जिस का दंड उस के साथसाथ सारी जिंदगी आप को भी भुगतना पड़ेगा और आगे जा कर खुशी को भी.’’

‘‘मेरी बात तो सुनो,’’ ऋ षभ ने कुछ कहना चाहा.

‘‘नहीं जीजाजी आप सुनो… खुशी अभी छोटी है. बड़ी हो कर जब उसे सब मालूम पड़ेगा तो वह भी अपनी मां को कभी माफ नहीं कर पाएगी और फिर यह तो सोचिए कि ऐसी लड़की से कौन शादी करना चाहेगा जिस की मां भाग…’’ ‘‘बस करो जतिन… तुम बहुत बोल चुके,’’ ऋ षभ ने थोड़ा गुस्से से कहा.

‘‘क्या गलत कह रहा है जतिन… अरे वह तो उस का भाई है उस का अपना खून. जब वह उसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा है, तो तू किस मिट्टी का बना है?’’ इस बार ऋ षभ के पापा बोले. ‘‘पापा, आप सभी समझने की कोशिश करें. मैं मीनू को जानता हूं… पत्नी है वह मेरी. अगर उस से कोई गलती हुई है, तो कहीं न कहीं मैं भी कुछ हद तक उस के लिए जिम्मेदार हूं. उस की इच्छाओं और चाहतों को मैं ने भी कहीं नजरअंदाज किया होगा, तभी तो उसे मयंक की जरूरत पड़ी होगी,’’ ऋ षभ के चेहरे पर गहरी संवेदना के भाव थे.

‘‘मैं यह नहीं कहता कि मीनू से गलती नहीं हुई है. लेकिन यही गलती मयंक से भी हुई है और आप का समाज मयंक को तो बाइज्जत बरी कर देगा इस गुनाह से. कल से ही वह फिर आवारागर्दी करता नजर आएगा इसी महल्ले में. फिर मेरी मीनू ही यह सजा क्यों भुगते? पति हूं मैं उस का. जीवन भर साथ निभाने के वादे किए थे तो उस की इस मुश्किल घड़ी में कैसे उस का हाथ छोड़ दूं? और अगर मान लीजिए यही गुनाह मुझ से हो जाता तो उसे यह मशवरा देने के बजाय आप लोग यही समझा रहे होते कि मीनू जाने दे, माफ कर दे ऋ षभ को. अपनी गृहस्थी टूटने से बचा ले, और न जाने क्याक्या? ‘‘सिर्फ इसलिए कि वह एक औरत है, उस के द्वारा की गई भूल के लिए हम उसे सूली पर चढ़ा दें? माफ कीजिए यह सजा मुझे मान्य नहीं है. मीनू के हमारे जीवन में होने से ही हमारी खुशियां हैं, उस के बिना मैं और खुशी दोनों अधूरे हैं. मैं मीनू की जिंदगी बरबाद नहीं कर सकता पापा. यह मेरा अंतिम निर्णय है.’’

ऋ षभ के दिए तर्कों का किसी के पास जवाब नहीं था. सभी चुप हो गए, पर मेरा मन चीत्कार कर उठा. बोली, ‘‘मुझे माफ कर दो ऋ षभ. तुम ने मेरी पीड़ा को समझा, पर मैं आज तक तुम्हें पहचान न सकी. किसी के बाहरी आकर्षण में पड़ कर मैं ने तुम्हारा दिल दुखाया और तुम्हें बहुत गहरा घाव दे बैठी. सचमुच मैं माफी के योग्य नहीं हूं.’’ पर कहते हैं न कि समय बड़े से बड़ा घाव भी कर देता है. इस घटना को 1 महीना हो गया था. ऋ षभ और मेरे बीच सभी कुछ सामान्य हो चला था. मैं अभी भी बाहर निकल कर लोगों का सामना करने से कतराती थी. मयंक के बारे में भी मुझे कोई जानकारी नहीं थी. अगस्त माह शुरू हो चुका था. बारिश का मौसम मुझे सब से सुहावना लगता था.

ऐसी ही एक खूबसूरत शाम ऋ षभ को घर जल्दी आया देख मैं चौंक पड़ी, ‘‘आज इतनी जल्दी?’’ मैं ने पूछा. ‘‘हां, तैयार हो जाओ, कहीं घूमने चलते हैं,’’ ऋ षभ ने मुसकरा कर कहा.

‘‘लेकिन खुशी सो रही है,’’ मैं ने बात टालने की गरज से कहा, क्योंकि मैं बाहर जाना ही नहीं चाहती थी. ‘‘मैं ने मौसी को बोल दिया है. आज वे खुशी के साथ यही रुक जाएंगी,’’ ऋ षभ ने कहा.

‘‘ठीक है, फिर मैं तैयार हो जाती हूं,’’ मैं ऋषभ को बिलकुल नाराज नहीं करना चाहती थी. मेरी वजह से उन्होंने पहले ही काफी कुछ सहा था. जब तक हम तैयार हुए, बारिश ने मौसम को और भी खुशगवार बना दिया था.

मौसी आ गई थीं. खुशी को उन्हें सौंप जब मैं बाहर निकली तो मेरी ओर देखते हुए इन्होंने एक प्यारी सी मुसकान बिखेरी. फिर गाड़ी निकालने लगे. मैं भी गेट खोल कर इन की मदद करने लगी. तभी अचानक मयंक के घर पर मेरी नजर पड़ी. ऊपर बालकनी से वह मुझे न जाने कब से निहारे जा रहा था. उस घटना के बाद मेरा और मयंक का पहली बार सामना हो रहा था. मेरा असहज हो जाना स्वाभाविक था.

ऊपर देखते हुए मैं लड़खड़ा सी गई. तभी 2 मजबूत बाजुओं ने मुझे सहारा दे कर थाम लिया. ये ऋ षभ थे जिन्होंने बड़ी ही अदा से मेरा हाथ थाम मुझे कार में बैठाया. आसपास के घरों से भी कई जोड़ी निगाहों ने हमें तब तक कैद में रखा जब तक कि हम उन की आंखों से ओझल नहीं हो गए.

खूबसूरत आलीशान होटल के अंदर एकदूसरे का हाथ थामे हम ने प्रवेश किया. अपनी खोई गरिमा को वापस पा कर मैं तो फूली नहीं समा रही थी. मन ही मन उस एक पल का शुक्रिया अदा कर रही थी, जिस पल मैं ने उन से शादी के लिए हां की थी.

गृहशोभा विशेष

हौल की धीमी रोशनी में ऋ षभ ने मुझे डांस के लिए इनवाइट किया, जिसे मैं ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. उन के सीने से लग कर डांस करते हुए मैं खुद को संसार की सब से खुशहाल औरत समझ रही थी. कुछ देर बाद प्यारा सा डिनर कर के हम होटल के उस कमरे में जाने लगे, जो ऋषभ ने पहले से ही बुक किया हुआ था.

‘‘ये सब करने की क्या जरूरत थी ऋ षभ,’’ काफी समय बाद मैं ने उन्हें उन के नाम से पुकारा. ‘‘अंदर तो आओ,’’ कह कर ऋ षभ ने मुझे अपनी बांहों में उठा लिया.

‘‘अरे, यह क्या कर रहे हैं? सब हमें देख रहे हैं,’’ मैं ने शरमाते हुए कहा. ‘‘देखने दो. इन्हें भी तो मालूम हो कि हमारी शरीकेहयात कितनी खूबसूरत हैं,’’ अंदर आ कर इन्होंने मुझे बैड पर लिटाते हुए कहा. उस के बाद अपनी जेब से एक छोटा सा गिफ्ट निकाल कर बड़े ही रोमांटिक अंदाज में मुझे पेश किया. उस में से हार्ट शेप की एक डायमंड रिंग निकाल कर इन्होंने मुझे पहना दी.

‘‘थैंकयू ऋ षभ,’’ कह मैं इन के गले लग गई. मेरी आंखों आंसुओं से भीगी थीं. अपनी पीठ पर गीलेपन का एहसास होते ही इन्होंने मेरा चेहरा हाथों में ले लिया, ‘‘यह क्या? तुम रो रही हो?’’

‘‘मैं ने तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया है ऋषभ… किस मुंह से माफी मांगू?’’ ‘‘बस मीनू अब इस टौपिक को आज के बाद यहीं खत्म कर दो. तुम मेरी प्रेयसी, प्रेरणा सभी कुछ हो. तुम्हें घर ला कर मैं ने कोई एहसान नहीं किया है. बस अब वह सब तुम्हें देने की कोशिश कर रहा हूं, जिस की तुम हकदार हो. मेरी एक बात ध्यान से सुनो. जब तक तुम खुद को माफ नहीं कर देतीं, हर कोई तुम्हें गुनहगार बताता रहेगा, इसलिए प्लीज इस तकलीफ से बाहर आओ. मैं तुम्हें इस तरह आत्मग्लानि में जीते नहीं देख सकता,’’ कह कर ऋ षभ ने मुझे अपने सीने से लगा लिया.’’

उस खूबसूरत रात उन पवित्र बांहों के आगोश में जाने कितने समय बाद मुझे चैन की नींद आई. दूसरा पूरा दिन भी हम होटल में ही रुके. आज मुझे मयंक का शारीरिक आकर्षण ऋ षभ के प्यार के आगे बौना नजर आ रहा था. मौसी से फोन कर हम लगातार खुशी के संपर्क में भी रहे. घर आने के बाद हमारी जिंदगी बदल चुकी थी. अपनी उस गलती को नादानी समझ मैं भी भुलाने लगी थी. ऋ षभ के प्यार व विश्वास ने मेरे दिलोदिमाग में मजबूती से अपनी जड़ें जमा ली थीं.

एक दिन ऋ षभ ने मुझे पार्लर की चाबी सौंपते हुए अपना काम दोबारा शुरू करने को कहा. मैं थोड़ा सोच में पड़ गई. एक तो महीनों से पार्लर बंद पड़ा था, दूसरे पार्लर आने वाली औरतों की निगाहों में तैरते प्रश्नों का सामना कैसे करूंगी यह सोच कर मन बैठा जा रहा था. मगर ऋ षभ ने मुझे अपने साथ का भरोसा दिया. उसी दिन कामवाली बाई के साथ जुट कर मैं ने अपना पार्लर साफ किया. कई कौस्टमैटिक जो ऐक्सपायर्ड हो गए थे, उन्हें हटा कर हर चीज व्यवस्थित की. कुछ जरूरी सामान की लिस्ट बनाई. पार्लर खोले 2-3 दिन हो गए थे, उस का बोर्ड भी ऋ षभ ने साफ कर फिर से लगा दिया था, परंतु एक भी क्लाइंट अभी तक नहीं आई थी. अपने सभी काम जल्दी से निबटा कर मैं पार्लर में बैठ जाती. किसी के आने का पूरा दिन बैठेबैठे इंतजार करती रहती. ऋ षभ से मेरे मन की बेचैनी छिपी नहीं थी.

एक दिन इन्होंने शाम के खाने पर अपने सहयोगी को पत्नी के साथ बुलाया. वे लोग खाना खा कर बैठे. थोड़ी देर हंसीमजाक और मस्ती का दौर चला. बातों ही बातों में जब ऋ षभ ने उन्हें बताया कि मेरी वाइफ बहुत टैलेंटेड हैं व पार्लर चलाती हैं, तो उन के दोस्त की पत्नी ने मेरा पार्लर देखा और सराहा. अगले ही दिन वे अपनी एक फ्रैंड के साथ पार्लर आईं और काफी काम कराया, मैं बहुत उत्साहित थी. उन के जाने के बाद बैठी ही थी कि कुछ दूर रहने वाली नैंसी और ममता भी आ गईं. नैंसी बड़ी ही मुंहफट थी. मैं ने हंस कर दोनों का स्वागत किया. नैंसी को अपने बालों को अलग लुक देना था तथा ममता को वैक्सिंग करवानी थी. नैंसी को अपने बालों की कटिंग बहुत पसंद आई. दोनों ही मेरे काम से खुश दिखीं. इस दौरान हमारे बीच कुछ फौर्मल सी बातचीत भी हुई.

एक दिन सुबहसुबह छुट्टी के दिन खुशी अभी सो कर नहीं उठी थी, ऋ षभ वाशरूम में थे कि तभी किसी ने बैल बजाई. यह सोच कर कि बाई आ गईर् होगी मैं ने दरवाजा खोला तो सामने मयंक को देख कर अचकचा गई. मेरा मन कसैला हो गया और चेहरे पर तनाव आ गया. ‘‘भैया हैं क्या?’’ मयंक धीरे से बोला और आंखों ही आंखों में मुझे कुछ समझाने की कोशिश करने लगा. उस की आंखों के भाव समझ मुझे उस से नफरत हो आई. क्या अब भी उसे मुझ से कुछ उम्मीद है? छि: यह अपनेआप को समझता क्या है? बहुत कड़े शब्दों में कोई जवाब देना चाहती थी कि तभी ऋ षभ ने पीछे से आवाज दी, ‘‘आओआओ मयंक, तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.

‘‘जी भैया आज्ञा कीजिए,’’ शब्दों में शहद घुली मिठास ले कर वह बेशर्मों की तरह बोला. ‘‘जान, मयंक के लिए कुछ ले कर आओ,’’ मेरे हाथों को थाम ऋ षभ ने मेरी पेशानी को चूमते हुए कहा.

‘‘जी,’’ ऋ षभ की बात का आशय समझ मैं वहां से चली आई. ‘‘मयंक, आप की भाभी यानी हमारी बेगम साहिबा का जन्मदिन आ रहा है 26 सितंबर को, तो एक पार्टी प्लान करने की सोच रहा हूं.’’

‘‘जी भैया बहुत अच्छा, मैं सारा इंतजाम कर दूंगा,’’ मयंक को जैसे इसी मौके की तलाश थी. ऋ षभ के बताए गार्डन में मयंक द्वारा वाकई बहुत खूबसूरत इंतजाम कर दिया गया. हालांकि इस बीच मयंक ने मुझे फिर से बहकाने का एक भी मौका नहीं छोड़ा. जब भी मेरे सामने अपनी जाहिल हरकतें करता और मैं उसे जवाब देने को आतुर होती, न जाने कहां से ऋ षभ हमारे बीच आ जाते. ऐसा लगता कि वे हमेशा मेरे पास ही हैं. लेकिन एक बात तो तय थी कि मयंक के जिन गुणों या हरकतों पर पहले मैं रीझ उठती थी अब उस की उन्हीं हरकतों पर मुझे क्रोध आता था.

शाम को ऋ षभ के पसंदीदा ग्रे शेड गाउन को पहन जब उन का हाथ थाम कर मैं ने गार्डन के हौल में प्रवेश किया, तो सभी ने तारीफ भरी नजरों से तालियां बजा कर हमारा स्वागत किया. पिंक कलर की फ्रौक में खुशी भी किसी परी से कम नहीं लग रही थी. केक कटने के बाद बजती तालियों के बीच सब से पहले मैं ने खुशी को केक खिलाया, फिर ऋ षभ ने मुझे व मैं ने ऋ षभ को खिलाया.

तभी अचानक लाइट के चले जाने से जो जहां था वहीं खड़ा रह गया. किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. कई लोगों की मिलीजुली आवाजें कानों में आ रही थीं कि सहसा किसी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे एक ओर ले चला. एक पल को तो मैं समझ नहीं पाई, पर फिर उन हाथों की छुअन का एहसास होते ही मैं ने उस व्यक्ति के गालों पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया. तभी लाइट आ गई. मेरा अंदाजा बिलकुल सही था, यह मयंक ही था, जिस ने लाइट जाने का फायदा उठाने की कोशिश की थी. फिर तो मैं ने मयंक को खूब खरीखोटी सुनाई. मेरे मन में उस के पति जितना आक्रोश था सारा मेरी जबान पर आ गया. उस की कारगुजारियों को बेपरदा करतेकरते मैं स्वयं भी आत्मग्लानि से भर भावुक हो उठी.

तभी किसी ने फिर पीछे से मेरा हाथ थाम लिया. हां ये ऋ षभ ही थे हमेशा की तरह. आगे ऋ षभ ने कहा, ‘‘दोस्तो, हकीकत से आप सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं. जो भी कुछ हो चुका है उस में मैं अपनी पत्नी का दोष नहीं मानता. कई बार स्थितियां व निर्णय हमारे बस में नहीं रहते. मेरा मानना है कि मेरी पत्नी आज भी उतनी ही पवित्र है और आज भी मैं उस का उतना ही सम्मान करता हूं जितना पहले करता था, बल्कि अब और ज्यादा. वैसे भी कायदे से सजा उसे मिलनी चाहिए, जो आज भी वही गलती दोहराने की कोशिश में लगा है. आप सभी देख चुके हैं. सचाई आप के सामने है.’’

थप्पड़ खाने के बाद मयंक कुछ गुस्से और चिढ़ से मुझे घूरने लगा. तभी ऋषभ की साफगोई देख कर महल्ले वाले भी हमारे पक्ष में बोलने लगे. बात बढ़ती देख मयंक के मम्मीपापा उसे वहां से ले कर चले गए. पार्टी में आए अचानक इस व्यवधान के लिए ऋ षभ और मैं ने मेहमानों से काफी मांगी. फिर सभी ने उत्साहपूर्वक पूरा प्रोग्राम अटैंड किया. पार्टी में जो कुछ हुआ उस ने मेरे खोए आत्मविश्वास को एक बार फिर लौटा दिया. ऋ षभ के साथ ने मुझ में एक साहस का संचार कर दिया.

मयंक को बारबार बुला कर उस से मेरा सामना कराना भी ऋषभ ने जानबूझ कर कराया था, ताकि मैं समाज के सामने अपने अपराधबोध से मुक्त हो सकूं, क्योंकि वे मयंक को मुझ से बेहतर समझ पाए थे और जानते थे कि मुझ से मिलने पर वह दोबारा अपनी जलील हरकत अवश्य दोहराएगा. बहरहाल, अब मैं बेधड़क बाहर आनेजाने लगी. मेरी झिझक व संकोच दूर हो गया था. मयंक मुझे फिर दिखाई नहीं पड़ा. दूसरे पड़ोसियों से ही मालूम हुआ कि मयंक के मातापिता अपना घर बेच कर कहीं और चले गए हैं. सुन कर मैं ने राहत की सांस ली.

उन के घर बदलने के 7-8 महीने बाद ही पता चला था कि मयंक की शादी हो गई है. अब उड़तीउड़ती खबरें कभीकभार सुनने को मिलती हैं कि वह अपनी पत्नी को बहुत परेशान करता है. मैं खुद को धन्य समझती हूं कि ऋषभ जैसा जीवनसाथी मुझे मिला, जिस ने मुझे मयंक के झूठे मोहपाश के दलदल से बचा लिया. तभी मेरी नजर घड़ी पर गई तो चौंक उठी कि खुशी के आने का वक्त हो गया है. घर का सारा काम जस का तस पड़ा था. खुशी को लेने जाने के लिए ताला लगा कर घर से निकली, रास्ते में ऋ षभ को फोन किया, तो उन्होंने बताया कि उन्हें मालूम हो चुका है, वे भी स्तब्ध हैं यह जान कर कि उस की पत्नी ने आत्महत्या कर ली है.

मैं पूजा के लिए वाकई बहुत दुखी थी. लेकिन मयंक जैसे अवसरपरस्त व बदतमीज इंसान के लिए मेरे मन में कोई संवेदना नहीं थी.

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