गृहशोभा विशेष

मीना और नितीश की गृहस्थी में अचानक तूफान आ गया था. दोनों के विवाह को मात्र 1 साल हुआ था. आधुनिक जीवन की जरूरतें पूरी करते हुए दोनों 45 वसंत देख चुके थे. पहले उच्चशिक्षा प्राप्त करने की धुन, फिर ऊंची नौकरी और फिर गुणदोषों की परख व मूल्यांकन करने के फेर में एक के बाद एक प्रस्तावों को ठुकराने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह रुकने का नाम ही नहीं लेता था.

मीना के मातापिता जो पहले अपनी मेधावी बेटी की उपलब्धियों का बखान करते नहीं थकते थे. अब अचानक चिंताग्रस्त हो उठे थे.

बड़ी मुश्किल से गुणदोषों, सामाजिक स्तर आदि का मिलान कर के कुछ नवयुवकों को उन्होंने मीना से मिलने को तैयार भी कर लिया था, पर मीना पर तो एक दूसरी ही धुन सवार थी.मीना छूटते ही अजीब सा प्रश्न पूछ बैठती थी, ‘‘आप को बच्चे पसंद हैं या नहीं?’’

ज्यादातर भावी वर, मीना की आशा के विपरीत बच्चों को पसंद तो करते ही थे, अपने परिवार के लिए उन का होना जरूरी भी मानते थे. मगर यही स्वीकारोक्ति मीना को भड़काने के लिए काफी होती थी और संबंध बनने से पहले ही उस के पूर्वाग्रहों की भेंट चढ़ जाता था.

नितीश से अपनी पहली मुलाकात उसे आज भी अच्छी तरह याद हैं. चुस्तदुरुस्त और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले नितीश को देखते ही वह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी. पर उच्चशिक्षा और ऊंची नौकरी ने उस के आत्मविश्वास को गर्व की कगार तक पहुंचा दिया था. वैसे भी वह नारी अधिकारों के प्रति बेहद सजग थी. छुईमुई सी बनी रहने वाली युवतियों से उसे बड़ी कोफ्त होती थी. इसलिए नितीश को देखते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी.

‘‘आशा है पत्रों के माध्यम से आप को मेरे बारे में पूरी जानकारी मिल गई होगी?’’ मीना अपने खास अंदाज में बोली थी.

‘‘जी, हां,’’ नितीश उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए बोला था.

मीना मन ही मन भुनभुना रही थी कि ऐसे घूर रहा है मानो कभी लड़की नहीं देखी हो, पर मुंह से कुछ नहीं बोली थी.

‘‘आप अपने संबंध में कुछ और बताना चाहती है? मौन अंतत: नितीश ने ही तोड़ा था.

‘‘हां, क्यों नहीं. शायद आप जानना चाहें कि मैं ने अब तक विवाह क्यों नहीं किया?’’

‘‘जी हां, अवश्य.’’

‘‘तो सुनिए, मेरे कंधों पर न तो पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ था और न ही कोई अन्य मजबूरी पर अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ा परिश्रम किया है मैं ने.’’

‘‘जी हां, सब समझ गया मैं. आप अपने मातापिता की इकलौती संतान हैं. पिता जानेमाने व्यापारी हैं, फिर पारिवारिक समस्याओं का तो प्रश्न ही नहीं उठता. पर मैं इतना खुशहाल नहीं रहा. पिता की लंबी बीमारी के कारण छोटे भाई और बहन के पालनपोषण, पढ़ाईलिखाई, विवाह आदि के बीच इतना समय ही नहीं मिला कि अपने बारे में सोच सकूं.’’

‘‘चलिए जब आप ने स्वयं को मानसिक रूप से विवाह के लिए तैयार कर ही लिया है, तो आप ने यह भी सोच लिया होगा कि आप अपनी भावी पत्नी में किन गुणों को देखना चाहेंगे.’’

‘‘किसी विशेष गुण की चाह नहीं है मुझे. हां, ऐसी पत्नी की चाह जरूर है जो मुझे मेरे सभी गुणोंअवगुणों के साथ अपना सके,’’ नितीश भोलेपन से मुसकराया तो मीना देखती ही रह गई थी. कुछ ऐसा ही व्यक्ति उस के कल्पनालोक में भी था.

गृहशोभा विशेष

‘‘आप के विचार जान कर खुशी हुई पर आप को नहीं लगता कि जीवन साथ बिताने का निर्णय लेने से पहले कुछ और विषयों पर विस्तार से बात करना जरूरी है?’’ मीना कुछ संकुचित स्वर में बोली.

‘‘मैं हर विषय पर विस्तार से बात करने को तैयार हूं. पूछिए क्या जानना चाहती हैं आप?’’

‘‘हम दोनों ने सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ा परिश्रम किया है, पर जब 2 सफल व्यक्ति एक ही छत के नीचे रहें तो कई अप्रत्याशित समस्याएं सामने आ सकती है.’’

‘‘शायद.’’

‘‘शायद नहीं, वास्तविकता यही है,’’ मीना झुंझला गई थी.

‘‘मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई समस्या आ सकती है जिसे हम दोनों मिल कर सुलझा न सकें.’’

‘‘सुन कर अच्छा लगा, पर विवाह के बाद घर का काम कौन करेगा?’’

‘‘हम दोनों मिल कर करेंगे. मेरा दृढ़ विश्वास है कि विवाह नाम की संस्था में पतिपत्नी को समान अधिकार मिलने चाहिए,’’ नितीश ने तत्परता से उत्तर दिया.

‘‘और बच्चे?’’

‘‘बच्चे? कौन से बच्चे?’’

‘‘बनिए मत, बच्चों की जिम्मेदारी कौन संभालेगा?’’ ‘‘इस संबंध में तो कभी सोचा ही नहीं मैं ने.’’

‘‘तो अब सोच लीजिए. शतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छिपाने से तो समस्या हल नहीं हो जाएगी.’’

‘‘मैं बहस के लिए तैयार हूं महोदया,’’ नितीश नाटकीय अंदाज में बोल कर हंस पड़ा.

‘‘तो सुनिए मुझे बच्चे बिलकुल पसंद नहीं हैं या यों कहिए कि मैं बच्चों से नफरत करती हूं.’’

‘‘क्या कह रही हैं आप? उन भोलभाले मासूमों ने आप का क्या बिगाड़ा है.’’

‘‘इन मासूमों की भोली सूरत पर न जाइए. ये मातापिता के जीवन को कुछ इस तरह

जकड़ लेते हैं कि उन्हें जीवन की हर अच्छी चीज को त्याग देना पड़ता है.’’

‘‘मैं आप से सहमत हूं पर फिर भी लोग संतान की कामना करते हैं,’’ नितीश ने तर्क दिया.

‘‘करते होंगे, पर मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी नौकरी के साथ आप के बच्चों के पालनपोषण का भार उठा सकूं. मुझे तो उन के नाम से ही झुरझुरी आने लगती है.’’

‘‘आप बोलती रहिए आप की बातों से मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही है.’’

‘‘जरा सोचिए, दोगुनी कमाई और 2 सफल व्यक्ति साथ रहें तो जीवन में आनंद ही आनंद है, पर मैं ने अपने कई मित्रों को बच्चों के चक्कर में रोतेबिलखते देखा है. अच्छा क्या आप बता सकते हैं कि केवल मानव शिशु ही क्यों रोते हैं? मैं ने जानवर या चिडि़या के बच्चों को कभी रोते नहीं देखा,’’ मीना ने अपनी बात समाप्त की.

‘‘आप ठीक कहती हैं. मैं आप से पूर्णतया सहमत हूं, पर परिवार में बच्चे की जगह कोई तोता या कुत्ता नहीं ले सकता.’’

‘‘तो फिर इस समस्या को कैसे सुलझाएंगे आप?’’

‘‘मैं एक समय में एक समस्या सुलझाने में विश्वास करता हूं. पहली समस्या विवाह करने की है. फैसला यह करना है कि हम दोनों एक ही छत के नीचे साथ रह सकते हैं या नहीं. बच्चे जब आएंगे तब देखा जाएगा. अभी से इस झमेले में पड़ने की क्या जरूरत है?’’ नितीश गंभीर स्वर में बोला.

‘‘पर मेरे लिए यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है. मैं किसी भी कीमत पर अपने भविष्य से समझौता नहीं कर सकती. नारीजीवन की सार्थकता केवल मां बनने में है, मैं ऐसा नहीं मानती.’’

‘‘मेरे लिए कोई समस्या नहीं है. अब वह समय तो रहा नहीं जब बच्चे बुढ़ापे की लाठी होते थे. इसलिए यदि आप शादी के बाद परिवार की वृद्धि में विश्वास नहीं करतीं तो मुझे कोई समस्या नहीं है,’’ नितीश ने मानो फैसला सुना दिया.

मीना कुछ देर मौन रही. कोई उस की सारी शर्तों को मान कर उस से विवाह की स्वीकृति देगा ऐसा तो उस ने कभी सोचा भी नहीं था. फिर भी मन में ऊहापोह की स्थिति थी. नितीश सचमुच ऐसा ही है या केवल दिखावा कर रहा है और विवाह के बाद उस का कोई दूसरा ही रूप सामने आएगा.

मगर अनिर्णय की स्थिति अधिक देर तक नहीं रही. सच तो यह था कि उस के विवाह को ले कर घर में पसरा तनाव सारी सीमाएं लांघ गया था. अपने लिए न सही पर मातापिता की खुशी के लिए वह शादी करने को तैयार थी.

मीना की मां ममता तथा पिता प्रकाश बड़ी बेचैनी से मीना और नितीश के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे थे. नितीश के मातापिता भी यही चाहते थे कि किसी तरह वह शादी के लिए हां कर दे तो वे चैन की सांस लें.

जैसे ही नितीश और मीना ने विवाह के लिए सहमति जताई तो घर में मानो नई जान पड़ गई. ममता तो मीना के विवाह की आशा ही त्याग चुकी थीं. उन्हें पहले तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ और जब हुआ तो वे फफक उठीं. ‘‘ये तो खुशी के आंसू है,’’ ममता झट आंसू पोंछ कर अतिथिसत्कार में जुट गई थीं.

गृहशोभा विशेष

दोनों ही पक्ष जल्द शादी के इच्छुक थे. पहले ही इतनी देर हो चुकी थी. अब 1 दिन की देरी भी उन के लिए अंसहनीय थी.

हफ्ते भर के अंदर ही शादी संपन्न हो गई. शादी के बाद मीना और नितीश जिस आनंदमय स्थिति में थे वैसा आमतौर पर किस्सेकहानियों में होता होगा. मधुयामिनी से लौटी मीना के चेहरे पर अनोखी चमक देख कर उस के मातापिता भी पुलकित हो उठे थे.

मगर जीवन सदा सीधी राह पर ही तो नहीं चला करता. अचानक मीना की सेहत बिगड़ने लगी. वह बुझी सी रहने लगी. दूसरों को भी प्रेरित करने वाली ऊर्जा मानो खो सी हो गई थी.

तबीयत सुधरते न देख नितीश उसे डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने जब नए मेहमान के आने का शुभ समाचार सुनाया तो मीना का व्यवहार सर्वथा अप्रत्याशित था. वह अपनी सुधबुध खो बैठी. डाक्टर बड़े प्रयत्न से उसे होश में लाईं तो चीखचिल्ला कर मीना ने पूरा नर्सिंगहोम सिर पर उठा लिया. आसपास के लोग डाक्टर रमोला के कक्ष की ओर कुछ इस तरह दौड़ आए मानो कोई अनहोनी घट गईर् हो.

‘‘इस तरह संयम खोने से कोई भी समस्या हल नहीं होगी मीनाजी. मैं ने तो सोचा था कि आप यह शुभ समाचार सुन कर फूली नहीं समाएंगी. खुद को संभालिए. मैं ने ऐसे व्यवहार की आशा तो सपने में भी नहीं की थी. डाक्टर रमोला मीना को समझाने का प्रयत्न कर रही थीं. मगर मीना तो एक ही रट लगाए थी कि वह किसी भी कीमत पर इस अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाना चाहती थी.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं आप को इस आयु में गर्भपात की सलाह नहीं दूंगी.’’

‘‘मैं आप की सलाह नहीं मांग रही…बहुत नम्रता से कहूं तो अनुरोध कर रही हूं. आप को दोगुनी या तिगुनी फीस भी देने को तैयार हूं.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं किसी कीमत पर यह काम कभी न करूंगी और न ही आप को गर्भपात करवाने की सलाह दूंगी.’’

‘‘आप क्या समझती हैं कि शहर में और कोई डाक्टर नहीं है? चलो कहीं और चलते हैं,’’ मीना बड़े तैश में नितीश के साथ डाक्टर रमोला के कक्ष से बाहर निकल गई.

‘‘मेरे विचार से पहले घर चलते है. सोचसमझ कर फैसला करेंगे कि क्या और कैसे करना है? किस डाक्टर के पास जाना है,’’ कार में बैठते ही नितीश ने सुझाव दिया.

‘‘मैं सब समझती हूं. तुम सब की मिलीभगत है. तुम चाहते ही नहीं कि मैं इस मुसीबत से छुटकारा पा सकूं.’’

‘‘क्या कह रही हो मीना? लगता है 1 साल बाद भी तुम मुझे समझ नहीं सकीं. मुझे तुम्हारे स्वास्थ्य की चिंता है. मैं ने तुम्हारे और अपने मातापिता को सूचित कर दिया है. कोई फैसला लेने से पहले सलाह आवश्यक है.’’

‘‘किस से पूछ कर सूचित किया तुम ने? मुझे तो लगता है कि डाक्टर रमोला के कान भी तुम ने ही भरे थे. सब पुरुष एकजैसे होते हैं. साफ क्यों नहीं कहते कि तुम मेरी ग्रोथ से जलते हो. इसीलिए राह में रोड़े अटका रहे हो,’’ मीना एक ही सांस में बोल गई.

मीना का रोनाधोना न जाने कब तक चलता पर तभी उस की मां ममता का फोन आ गया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि वे पहली गाड़ी से पहुंच रही हैं. तब तक धैर्य से काम लो.

मीना छटपटा कर रह गई. वह समझ गई कि इस मुसीबत से निकल पाना आसान नहीं होगा.

दूसरे दिन सवेरे तक घर में मेहमानों की भीड़ लग गई थी. सब ने एकमत से घोषणा कर दी कि कुदरत के इस वरदान को अभिशाप में बदलने का मीना  को कोई अधिकार नहीं.

मीना मनमसोस कर रह गई. फिर भी उस ने निर्णय किया कि अवसर मिलते ही वह इस मुसीबत से छुटकारा अवश्य पा लेगी.

लाख चाहने पर भी मीना को अवसर नहीं मिल रहा था. उस के तथा नितीश के मातापिता एक पल के लिए भी उसे अकेला नहीं छोड़ते थे.

उस की मां ममता ने तो बच्चे को पालने का भार अपने कंधों पर लेने की घोषणा भी कर दी थी. फिर भला नितीश की मां कब पीछे रहने वाली थीं. उन्होंने भी अपने सहयोग का आश्वासन दे डाला था.

अब मीना बेचैनी से उस पल का इंतजार कर रही थी जब बच्चे के जन्म के साथ ही उसे इस शारीरिक तथा मानसिक यातना से छुटकारा मिलेगा. वह अकसर नितीश से परिहास करती कि नारी के साथ तो कुदरत ने भी पक्षपात किया है. तभी तो सारी असुविधाएं नारी के ही हिस्से आई हैं.

समय आने पर बच्चे का जन्म हुआ. सब कुछ ठीकठाक निबट गया तो सब ने राहत की सांस ली.

बच्चे को गोद में लेते हुए ममता तो रो ही पड़ी, ‘‘आज 35-36 साल बाद घर में बच्चे की किलकारियां गूजेंगी. कुदरत इतनी प्रसन्नता देगी, मैं ने तो इस की कल्पना भी नहीं की थी,’’ वे भरे गले से बोलीं.

‘‘यह तो बिलकुल अपने दादाजी पर गया है. वैसे तीखे नैननक्श, वैसा ही रोबीला चेहरा. तुम लोगों ने इस का नाम क्या सोचा है? नितीश की मां बच्चे को दुलारते हुए बोलीं.

‘‘आप लोग ही पालोगे इसे, नाम भी आप ही सोच लेना,’’ नितीश ने शिशु को गोद में ले कर ध्यान से देखा.

मीना कुतूहल से सारा दृश्य देख रही थी. वह बिस्तर पर बैठी थी. नितीश ने बच्चा उस के हाथों में दे दिया.

मीना को लगा मानो पूरे शरीर में बिजली दौड़ गईर् हो. उस ने बच्चे की बंद आंखों पर उंगलियां फेरी, छोटेछोटे हाथों की उंगलियां खोलने का प्रयत्न किया और नन्हे से तलवों को प्यार से सहलाया.

मीना को पहली बार आभास हुआ कि वह इस नन्ही सी जान को स्वयं से दूर करने की बात सोच भी नहीं सकती. उस ने शिशु को कलेजे से लगा लिया. और फिर उस कोमल, मीठे स्पर्शसुख में भीगती चली गई जिसे शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता था. दूर खड़ा नितीश मीना के चेहरे के बदलते भावों को देख कर ही सब कुछ समझ गया था जैसे दूर क्षितिज से पहली सूर्यकिरण अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हो.