गृहशोभा विशेष

‘‘प्रैशर आया?’’ हाथी जैसी मस्त चाल से झूमते हुए अंदर आते ही जय ने पूछा. ‘‘अरे जय भैया आप को ही आया लगता है, जल्दी जाइए न वाशरूम खाली है,’’ प्रश्रय की छोटी बहन प्रशस्ति जोर से हंसी.

‘‘क्यों बिगाड़ता रहता है जय मेरे बेटे का सुंदर नाम. पहले ढंग से बोल प्रश्रय…’’ नीला, बेटे के नर्सरी के दोस्त संजय को आज भी दोस्त का सही नाम लेने के लिए सता कर खूब मजे लेती. बचपन में जय तोतला था तो उस के मुंह से अलग ही नाम निकलता. धीरेधीरे तो बोल जाता पर जल्दी में कुछ और ही बोल जाता. अब तो उस ने प्रश्रय को पै्रशर ही बुलाना शुरू कर दिया. अमूमन वह सीरियस बहुत कम होता. सीरियस होता तो भी प्रैशर सिंह ही पुकारता और प्रश्रय उसे तोतला. ‘‘अरे आंटीजी छोड़ो भी, कितनी बार कहा आसान सा नाम रख दो. इतना मुश्किल नाम क्यों रख दिया. अब हम ने सही नाम तो रख दिया प्रैशर सिन्हा… हा… हा… अरे मोदीजी की क्या खबर है. कुछ पता भी है, आज क्या नया इजाद कर डाला?’’

‘‘क्या?’’ सब का मुंह खुल गया, फिर कोई नई ‘बंदी’, ‘नोटबंदी’? सब सोच ही रहे थे कि वह मोदीजी… मोदीजी कहते हुए किचन में चला आया. ‘‘ओह… क्या जय भैया…’’ सब भूल ही जाते जय प्रश्रय की नईनवेली पत्नी मुदिता को मोदीजी कहना शुरू किया है.

‘‘अरे मुदिता भी नहीं कह पाता, सिंपल तो है. तो मोदीजी क्या भाभी ही कहा कर… कोई और भाभी तो है नहीं.’’ ‘‘मैं तो भैया मोदीजी ही कहूंगा, रोज

नया ही कुछ देखने को मिल जाता है. कुछ नया फिर किया?’’ ‘‘किया है न तभी तो स्कूटी से प्रश्रय साथ दूध लेने गई है. बना रही थी हलवा उस में पानी इतना डाला कि वह लपसी बन गया. अब उसे सुधार कर फटाफट खीर बनाने का प्रोग्राम है. लो आ गए दोनों…’’ नीला मुसकरा कर बोलीं.

‘‘हमारे भैया भी तो महा कंजूस… कुछ वैस्ट नहीं करने देते…’’ ‘‘राम मिलाई जोड़ी… आगे नहीं बकूंगा वरना प्रैशर सिन्हा को प्रैशर आ जाएगा. बहुत मारेगा फिर…’’ कहते हुए उस ने प्रशस्ति के हाथ पर जोर से ताली मारी, हंसा और फिर उंगली से उसे चुप रहने का इशारा किया.

‘‘जल्दी भाभी… आप की नई ईजाद डिश ‘एग प्लस’ वह आमलेट में ब्रैड की फिलिंग वाले यम्मी नाश्ते से तो हमारा अभी आधा पेट ही भरा,’’ प्रशस्ति ने जानबूझ कर जबान होंठों पर फिराई, ‘‘आप चूक गए जय भैया उस स्पैशल नाश्ते को…’’ बहन प्रशस्ति छेड़ कर मुसकरा उठी. ‘‘क्याक्या वह ब्रैड में अंडे की स्टफिंग तो खाई है पर अंडे में ब्रैड की स्टफिंग? देखा तश्तरी, मैं ने सही नाम ही दिया है मोदीजी नमस्ते, मेरे लिए तो जरूर, जल्दी…’’ उस ने पेट सहलाते हुए भूखा होने का एहसास दिलाया.

मुदिता ने हंसते हुए प्रतिक्रिया दी, ‘‘मैं अभी सबकुछ, आप के लिए भी लाई…’’ और फिर किचन में चली गई. ‘‘क्यों मजाक बनाता है मेरी नईनवेली का तोतले? वह बुरा नहीं मानती. फिर इस का मतलब क्या?’’ प्रश्रय ने उस की पीठ पर हंसते हुए एक धौल जमा दी.

‘‘क्यों भई, प्रैशर सिन्हा तो प्रैशर में आ गया. तश्तरी तू उठ, उसे ठंडा हो कर बैठने

दे ढक्कन…’’ ‘‘लो अब एक और नामकरण मेरा… क्या है भैया,’’ वह रूठते हुए बोली.

‘‘ठीक ही तो है पर्यायवाची ही तो है तश्तरी का ढक्कन,’’ प्रश्रय हंस कर उसे सरकाते हुए बैठ गया.

‘‘यही तो काम होता है तश्तरी का,’’ दोनों हंसने लगे तो 15 साल की प्रशस्ति पीछे जा कर दोनों को हलकेहलके घूंसे बरसाने लगी. ‘‘अरे, रुकरुक ढक्कन… देख प्रैशर की तो डाई उतरने लगी है,’’ जय उस के बालों को निहारते हुए उन पर हाथ फिराने लगा.

‘‘अरे यार, मैं डाई लगाता कहां हूं जो छूटने लगेगी… पागल है क्या?’’ वह थोड़ा हैरानपरेशान हुआ, नवेली बहू मुदिता भी ध्यान लगा कर सुनने जो लगी थी. ‘‘बड़ी मार खाएगा, मेरी इज्जत का फालूदा क्यों निकालने पर लगा रहता है?’’

‘‘लो भई, प्रैशर सिन्हा तो जरा से में प्रैशर में आ गए.’’ ‘‘अबे समझ न, पैदा ही अच्छी डाई लगवा कर हुआ था, ऊपर वाले के सैलून से. अब और कितने सालों चलेगी आखिर. 30 का तू होने को आया…’’

‘‘ओए तू कितने का होने आया स्वीट सिक्सटीन?’’ वह चिढ़ कर बोला. ‘‘तुझे भी पता है शक्ल से तो स्वीट सिक्सटीन ही लगता है और दिल से ट्वैंटी वन और दिमाग से फोर्टी फोर…’’ कौलर ऊंचा करते हुए अकड़ से बोला.

‘‘मुझे तो तू हर तरह से फोर्टी फोर नहीं, फोरट्वैंटी लगता है.’’ ‘‘भई वकालत क्या यों ही चल जाएगी. इसीलिए तो ये विस्कर्स भी सफेद कलर कर रखे हैं कि लोग थोड़ा अनुभवी वकील समझें… वैसे मुझे तो तुझ से बढि़या डाई लगा कर भेजा है कुदरत ने और फिर प्रैशर सिन्हा तुझ से छोटा भी तो हूं,’’ बात मुदिता तक पहुंचाने के लिए वह तेज स्वर में बोला.

‘‘अच्छा?’’ मुदिता नाश्ते की ट्रे के साथ वहीं आ गई थी.

‘‘अच्छा क्या… केवल 4 दिनों का ही अंतर है महाराज. 1 ही महीना 1 ही साल दोनों पैदा हुए हैं…’’

‘‘तू फिर प्रैशर में आ गया, मजाक में भी सीरियस…’’ उस ने ऐसा चेहरा बनाया कि सभी हंस पड़े. फिर नाश्ते के लिए टेबल पर जा बैठे. मुदिता फिर कुछ लाने किचन में चली गई. तभी मुदिता का टेबल पर रखा मोबाइल बजने लगा.

‘‘देखना किस का है प्रश्रय… उठा लो, मैं आई.’’

‘‘दे भई,’’ प्रश्रय ने उसे मोबाइल पास करने को कहा. ‘‘गदाधर भीम…’’ कहते हुए उस ने मुसकरा कर मोबाइल उसे थमा दिया. मुदिता की बहन मुग्धा के नाम का सरलीकरण उस ने यही कर दिया था.

प्रश्रय ने उसे उंगली से चुप रहने का इशारा किया और बात करने लगा. ‘‘नमस्ते जीजू, जीजी कहां है? उस ने अपना मोबाइल जो मुझे दिया फिर उस में कुछ टाइप हो कर मेरे सिर को चला गया. अब मैं

क्या करूं. मेरा मूड बहुत औफ है जीजू, दीजिए उन को… अपना घटिया फोन मुझे हैल्प के लिए थमा दिया.’’ ‘‘देता हूं 1 सैकंड… किचन में है… पर अब क्या टाइप हो कर सैंड हो गया?’’

‘‘जीजू वह कैमिस्ट्री सर को मैं ने प्रश्न भेजने के लिए लिखा था ‘यू सैंड’

तो ई की जगह ए टाइप हो गया. फिर मैं ने ‘सौरी’ लिखा तो एस की जगह डब्ल्यू सैंड हो गया.’’ ‘‘क्याक्या मतलब…’’

‘‘यू सांड…वरी सर… अब क्या करूं जीजी के फोन ने तो कहीं का न छोड़ा… सर बहुत गुस्सा हो गए,’’ और उस का रोना शुरू हो गया. ‘‘अरे कौन वह विवेक शर्मा ही पढ़ाता है न तुम्हें…यहीं तो रहता है. मैं बात कर लूंगा. कोई गुस्सा नहीं रहेगा. अब रोना बंद करो और लो जीजी से बात करो.’’

‘‘सांड… वरी…’’ जय की हंसी छूट गई. वह पेट पकड़े हंसे जा रहा था. ‘‘मरवाएगा क्या पागल?’’

‘‘इसे बताया ही क्यों,’’ नीला के होंठों पर भी मुसकान खेलने लगी. ‘‘पहले ही बोला था मुझे दिया होता तो अब तक ठीक कर दिया होता,’’ जय किसी तरह हंसी कंट्रोल करते हुए बोला.

‘‘छांट कर ससुराल ढूंढ़ी है. सभी कलाकार हैं. हा… हा…’’ ‘‘ज्यादा मत हंस. तेरी भी शादी छांट कर ही करवाऊंगा, तोतले… जहां लड़की का तो ऐसा मुश्किल नाम होगा कि तू नाम ही सोचता रह जाएगा,’’ प्रश्रय जोर से हंसा.

‘‘ठीकवीक नहीं करना. से नया स्मार्ट फोन चाहिए अपने बर्थडे पर पहले ही वादा कर चुकी हूं. इसी 24 को तो है संडे को… मम्मी ने सब को बुलाया है. आप को भी आना है जय भैया… आंटी को भी लाना है,’’ मुदिता भी आ कर खाली सीट पर बैठ गई. ‘‘अरे बिलकुल. आप की आज्ञा शिरोधार्य.’’

‘‘यार, इतना महंगा फोन अभी बच्ची ही तो है… 11वीं क्लास कुछ होती है?’’ ‘‘लो प्रैशर सिन्हा का प्रैशर फिर बढ़ गया… अच्छा ही तो है रोजरोज गदाधर सायरन तुझे नहीं सुनना पड़ेगा.’’

‘‘अरे इतनी क्या कंजूसी. एक ही साली है, तेरी शादी के बाद उस का पहला जन्मदिन है. सही तो वादा किया है मुदिता ने,’’ नीला मुसकराई.

रविवार को मुदिता के घर जन्मदिन की खूब चहलपहल हो रखी थी. प्रश्रय और जय परिवार के साथ ठीक समय पर पहुंच गए. बर्थडे गर्ल मुग्धा बाकी मेहमानों को छोड़ उन की ओर लपकी और गिफ्ट का डब्बा मुदिता के हाथ से खींच लिया, ‘‘मेरा मोबाइल

है न…’’ ‘‘अरे रुकरुक, पहले सब से मिल… हम सब को विश तो कर लेने दे…’’

‘‘ओकेओकेओके… नमस्तेनमस्ते आंटी, आंटीजी, जीजू भैया दी… थैंकयू… थैंकयू… थैंकयू सब को,’’ उस ने गिफ्ट लेनेके उतावलेपन में इतनी जल्दीजल्दी कहा कि सभी हंस पड़े. ‘‘और मोहित कैसे हो यार? कैसी चल रही है तुम्हारी फाइनल ईयर की पढ़ाई? कभी तो मिलने आ जाया करो घर. कब हैं ऐग्जाम्स?’’ मोहित मुदिता का भाई जिसे जय मिसफिट, कभी लाल हिट कहता, घर भर में उसे वही तेज दिमाग व गोरा लगता था.

‘‘अरे छोड़ यार लाल हिट, सारे प्रश्न कौकरोचों को तुझे तो मार ही डालना है… आज के दिन भी पढ़ाई की बातें ही करेगा… बता आंटीअंकल कहां हैं? दोनों दिख नहीं रहे? नमकमिर्च… पेपरसाल्ट, मेरे अंकलआंटी तेरे मम्मीपापा रौनक कुछ कम लग रही है. मजा नहीं आ रहा,’’ जय ने कुतूहल से पूछा. तभी दोनों आ गए… सक्सेनाजी दोनों हाथों से पैंट संभालने में लगे हुए थे और गोलमटोल मैडम ने केक का डब्बा और एक पैकेट थामा हुआ था. सब से नमस्तेनमस्ते हुई पर दोनों की तूतू मैंमैं अभी भी चालू थी.

‘‘नाड़ा तेरा टूटा तो बैल्ट निकलवा मेरी आफत कर डाली. अब मेहमानों के सामने मेरी फजीहत… सब की तूही जिम्मेदार है…’’ ‘‘चुप करो अकेले तो कोई काम करते नहीं बनता. टेलर से ब्लाउज लेना न होता तो मैं जाती भी न आज तुम्हारे साथ.’’

‘‘तेरा सामान कौन लाता? कम खाया कर वरना नाड़ा न टूटता तेरा… वह तो शुक्र मना मेरा कि मैं ने तुम्हें अपनी बैल्ट मौके पर ही बांधने को दे दी.’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं. भूल गए पहली बार ससुराल कैसी पुरानी बैल्ट पहन कर पहुंच गए थे, जो पटाक से टूटी तो चुपके से मैं ने ही नाड़ा ला कर तुम्हारी इज्जत बचाई थी. बड़े हीरो की तरह शर्ट बिना खोंसे बाहर निकाल कर आए थे कि पुरानी बैल्ट दिखेगी नहीं… हां नहीं तो लो थामो अपना वालेट…’’

‘‘भगवान ने रात बनाई है वरना तो चौबीसों घंटे मुझ से लड़ाई ही करती रहो तुम…’’ मिसेज सक्सेना की साड़ी पर चमकती बैल्ट देख माजरा समझ सभी मुसकरा रहे थे. जय, प्रश्रय के कानों के पास मुंह ले जा कर बुदबुदा उठा, ‘‘राम मिलाए जोड़ी…’’

प्रश्रय ने उसे घूर कर देखा तो उस ने मुसकराते हुए अपने होंठों पर चुप की उंगली रख ली.

‘‘नमस्ते पापा,’’ प्रश्रय चरण छूने झुका था. ‘‘अरे रुकोरुको वरना हाथ उठा कर

आशीष दिया तो गड़बड़ हो जाएगी,’’ वे हंसे और बैठ गए.

‘‘हां अब ठीक है… खुश रहो,’’ उन्होंने दोनों हाथों से आशीर्वाद दिया.

‘‘भागवान, मौके की नजाकत समझो, जल्दी जा कर मेरी बैल्ट ला दो…’’ वे बैठ कर वालेट में नोट गिनगिन कर कुछ परेशान से दिखने लगे…

‘‘लगता है शौप में हजार के 2 नोट देने की जगह 3 नोट दे डाले मैडम ने. 10 होने चाहिए थे अब 9 ही हैं.’’ ‘‘अरे नहीं…’’

गृहशोभा विशेष

‘‘नमस्ते अंकल… लाइए मैं देखता हूं… होंगे इसी में, आंटीजी इतनी भी भुलक्कड़ नहीं… अरे, बहुत गड़बड़ कर दी है आप ने तभी तो… पिताजी की तसवीर उलटी रखेंगे तो क्या होगा. यह देखिए सारे पिताजी को सीधा कर दिया. अब गिन लीजिए पूरे हैं…’’ मिस्टर सक्सेना के साथ औरों का मुंह भी सोच में खुला रह गया था…

‘‘अरे पिताजी मतलब बापू, गांधीजी…’’ उस ने मुसकरा कर वालेट वापस थमा दिया, ‘‘अब गिनिए पूरे हैं ना?’’ ‘‘अच्छा ऐसा भी होता है क्या… मुझे तो मालूम ही नहीं था,’’ उन का मुंह अभी भी खुला हुआ था.

‘‘अरे पापा इस की तो मजाक करने की आदत है. आप को मालूम तो है…’’ प्रश्रय मुसकराया. ‘‘यह लो अपनी बैल्ट… मोहित जल्दी जा गाड़ी में मेरा चश्मा रह गया है उठा ला. नए चश्में के साथ मेरा फोटो सब से रोबदार आती है,’’ उन्होंने मिस्टर सक्सेना की ओर देखते हुए कहा.

‘‘मम्मी सिर पर लगा रखा है पहले देख तो लो…’’ ‘‘देखती कैसे इस की असली आंखें तो सर पर थीं…’’ मिस्टर सक्सेना चिढ़ कर चहक उठे.

‘‘आप भी न भाई साहब भाभी को छेड़ने का कोई मौका नहीं चूकते,’’ नीला मुसकराई. ‘‘सच में प्यारी सी हैं भाभीजी, चहकती

ही अच्छी लगती हैं,’’ जय की मम्मी शांता ने सहमति दर्शाई. ‘‘गजानन का हुक्म हो गया है, चलना ही पड़ेगा…’’ उन्होंने मुसकराते हुए जय, प्रश्रय की ओर देखा. हंसे तो हिल कर उन का शरीर भी साथ देने लगा.

‘‘जानते हो इन का असली नाम तो गजगामिनी था… नए नामकरण में क्या खाली तुम ही उस्ताद हो?’’ वह मुसकराए. ‘‘पर मैं कभी बुला ही नहीं पाया. इतने लंबे नाम से खाली गज कैसे कहता, मार ही डालती, तो गजानन पुकारने लगा,’’ वे ठठा कर हंस पड़े.

‘‘तभी तो आप के बिना माहौल जम नहीं रहा था.’’

‘‘बस 10-10 मिनट रुकिए, मम्मी वह वैशाली पहुंचने वाली है. 1 घंटा पहले एअरपोर्ट से निकली हैं… मुंबई से आ चुकी हैं. उस की दीदी और पापामम्मी भी साथ हैं… दी का कोई ऐग्जाम है. अभीअभी उस का फोन आया.’’

‘‘अरे वाह वैष्णवी… मेरी सहेली कितने सालों बाद हम मिलेंगे मम्मी…’’ मुदिता खुशी से चीखी और मम्मी के गले लिपट गई. डगमगा गया था संतुलन मम्मी का. किसी तरह मोटे शरीर को संभाला. ‘‘छोड़छोड़ मुदि, अभी तो मैं गिर जाती.’’

‘‘अच्छा… हिमांशु अंकल सपरिवार… सही मौके पर…’’ ‘‘तब तक आप लोग कुछकुछ खातेपीते रहो. कोल्ड ड्रिंक्स और लो, बहुत वैराइटी है…’’ गजगामिनी ने पास आ कर बोला.

शीतल बाल पेय बहुत हो लिया आंटीजी अब थोड़ा बड़ों का उष्णोदक मिल जाए तो… मीठा गरम पानी बढि़या… मतलब बींस पाउडर वाला या लीफ वाला…’’ ‘‘मतलब मम्मीजी कौफीचाय की तलब लग रही है इसे…’’ प्रश्रय ने मुसकराते हुए घबराई गजगामिनी को क्लीयर कर दिया.

‘‘आए, हय मैं तो घबरा ही गई कि कोई बीमारी हो गई क्या… अच्छाअच्छा मैं बनवाती हूं अभी,’’ वह मस्त लुढ़कती सी चली गई.

चाय का दौर चल ही रहा था कि मुग्धा की सहेली वैशाली, दीदी वैष्णवी, सुधांशु अंकल व ललिता आंटी आ गए. 3 साल पहले वे दिल्ली इसी कालोनी में रहते थे. बच्चों का स्कूल में भी साथ हो गया तो दोनों परिवारों में अच्छी दोस्ती हो गई थी. फिर सुधांशुजी का परिवार अहमदाबाद शिफ्ट हो गया. वहां प्रोफैसर पद

पर यूनिवर्सिटी में उन की नियुक्ति हो गई थी. सभी अपने पुराने दोस्तों से मिल कर प्रसन्न हो गए. सभी से उन का परिचय कराया जाने लगा. मुदिता वैष्णवी को ले कर प्रश्रय के पास

ले आई, ‘‘मिल, ये तेरे जीजाजी हैं, तू तो शादी में थी नहीं.’’

‘‘नमस्ते जीजाजी… मी वैष्णवी… हाऊ हैंडसम यू आर… हये बहुत लकी है मुदिता तू यार.’’

‘‘अब नजर न लगा मेरे पति को, क्या पता तू मुझ से भी लकी निकले, मुझ से सुंदर जो है.’’ ‘‘इन से मिलो ये हैं जय भैया. प्रश्रय के दोस्त बड़े मजाकिया स्वभाव के हैं. जानती हो प्रश्रय को ये प्रैशर सिन्हा और प्रश्रय इन्हें तोतला पुकारते हैं बचपन से.’’

‘‘हाय, माइसैल्फ वैष्णवी एलएलबी. मुदिता की टैंथ ट्वैल्थ की फ्रैंड,’’ वैष्णवी ने नमस्ते की. ‘‘नमस्ते, पर आप को बता दूं अब मैं तोतला बिलकुल नहीं हूं… वलना तोल्त में तेस तैसे ललता तिनियल लायल जो हूं.’’

वैष्णवी हंस पड़ी. ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कौन सा मीठा साबुन चख कर आप आई हैं मुंबई से?’’

‘‘आप की उजली दंत कांति ने मुझे प्रश्न के लिए मजबूर कर दिया,’’ वह गंभीर होते

हुए बोला. ‘‘मीठा साबुन… मतलब?’’ वह सोचने लगी थी. साथ ही मुदिता भी. फिर बोली, ‘‘ओ गुड आप भी लौयर हैं. मेरी भी कानून में बहुत रुचि है, व्यक्ति को सिविलाइज्ड बनाता है कानून. इसीलिए मैं ने एलएलबी किया. अब सिविल जजी का ऐग्जाम ही देने आई हूं यहां.’’

‘‘अरे ठाट से वकालत कीजिए, ढेरों पैसे बनाइए, जजी में क्या रखा है? आप के पास जो केस आएगा समझो जीताजिताया है.’’ ‘‘वह कैसे?’’

‘‘ओ जय भैया, बातें बाद में बनाना. किस से बातें कर रहे हो… यह तो बताओ पहले… ‘वैष्णवी’ बोल के तो दिखाओ, तब मानेंगे हम वरना कुछ तो है बचपन का वह असर अभी भी हम तो यही कहेंगे… मालूम है अब बस आप नया नाम ही दे दोगे, चलो वही दे दो इसे भी,’’ वह मुसकराई.

‘‘मोदीजी माफी…’’ उस ने हंसते हुए हाथ जोड़ दिए. छोटी बहन वैशाली ने जय का प्रश्न सुन लिया था. पापा सुधांशु को पूछने भी चली गई. जहां पहले ही वैष्णवी की शादी के लिए सुधांशु और ललिता को चिंतित देख गजगामिनी नीला और जय की शादी के लिए परेशान शांता सभी अपने सुयोग्य ऐडवोकेट लड़के जय की तारीफ और उस के मजाकिया स्वभाव की भी चर्चा

किए बैठे थे. ‘‘ओ गौड मतलब मंजन टूथपेस्ट… मीठा साबुन? हा… हा… कोलगेट,’’ प्रोफैसर सुधांशु जवाब दे कर हंसे थे.

‘‘मुझे भी मिलाओ उस भैया से,’’ मुग्धा व वैशाली उसे बुलाने चलीं आईं. ‘‘चलचल हीरो बन रहा था न आज तेरी बात ही पक्की करवा देता हूं इसी वैष्णवी से… शांता आंटी की तेरी शादी की चिंता खत्म…

बेटा अब बोल के दिखा नाम या कोई और नाम रख,’’ प्रश्रय उस के कानों में फुसफुसा कर हंसे जा रहा था. वह जय को पकड़ कर वहां ले गया जहां सुधांशु और उस के ससुर मिस्टर सक्सेना पत्नियों के साथ बैठे थे.

हंसीमजाक चलता रहा. केक कटा, खानापीना, नाचगाना और

खूब मस्ती होती रही. बड़ों ने उसी बीच जय और वैष्णवी की रजामंदी ले कर उन की शादी भी तय कर दी. ‘‘जय भैया अब तो नाम लेना ही पड़ेगा, बोलिए वैष्णवी… या नाम बिगाडि़ए हमारे जैसा…’’

‘‘बेशोन दही या नवी मुंबई जो पसंद हो…’’ झट से बोल कर जय जोर से हंसा. सारे बच्चे, बड़े ‘बेशोन दही’ और ‘नवी मुंबई’ कह कर वैष्णवी को चिढ़ाने लगे. ये… ये… उस ने सोफे पर बैठे हुए एक कुशन से जय पर सटीक निशाना लगाया और फिर हंसते हुए कहा, ‘‘अरे ये जय नहीं प्रलय… और फिर कुशन में अपना मुंह छिपा लिया.’’

फिर तो सब का कुशन एकदूसरे पर फेंकने का खेल चल पड़ा. हुड़दंग का जंगल लौ अचानक वैष्णवी को सिविल लौ से और भी अच्छा लगने लगा था.

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