कावेरी लंचबाक्स पैक कर उसे अपने बैग में रखने के लिए बढ़ी ही थीं कि उन का बेटा दौड़ता हुआ आया और दरवाजे से ही चिल्ला कर बोला, ‘‘अम्मां, गांव में पिताजी का इंतकाल हो गया.’’

कावेरी ने सुना पर बात को अनसुना कर वे अपना काम करती रहीं. यद्यपि पति के मरने की खबर से एक क्षण को मन में कुछ जरूर हुआ था, किंतु उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई.

‘‘आप सुन रही हैं न?’’ यह कह कर सुंदरम ने मां का कंधा पकड़ उन्हें झकझोरा तो कावेरी उसे एकटक निहारती रहीं, मानो पूछ रही हों कि तू क्यों झकझोरझकझोर कर यह कह रहा है.

छोटा बेटा भी तब तक वहां आ गया था और क्रोध से मां को घूरने लगा, मानो वे उस की अपराधिनी हों, ‘‘पिता कल रात को गुजर गए हैं और आप यह सुन कर भी दफ्तर जाने की तैयारी में हैं?’’

कावेरी चुपचाप फाइलें उठा कर बैग में सहेजने लगीं. उन का दिल सुन्न था. न उस में स्पंदन, न संवेदन की कोई लहर थी. उन का हृदय मरुस्थल सा बन चुका था.

छोटे बेटे ने अपनी पत्नी की ओर देख कर कहा, ‘‘रोओ…चिल्लाओ…छाती पीटो… माथा पटको…अपने अनाथ होने की दुहाई दो…’’ इस पर भी अम्मां की कोई प्रतिक्रिया न देख कर छोटे बेटे मुन्नूस्वामी ने पूछा, ‘‘अम्मां, तुम दफ्तर जा रही हो…’’

कावेरी अपना पर्स और बैग उठा कर घर से निकल गईं.

बसों की भीड़भाड़ में भी कावेरी का मन शांत रहा. दफ्तर में भी उन्होंने किसी से कुछ नहीं बताया और रोज की तरह अपना काम करती रहीं.

कावेरी के दफ्तर चले जाने से उन की दोनों भाभियां मन ही मन काफी नाराज थीं. बड़ी भाभी अमलू तड़प उठी और उस ने देवरानी वल्ली को खूब भड़काया. एक बजतेबजते दफ्तर में अमलू भाभी ने फोन कर बता दिया कि कावेरी के पति की रात को मौत हो गई है.

‘तुम्हारे पति का कल रात देहांत हो गया और तुम दफ्तर आ गईं?’’ मैनेजर ने कहा.

कावेरी के इस व्यवहार से दफ्तर के लोगों को समझ में आ गया कि कहीं कुछ गड़बड़ है. दफ्तर में दबी जबान से चर्चा होने लगी.  कावेरी को दफ्तर का वातावरण अजनबी सा लगने लगा तो वे घर आ गईं. घर में आसपड़ोस के लोग जमा थे. उन की भाभियां और बहुएं उन के बुरे व्यवहार को ले कर चर्चा कर रही थीं. घर का दृश्य देख कावेरी को समझते देर न लगी कि अमलू भाभी किस बात को ले कर इतना फसाद खड़ा कर रही हैं.

कावेरी को देखते ही बेटा सुंदरम पास आ कर बोला, ‘‘अम्मां, हम सब जा रहे हैं. तुम चलोगी?’’

‘‘तुम सब का मरने वाले के साथ कौन सा रिश्ता है जो मेरा जीवन यातनाओं से भरते जा रहे हो…आज तक तुम ने अपने बाप की शक्ल देखी…आज 35 साल के बाद सब चेत रहे हैं… जिस से मेरा नाता तुम सब ने मिल कर तुड़वा दिया था. आज मेरे सूखे जख्म क्यों छील कर हरे कर रहे हो?’’

‘‘नहीं, कावेरी,’’ बड़े भाई ने समझाते हुए कहा, ‘‘जो हुआ सो हुआ…तुम्हारी ससुराल से यह खबर आई है, अगर खबर न आई होती तो बात दूसरी थी.’’

‘‘आखिर है तो वह तुम्हारे दोनों बेटों का पिता…’’ छोटे भाई ने जोड़ा.

दोनों बहुएं यह नहीं चाहती थीं कि बाहर का कोई बात बनाए. इसलिए कहा, ‘‘देखो, अम्मां, अब पिताजी जीवित नहीं हैं. मरते समय उन्होंने अपने भाई से अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की बात कही भी होगी तो हमें क्या पता? मां, अगर आप जाएंगी तो उन की आत्मा को शांति मिलेगी कि मेरी पत्नी ने मुझे माफ कर दिया, मेरा अंतिम संस्कार भी किया. आप की आने वाली पीढ़ी यानी पोतेपोतियों के सुखमय जीवन के लिए आप का चलना जरूरी है.’’

‘‘आप सब जाइए और दुनियादारी निभाइए,’’ कावेरी ने कहा, ‘‘मैं न दुनियादारी निभाऊंगी और न आप की बातों में आऊंगी.’’

यह सुनने के बाद बड़ी भाभी अमलू ने सिर धुनना शुरू किया और जोरजोर से कावेरी को ताने देने लगीं. दूसरी भाभी भी बड़ी के मुताबिक छाती पीटने लगीं. घर में चीखनेचिल्लाने की आवाजें गूंजने लगीं.

दोनों भाइयों के जोर देने पर अनमनी सी कावेरी उठीं और बोलीं, ‘‘आप को मेरा जीवन नरक में ढकेल कर खुशी होती है तो चलो,’’ इतना कह चप्पल पहन वे घर से बाहर आ गईं.

35 साल पहले जिस घर को छोड़ कर कावेरी गई थीं उस घर में पति कुमरेशन की लाश जमीन पर पड़ी थी. शराब पीपी कर उन का शरीर बड़ा भद्दा और स्याह पड़ चुका था. दूर से देखने पर किसी कोढ़ी की लाश लगती थी. उस पर मक्खियां भिनभिना रही थीं. कावेरी ने एक नजर लाश पर डाली और मन घृणा से भर गया था. इतना ऊंचा पद और पैसा होते हुए भी कुत्ते की मौत…इस पियक्कड़ को क्या पता कि सारा पैसा छोटा भाई खा गया था. कावेरी का मन भर आया. वे बाहर आ गईं.

‘‘क्रियाकर्म, दाहसंस्कार, रीतिनीति नहीं निभाओगी, भाभी?’’ कावेरी के देवर ने पूछा.

‘‘आज तक तुम ने किया है, आगे भी तुम ही करो,’’ इतना कह कर कावेरी खामोश हो गईं.

उन के मन में पति के मरने का तनिक भी अफसोस न था. रिश्तेदारों ने उन को बिठा कर सिर पर पानी डाला, पहनने को साधारण सी साड़ी दी और विधवा को लगाने वाली भभूत लगाई.

दाहसंस्कार करते समय पोतीपोते मृतक कुमरेशन के इर्दगिर्द खड़े कर दिए गए. दाहसंस्कार कर शाम 7 बजे सब घर आ गए थे. बड़े बेटे सुंदरम ने बताया कि दाहसंस्कार का सारा इंतजाम उन्हें (अम्मां को) ही करना है. कावेरी क्षुब्ध हो उठीं.

‘‘मुझे कुछ नहीं करना है. मैं इस आदमी को नहीं जानती. जब मेरे दफ्तर के पीछे रहते हुए भी यह कभी मुझ से मिलने नहीं आया, न कभी पता लगाया कि बच्चे कैसे हैं, कितने बड़े हो गए हैं? क्या कर रहे हैं? आज मेरे दोनों बच्चे काबिल और बेहतर जीवन जी रहे हैं तो अपने बाप के कारण नहीं बल्कि मेरे कारण क्योंकि मैं खुद रातदिन मेहनत करती रही, किसी ने मुझे मदद की…’’

‘‘पर अम्मां,’’ मुन्नूस्वामी ने टोका.

‘‘तू चुप कर,’’ कावेरी चीखीं, ‘‘तू क्या उस की तरफदारी कर रहा है? तू ने तो अपने पिता की शक्ल तक नहीं देखी. आज ही देखी है न…फिर कौन सा पिता और कौन सा चाचा…

‘मर गया तो क्रियाकर्म हमें करना है और जिंदा था तो सब उस का था…’ कावेरी ने भाभियों के तेवर देखे तो समझ गईं कि ये बदला लेना चाहती हैं, अत: एकाएक चिल्लाईं, ‘‘तुम मुझे विधवा देखना चाहती हो न, ठीक है आज से तुम सब अपने मन की करो. मैं कुछ नहीं बोलूंगी.’’

तेरहवीं तक प्रतिदिन पौ फटने से पहले ससुराल के रिश्तेनाते वाले कावेरी पर पानी डालते. उन का हर दिन अलगअलग फूलों से शृंगार करते किंतु पहनने को 2 साडि़यां ही देते. किसी चीज को छूना उन के लिए मना था. 12वें दिन मुंहअंधेरे ही उठ कर गले का मंगलसूत्र दूध में डलवा दिया गया और मुंह छिपा कर घर के एक कोने में बिठा दिया गया.

तेरहवीं के बाद मंगलसूत्र तिरुपति की हुंडी में डालने के लिए परिवार एकसाथ जाना चाहता था पर दूरदर्शी बड़े भाई ने समझदारी से काम किया. वे अपनी छोटी बहन के दिल का हाल जानते थे. वे कावेरी को और टूटते नहीं देखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने ऐसी तारीख निश्चित की जिस से काम भी हो जाए और आने वाले नए साल की सुखदाई सुबह भी हो जाए.

कावेरी पिछले 35 साल के जीवन में  जाने कैसेकैसे कंटीले रास्तों को पार कर चुकी थीं. उन्होंने कमरे में झांका तो सारा परिवार गहरी नींद में सो रहा था. खिड़की खोल कर बाहर देखा तो सड़क पर उन के जीवन की भांति सन्नाटा छाया था. हां, भाभियों के चेहरे संतुष्ट प्रतीत हो रहे थे.

हवा तेज चल रही थी. खिड़की के पट जोरजोर से हिलने लगे. उन्हें अंदर तक किसी अज्ञात भय ने घेर लिया. उन्होंने झट उठ कर खिड़की बंद कर दी. मन में उठ रहा शोर बढ़ता जा रहा था. सांयसांय की आवाज मानो मरे पति की हो जो मुंह चिढ़ा कर कह रही हो, ‘क्यों, घर छोड़ कर भाग गई थी न. आज मेरी विधवा बनी है.’ और इस के साथ ही अतीत के वे दिन कावेरी की आंखों के सामने साकार होने लगे.

अमलू भाभी की जिद के चलते ही मातापिता ने इस रिश्ते के लिए हां की थी क्योंकि कुमरेशन भाभी का चचेरा भाई था और कावेरी की सुंदरता पर मुग्ध था. उस ने अमलू भाभी को उपहार में साडि़यां, गहने दे कर पटा लिया था.

कुमरेशन पुलिस विभाग में कर्मचारी था. आसपड़ोस वालों ने तारीफ करते हुए कहा था, ‘कावेरी ने क्या तकदीर पाई है. लड़का अच्छी सरकारी नौकरी के साथसाथ हृष्टपुष्ट व रूपवान भी है.’ भाभी की मां ने कहा था, ‘उपहारों से घर भर जाएगा और कुमरेशन तो एक काबिल पुलिस वाला है.’

शादी के बाद कावेरी की घरगृहस्थी खूब जमी. सास ज्यादा न बोलतीं. मशीन की तरह घर का सारा काम करती रहतीं. कावेरी भी उन का पूरा हाथ बटाती. सुंदरम 2 साल का था और मुन्नूस्वामी 2 माह का था. एक दिन सास ने कहा, ‘आज कुछ मेहमान आने वाले हैं. अच्छी तरह से तैयार हो जाना’ और उन की आज्ञानुसार वह तैयार हो गई थी. घर में जो मेहमान के नाम पर आए वे सारे के सारे ऐयाश थे. देर रात तक खातेपीते रहे. उस दिन से यह हर रोज का नियम बन गया.  आएदिन शराब की बोतलें, सोडा, मछली आदि लाई जाती और मां बनाया करतीं. जब वे आते उस समय कुमरेशन ड्यूटी पर होते. कावेरी जब भी इस बारे में पति से कुछ कहना चाहती तो वे बिना सुने उठ कर चल पड़ते.

एक दिन सास ने जब कहा, ‘कावेरी, उस के साथ पिक्चर जा कर देख आ,’ तो वह भौचक्की हो सास की तरफ देखती रह गई.

‘मुझे पिक्चर देखना पसंद नहीं है, मां. मेरा बच्चा बहुत छोटा है,’ यह कह कावेरी सास की बात टाल गई.

2 दिन बाद कुमरेशन ड्यूटी से घर आए तो मां की बातें सुन कर झुंझला उठे. ‘तुम ने इसे समझाया नहीं कि इसे पिक्चर जाना चाहिए था, क्या वे इसे खा जाते?’

पति के मुंह से यह सुन कर कावेरी को काठ मार गया. उस रात इसी बात को ले कर पतिपत्नी दोनों में खूब बहस छिड़ी. बात मारपीट पर उतर आई थी. कावेरी समझ नहीं पा रही थी कि पुलिस विभाग में काम करने वाला उस का पति उसे गलत काम करने को क्यों कह रहा है. पत्नी को दासी समझने वाला कुमरेशन आदेशात्मक स्वर में बात करता रहा, ‘2 बच्चों की मां बन चुकी हो परंतु जीवन में पति का फायदा कैसे करना है, यह पता नहीं,’ बालों को पकड़ कर कहा था, ‘ऐ सुन, जो मां कहती हैं वैसा कर. मुझे यह अच्छी नौकरी ही नहीं अपने परिवार को भी बचा कर रखना है.’

‘तो ईमानदारी से काम कीजिए…’

‘क्या…मुझे पाठ पढ़ाती है… पुलिस वाले को…’

कावेरी पति की ओर देखती रह गई.

‘ऐसे क्या देख रही है…’ कहतेकहते उस का सिर दीवार पर दे मारा था. बहुत चोट लगी थी. सिर से खून बहने लगा था.

उस दिन से दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा और दूरियां भी. हर रोज जलसे मनाए जाते. दोपहर तक मछली, चिकन, अंडे, सोडा शराब की बोतलें आ जातीं. देवर इन्हें ला कर कमरे में रख देता. धीरेधीरे कावेरी की सहनशक्ति का हृस होने लगा. मेहमानों की सेवा में लगी कावेरी जब भी बच्चा रोता तो वह उन्हें छोड़ कर बच्चे को उठा लेती, दूध पिलाती. एक दिन कमरे से बाहर आने में देर होती देख पति खूब झल्लाए और मुन्नूस्वामी और सुंदरम को उठा कर घर के बाहर पटक दिया.

कावेरी तब पहली बार बिफरी थी, ‘आप बच्चों को इस तरह क्यों पटक रहे हैं. घड़ी देखी है. पौने 12 बज रहे हैं. मैं अब कमरे से बाहर नहीं आऊंगी.’ और दोनों बच्चों को ले वह अंदर आ गई थी. कमरा बंद कर लिया. उस दिन जीवन में जो तूफान आया तो उस ने जीवन की धारा ही बदल दी. बंद कमरे में कावेरी यही सोचती रही कि मायके जा कर क्या कहेगी? ऐयाश लोग कब किस को क्या कह दें, पता थोड़े ही चलता है. दहेज मैं कम नहीं लाई… फिर…ऐसी हरकतें क्यों…

कावेरी घृणा, क्रोध से भर उठी. पतिपत्नी का पवित्र रिश्ता… उसे घुटन होने लगी. अगर घर में पैसे चाहिए तो वह कमा कर लाएगी, ट्यूशनों से कमाएगी किंतु अपने चरित्र में दाग नहीं लगने देगी.

मुन्नूस्वामी के 2 साल पूरे होते ही उस ने नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी. नौकरी पब्लिक लाइब्रेरी में मिल गई थी. वह भी पूरे 1,500 रुपए की. इसे सुन कर सास सब से ज्यादा खुश हुई थीं. पहली बार उन के चेहरे पर सच्ची मुसकान थी. तब यह नौकरी और तनख्वाह बहुत बड़ी मानी जाती थी. अब छोटीछोटी बात भी घर में उठने लगी. एक दिन कावेरी पुस्तकालय से बाहर निकली तो लाइब्रेरी के एक कर्मचारी को उस ने समझाया कि चाबी कहां जमा करनी है. पति ने यह देखा तो वे आगबबूला हो उठे.

‘कावेरी, किसी पराए मर्द के साथ बातें करते तुझे शर्म नहीं आती?’ उस ने तब पति को बहुत समझाया कि वह कर्मचारी है और लाइबे्ररियन होने के नाते उसे समझाना होता है. उस दिन कुमरेशन ने उसे खूब पीटा और खिन्न हो कर वह दोनों बच्चों को ले कर मायके आ गई. पिता को जब पता चला तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया. दोनों भाइयों ने उसे ससुराल नहीं जाने दिया. यद्यपि कावेरी ने भाइयों को समझाया था कि जा कर पता तो लगाओ कि सचाई क्या है. किंतु किसी ने कुछ न सुना. रिश्ता तोड़ दिया गया.

कावेरी की सास मरने से 1 साल पहले चोरी से उस से मिलने आई थीं. उस के जेवर लौटाते हुए उन्होंने कहा था, ‘तेरी हिम्मत की दाद देती हूं. औरतों को हमेशा भोगने की चीज ही समझा जाता रहा है, हमारी बिरादरी की औरतों ने ऐसा ही जीवन जिया है. उन की दुनिया को बड़ी चतुराई से घर की चारदीवारी में सीमित रखने की साजिश पुरुषों द्वारा आज भी रची जा रही है और आज भी वे शोषण की शिकार हैं.’

वे थोड़ी देर को रुकीं फिर कहने लगीं, ‘अनुशासन, हया, तमीज सब औरतों के ही आभूषण हैं. पुरुष कितना भी अनैतिक और अशोभनीय आचरण करे, उस के चरित्र पर कभी कलंक नहीं लगाया जाता जैसे कि वह सामाजिक अनुशासन के परे है. समाज के सभी स्तरों पर औरतों के ऊपर अकथनीय उत्पीड़न होता है.’ फिर उन्होंने बातों का रुख बदला, ‘तू ने सुंदरम को वकील बना दिया. यह तेरी हिम्मत की बात है. भाइयों से कभी पैसे की मदद नहीं मांगी. शादी भी भाई की लड़की से न कर वकालत पास लड़की से की यह और भी खुशी की बात थी.’ ‘छोटे मुन्नूस्वामी को लाइब्रेरियन बना दिया और उस की शादी भी भाई की लड़की से नहीं की. यह भी शान की बात है. छोटी बहू को काम पर लगवा दिया. आज की महंगाई के चलते सब काम अच्छी तरह निबटा दिया. मैं तुम्हें आज प्रणाम करती हूं. ये गहने ले.’

‘नहीं, अम्मां,’ कावेरी बोली, ‘आप ने मेरी हर बात को समझा और मुझ से मिलने आईं, यही मेरे लिए काफी है. ये गहने आप ही रखिए. कभी आड़े वक्त आप के काम आएंगे,’ फिर थोड़ा रुक कर आगे बोली, ‘क्या एक सवाल आप से कर सकती हूं…’

‘हां,’ उन्हें शायद अंदेशा हो गया था.

‘मां हो कर भी आप ने घर में ऐसा वातावरण क्यों बनने दिया था?’

वे बहुत देर तक गंभीर बनी रहीं फिर बोलीं, ‘तुझे यह पता है न कि हमारे यहां ज्यादातर पुरुष के कम से कम 2 घर होते ही हैं. यह सामाजिक प्रथा मान्यता प्राप्त थी. संध्या समय खूब बनावशृंगार कर औरतों का मंदिर में प्रिय को मिलने जाना, और मैं इस प्रथा के खिलाफ थी, उस का अंत करना चाहती थी किंतु पुलिसकर्मी हो कर भी तेरे दादा व नाना, पिता सब बढ़ावा देते रहे और अपना अधिकार समझ कर खुलेआम इस अनैतिकता को करते रहे,’ कह कर वे चुप हो गईं…

‘अब तो सबकुछ बदल चुका है. समाज में बहुत बदलाव आ गया है, अम्मां.’

‘मैं ने मन पर एक बड़ा पत्थर रख कर जीवन से समझौता कर लिया था, किंतु तू ने बहादुरी से काम लिया क्योंकि तू पढ़ीलिखी थी.’

‘जीवन साहस का नाम है, अम्मां,’ कावेरी बोली, ‘अगर आप साहस करतीं तो आज न आप के पुत्र की दुर्दशा होती और न मेरी गृहस्थी टूटती. अब मैं उसे अपना पति नहीं मानती. उस के मरने पर मैं किसी प्रकार का शोक नहीं मनाऊंगी.’

‘ठीक है,’ अम्मां ने कहा और इसी के साथ कावेरी उठ कर बैठ गई. घड़ी पर नजर डाली तो 4 बजने वाले थे. अब उस का मन बेचैन नहीं था. मन ही मन विचार उत्पन्न हुए कि दुनिया का सब से बड़ा आश्चर्य क्या है? यक्ष के प्रश्न वाला प्रसंग मन में उठा.

यक्ष के इस प्रश्न पर युधिष्ठिर ने जवाब दिया, ‘हम में से प्रत्येक को इस बात की जानकारी है कि जब हम पैदा हुए हैं तो एक दिन मरना भी पडे़गा, फिर भी यही माने बैठे हैं कि हम सदा के लिए जिंदा रहेंगे. आज पति नाम का जीव शरीर छोड़ कर चला गया है तो कल मुझे भी जाना ही होगा.’

इस तथ्य से मुक्त होने में मानव तब तक अक्षम है जब तक कि वह अपनी सोच अथवा मानसिक स्तर को ऊर्ध्वमुखी न बनाए. जीवन भी ऐसा ही सत्य है और मृत्यु भी, जिस का सामना हम सभी को कभी न कभी करना ही होगा. इस दुनिया में पैदा हुई हर चीज का अंत है. जीवन हर क्षण में हमें मृत्यु के करीब ला रहा है. हम बूढ़े होना नहीं चाहते किंतु होते जाते हैं. हम अपने शरीर को अपना मानते हैं किंतु यह तो हमारा नहीं है.

मुझे अब क्या करना चाहिए…विचार पलटा. हमारा इस धरा पर आवागमन चलता रहेगा. हर दिन सूर्य निकलता है तो डूबता भी है. बड़ी बात तो यह है कि हर वक्त नया बन कर निकलता है. प्रकृति का यह नियम कब कौन बदल सका है. इसलिए मुझे भी हर दिन नए सूर्य की तरह जीना चाहिए. उसे आने वाले नववर्ष से प्रेरणा मिलने लगी. हर साल एक नया साल के रूप में आता है. मैं ने अपने हिस्से की तमाम जिम्मेदारियां निभा दी हैं.

मैं आज तक अनभिज्ञ रही. आज से और ज्यादा काम करूंगी. क्या जरूरत है बीती जिंदगी की गलतियों पर विचार कर कोसना. मेरी जो बची जिंदगी है उसे और ऊर्जावान बना कर कुछ अपने बच्चों, कुछ खुद के लिए और कुछ इस धरा के लिए कर पाऊं यही तो नियति है.

मंदिर के घंटे ने 4 बजाए. दर्शनार्थियों की भीड़ उद्घोष के साथ मंदिर के मुख्यद्वार की ओर चल पड़ी. कोरा पाखंड. जिस ने पत्नी को जीवन भर दुख दिए उस को पंडेपुरोहित भी दानदक्षिणा के लालच में आसानी से श्रेष्ठ जन साबित कर देते हैं. यह धोखेबाजी औरतों को बहुत महंगी पड़ती है. कावेरी ने तमाम मलिनता को परे फेंक दिया. कमरे में देखा तो सारा परिवार उसी तरह थकामांदा सोया था. उस ने केसरी बार्डर वाली साड़ी निकाली. नहाधो कर तैयार हुई. कुमकुम लगाई. पर्स खोल कर चैकबुक निकाली. बड़ेछोटे सब के नाम 2-2 हजार के चैक काटे. साथ ही एक पत्र लिखा :

‘मेरे बच्चो,

‘मैं बस स्टैंड के बाहर की सीढि़यों पर बैठी हूं, सूर्य की प्रथम किरण के फूटते ही मेरे मन का अंधकार मिट गया है. जन्ममरण हमारी नियति है इसलिए सब लोग घूमेंफिरें, जो खरीदफरोख्त करनी है, करें. किसी को अब और मायूस हो कर बैठने की जरूरत नहीं है. ‘आज नया वर्ष है. इस नए वर्ष का स्वागत नई सोच से करें. ‘मैं जिस तरह प्रतिदिन रहती आई हूं वैसे ही रहूंगी.

आप की कावेरी.’

प्रात: 7 बजे के आसपास जब परिवार के सदस्य उठे और पत्र पढ़ा तो उन के मन में भी नया प्रकाश हुआ. कल तक जो कावेरी को दोषी करार दे रहे थे, उस के परिपक्व विचार देख सब के सब नकारात्मक मार्ग से सकारात्मक मार्ग की ओर सोचने लगे. एक नई खुशी की लहर घरपरिवार में फैल गई. ऐसी खुशी जो बिलकुल नई तरह की थी. सब ने देखा, केसरी साड़ी पहने सजीधजी अम्मां बस स्टैंड की सीढि़यों के पास बैठी थीं और एकटक सूर्य को देख रही थीं. सब दौड़ते हुए उन के पास पहुंच गए और उन्हें गले से लगा कर प्यार करने लगे.

आज सूर्य की किरणें नई आभा बिखेर रही हैं.