15 वर्षों से अमेरिका में नौकरी करते करते ऐसा लगने लगा जैसे अब हम यहीं के हो कर रह गए हैं. 3 साल में 1 बार अपनी मां के पास अपने देश भारत जाना होता है. बच्चे भी यहीं की बोली बोलने लगे हैं और यहीं का रहनसहन अपना चुके हैं. कई बार मैं अपने पति से कहती कि क्या हम यहीं के हो कर रह जाएंगे? पति कहते कि कर भी क्या सकते हैं? आजकल की नौकरियां हैं ही ऐसी. जहां नौकरी वहीं हम. पहले जमाने की तरह तो है नहीं कि सुबह 9 से शाम 5 बजे तक की सरकारी नौकरी करो और आराम से जिंदगी जीयो और न ही वह जमाना रहा कि पति की नौकरी से ही घर खर्च चल जाए और बचत भी हो जाए. अत: मुझे तो नौकरी करनी ही थी.

मेरे पति आकाश के मांबाबूजी यानी अपने सासससुर को मैं मम्मीपापा ही पुकारती हूं. वे भारत में ही हैं और उन की बहन आशी यानी मेरी ननद भी मुंबई में ही रह रही हैं. उन के पति मर्चेंट नेवी में हैं और 2 सुंदर बेटियां हैं. मम्मीपापा कहने को तो अकेले रहते हैं अपने फ्लैट में, लेकिन उन की देखभाल तो आशी दीदी ही करती हैं. मगर मम्मीपापा को कहां अच्छा लगता है कि वे अपनी बेटी पर बोझ बनें. वे तो भारत में विवाह के बाद पराया धन मानी जाती हैं. लेकिन अब तो मम्मीपापा के अकेले रहने की उम्र भी नहीं रही. अत: हम लोग बारबार उन से आग्रह करते कि हमारे पास अमेरिका में ही रहें. पर वे तो अपने देश, अपने घर के मोह में ऐसे बंधे हैं कि उन्हें छोड़ना ही नहीं चाहते.

हर बार यही कहते हैं कि अमेरिका में मन नहीं लगेगा. भारतीय लोग भी तो नहीं हैं वहां. किस से बोलेंगे? भाषा की समस्या अलग से. लेकिन जब आशी दीदी ने उन्हें समझाया कि अब तो अमेरिका में बहुत भारतीय हैं, तो उन्होंने अमेरिका आने का मन बना लिया. फिर क्या था. आकाश भारत गए और वहां का फ्लैट बेचने की कारवाई शुरू कर दी. मम्मीपापा का तो रोमरोम घर में बसा था. बहुत प्यार था मम्मी को उस घर की हर चीज से. क्यों न हो. पापा की खूनपसीने की कमाई से बना था उन का यह घर.

मम्मी एक तरफ तो उदास थीं कि इतने वर्ष जिस घर में रहीं वह आज बिक रहा है, सब छूट रहा है, लेकिन दूसरी तरफ खुश भी थीं कि अपने बेटेपोते के साथ बुढ़ापे के बचेखुचे दिन गुजारेंगी. 2 महीने पूरे हुए. मम्मी आशी दीदी से विदाई ले कर अमेरिका के लिए रवाना हो गईं. आशी दीदी का मन भी बहुत दुखी था कि अब उन का भारत में कोई नहीं. एक मम्मी ही तो थीं जिन से वे दुखसुख की सारी बातें कह लेती थीं.

मम्मीपापा मेरे बच्चों अक्षय और अंशिका से मिल कर बहुत खुश हुए. पापा तो उन से अंगरेजी में बात करने की पूरी कोशिश करते, लेकिन मम्मी उन का अमेरिकी लहजा न समझ पातीं. आधी बातें इशारों में ही करतीं. मैं अच्छी तरह समझती थी कि शुरूशुरू में उन का यहां मन लगना बहुत मुश्किल है. अत: मैं ने उन के लिए औनलाइन हिंदी पत्रिकाएं और्डर कर दीं.

फिर एक दिन मैं ने कहा, ‘‘मम्मी, शाम को कुछ भारतीय महिलाएं अपनी किट्टी पार्टी करती हैं, जिन में से कुछ आप की उम्र की भी हैं. आप रोज शाम को उन के पास चली जाया करें. आप की दोस्ती भी हो जाएगी और मन भी लग जाएगा.’’

एक दिन मैं ने उन महिलाओं से मम्मी का परिचय करवाते हुए कहा, ‘‘मम्मी, ये हैं विनीता आंटी, ये कमला आंटी, ये रूपा आंटी और ये हमारी मम्मी.’’

सभी महिलाएं बड़ी खुश हुईं. रूपा आंटी कहने लगीं, ‘‘स्वागत है बहनजी हमारे समूह में आप का. बड़ी खुशी हुई आप से मिल कर. चलो, हमारे परिवार में एक सदस्य और बढ़ गया. अब हम इन्हें रोज नीचे बुला लिया करेंगी.’’

अब मम्मी शाम को 5 बजे अपनी सहेलियों के पास रोज पार्क में चली जातीं. वहां गपशप व थोड़ी इधरउधर की बातें करना उन्हें बहुत अच्छा लगता. धीरेधीरे 1 ही महीने में मम्मी का मन यहां लग गया. पापा तो रोज अपने नए मित्रों के साथ सुबहशाम सैर कर आते और बाकी खाली समय में हिंदी पत्रिकाएं पढ़ते. मम्मी सुबहशाम मेरा रसोई में हाथ बंटातीं. लेकिन अब मम्मी जब शाम को पार्क से लौटतीं, तो उन के पास हर दिन एक नया किस्सा होता, मुझे सुनाने के लिए.

फिर एक दिन मम्मी जब पार्क से लौटीं तो सेम की फलियां काटतेकाटते बोलीं, ‘‘आज मालूम है रूपा क्या बता रही थी? कह रही थी कि इधर एक हिंदुस्तानी पतिपत्नी रहते हैं. दोनों नौकरी करते हैं. उन के बच्चे नहीं हैं. सुना है पति नपुंसक है. उस की पत्नी का दफ्तर में एक अन्य आदमी से संबंध है.’’

‘‘मम्मी यहां सब चलता है और मैं भी पहचानती हूं उन्हें. अच्छे लोग हैं दोनों ही.’’

‘‘क्या खाक अच्छे लोग हैं… पति के रहते पत्नी गैरपुरुष से संबंध रखे तो क्या अच्छा लगता है?’’

मैं मम्मी के चेहरे को गौर से देख रही थी. उन की त्योरियां चढ़ी हुई थीं. सही बात तो यह है कि उन के चेहरे पर ये भाव होने वाजिब ही थे, क्योंकि हमारे हिंदुस्तान में ऐसे संबंधों को कहां मान्यता दी है? हां यह बात अलग है कि वहां चोरीछिपे सब चलता है. यदि बात खुल जाए तो स्त्री और पुरुष दोनों ही बदनाम हो जाते हैं. लेकिन हिंदुस्तान में भी तो शुरू से ही रखैल और देवदासी प्रथा प्रचलित थी. उच्च वर्ग के लोग महिलाओं को बखूबी इस्तेमाल करते थे. लेकिन उच्च वर्ग यह करे तो शानशौकत और निम्न वर्ग तो बेचारा इस्तेमाल ही होता रहा. समाज में समानता कहां है. लेकिन यहां तो समाज इन रिश्तों को खुल कर स्वीकारता है. पर मम्मी को कौन समझाए? मैं उन से इस बारे में बहस नहीं करना चाहती थी. मैं जानती थी इन सब बातों से मम्मी का दिल दुखेगा. सो मैं ने सेम की फलियां हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘लाओ मम्मी, मैं सब्जी छौंक देती हूं, आप थक गई होंगी. जाइए, आप थोड़ा आराम कर लीजिए.’’

मम्मी भी मुसकरा कर बच्चों के पास चली गईं. मेरी बेटी अंशिका उन से बहुत खुश रहती. धीरेधीरे मम्मी अंगरेजी भी सीखने लगी थीं. अब मम्मीपापा बच्चों से अंगरेजी में ही बात करते. उन के यहां आने से मुझे बहुत सहारा मिल गया था वरना यहां तो सारा काम खुद ही करना पड़ता है, नौकरचाकर तो यहां मिलते नहीं और जिस तरह से मम्मी अपना घर समझ कर काम करती थीं, वे थोड़े ही न करेंगे?

गृहशोभा विशेष

अब मम्मी यहां पूरी तरह ऐडजस्ट हो गई थीं. महीने में 1 बार अपनी सहेलियों के साथ रेस्तरां में किट्टी पार्टी कर लेतीं. सभी महिलाओं में होड़ लगी रहती कि सब से अच्छी डिश कौन बना कर लाती है. सो मम्मी भी उस होड़ में शामिल हो नई सलवारकमीज, पर्स, मैचिंग चप्पलें आदि पहन कर बड़ी खुश होतीं. यही एक सब से अच्छा जरिया था यहां उन का मन लगाने का. सजधज कर चली जातीं. 1-2 गेम खेलतीं और एकदूसरे से अपने मन की बातें कर लेतीं.

इस बार जब वे किट्टी पार्टी से लौटीं तो सब सहेलियों से और भी नईनई बातें सुन कर आईं और बड़ी बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थीं कि कब मैं दफ्तर से आऊं और कब वे अपने मन की बात मुझे बताएं.

मेरे घर आते ही वे 2 कप चाय बना कर ले आईं और फिर मेरे पास आ कर बैठ गईं.

मैं ने पूछा, ‘‘कैसी रही आप की किट्टी पार्टी?’’

वे तो जैसे तैयार ही बैठी थीं सब बताने को. कहने लगीं, ‘‘किट्टी तो बहुत अच्छी थी, किंतु यहां की कुछ बातें मुझे अच्छी नहीं लगतीं. आज तो सभी औरतें स्पर्म डोनेशन की बातें कर रही थीं. वे बता रही थीं कि यदि कोई मर्द बच्चा पैदा करने में असमर्थ हो तो किसी और मर्द के स्पर्म (शुक्राणु) उस की पत्नी की कोख में स्थापित कर दिए जाते हैं और उस पत्नी को यह मालूम ही नहीं होता कि स्पर्म किस मर्द के हैं. ऐसे ही यदि महिला बच्चा पैदा करने में असमर्थ हो तो दूसरी महिला की कोख में दंपती के शुक्राणु व अंडाणु निषेचित कर के स्थापित कर दिए जाते हैं और इस तरह दूसरी महिला 9 महीने के लिए अपनी कोख किराए पर दे देती है. जब बच्चा पैदा हो जाता है तो वह उस दंपती को सौंप देती है. छि…छि… कितना बुरा है ये सब?’’

मैं ने मम्मी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘क्या बुराई है इस में यदि कोई दंपती बच्चा पैदा करने में असक्षम हो और इस में दूसरे की मदद ले?’’ मम्मी ने भी मुझे करारा जवाब देते हुए कहा, ‘‘पर उस बच्चे की रगों में खून तो उस मां का ही दौड़ रहा है न जो कोख किराए पर देती है?’’

मैं समझ गई थी कि मम्मी से इस वक्त बहस करना ठीक नहीं. सो मैं ने कहा, ‘‘हां मम्मी, आप बात तो ठीक ही कह रही हैं.’’

वे धीरेधीरे बुदबुदाने लगीं, ‘‘हर इनसान अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी सकता है… न कोई समाज न ही कोई संस्कार… आने वाली पीढ़ी तो और भी न जाने क्या करेगी? अगर मातापिता ही ऐसे हैं तो…’’

मैं जानती थी कि मम्मी से इस विषय पर और बात करना उचित नहीं. लेकिन मेरे बच्चों को उन की बात बड़ी ही दकियानूसी लगतीं.

मेरी बेटी अकसर कहती, ‘‘मौम, दादी ऐसी बात क्यों करती हैं. यदि सब लोग अपने हिसाब से रहते हैं तो इस में क्या बुराई है?’’

मैं कहती, ‘‘बुराई तो कुछ नहीं पर मम्मी अभी यहां नईनई आई हैं न इसलिए उन्हें यह सब अजीब लगता है.’’

ऐसा चलते कब 3 साल बीत गए पता ही न चला. मम्मी भी आशी दीदी से मिलने मुंबई जाना चाहती थीं. बच्चों की भी छुट्टियां थीं तो मैं ने बच्चों के भी टिकट ले लिए. हां, पापा नहीं जाना चाहते थे. उन के दोस्तों का यहां कुछ प्रोग्राम था.

आशी दीदी बहुत खुश थीं कि मम्मी आ रही हैं. इन 3 सालों में वे भी तो कितनी अकेली रह गई थीं. जब मम्मी और बच्चे वहां पहुंच गए तो आशी दीदी उन्हें रोज कहीं न कहीं घुमा लातीं. उन के लिए तरहतरह का खाना बनातीं. रात को दीदी की बेटियां और मेरे बच्चे एक ही कमरे में सो जाते. आशी दीदी के पति यानी मेरे ननदोई निशांत तो शिप पर ही थे. वे तो 6 महीने में मुंबई आते थे. आशी दीदी ने अपनी 2 बेटियों को पालने में जिंदगी अकेले ही बिता दी. निशांत भी आशी दीदी की इस बात की तारीफ करते नहीं थकते.

एक रात मम्मी को कुछ बेचैनी सी हुई तो लिविंगरूम में सोफे पर आ कर लेट गईं.

थोड़ी ही देर में देखती हैं कि कोई नौजवान दीदी के कमरे से बाहर निकल रहा है और दीदी अपना नाइट गाउन पहने उसे दरवाजे तक छोड़ने आईं.

जातेजाते उस नौजवान ने दीदी के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘मैं कल फिर आऊंगा.’’

दीदी ने भी उसे स्वीकृति दे दी और कहा, ‘‘ओके बाय.’’

दीदी को तो मालूम भी न था कि मम्मी सोफे पर लेटीं यह सब देख रही हैं. उन्होंने उस शख्स के जाते ही लिविंगरूम की बत्ती जला कर पूछा, ‘‘कौन है यह? जंवाई बाबू की गैरहाजिरी में ये सब करते अच्छा लगता है तुम्हें? तुम्हारी 2 जवान बेटियां हैं. उन का तो लिहाज किया होता…’’

दीदी जवाब में सिर्फ इतना ही बोलीं, ‘‘जाने दीजिए मम्मी… आप नहीं समझेंगी.’’

मम्मी का तो पारा हाई था. अत: कहने लगीं, ‘‘मैं नहीं समझूंगी? ये बाल मैं ने धूप में सफेद नहीं किए हैं… मुझे लगता है तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़ गया है,’’ और मम्मी ने झट से मेरे पति आकाश को फोन कर सब बता दिया.

एक पल को तो मेरे पति सकते में आ गए, फिर अगले ही पल बोले, ‘‘मम्मी, तुम आशी को कुछ न कहो. पहले मुझे मामले की तह तक जाने दो.’’

‘‘तुम सब जल्दी मुंबई आओ और देखो यहां आशी क्या कर रही है.’’

अगले ही दिन आकाश ने भारत की फ्लाइट के टिकट बुक कराए और हम भारत पहुंच गए. आकाश और मुझे देख कर आशी दीदी बहुत डर गई थीं. एक दिन तो आकाश ने आशी दीदी से कुछ न पूछा. लेकिन जब आकाश ने आशी दीदी से सब साफसाफ बताने को कहा तो जो आशी दीदी ने बताया वह वाकई चौंकाने वाला था. वे कह रही थीं और मैं और आकाश सुन रहे थे. वे बोलीं, ‘‘भैया, आप को तो मालूम ही है कि निशांत और मेरी शादी दोनों की मरजी से हुई थी… वे मर्चेंट नेवी में होने की वजह से साल में 6 महीने बाहर ही रहते हैं. लेकिन 6 महीने बाहर रहने से निशांत के वहां लड़कियों से संबंध हैं. जब वे यहां भी आते हैं तो भी उन की रुचि मेरे में नहीं होती है… वे घर के मुखिया का दायित्व तो निभा रहे हैं, लेकिन सिर्फ हमारी 2 बेटियों के कारण.

‘‘यदि मैं निशांत को कुछ कहती हूं तो वे कहते हैं कि तुम आजाद हो… चाहे तो तलाक ले लो या तुम भी किसी गैरमर्द से संबंध रख सकती हो. बस बात घर के बाहर न जाए, क्योंकि समाज के सामने तो यह रिश्ता निभाना ही है. हमारी यह शादी तो समाज के समाने सिर्फ एक दिखावा है. अब इन 2 जवान बेटियों को छोड़ कर मैं कहां जाऊं. तलाक भी तो नहीं ले सकती… मुझे भी तो प्यार चाहिए… तन की प्यास क्या सिर्फ मर्द को ही जलाती है, औरत को नहीं?’’

इतना सुनते ही मम्मी ने दीदी के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया. वे चीख पड़ीं, ‘‘तुझे शर्म नहीं आई ये सब कहते?’’

आकाश ने मम्मी का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप शांत हो जाएइ. मैं आशी से अकेले में बात करता हूं.’’

अब आशी दीदी, आकाश और मैं ही कमरे में थे. लेकिन उस के बाद जो आशी दीदी ने बताया वह तो और भी चौंकाने वाला था.

वे बोलीं, ‘‘यहां भी उन के पड़ोस की महिला से संबंध हैं और इस बारे में उस के पति को भी सब मालूम है. उस महिला ने अपने पति को भी कह दिया है कि वह आजाद है, चाहे जिस स्त्री से संबंध रखे. उस रात पड़ोस की उस महिला का पति ही यहां आया था और यह बात निशांत को भी मालूम है कि मेरे उस से संबंध हैं. उन्हें इस संबंध से कोई हरज नहीं. हां, उन्होंने इतना जरूर कहा है कि यह बात घर से बाहर न जाए, क्योंकि हमारा समाज इन रिश्तों को स्वीकार नहीं करेगा,’’ और फिर आशी दीदी रोने लगीं.

मैं ने उन्हें चुप कराते हुए कहा, ‘‘दीदी, आप फिक्र न कीजिए सब ठीक हो जाएगा. आप हमें थोड़ा सोचने के लिए समय दें बस,’’ और फिर मैं और आकाश आशी दीदी के कमरे से बाहर आ कर लौन में सैर करने लगे.

मैं ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘यदि आशी दीदी जो बता रही हैं वह सत्य है, तो इस में दीदी का क्या दोष है? अपनी पत्नी के सिवा गैरस्त्री से संबंध रखने का हक मर्द को किस ने दिया और फिर यदि यह हक निशांत को है तो फिर आशी दीदी को भी है.’’

आकाश ने भी धीरे से कहा, ‘‘हां, तुम ठीक ही कहती हो, लेकिन मम्मी को कौन समझाए? वे तो आशी को कभी माफ नहीं करेंगी.’’

मैं मन ही मन सोच रही थी कि दीदी ने ठीक ही कहा कि तन की आग क्या सिर्फ मर्द को ही जलाती है? कुदरत ने औरत को भी तो शारीरिक उत्तेजना दी है और यदि उस का पति उस में रुचि न ले तो वह अपनी शारीरिक उत्तेजना कैसे शांत करे? सच तो यह है कि इस में दीदी की कोई गलती नहीं है. पर चूंकि हमारे समाज के नियम इन संबंधों को नहीं स्वीकारते, इसलिए सब कुछ चोरीछिपे चल रहा है यहां. सिर्फ दीदी व निशांत ही क्यों उन के पड़ोसी दंपती को भी तो वही समस्या है. तब ही तो वह उस रात दीदी के पास आया था. उस की पत्नी को भी तो इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं. न जाने ऐसे कितने लोग होंगे जिन के ऐसे ही संबंध होंगे.

बात मेरे पति आकाश के दिमाग में ठीक बैठ रही थी. वे कहने लगे, ‘‘तुम ठीक ही कहती हो. लेकिन अब मम्मी को समझाना होगा, जोकि बहुत मुश्किल काम है.’’

खैर एक बार तो हम मम्मी को ले कर वापस अमेरिका आ गए, लेकिन मेरे ननदोई निशांत के शिप से वापस आने पर हम फिर भारत आए और मम्मी को भी साथ ले आए. वहां आकाश ने निशांत से उन के दूसरी स्त्रियों से संबंध के बारे में पूछा तो निशांत ने उन संबंध को खुले शब्दों में स्वीकारते हुए कहा, ‘‘आकाश आप तो इतने सालों से अमेरिका में रह रहे हैं. आप भी इन्हें बुरा समझते हैं? मेरे संबंधों के बारे में आशी को सब कुछ मालूम है और मैं ने भी आशी को पूरी छूट दी है कि वह भी अगर चाहे तो किसी से संबंध रख सकती है. बस हमारे परिवार पर उन संबंधों का बुरा असर नहीं पड़ना चाहिए. आकाश आप तो पढ़ेलिखे हैं. आप को तो इन संबंधों से नाराज नहीं होना चाहिए.’’

आकाश ने कहा, ‘‘निशांत आप ठीक कहते हैं, किंतु मम्मी को कौन समझाए?’’

मैं ही समझाऊंगा मम्मी को भी. चलिए अभी बहुत रात हो गई है. कल सुबह बात करते हैं.

अगले दिन सुबह नाश्ता कर निशांत मम्मी के पास बैठ गए और बोले, ‘‘मम्मी, मुझे पता है आप बहुत नाराज हैं मुझ से और आशी से. आप का नाराज होना वाजिब भी है. आप को तो पता है आशी और मेरी शादी हमारे समाज के नियमों के अनुरूप हो गई, लेकिन हम दोनों ही कहीं एकदूसरे के लिए बने ही नहीं थे. हम दोनों ने कोशिश भी की कि हमारा रिश्ता अच्छा बना रहे, लेकिन कहीं कुछ तो कमी थी जिसे हम दोनों दूर करने में असमर्थ थे. शादी का मुख्य उद्देश्य तो शारीरिक संबंध और संतानोत्पत्ति ही होता है. अब बच्चे तो हम पैदा कर चुके हैं. लेकिन कहीं हमारे शारीरिक संबंधों में वह मधुरता नहीं है, जो एक पतिपत्नी के बीच होनी चाहिए. मैं तो वैसे भी 6 महीने शिप पर रहता हूं. ऐसे में आशी तो मेरे पास होती नहीं तो यदि वह सुख मुझे कहीं और से प्राप्त होता है तो उस में क्या बुराई है? मैं ने तो आशी को भी पूरी छूट दी है कि वह भी चाहे जिस से संबंध रख सकती है. उस की भी इच्छाएं हैं. मैं उन मर्दों में से नहीं जो स्वयं तो मौजमस्ती करें और पत्नी को समाज के नियमों की आड़ में तिलतिल मरने के लिए छोड़ दें. अगर आशी के पास वह पड़ोसी आता है तो क्या बुराई है उस में?’’

लेकिन मम्मी कहां यह सब समझने वाली थीं. मम्मी तो वैसे ही मुंह फुला कर बैठी थीं. निशांत भी समझ गए कि मम्मी को उन की बातें अच्छी नहीं लग रही हैं. अत: उन्होंने मम्मी का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर कहा, ‘‘मम्मी, मैं समझता हूं कि आप को इन सब बातों से बहुत दुख पहुंचा है, किंतु यदि कोई नियम किसी की खुशी के आड़े आए तो उस नियम को तोड़ देना अच्छा…फिर आज ही क्यों पहले जमाने में भी तो यह सब होता था, लेकिन पहले घरपरिवार के लोग उस में साथ देते थे और अब समाज के नियमों के डर से परिवार भी अपनों की खुशियों से मुंह मोड़ लेता है… यदि मैं और आशी एकदूसरे के आचरण से खुश हैं तो दूसरों को तकलीफ क्यों?

‘‘यदि आप को लगता है ये सब इस युग में ही हो रहा है तो लाइए आप को महाभारत जिस का पाठ आप रोज नियम से करती हैं उसी में दिखा देता हूं आप को पुराने युग की सचाई,’’ कह कर निशांत ने इंटरनैट से महाभारत डाउनलोड किया और उसी समय मम्मी को पढ़वाना शुरू कर दिया, जिस में पांडु और कुंती के बारे में साफसाफ लिखा है.

‘‘पांडु को एक ऋषि से श्राप मिला था जिस के कारण वे स्त्री सहवास नहीं कर सकते थे, लेकिन वे चाहते थे कि उन की पत्नी के गर्भ से संतानोत्पत्ति हो, क्योंकि वे अपने पिता के ऋण से मुक्त होना चाहते थे. अत: एक दिन पांडु ने अपनी पत्नी कुंती से कहा, ‘‘प्रिये, तुम पुत्रोत्पत्ति के लिए प्रयत्न करो.’’

तब कुंती ने कहा, ‘‘हे आर्यपुत्र जब मैं छोटी थी तब मेरे पिता ने मुझे अतिथियों के

स्वागतसत्कार का कार्य सौंप रखा था. मैं ने उस समय दुरवासा ऋषि को अपनी सेवा से प्रसन्न कर दिया था और बदले में उन्होंने मुझे वरदानस्वरूप एक मंत्र देते हुए कहा कि हे पुत्री, इस मंत्र का उच्चारण कर तुम जिस भी देवता का आह्वान करोगी वह चाहे अथवा न चाहे तुम्हारे अधीन हो जाएगा. अत: आप की आज्ञा होने पर मैं जिस देवता का आह्वान करूंगी, उसी से मुझे संतानोत्पत्ति होगी. इस प्रकार धर्मराज से युधिष्ठिर, वायुदेव से भीमसेन, इंद्र से अर्जुन, अश्विन कुमार से जुड़वा पुत्र नकुल व सहदेव प्राप्त हुए.

‘‘मम्मी, यह तो बात हुई 5 पांडु पुत्रों की उत्पत्ति की. उस के बाद यह तो सर्वविदित है कि द्रौपदी के 5 पति थे, क्योंकि उन की माता कुंती अपने 5 बेटों को सदा कहती थीं कि कोई भी वस्तु पांचों बराबर बांट कर इस्तेमाल करो. अत: जब वे द्रौपदी को जीत कर लाए तो वही बात कुंती ने बिना द्रौपदी को देखे कह दी और तब से द्रौपदी के 5 पति थे. इस के अलावा भीम व हिडिंबा से घटोत्कच का जन्म हुआ और धृतराष्ट्र के पुत्र युयुत्सू का जन्म एक वेश्या के गर्भ से हुआ था. तो मम्मी अब देखिए आप हमारे जिस धार्मिक ग्रंथ को रोज बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ती हैं, उस में हमारी पुरानी संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है, जिस में यह बताया गया है कि जीवन को स्वेच्छा से हंसीखुशी और मौजमस्ती के साथ जीओ. लेकिन यह भी ध्यान रखो कि आप की इस मौजमस्ती का नुकसान दूसरों को न उठाना पड़े और हम किसी के साथ कोई जबरदस्ती न करें.

‘‘तो मम्मी कहां बुराई है मेरे और आशी के गैरसंबंधों में? आप को बुराई दिखाई देती है, क्योंकि हमारे समाज के नियम इन संबंधों को अस्वीकृत करते हैं. लेकिन ये समाज के नियम बनाए किस ने? समाज के चंद पहरेदारों ने. तो फिर क्यों रोक नहीं इन कोठों पर, वेश्यालयों पर, क्यों खुले हैं ये? सिर्फ उन पहरेदार मर्दों के लिए जो इन नियमों को बनाते तो हैं, किंतु स्वयं उन्हें नहीं मानते और उन मर्दों की औरतें उदासीन जिंदगी जीने के लिए मजबूर होती हैं. वे मर्द अपनी कामेच्छा की संतुष्टि तो कर लेते हैं, किंतु उन की औरतों का क्या जो उन मर्दों से विवाह कर सारी जिंदगी उन के बच्चे ही पालती रहती हैं या फिर उन पर आश्रित होती हैं कि कब उन के पति को उन पर प्यार आए जिस की बारिश में वह उन के तनमन को भिगो दे. उन्हें भी तो हक होना चाहिए अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का या फिर यदि समाज के निमय हैं तो मर्द व औरत के लिए समान रूप से होने चाहिए. मम्मी ये सब तो कल भी होता था आज भी हो रहा है और कल भी होगा. यदि समाज इन पर प्रतिबंध लगाएगा तो चोरीछिपे होगा पर होगा जरूर.’’

मम्मी अपने जंवाई की बातें सुन कर नि:शब्द थीं. दीदी वहीं बैठ कर सुबकसुबक कर रो रही थीं. निशांत ने उन्हें गले से लगा कर चुप कराते हुए कहा, ‘‘मत रोओ आशी, इस में तुम्हारा कोई दोष नहीं. आगे भी तुम स्वेच्छा से अपनी जिंदगी जी सकती हो.’’

हालांकि मम्मी अभी भी इस तरह के संबंधों को मन से स्वीकार नहीं कर पा रही थीं, लेकिन निशांत व आशी दीदी के चेहरे पर मुसकान देख कर हम सब भी मुसकरा रहे थे.

तभी मम्मी दीदी से कहने लगी, ‘‘बेटी, मैं ने तुम्हें बहुत भलाबुरा कहा. तुम मुझे माफ कर देना.’’

मम्मी को यह सब समझाने में निशांत ने जिस धैर्य से काम लिया वह काबिलेतारीफ था.

तभी आकाश बोल उठे, ‘‘भई, भूख लग रही है. आज खाना बाहर से ही और्डर कर देते हैं.’’

सभी मम्मी से पूछने लगे कि कहिए क्या और्डर किया जाए?

माहौल हलका हो गया था. आशी दीदी व निशांत अपने कमरे में चले गए. हम अमेरिका वापसी की तैयारी में लग गए. अब वापस लौट कर मम्मी को अमेरिका में उन की सहेलियों की बातों से कोई आश्चर्य न होता और अब उन्होंने इस देश को कोसना छोड़ दिया था. मेरे दोनों बच्चे भी कहने लगे थे, ‘‘मौम, अब दादी कुछ बदली बदली लगती हैं.’’

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