गृहशोभा विशेष

‘‘कैसे करेले उठा लाए? सारे एकदम कड़वे हैं. न जाने कैसी खरीदारी करते हैं. एक भी सब्जी ठीक नहीं ला पाते.’’

श्रीमतीजी ने हमारे द्वारा लाए गए करेलों का सारा कड़वापन हम पर उड़ेला.

‘‘क्यों, क्या बुराई है भला इन करेलों में? बाजार से अच्छी तरह देख कर, चुन कर अच्छेअच्छे हरेहरे करेले लाए थे हम… अब सवाल रहा जहां तक इन के कड़वे होने का तो वह तो करेलों की प्रकृति ही है… करेले भी कभी मीठे सुना है क्या भला आज तक?’’ हम ने भी श्रीमतीजी की प्रतिक्रिया का पुरजोर विरोध किया.

‘‘करेले कड़वे होते हैं वह तो मैं भी जानती हूं, लेकिन इतने कड़वे करेले? अभी कल ही पड़ोस में कान्हा के दादाजी ने साइकिल वाले से करेले खरीदे. सच, भाभी बता रही थीं कि इतने अच्छे, इतने मुलायम और नरम करेले थे कि कुछ पूछो मत. ऊपर से कड़वापन भी बिलकुल न के बराबर. समझ में नहीं आता कि सब को अच्छी सब्जियां, अच्छे फल, अच्छा सामान कैसे मिल जाता है. बस एक आप ही हैं, जिन्हें अच्छी चीजें नहीं मिलतीं.

‘‘सच कई बार तो मन में आता है कि आप से कुछ कहने के बजाय स्वयं बाजार जा कर सामान खरीद लाया करूं. लेकिन उस में भी एक परेशानी है, आप के लिए तो यह और भी अच्छा हो जाएगा. काम न करने का बहाना मिल जाएगा,’’ श्रीमतीजी ने हम से कार्य करवाने की अपनी मजबूरी बताई.

‘‘संयोग की बात है कि ऐसा हो जाता है. वरना इस महंगाई में रुपए खर्च कर खराब सामान लाने का तो हमें स्वयं भी कोई शौक नहीं है. हमें स्वयं अफसोस होता है जब हमारे लिए सामान में कोई गड़बड़ निकलती है. लेकिन इस में भला हम कर भी क्या सकते हैं,’’ हम ने अपनी बेचारगी दिखाई.

‘‘संयोग है कि सारे संयोग सिर्फ आप के साथ ही होते हैं… संयोग से आप को ही अंदर से काले खराब आलू मिलते हैं… संयोग से ही आप को ऐसे सेब मिलते हैं, जो ऊपर से तो अच्छे दिखाई देते हैं, लेकिन होते हैं एकदम फीके. यह भी संयोग है कि आप के लाए नारियल फोड़ने पर प्राय: खराब निकल जाते हैं,’’ श्रीमतीजी के पास जैसे हमारे लाए खराब सामान की एक पूरी सूची थी.

‘‘यह क्यों भूल रही हैं कि तुम से विवाह कर के हम ही तुम्हें यहां इस घर में लाए थे… हम ने ही तुम्हें पसंद किया था… अब अपने विषय में तुम्हारा क्या विचार है? अपने ऊपर लगते लगातार आरोपों ने हमें भयभीत कर दिया…’’ इसीलिए वातावरण को हलका करने के लिए हम ने श्रीमतीजी से मजाक किया.

लेकिन यह क्या? हमारे मजाक को वे तुरंत समझ गईं. झल्ला कर बोलीं, ‘‘मजाक छोडि़ए, मैं आप से गंभीर बात कर रही हूं… आप की कमियां आप को बता रही हूं और एक आप हैं, जो मेरे कहे को गंभीरता से सुनने तथा स्वयं में सुधार लाने के स्थान पर मेरी बात को मजाक में उड़ा रहे हैं. आप की इस प्रवृत्ति का ही यहां के दुकानदार भरपूर फायदा उठा रहे हैं. वे खराब सामान आप के मत्थे मढ़ देते हैं. ऐसे में वे तो दोहरा लाभ उठा रहे हैं.

‘‘पहला उन के यहां का खराब सामान निकल जाता है. और दूसरा वे उसे बेच कर कमाई भी कर लेते हैं… और हम हैं कि सिर्फ नुकसान उठाए जा रहे हैं. मेरी तो समझ में नहीं आता कि क्या करूं, किन शब्दों में आप को चेताऊं ताकि हमें और नुकसान न झेलना पड़े.’’

‘‘तुम भी न बस जराजरा सी बातों को तूल देती हो… एक बड़ा मुद्दा बना देती हो… यह भी कोई बात हुई भला कि करेले कड़वे क्यों हैं? अरे करेले की तो प्रकृति ही है कड़वा होना. इस में भला हम क्या कर सकते हैं? रहा सवाल खरीदारी का तो यह तो किसी के साथ भी हो सकता है, बल्कि हो ही जाता होगा. लेकिन हमें क्या यह सब पता चलता है कि कौन कब बेवकूफ बना? किस के साथ क्या चालाकी हुई? इसलिए इन छोटीछोटी बातों को गंभीरता से न लिया करो. अब थोड़ाबहुत चला भी लिया करो,’’ अब हम कड़वे करेलों की बात को यहीं पर समाप्त करना चाहते थे.

‘‘आप इन्हें छोटीछोटी बातें समझ रहे हैं? कोई आप की आंखों में धूल फेंक दे, आप को बेवकूफ बना कर खराब सामान पकड़ा दे और आप के लिए यह कोई बात ही नहीं है? आप के लिए होगी ये सब जराजरा सी बातें, लेकिन मुझे तो यह सब किसी भी तरह अपने अपमान से कम नहीं लगता. कोई आप के संपूर्ण व्यक्तित्व को नकार कर अपना उल्लू सीधा कर ले, यह तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात हो गई. रहा सवाल दूसरों के बेवकूफ बनने का तो मुझे इस सब से कोई मतलब नहीं है कि कौन अपने घर में क्या कर रहा है, क्या खापका रहा है? वैसे भी राह चलता व्यक्ति चाहे जो कर रहा हो, हम न तो उस की ओर ध्यान देते हैं और न ही इस से कुछ खास फर्क पड़ता है. लेकिन आप तो मेरे पति हैं, आप के साथ यदि कुछ गलत होगा, चालाकी होगी तो उस का प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ेगा. हमें बुरा भी लगेगा. इसलिए कोशिश कीजिए कि आप के साथ ऐसा कुछ न हो, जिस से हमें नुकसान उठाना पड़े. इस महंगाई के दौर में जब वैसे ही इतनी कठिनाई आ रही है… आप अपनी इन नादानियों से मेरी परेशानी और बढ़ा रहे हैं,’’ श्रीमतीजी ने कहा.

‘‘यदि तुम्हें मेरे लिए सामान, मेरी लाई सब्जी, फलों से इतनी ही अधिक परेशानी है, तो एक काम क्यों नहीं करतीं? आज से सारा सामान स्वयं लाया करो. इस से तुम्हें तुम्हारा मनपसंद सामान भी मिल जाएगा और खराब सामान आने की समस्या से भी दोचार नहीं होना पड़ेगा,’’ अब इस विकट परिस्थिति में हमें यही एक उपाय सूझा, जिसे हम ने श्रीमतीजी के सामने रख दिया.

‘‘अच्छा तो मुझ पर यह अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी जा रही है… आप क्या समझते हैं कि मैं आप की चालाकी नहीं समझती हूं? खरीदारी का काम मुझे सौंप कर आप इस काम से बचना चाहते हैं… ऐसा कतई नहीं होगा. आप को घर का इतना कार्य तो करना ही पड़ेगा… बाजार से सामान तो आप को ही लाना पड़ेगा,’’ श्रीमतीजी ने निर्णायक स्वर में कहा.

अब भला हम क्या कहते? चुप रहे. इस समय हमारी हालत उस व्यक्ति की तरह हो रही थी जिसे मारा भी जा रहा हो और रोने भी न दिया जा रहा हो.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं