गृहशोभा विशेष

नीना और राजन का गंभीरता से किसी मसले पर सलाहमशवरा करना ठीक वैसा ही हैरान कर देने वाला था जैसे हवा में दीपक का जलना. मगर आज दोनों बातचीत में इतने तल्लीन थे कि उन्हें देव के आने का पता भी नहीं चला.

‘‘इतना सन्नाटा क्यों है भई?’’

दोनों ने सिर उठा कर देखा. दोनों की ही आंखों में परेशानी के साथसाथ मायूसी भी थी.

‘‘खैरियत तो है न?’’ देव ने फिर पूछा.

‘‘हां भैया, घर में तो सब ठीक ही है…’’

‘‘तो फिर गड़बड़ कहां है?’’ देव ने राजन की बात काटी.

‘‘सोनिया की जिंदगी में भैया,’’ नीना बोली, ‘‘और वह भी बिना वजह… समझ नहीं आ रहा कैसे उस की मदद करें.’’

सोनिया नीना की खास सहेली थी और उस की ओर राजन का झुकाव भी देव की पैनी नजरों से छिपा नहीं था.

‘‘पूरी बात बताओ,’’ देव ने आराम से बैठते हुए कहा, ‘‘हो सकता है मैं कुछ मदद कर सकूं.’’

राजन फड़क उठा…

‘‘सुन नीना, पहले तो सब ठीक ही था, जीजी का इनकार आलोक के दादाजी की हत्या के बाद ही शुरू हुआ है न… तो भैया ठहरे हत्या विशेषज्ञ, जरूर यह मसला भी सुलझा देंगे.’’

नीना ने चिढ़ कर राजन की ओर देखा, ‘‘हत्या से सोनिया बेचारी का क्या लेनादेना? खैर, फिर भी भैया आप सोनिया के लिए कुछ न कुछ सुझाव तो दे ही सकते हैं,’’ नीना बोली, ‘‘आप जानते ही हैं कि सोनिया ने भी राजन के साथ ही आईआईएम अहमदाबाद की प्रवेश परीक्षा दी है और उसे भरोसा है कि वह सफल हो जाएगी. मगर उस के घर वाले चाहते हैं कि परीक्षा का नतीजा आने से पहले ही वह शादी कर ले, फिर अगर उस की ससुराल वाले चाहें तो वह पढ़ाई जारी रख सकती है… पैसे की बात नहीं है भैया, सोनिया के पापा शादी के बाद भी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने को तैयार हैं.’’

‘‘शादी किस से हो रही है?’’ देव ने पूछा.

‘‘अभी तो सोनिया से कहा है कि उसे कोई पसंद है, तो बता दे. वे लोग उस

की भी पढ़ाई का खर्चा उठाने को तैयार हैं और अगर उसे कोई पसंद नहीं है, तो वे ढूंढ़ लेंगे.’’

‘‘यानी किसी भी कीमत पर उन्हें सोनिया की शादी करनी है,’’ देव ने फिर नीना की बात काटी, ‘‘मगर क्यों?’’

नीना ने फिर गहरी सांस ली.

‘‘इस की वजह है सोनिया की जीजी किरण का अजीब व्यवहार. किरण की पड़ोस में रहने वाले आलोक से बचपन से दोस्ती थी और दोनों की सगाई की तारीख भी तय हो चुकी थी. लेकिन अचानक किरण ने शादी करने से मना कर दिया. आलोक से ही नहीं किसी से भी. उस का कहना है कि उसे शादी से इनकार नहीं है पर उसे कुछ समय दिया जाए. घर वालों ने 2 साल से ज्यादा समय दिया, मगर किरण अभी भी और समय चाहती है. घर वाले परेशान हो गए हैं. उन का खयाल है कि उन्होंने किरण को नौकरी करने की छूट दे कर गलती की है और यही गलती वे सोनिया के साथ नहीं दोहराना चाहते.’’

‘‘दूध का जला छाछ तो फूंकेगा ही. किरण के व्यवहार की वजह क्या है?’’ देव ने पूछा.

‘‘यही तो वह नहीं बतातीं. वजह पता चल जाए तो सोनिया सब को समझा तो सकती है कि उस के साथ ऐसा कुछ नहीं है. वह पढ़ाई खत्म होने पर शादी कर लेगी पर फिलहाल आईआईएम की पढ़ाई और शादी एकसाथ करना न तो मुमकिन है और न ही मुनासिब.’’

‘‘यह तो है. वह हत्या वाली बात… तुम क्या कह रहे थे राजन?’’

‘‘किरण और आलोक की सगाई से कुछ रोज पहले आलोक के दादाजी की हत्या हो गई थी. हत्या क्यों और किस ने की यह आज तक पता नहीं चल सका,’’ नीना ने बताया, ‘‘लेकिन इस से किरण के इनकार का क्या ताल्लुक?’’

‘‘हो भी सकता है. किरण और आलोक जानेपहचाने से नाम हैं,’’ देव कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘ये लोग सुंदर नगर में पासपास की कोठियों में तो नहीं रहते?’’

‘‘जी हां,’’ नीना बोली, ‘‘आप कैसे जानते हैं?’’

‘‘ये दोनों कालेज में मेरे से 2 साल पीछे थे और मेरे निर्देशन में दोनों ने नाटकों में अभिनय भी किया था. हमारे एक नाटक ‘चोट’ का चयन अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता में होने पर हम सब दूसरे शहरों में उस के मंचन के लिए भी गए थे और तब हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी. मैं ने एक बार जब आलोक से पूछा था कि किरण के साथ शादीवादी करने का इरादा है तो उस ने बड़ी गंभीरता से हां कहा था.’’

‘‘शादी के लिए इनकार आलोक नहीं किरण कर रही है. हालांकि आलोक ने भी अभी शादी की बात नहीं है. काम की व्यस्तता के कारण

2-3 साल पहले उस ने आईबीएम की एजेंसी ली और मार्केट में पैर जमाने के लिए बहुत भागदौड़ कर रहा था. अब धंधा जम गया है और वह शादी कर सकता है. यह सुन कर किरण के घर वाले बेचैन हो गए हैं. भैया, आप क्या आलोक से मिल कर किरण के इनकार की वजह नहीं पूछ सकते?’’ नीना ने पूछा.

‘‘जब इनकार किरण कर रही है तो आलोक से क्यों, किरण से क्यों नहीं? मुझे किरण से मिलवा सकती हो?’’

‘‘हां, जब भी आप कहें. शादी न करने के सिवा उन्हें और किसी बात से इनकार नहीं है,’’ नीना बोली, ‘‘मेरा मतलब है किसी से मिलनेजुलने से उन्हें कोई परहेज नहीं है. क्यों न मैं कल शाम को सोनिया के घर चली जाऊं और आप मुझे लेने वहां आ जाओ.’’

‘‘ठीक है, मैं औफिस से निकलने से पहले तुम्हें फोन कर दूंगा ताकि तुम किरण से मुलाकात का जुगाड़ भिड़ा सको.’’

अगले दिन जब देव नीना को लेने पहुंचा तो वह किरण और सोनिया के  ड्राइंगरूम में बैठी हुई थी.

‘‘अरे सर, आप?’’ किरण चौंकी.

‘‘आप यहां कैसे वकीलनीजी?’’ देव ने भी उसी अंदाज में कहा, फिर नीना और सोनिया की ओर देख कर बोला, ‘‘मेरे एक नाटक में यह वकील की पत्नी बनी थी तब से मैं इसे वकीलनीजी ही बुलाता हूं. चूंकि मैं नाटक का निर्देशक और सीनियर था सो किरण तो मुझे सर कहेगी ही. लेकिन सोनिया, तुम ने कभी जिक्र ही नहीं किया कि तुम्हारी जीजी अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता जीत चुकी हैं.’’

‘‘नीना ने भी कभी आप के बारे में कहां बताया? इन लड़कियों को किसी और के बारे में बात करने की फुरसत ही नहीं है,’’ किरण बोली, ‘‘सर, मुझे आप से कुछ सलाह लेनी है. कभी थोड़ा समय निकाल सकेंगे मेरे लिए?’’

‘‘कभी क्यों, अभी निकाल सकता हूं बशर्ते आप 1 कप चाय पिला दें,’’ कह देव मुसकराया.

‘‘चाय पिलाए बगैर तो हम ने आप को वैसे भी नहीं जाने देना था भैया,’’ सोनिया बोली, ‘‘मैं चाय भिजवाती हूं. आप इतमीनान से दीदी के कमरे में बैठ कर बातें कीजिए. मांपापा रोटरी कल्ब की मीटिंग में गए हैं, देर से लौटेंगे.’’

‘‘और बताओ वकीलनीजी, अपने मुंशीजी, मेरा मतलब है आलोक कहां है आजकल?’’ देव ने किरण के कमरे में आ कर पूछा.

किरण ने गहरी सांस ली, ‘‘हैं तो यहीं पड़ोस में, लेकिन मुलाकात कम ही होती है…’’

‘‘क्यों? बहुत व्यस्त हो गए हो तुम दोनों या कुछ खटपट हो गई है?’’ देव ने बात काटी.

‘‘इतने व्यस्त भी नहीं हैं और न ही हमारी जानकारी के अनुसार कोई खटपट हुई है. मुझे ही कोई गलतफहमी हो गई है शायद.’’ किरण हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘उसी बारे में आप से बात करना चाह रही थी. आप के बारे में अकसर पढ़ती रहती हूं. कई बार आप से मिलना भी चाहा, मगर समझ नहीं आया कैसे मिलूं. सर, मुझे लगता है आलोक ने अपने दादाजी की हत्या की है.’’

देव चौंक पड़ा कि तो यह वजह है शादी न करने की. लेकिन किरण से पूछा, ‘‘शक की वजह?’’

‘‘जिस रात दादाजी की हत्या हुई मुझे लगता है मैं ने आलोक को छत से कूद कर भागते हुए देखा था. लेकिन आलोक का कहना है कि वह उस समय पिछली सड़क पर हो रही अपने दोस्त की शादी के मंडप में था. दादाजी की हत्या की सूचना भी उसे वहीं मिली थी.’’

‘‘लेकिन तुम्हें लगता है कि भागने वाला आलोक ही था?’’

‘‘जी, सर हत्या का कोई मकसद भी सामने नहीं आया. न तो कुछ चोरी हुआ था और न ही दादाजी की किसी से कोई दुश्मनी थी.’’

‘‘हत्या से किसी को व्यक्तिगत लाभ?’’

गृहशोभा विशेष

‘‘सिर्फ आलोक को जो केवल मुझे मालूम है क्योंकि दूसरों की नजरों में तो दादाजी वैसे ही सबकुछ उस के नाम कर चुके थे.’’

‘‘जो तुम्हें मालूम है या जो भी तुम्हारा अंदाजा है, मुझे विस्तार से बताओ किरण. मैं वादा करता हूं मैं जहां तक हो सकेगा तुम्हारी मदद करूंगा?’’

‘‘मां का कहना था कि मुझे प्रवक्ता की नौकरी न करने दी जाए, क्योंकि  फिर मैं अपने दादाजी के फ्रिज और टीवी के शोरूम में बैठने वाले आलोक से शादी करने को मना कर दूंगी. पापा ने उन्हें समझाया कि आलोक खुद ही फ्रिज और टीवी बेचने के बजाय विदेशी कंप्यूटर की एजेंसी लेना चाह रहा है. इसी सिलसिले में कानूनी सलाह लेने उन के पास आया था. उस में कोई कानूनी अड़चन नहीं है. आलोक को बड़ी आसानी से एजेंसी मिल जाएगी और कंप्यूटर विके्रता से शादी करने में उन की लैक्चरार बेटी को कोई एतराज नहीं होगा.

‘‘मां ने फिर शंका जताई कि दादाजी अपनी बरसों पुरानी चीजों को छोड़ कर कंप्यूटर बेचने से रहे तो पापा ने बताया कि शोरूम तो दादाजी आलोक के नाम कर ही चुके हैं सो वह उस में कुछ भी बेचे, उन्हें क्या फर्क पड़ेगा. मां तो आश्वस्त हो गईं, लेकिन पापा का सोचना गलत था. दादाजी कंप्यूटर की एजेंसी लेने के एकदम खिलाफ थे. वे कंप्यूटर को फ्रिज या टीवी की तरह रोजमर्रा के काम आने वाली और धड़ल्ले से बिकने वाली चीज मानने को तैयार ही नहीं थे.

‘‘दादाजी ने शोरूम जरूर आलोक के नाम कर दिया था, लेकिन उसे चलाते अभी भी वे खुद ही थे, अपनी मनमरजी से. जिस ग्राहक को जितना चाहा उतनी छूट या किश्तों की सुविधा दे दी, कौन सा मौडल या ब्रैंड लेना बेहतर रहेगा, इस पर वे हरेक ग्राहक के साथ घंटों सलाहमशवरा और बहस किया करते थे. कंप्यूटर की एजेंसी लेने से तो उन की अहमियत ही खत्म हो जाती, जिस के लिए वे बिलकुल तैयार नहीं थे. उन्होंने आलोक से साफ कह दिया कि उन के जीतेजी तो उन के शोरूम में जो आज तक बिकता रहा है वही बिकेगा. कुछ दूसरा बेचने के लिए आलोक को उन की मौत का इंतजार करना होगा.

‘‘आलोक ने मुझे यह बात बताते हुए कहा था कि दादाजी के इस अडि़यल रवैए से मेरा कंप्यूटर विक्रेता बनने का सपना कभी पूरा नहीं होगा. मैं दादाजी का शोरूम संभालने को तैयार ही इस लालच में हुआ था कि आईबीएम की एजेंसी लूंगा वरना पापा और अशोक भैया की तरह मैं भी चार्टर्ड अकाउंटैंट बन कर उन के औफिस में बैठा रहूंगा. वैसे अभी भी मैं फ्रिजटीवी बेच कर तो रोटी कमाने से रहा. जब तक मैं अपने कैरियर का चुनाव न कर लूं किरण, मैं सगाईशादी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता.

‘‘मुझे उस की बात सही लगी और मैं ने उसे भरोसा दिलाया कि मैं किसी तरह सगाई टलवा दूंगी. इस से पहले कि मैं कोई बहाना खोज पाती, आलोक फिर आया. वह बहुत सहज लग रहा था. उस ने कहा कि मुझे परेशान होने की जरूरत नहीं है, सब ठीक हो जाएगा. कुछ रोज बाद हमारे सहपाठी रवि की शादी थी. आलोक उस की बारात में मेरे साथ खूब नाचा. खाने के बाद आलोक ने कहा कि रवि के सभी दोस्त उसे मौरल सपोर्ट देने को बिदाई तक रुक रहे हैं सो वह भी रुकेगा. उस ने मुझे भी ठहरने को कहा, मगर मुझे कुछ कापियां जांचनी थीं सो मैं घर वालों के साथ वापस आ गई.

‘‘आलोक के घर में एक जामुन का पेड़ है, जिस की शाखाओं ने हमारी आधी छत को घेरा हुआ है. मैं तब ऊपर छत वाले कमरे में रहती थी. आलोक और दादाजी का कमरा भी उन की छत पर था. दादाजी के सोने के बाद पेड़ की डाल के सहारे आलोक अकसर मेरे कमरे में आया करता था.’’

‘‘आया करता था यानी अब नहीं आता?’’ देव ने बात काटी.

‘‘क्योंकि दादाजी की हत्या के बाद पापा ने मुझे अकेले ऊपर नहीं रहने दिया. हां, तो मैं बता रही थी कि उस रात पत्तों की आवाज सुन कर मुझे लगा कि आलोक आ गया है. मैं बाहर आई. पत्ते तो हिल रहे थे, लेकिन छत पर कोई नहीं था. मैं ने नीचे से झांक कर देखा तो पेड़ से उतर कोई भागता नजर आया और दादाजी के कमरे से उन के नौकर राजू के चिल्लाने की आवाजें आईं कि देखो दादाजी को क्या हो गया. मैं भाग कर नीचे आई और सब को राजू के चिल्लाने के बारे में बताया. हम लोग आलोक के घर गए. दादाजी के मुंह पर तकिया रख कर किसी ने दम घोंट कर उन की हत्या कर दी थी.

‘‘राजू दादाजी के लिए दूध ले कर ऊपर जा रहा था कि गिलास पर ढक्कन की जगह रखी कटोरी गिर सीढि़यों से झनझनाती हुई नीचे चली गई. शायद उसी की आवाज सुन कर हत्यारा कहीं छिप गया था. सब उस की तलाश करने लगे. मगर मैं ने किसी को नहीं बताया कि मैं ने हत्यारे को पेड़ से उतरते और दीवार फांदते देखा था. क्योंकि मैं ने उस की शक्ल तो नहीं सिर्फ लिबास देखा था.

‘‘वैसा ही रेशमी कुरतापाजामा जैसा आलोक पहने हुए था. पापा ने मेरे छोटे भाई बंटी को फंक्शन हौल से आलोक को लाने भेजा. मेरा खयाल था कि आलोक वहां नहीं होगा, लेकिन बंटी आलोक को ले कर आ गया. गौर से देखने पर भी आलोक के कपड़ों पर पेड़ पर चढ़नेउतरने के निशान नहीं थे. और आलोक भी परिवार के अन्य सदस्यों की तरह ही हैरान था…’’

‘‘फिर तुम्हें यह शक क्यों है कि हत्यारा आलोक ही है?’’ देव ने बीच में पूछा.

‘‘क्योंकि अगले दिन जब पुलिस ने पेड़ के नीचे जूतों के निशान देखे तो वे जोधपुरी जूतियों के थे जिन्हें आलोक उस समय भी पहने हुए था. सही साइज का पता नहीं चल रहा था क्योंकि भागने की वजह से निशान अधूरे थे. आलोक शक के घेरे में आ गया, मगर उस ने अपने बचाव में रवि की शादी की वे तसवीरें दिखाई, जिन में वह उस समय तक रवि के साथ था जब तक बंटी उसे बुलाने नहीं गया था. पुलिस ने भले ही उसे छोड़ दिया हो, लेकिन मुझे लगता है कि वह आलोक ही था. एक तो पेड़ पर से चढ़नेउतरने का रास्ता उसे ही मालूम है, दूसरे दादाजी की मौत से फायदा भी उसे ही हुआ.

‘‘13वीं के तुरंत बाद उस ने एजेंसी लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. रहा सवाल तसवीर का, तो खाने और फेरों के दरम्यान तो लगातार तसवीरें कहां खिंचती हैं सर? फोटोग्राफर भी उसी दौरान खाना खाते हैं. फंक्शन हौल घर के पीछे ही तो था. दीवार फांद कर आनेजाने और तकिए से मुंह दबा कर किसी बुजुर्ग को मारने में समय ही कितना लगता है?’’

‘‘तुम ने इस बारे में आलोक से बात की?’’

‘‘नहीं सर, आज पहली बार आप को बता रही हूं.’’

‘‘तुम ने अपनी सगाई या शादी कैसे टाली?’’

‘‘दादाजी की मृत्यु के तुरंत बाद तो सवाल ही नहीं उठता था. उस के बाद आलोक भी बहुत व्यस्त हो गया था. घर पर आता तो था, मगर पापा से सलाहमशवरा करने और मैं अपनी तरफ से उस से अकेले मिलने की कोशिश ही नहीं करती थी. साल भर बाद जब मां ने सगाई की जल्दी मचाई तो मैं ने उन से साफ कहा कि मुझे शादी से पहले कुछ समय चाहिए. आलोक के घर वाले भी उस की व्यस्तता के चलते अभी शादी करने की जल्दी में नहीं थे सो मेरे घर वाले भी मान गए.’’

‘‘और आलोक से मिलनाजुलना कैसे कम किया?’’

किरण मुसकराई, ‘‘उसे समझा दिया सर कि हमें ज्यादा मिलतेजुलते देख कर मां शादी जल्दी करवा देंगी. चूंकि आलोक भी धंधा जमने के बाद ही शादी करना चाहता था सो मान गया. वैसे भी उसे फुरसत तो थी नहीं, लेकिन अब जब भी फुरसत मिलती है आ जाता है और मां का शादी वाला राग शुरू हो जाता है. अब आप ही बताइए सर, जिस आदमी पर मैं शक करती हूं उस से शादी करना मुनासिब होगा?’’

‘‘बिलकुल नहीं. मैं कल ही इस केस की फाइल देखता हूं. मुझे दादाजी का नाम और हत्या की तारीख बताओ,’’ देव ने कहा, ‘‘तुम भी अब शादी के लिए मना मत करो. जब तक घर वाले तैयारी करेंगे, तब तक मैं हत्यारे को पकड़ लूंगा. अगर आलोक हुआ तो शादी का सवाल ही नहीं उठता और कोई दूसरा हुआ तो तुम्हारे इनकार करने की, फिर मना कर के घर में सब को परेशान करने की क्या जरूरत है?’’

‘‘जी सर.’’

रास्ते में देव ने नीना को बताया कि उस ने किरण को समझा दिया है और वह शादी के लिए मना नहीं करेगी. सोनिया को फिलहाल परेशान होने की जरूरत नहीं है.

अगले दिन देव ने कमिश्नर साहब को सारी बात बता कर केस की फाइल निकलवा ली. उस में लिखे तथ्यों के मुताबिक सुबूत न के बराबर थे, जिन के आधार पर हत्यारे को पकड़ना भूसे के ढेर में सूई ढूंढ़ने के समान था. लेकिन देव ने कमिश्नर साहब से आग्रह किया कि वे यह केस उस के सुपुर्द कर दें.

आलोक के घर वालों को दोबारा तफ्तीश की बात सुन कर पहले हैरान और फिर खुश होना स्वाभाविक ही था. सब से ज्यादा खुश आलोक लगा.

‘‘मैं अपने को जानबूझ कर व्यस्त रखता हूं सर क्योंकि जहां जरा सी फुरसत मिली, मैं यही सोचने लगता हूं कि दादाजी की हत्या किस ने की होगी?’’

‘‘और क्यों की होगी?’’ देव ने जोड़ा.

‘‘चोरी के लिए सर दादाजी गले में सोने की मोटी चेन, उंगलियों में हीरेपन्ने की अंगूठियां, सोने की कलाई घड़ी और सोने के बटन वाले कुरते पहनते थे. उन के बटुए में भी हजारों रुपए रहते थे. कमरे में मेरा भी लैपटौप, आईपौड वगैरह पड़े थे, लेकिन इस से पहले कि चोर ये सब समेट सकता, राजू के हाथ से सीढि़यों में कटोरी गिर गई और उस की आवाज से वह डर कर भाग गया,’’ आलोक ने कहा.

‘‘पेड़ से चढ़नेउतरने का रास्ता नए आदमी को तो मालूम नहीं हो सकता?’’

‘‘यही तो परेशानी है सर, हत्या तो किसी जानपहचान वाले ने ही की है. आप को एक बात बतांऊ, पेड़ के नीचे मिले निशान मेरी राजस्थानी जूतियों से मेल खा रहे थे. मैं शक के घेरे में तो आ गया था, लेकिन उसी दिन मेरे एक दोस्त की शादी थी और हर तसवीर और वीडियो के फ्रेम में होने की वजह से मैं बच गया.’’

‘‘मैं वह अलबम और वीडियो देख सकता हूं?’’

‘‘जरूर सर. मैं रवि के घर से अलबम और वीडियो कैसेट ला कर आप को फोन करूंगा,’’ आलोक ने कहा.

कुछ देर बाद आलोक ने देव को फोन किया कि उसे अलबम तो मिल गया है, मगर वीडियो कैसेट बारबार चलाने के कारण इतनी घिस गई है कि देखने में उलझन होती है सो न जाने कहां रख दी है. ढूंढ़ने को कह दिया है.

‘‘ठीक किया. फिलहाल अलबम मेरे औफिस में ला या भिजवा सकते हो?’’

‘‘अभी भेज देता हूं सर और अगर मेरी जरूरत हो तो फोन कर दीजिएगा, मैं फौरन हाजिर हो जाऊंगा.’’

अलबम देखने के बाद देव ने किरण को फोन किया, ‘‘किरण, उस रात तुम ने भागने वाले के कपड़ों का रंग भी देखा था?’’

‘‘नहीं सर, इतनी रोशनी नहीं थी…सिर्फ चमक और कुरते की लंबाई देखी थी.’’

‘‘वैसे उस शादी में आलोक के अलावा और कई लोग सिल्क के कुरतेपाजामों में थे.’’

‘‘हां सर, यह उस समय का खास फैशन था.’’

‘‘तो फिर भागने वाला आलोक ही क्यों, कोई और भी तो हो सकता है?’’

‘‘आलोक इसलिए सर कि एक तो भागने का रास्ता सिर्फ उसे ही मालूम था और दूसरे दादाजी के न रहने से फायदा भी तो उसी को हुआ.’’

किरण के तर्क में दम तो था, लेकिन देव फिलहाल उस से सहमत होने को तैयार नहीं था. उस ने तसवीरों को फिर गौर से देखा. फिर आलोक को फोन कर के बुलाया.

‘‘इन तसवीरों में दूल्हा और तुम्हारे दूसरे सभी दोस्त तो अपने कालेज के साथी ही हैं सिवा एक के जो हर तसवीर में तुम से सट कर खड़ा है,’’ देव ने टिप्पणी की.

‘‘वह मेरा बिजनैस पाटर्नर नकुल है सर. अमेरिका से कंप्यूटर में डिप्लोमा कर के आया है. आप को तो मालूम ही होगा सर, आईबीएम की एजेंसी लेने के लिए कंप्यूटर स्पैशलिस्ट होना अनिवार्य है, इस के अलावा इलैक्ट्रौनिक प्रोडक्ट्स बेचने का अनुभव और एक बड़े एअरकंडीशंड शोरूम का मालिक होना भी. मैं ने और नकुल ने साथ मिल कर ये सब शर्तें पूरी कर के जोनल डिस्ट्रिब्यूटरशिप ली है.’’

‘‘कब से जानते हो नकुल को?’’

‘‘बचपन से सर. हमारे घर में एक बहुत बड़ा जामुन का पेड़ है. हम दोनों अकसर उस पर बैठ कर कुछ बड़ा, कुछ हट कर करने की सोचा करते थे. उस पेड़ की तरह ही विशाल. नकुल तो इसी फिराक में अमेरिका निकल गया. मैं दादाजी के मोह और किरण की मुहब्बत में कहीं नहीं जा सका, मगर नकुल बचपन की दोस्ती और सपने नहीं भूला था. उस ने वापस आ कर मुझ से भी कुछ अलग और बड़ा करवा ही दिया.’’

‘‘आलोक, इस केस को सुलझाने के लिए हो सकता है कि मुझे इन तसवीरों में मौजूद तुम्हारे सभी दोस्तों से पूछताछ करनी पड़े.’’

‘‘आप जब कहेंगे सब को ले आऊंगा सर, लेकिन उस से पहले अगर आप किरण से पूछताछ करें तो हो सकता है कोई अहम बात पता चल जाए.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘मालूम नहीं सर, मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि किरण को कुछ पता है, क्योंकि दादाजी की हत्या के बाद वह पहले वाली किरण नहीं रही है. हमेशा बुझीबुझी सी रहती है.’’

‘‘दादाजी से खास लगाव था उसे?’’

‘‘वह तो सभी को था सर. उन की शख्सीयत ही ऐसी थी.’’

‘‘दादाजी की हत्या की खबर सुनते ही तुम्हारे साथ कितने दोस्त आए थे?’’

‘‘कोई नहीं सर क्योंकि बंटी से यह सुनते ही कि दादाजी बेहोश हो गए हैं, मैं किसी से कुछ कहे बिना फौरन उस के स्कूटर के पीछे बैठ कर आ गया था.’’

‘‘कोई तुम्हारी तलाश में तुम्हारे पीछेपीछे नहीं आया?’’

‘‘नहीं सर,’’ आलोक ने इनकार में सिर हिलाया, ‘‘मुझे अच्छी तरह याद है कि उस रात तो डाक्टर और पुलिस के अलावा हमारे परिवार के साथ सिर्फ किरण के घर वाले ही थे. सुबह होने पर उन लोगों ने औरों को सूचित किया था.’’

अगली दोपहर को किरण के साथ इंस्पैक्टर देव को अपने शोरूम में देख कर आलोक हैरान रह गया, ‘‘खैरियत तो है सर?’’

‘‘फिलहाल तो है,’’ देव ने लापरवाही से कहा, ‘‘तुम ने कहा था कि किरण से पूछताछ करूं सो बातचीत करने को इसे यहां ले आया हूं. तुम्हारे बिजनैस पार्टनर नहीं है?’’

‘‘हैं सर, अपने कैबिन में.’’

‘‘तो चलो उन्हीं के कैबिन में बैठते हैं,’’ देव ने कहा.

आलोक दोनों को बराबर वाले कैबिन में ले गया. नकुल से देव का परिचय करवाया.

‘‘कहिए क्या मंगवांऊ. ठंडा या गरम?’’ नकुल ने औपचारिकता के बाद पूछा.

‘‘वे सब बाद में, अभी तो बस आलोक के दादाजी की हत्या के बारे में कुछ सवालों के जवाब दे दीजिए,’’ देव ने कहा.

नकुल एकदम बौखला गया, ‘‘उस बारे में भला मैं क्या बता सकता हूं? मुझे तो हत्या की सूचना भी किरण से अगली सुबह मिली थी.’’

‘‘यही तो मैं पूछना चाह रहा हूं नकुल कि जब पूरी शाम आप आलोक के साथ थे तो आप ने इसे बंटी के साथ जाते हुए कैसे नहीं देखा?’’

नकुल सकपका गया, लेकिन आलोक बोला, ‘‘असल में सर उस समय कंगना खेला जा रहा था और सब दोस्त एक घेरे में बैठ कर रवि को उत्साहित करने में लगे हुए थे.’’

‘‘बिलकुल. असल में मैं ने सब को रोका ही रवि को कंगने के खेल में जितवाने के लिए था,’’ नकुल तपाक से बोला.

‘‘मगर आप स्वयं तो उस समय वहां नहीं थे…’’

‘‘क्या बात कर रहे हैं इंस्पैक्टर साहब?’’ नकुल ने उत्तेजित स्वर में देव की बात काटी, ‘‘मैं रवि की बगल में बैठ कर उस की पीठ थपथपा रहा था.’’

‘‘तो फिर आप इस तसवीर में नजर क्यों नहीं आ रहे?’’ देव ने अलबम दिखाया, ‘‘न आप इस तसवीर में हैं और न इस के बाद की तसवीरों में. आप तकलीफ न करिए, मैं ही बता देता हूं कि आप कहां थे?’’

‘‘बाथरूम में था, ज्यादा खानेपीने के बाद जाना ही पड़ता है,’’ नकुल ने चिढ़े स्वर में कहा.

‘‘जी नहीं, उस समय आप दादाजी के कमरे में थे,’’ देव ने शांत स्वर में कहा, ‘‘आप की योजना हो सकती है हत्या कर के फिर मंडप में आने की हो, लेकिन जल्दीजल्दी पेड़ से उतरते हुए आप के कपड़े खराब हो गए थे सो आप ने वापस आना मुनासिब नहीं समझा.’’

‘‘आप जो भी कह रहे हैं उस का कोई सुबूत है आप के पास?’’ नकुल ने चुनौती के स्वर में पूछा.

‘‘अभी लीजिए. जरा पीठ कर के खड़े होने की जहमत उठाएंगे आप और आलोक तुम भी इन के साथ पीठ कर के खड़े हो जाओ,’’

कह देव किरण की ओर मुड़ा, ‘‘इन दोनों को गौर से देखो किरण, प्राय: एक सा ही ढांचा है और अंधेरे में ढीलेढाले कुरते में यह पहचानना मुश्किल था कि पेड़ से कूद कर भागने वाला आलोक था या नकुल.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं सर,’’ किरण चिल्लाई, ‘‘मुझे यह खयाल पहले क्यों नहीं आया कि नकुल ने भी आलोक के जैसे ही कपड़े पहने हुए थे और उस के पास तो हत्या करने की आलोक से भी बड़ी वजह थी. उस ने तो आईबीएम की एजेंसी लेने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था सर. वह नौकरी छोड़ कर और अपना ग्रीन कार्ड वापस कर के अमेरिका से वापस आया था…’’

आलोक ने किरण के कंधे पकड़ कर उसे झंझोड़ा, ‘‘यह क्या कह रही हो किरण, तुम ने पहले कभी तो बताया नहीं कि तुम ने किसी को भागते हुए देखा था?’’

‘‘कैसे बताती, उसे शक जो था कि भागने वाले तुम हो. इसीलिए बेचारी शादी टाल रही थी और गुमसुम रहती थी. संयोग से मुझ से मुलाकात हो गई और असलियत सामने आ गई… भागने की बेवकूफी मत करना नकुल, मेरे आदमियों ने तुम्हारा शोरूम घेरा हुआ है. मैं नहीं चाहूंगा कि तुम्हारे स्टाफ के सामने तुम्हें हथकड़ी लगा कर ले जाऊं, इसलिए चुपचाप मेरे साथ चलो, क्योंकि उस रात कमरे के दरवाजों, छत की मुंडेर वगैरह पर से पुलिस ने जो उंगलियों के निशान उठाए थे, वे तुम्हारी उंगलियों के निशानों से मिल ही जाएंगे. वैसे किरण ने वजह तो बता ही दी है, फिर भी मैं चाहूंगा कि तुम चलने से पहले आलोक को बता ही दो कि ऐसा तुम ने क्यों किया?’’ देव ने कहा.

‘‘हां नकुल, तूने तो मुझे भरोसा दिया था कि तू लाभ का पूरा ब्योरा दे कर दादाजी को मना लेगा या एक और शोरूम लेने की व्यवस्था कर लेगा, फिर तूने ऐसा क्यों किया?’’ आलोक ने दुखी स्वर में पूछा.

‘‘और करने को था ही क्या? दादाजी कुछ सुनने या अपने शोरूम का सामान छोटे शोरूम में शिफ्ट करने को तैयार ही नहीं थे और बड़ा शोरूम लेने की मेरी हैसियत नहीं थी. तेरे यह बताने पर कि तूने शोरूम अपने नाम करवा लिया है, मैं अपनी बढि़या नौकरी छोड़ और ग्रीन कार्ड वापस कर के यानी अपने भविष्य को दांव पर लगा यहां आया था. दादाजी यह जाननेसमझने के बाद भी कि कंप्यूटर बेचने में बहुत फायदा होगा, अपने वर्चस्व का मोह त्यागने को तैयार ही नहीं थे. उन की इस जिद के कारण मैं हाथ पर हाथ धर कर तो नहीं बैठ सकता था न?’’ नकुल ने कड़वे स्वर में पूछा.

‘‘अच्छा किया नकुल बता दिया, तुम्हारे लिए इतना तो करवा ही दूंगा कि जेल में तुम्हें एक दिन भी हाथ पर हाथ धर कर बैठना न पड़े,’’ देव की बात पर उस बोझिल वातावरण में भी आलोक और किरण मुसकराए बगैर न रह सके.

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