गृहशोभा विशेष

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हीथ्रो हवाई अड्डे पर जब संभव ने मुसकान से अपने मातापिता अतुल और चारु को मिलवाया तो उसे देखते ही चारु को ऐसा लगा जैसे वह उसे पहले से जानती है. जब चारु और अतुल अपने बेटे संभव के साथ मुसकान के घर पहुंचे तो वहां मुसकान के पिता के रूप में शुभेंदु को देख कर चारु का शक सच में बदल गया कि मुसकान शुभेंदु की पहली पत्नी बसु की ही बेटी है. यही राज जानने के लिए चारु अकेले शुभेंदु से मिलने उस के घर पहुंची तो शुभेंदु ने चारु को बताया कि मुसकान उस की पत्नी बसु और रवि की ही बेटी है, लेकिन यह सचाई मुसकान आज तक नहीं जान पाई है…     

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पति शुभेंदु को धोखा दे कर रवि संग ब्याह रचाने वाली बसु के साथ ऐसा क्या घटित हुआ कि अपनी दूसरी शादी के कुछ ही सालों बाद उस ने अपने पति रवि की हत्या कर अपनी जीवनलीला भी समाप्त कर डाली…

कुछमहीनों बाद शुभेंदु दिल्ली लौटे, ढेर सारे उपहार लिए. जितने दिन दिल्ली रहे रवि कम आता था. उन दिनों बसु भी अनमनी सी रहती थी. ऐसा लगता जैसे वह बेसब्री से उन के लौटने की राह देख रही हो. शुभेंदु जितना उस के करीब आने की कोशिश करते बसु उन से उतनी ही दूर रहती थी. सहृदय, सरल स्वभाव वाले शुभेंदु एक पल के लिए भी समझ नहीं पाए थे कि कुछ अनर्थ घटने वाला है. बसु ने अपनी वाक्पटुता से बच्चों को भी होस्टल भेज दिया था.

3 हफ्ते रह कर शुभेंदु दुबई लौट गए. धीरेधीरे उन का बिजनैस पूरे दुबई में फैलता जा रहा था. शुभेंदु का दिल्ली बहुत कम आना हो पाता था. अब महीनों  बसु का चेहरा भी दिखाई नहीं देता था. मां ने मेरे विवाह के बहाने उस से अपना मकान खाली करवा लिया था. वे नहीं चाहती थीं कि मेरी भावी ससुराल में किसी को इस बात की भनक भी लगे कि हमारा उठनाबैठना बसु जैसी महिला के साथ है.

बिजनैस के सिलसिले में जमती कौकटेल पार्टियां और कौकटेल के बीच उठते ठहाके… समय चुपचाप रिसता चला गया. चौंकी तो वह तब थी जब रवि का अंश उस की कोख में पलने लगा था.

हमारी शादी को अभी कुछ महीने ही हुए थे कि अतुल को 1 माह के टूर पर चैन्नई जाना पड़ा. मैं उस समय गर्भवती थी. कमरे में झांक कर देखा तो मां के पास बसु बैठी थी. मांग में सिंदूर, हाथों में लाल चूडि़यां, माथे पर लाल बिंदी. सभी सुहागचिह्नों से सजी बसु ने जैसे ही रवि के साथ अपने ब्याह और गर्भवती होने की सूचना दी मैं जड़ हो गई. उस के चेहरे पर कुतूहल था. मां ने बसु को घूरा, फिर मुझे निहारा. उस के सामने अब मेरा ठहरना उन के लिए असुविधाजनक हो गया था, जिसे बसु जैसी व्यवहारकुशल स्त्री भांप चुकी थी. अत: चुपचाप वहां से चली गई.

‘‘न जाने क्यों चली आती है? महल्ले भर में इस की चर्चा है. इसीलिए तो मैं ने इसे तेरे ब्याह पर भी नहीं बुलाया था. कलंकिनी ने अपने पति को ही नहीं, अपने पितृकुल और ससुरकुल तक को कीचड़ में घसीट दिया,’’ मां की बड़बड़ाहट शुरू हो गई.

मैं अपने कमरे में आ गई. शुभेंदु का चेहरा मेरी आंखों के सामने आ गया. तिनकातिनका कर के उन्होंने घोंसला बनाया. प्यार और विश्वास से सींचा और यह मृगमरीचिका सी चिडि़या फुर्र से उड़ गई. सम्मान, गौरव, आभिजात्य, कोई भी बंधन इसे रोक नहीं पाया. जब सब कुछ मिल जाए तो उस की अवमानना में ही सुख मिलता है. इन्हीं विचारों की गुत्थियों में उलझतेसुलझते मैं ने पूरी रात काट दी.

एक दिन मैं मां और भाभी के साथ लौनमें बैठी सुबह की चाय का आनंद ले रही थी. भैया अपने लैपटौप पर काम कर रहे थे कि तभी चीखपुकार, मारपीट के स्वर सुनाई दिए. नजर सामने के जंग खाए फाटक के भीतर चली गई जहां टूटेफूटे पीले मकान में तमाम आलोचनाओं की केंद्र बसु अपने दूसरे पति के साथ रह रही थी.

मैं ने मां से उस के विषय में पूछा तो वे गहरी सांस भर कर बोलीं, ‘‘यह सब तो रोज का काम है. पाप पेट में पलता है तो उस की यही परिणति होती है. बस यह समझ ले कारावास की सजा भुगत रही है.’’

कुछ समय बाद भैया दफ्तर के लिए निकले ही थे कि तभी दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो द्वार पर बसु की कामवाली घबराई हुई खड़ी थी. साथ में छोटी सी बच्ची भी थी. मांबेटी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं.

जब मैं ने पूछा कि क्या हुआ तो कांपते स्वर में बाई ने बताया, ‘‘बसु सीढि़यों से गिर पड़ी है.’’

तभी उस की बच्ची बोल पड़ी, ‘‘झूठ मत बोलो मां, बाबूजी ने धक्का दिया है. पीठ पर भी मारा है.’’

अब बाई भी सच पर उतर आई थी, ‘‘इंसान की शक्ल में भेडि़या है भेडि़या. दिनरात गाली बकता है, दारू पीता है.’’

‘‘बसु कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अस्पताल में है. बिटिया हुई है.’’

मैं ने बाई की बात सुन कर मां को बताया और फिर औटो कर के हम अस्पताल पहुंच गईं.

बसु सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर अकेली लेटी थी. मैं ने जैसे ही उस के सिर पर हाथ फेरा. उस की आंखों से अश्रुधारा बह निकली. पता नहीं ये आत्मग्लानि के आंसू थे या पश्चात्ताप के… पास ही झूले में लेटी उस की बिटिया को गोद में उठा कर मैं ने बसु से पूछा, ‘‘रवि कहां हैं?’’

‘‘व्यस्त होंगे वरना जरूर आते,’’ उस ने बिना मेरी ओर देखे अपना मुंह दूसरी ओर मोड़ लिया.

बसु मुझे धोखे में रखना चाह रही थी या खुद धोखा खा रही थी. पता नहीं, क्योंकि जिस रात बसु प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी उस रात रवि अपनी पत्नी के साथ था.

एक बार बसु ने बताया था कि अपने दोनों बेटों के प्रसव के समय शुभेंदु पूरी रात अस्पताल के कौरिडोर में दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में चहलकदमी करते रहे थे. अपनी पत्नी या बच्चों की जरा सी भी पीड़ा वे बरदाश्त नहीं कर पाते थे. आज बसु खुद को कितना अकेला महसूस कर रही होगी. उधर रेगिस्तान में लू के थपेड़ों के बीच शुभेंदु ने भी कितने अनदेखे दंश खाए होंगे. यहां भी उन के लिए मरुभूमि के अतिरिक्त क्या था?

औरत विधवा हो या परित्यक्ता, पुनर्विवाह करने पर बरसों अपने पूर्व पति को भुला नहीं पाती. यादें कोई स्लेट पर लिखी लकीरें तो नहीं होतीं कि जरा सा पोंछने पर ही मिट जाएं. सहज नहीं होता एक नीड़ को तोड़ कर, दूसरे नीड़ की रचना करना. बसु ने कैसे भुलाया होगा शुभेंदु को? अपने बच्चों की नोकझोंक, उठतेबैठते शुभेंदु की बसुबसु की गुहार क्या उसे पुराने परिवेश में लौट जाने के लिए बाध्य नहीं करती होगी या फिर जानबूझ कर शुभेंदु को भुलाने का नाटक कर रही है?

2 वर्ष का अंतराल चुपचाप दरक गया. उन दिनों अतुल की अंशकालिक पोस्टिंग देहरादून हो गई. मैं नन्हे संभव को ले कर थोड़ाबहुत जरूरत का सामान ले कर देहरादून पहुंच गई थी. 6 महीने के लिए अतुल को देहरादून के अतिरिक्त मसूरी और सहारनपुर का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था. काम की व्यस्तता उन्हें हर समय घेरे रहती. ऐसे में घरगृहस्थी के हर छोटेबड़े काम को निबटाने का दायित्व मुझ पर आ गया था.

एक दिन मैं अतुल के साथ फिल्म देख कर लौट रही थी तभी सामने एक गाड़ी से एक स्मार्ट, आकर्षक व्यक्तित्व के व्यक्ति को उतरते देखा. हालांकि मैं उन्हें काफी समय बाद देख रही थी, फिर भी मैं ने उन्हें तुरंत पहचान लिया. वे शुभेंदु थे. मन में संशय जगा कि शुभेंदु यहां कैसे? क्या दुबई का बिजनैस समेट दिया या मन भर गया वहां की चकाचौंध और पैसा कमाने की लालसा से? फिर मन ही मन सोचा कि उकसाने वाली पत्नी ही साथ छोड़ गई तो क्यों भटकते फिरते उस रेगिस्तान में? चलो देर से ही सही अपनी आत्मशक्ति और पौरुष का इजहार तो किया उन्होंने वरना तो सारी जिंदगी बसु के ही हाथों की कठपुतली बने रहे थे.

अगली सुबह अतुल दफ्तर के लिए निकल ही रहे थे कि शुभेंदु का फोन आ गया. मैं अचरज में पड़ गई. इन्हें मेरा नंबर कहां से मिला? शायद टैलीफोन डाइरैक्टरी से ढूंढ़ निकाला हो.

तभी उन का हताश स्वर सुनाई दिया, ‘‘चारु मैं तुम से मिलना चाहता हूं.’’

‘‘मैं कुछ देर बाद आप को फोन करती हूं,’’ मैं ने टालने की गरज से कहा और फिर फोन काट दिया.

अतुल मेरे पास आ कर खड़े हो गए थे. सब कुछ जानने के बाद उन्होंने मुझे समझाया. ‘‘चारु, किसी की निजी जिंदगी से हमें क्या लेनादेना? मिल लो उन से.’’

दफ्तर पहुंच कर अतुल ने अपनी गाड़ी मेरे पास भेज दी. मैं ने संभव को आया के पास छोड़ा और कुछ ही देर में शुभेंदु के मसूरी रोड स्थित भव्य बंगले पर पहुंच गई.

शुभेंदु बेहद गर्मजोशी से मिले. बेशकीमती सामान से सजे उस बंगले को देख कर मेरी आंखें चौंधिया गईं. द्वार पर दरबान, माली और घर के अंदर दौड़ते नौकर, रसोइए. सामने वाली दीवार पर उन्होंने अपने परिवार का बड़ा सा चित्र टांगा हुआ था. साइड स्टूल, शोकेस पर हर जगह बसु के ही फोटो रखे थे. हंसतीखिलखिलाती बसु, राजेशमहेश को गोद में उठाए बसु, शुभेंदु के कंधों पर झूलती बसु, विदेशी पहनावा पहने हुए कैरियर वूमन बसु. घर के चप्पेचप्पे पर बसु का आधिपत्य था. शुभेंदु ने उस की अनुपस्थिति में भी उस की पसंदनापसंद का पूरा ध्यान रखा था. खिड़कियों पर आसमानी रंग के परदे, गमलों में सजे मनीप्लांट. जैसे किसी भी पल बसु आएगी और कहेगी कि शुभेंदु देखो मैं उस दरिंदे को छोड़ कर तुम्हारे पास लौट आई.

‘‘बसु कैसी है?’’ शुभेंदु का स्वर मुझे कल्पना लोक से यथार्थ में लौटा गया था. नजरें उन के उदास चेहरे पर अटक गईं. क्षण भर के लिए मुझे बसु के प्रति रवि का बर्बरतापूर्ण व्यवहार याद आ गया था. कदमकदम पर बेइज्जती, तानेउलाहने, गालीगलौज, मारपीट… क्या शुभेंदु कायर हैं, जो अभी भी उस की यादों को सीने से चिपकाए बैठे हैं? मानसम्मान, सब कुछ तो ले डूबी यह औरत. क्षमाप्रार्थी तो वह कदापि नहीं थी.

क्या उत्तर देती शुभेंदु के प्रश्न का? बस इतना ही कहा था मैं ने, ‘‘बस यह समझ लीजिए अपने किए की सजा भुगत रही है… इंसान जो बोता है वही काटता है.’’

6 माह की अवधि समाप्त हुई और हम दिल्ली लौट आए. न अब बसु से मेरा या मेरे परिवार का कोई संबंध रह गया था. मां और भैयाभाभी सभी लखनऊ चले गए थे. शुभेंदु अकसर फोन करते रहते थे. हर बार बसु के विषय में पूछते, लेकिन मैं सहजता से टाल जाती. क्या जवाब थे मेरे पास उन के प्रश्नों के?

एक दिन अचानक बसु मेरे घर आ गई. गोद में मुसकान थी. मन में प्रश्नों के नाग फन उठा कर खड़े हो गए कि क्यों आई है बसु यहां? कहीं रवि ने भी तो इसे नहीं निकाल दिया? हमेशा ही तो अश्लील भाषा में बात करता था इस से. प्रकृति का नियम है कि जीवन में हम जिन लोगों से दूर भागना चाहते हैं, वे हमें उतना ही अपने पास खींचते हैं. बसु के साथ मेरा रिश्ता भी तो ऐसा था… कुछ प्यार का, कुछ नफरत का, कुछ सहानुभूति का.

मैं ने उस की खूब आवभगत की. कटाक्ष भी किए. अपने सुखद गृहस्थ जीवन का रेखाचित्र खींचते हुए मैं उसे जताना चाह रही थी कि इंसान यदि अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर नियंत्रण रखे तो जिंदगी सुख से कट जाती है. महत्त्वाकांक्षी होना बुरा नहीं, लेकिन उस के लिए रिश्तों को दांव पर लगाना सही नहीं. रिश्तों की चादर ओढ़ कर भी सपनों को सच किया जा सकता है.

बसु मेरी बातें चुपचाप सुनती रही. जैसे शतरंज का खिलाड़ी अपनी ढेर सारी चालों के बावजूद यकायक विपक्षी की एक ही चाल से मात खा कर उठ जाता है कुछ ऐसा ही भाव लिए वह मुझे घूरती रही.

थोड़ा माहौल बदला तो उस ने मुझ से प्रश्न किया, ‘‘शुभेंदु से भेंट हुई? आजकल देहरादून में ही अपनी भवननिर्माण कंपनी खोली है उन्होंने.’’

मैं ने विस्तार से वहां की समृद्धि, शुभेंदु की ख्याति और काम का वर्णन किया तो उस की आंखें नम हो गईं.

‘‘इतनी सुखी गृहस्थी को लात मार कर क्यों चली आई तू? आज भी शुभेंदु की हर सांस में तेरी यादें हैं, मुसकराहटें हैं. घर के हर कोने में तेरी अमिट छाप आज भी दिखाई देती है. क्या मिला तुझे अपना नीड़ तोड़ कर?’’

विरह की अग्नि में उस का हृदय मानों जल उठा हो. ‘‘गणित नहीं है जिंदगी जिस के हर सूत्र का एक स्पष्ट उत्तर हो. न जाने कौन सा झंझावात आया और उड़ा ले गया मेरी गृहस्थी का सुखचैन. वह घटना कीचड़ की तरह मेरे मनमस्तिष्क से चिपक गई और आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ती.’’

वह अंदर से टूट गई थी. स्मृतियों के नाग उस के मस्तिष्क पर फूंफूं कर रेंगने लगे थे.

गृहशोभा विशेष

‘‘कितना विचित्र है इंसान का स्वभाव. जो सरलता से प्राप्त हो जाता है, उस की कोई कीमत नहीं होती उस की नजर में और जो कुछ नहीं मिलता उस की तलाश में वह हर पल भटकता रहता है. काश मैं मृग की तरह अंदर छिपी कस्तूरी की सुगंध से सराबोर होने के बजाय सुगंध कहीं और ढूंढ़ने की कोशिश न करती.’’

अपनी ही नजरों में गिरना कितना कष्टप्रद होता है, इस का एहसास मुझे बसु की बातों से हो गया था. अचानक बसु विद्रोह पर उतर आई थी. उस का पूरा शरीर अपमान की ज्वाला से दग्ध था.

‘‘चारु, क्या सारा दोष मेरा ही है? शुभेंदु पूरी तरह निर्दोष हैं? क्यों मुझे अजगर के मुंह में अकेला छोड़ गए? मैं ने उन से जो चाहा, जो मांगा उन्होंने मुझे दिया. न कभी रोका, न टोका. कभी तो विरोध प्रकट करते, समझाते कि इच्छाओं और आकांक्षाओं का समुंदर आंधीतूफान से भरा होता है. कहीं विराम भी लगाना चाहिए. उन्होंने न कभी अपना क्रोध प्रकट किया न प्रतिवाद. न ही अभियोग लगाया, बल्कि मुझे देख कर आंखें झुका लीं. उन आंखों पर जो पलकें तनी थीं, वे भांपने ही नहीं देती थीं कि उन आंखों में क्या ठहरा हुआ है? कोई कसक, कोई चुभन, अफसोस या पीछे छूट गई कोई स्मृति?’’

‘‘पर, तू तो अब भी उस दलदल से निकल सकती है. तोड़ दे उस बंधन को और लौट जा अपने पुराने नीड़ में जहां शुभेंदु और तेरे बच्चे, आज भी तेरी राह देख रहे हैं. ये कसैली यादें बुरे सपने की तरह धीरेधीरे मिटती चली जाएंगी.’’

‘‘इतना आसान नहीं है यह सब… मार डालेगा वह मेरी बच्ची को.’’

मातृत्वबोध उस के चेहरे पर मुखर हो उठा था. मेरे सामने वह बरसों पुरानी आत्मीयता की तरह खुल गई थी.

उस ने बताया, ‘‘रवि से ब्याह करने के बाद जब मेरी आंखों से परदा हटा तो मैं बहुत रोई, गिड़गिड़ाई. रवि के सामने घुटने टेक कर विनती भी की कि मुझे इस नारकीय जीवन से मुक्त कर दे. तब उस ने मेरे सामने एक शर्त रख दी कि अगर बेटा होगा तो लौट जाना शुभेंदु के पास और अगर बेटी हुई तो तुम्हें मेरे ही साथ रहना होगा. मेरी गोद में मुसकान आ गई.’’

बसु की अश्रुधारा बह चली थी. कैसी लाचारी, कैसी विडंबना थी? डूबते को किश्ती की तलाश भी थी और किश्ती से दूर रहने की मजबूरी भी.

‘‘रवि ने दो टूक फैसला कर मुझे एक अंधेरी सीलन भरी सुरंग में धकेल दिया था, जहां मेरा दम घुटता था. मुझे चुटकी भर उजाला चाहिए था ताकि मैं बाहर निकलने का रास्ता खोज सकती. कई बार शुभेंदु का खयाल आया. सोचा दौड़ कर जाऊं और उन से अमर बेल की तरह लिपट जाऊं. लेकिन इतना गिरने के बाद उन से नजरें मिलाने का साहस नहीं था मुझ में.’’

‘‘कब तक जीएगी ऐसा जीवन?’’ मेरे मुंह से निकला.

‘‘मुझे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता. मैं हर दिन घुलती हूं… हर रात मरती हूं… फिलहाल ये बच्चे छोटे हैं, नासमझ हैं. कल को बड़े होंगे, तो इन की आंखों में तिरते अनुत्तरित प्रश्नों के तीर झेल पाना क्या सहज होगा मेरे लिए?’’

बसु रोने लगी थी. उसे सांत्वना देने का मन किया पर मानो मेरे शब्द ही खत्म हो गए हों. अगर पुरुष आकाश है तो स्त्री धरती. बादल का कोई टुकड़ा ऊपर से गिरता है तो धरती उसे सहेज लेती है और सोख भी लेती है. पर जब धरती फटती है, तो कहीं कोई सहेजने वाला नहीं होता. यह बोध भी मुझे तब हुआ जब बसु नहीं रही.

बसु ने रवि की हत्या कर दी और स्वयं नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने का प्रयास किया. 2 दिन पहले ही तो मिली थी मैं उस से. ऐसा लगता था जैसे वह मानसिक अवसाद से घिरती जा रही है. बात करतेकरते चुप हो जाती या शून्य में निहारने लगती.

‘‘जिंदगी बोझ सी बनती जा रही है. नहीं जी पाऊंगी मैं… सोचती हूं अपनेआप को खत्म कर लूं या कहीं दूर चली जाऊं,’’ कह वह पुन: शून्न्य में निहारने लगी थी.

‘‘आत्महत्या कायर करते हैं,’’ मैं ने उसे समझाया था. पर उस ने कहां मानी थी मेरी बात? हमेशा जो मन में आता वही तो करती थी. फिर चाहे बाद में पछताना ही क्यों न पड़े… वह आज भी पछता रही थी.

अस्पताल का कमरा दवा की गंध से भरा था. उस के मुंह पर औक्सीजन मास्क लगा था और ग्लूकोज चढ़ रहा था. दौड़तीभागती नर्सें, डाक्टर उसे जीवन दान देने का प्रयास कर रहे थे. आसपास बिखरे सन्नाटे को चीरते हुए उस के अस्फुट स्वरों को सुनते ही पुलिसकर्मी बसु का बयान लेने उस तक पहुंचते उस से पहले ही उस की सांसें बंद हो गईं.

मैं वार्ड के बाहर आ गई थी. थोड़ी ही देर में पुलिस अधिकारी तेजतेज कदमों में चलते हुए कमरे तक आए और अपनी गोद में उस 1 साल की बच्ची मुसकान को ले कर कमरे से बाहर निकल गए. मन हुआ झपट कर मुसकान को उन से छीन लूं, पर यह मैं कैसे करती किस अधिकार से करती? मैं तो सोचती भर रह जाने वाली चारु थी.

अतुल से मैं ने तब मुसकान को गोद लेने का आग्रह किया था. वैसे भी हमारी बेटी नहीं थी लेकिन उन्होंने अपनी स्वीकृति नहीं दी. बोले, ‘‘हर जगह मुसकान, चरित्रहीन और हत्यारिन की बेटी के नाम से जानी जाएगी. इस बच्ची को क्या समाज स्वीकारेगा?’’

उन के तर्क के सामने मैं चुप हो गई थी. लेकिन खुद को दोषी पाती थी. इस पूरे प्रसंग में उस बच्ची का क्या कुसूर था? अपनी मां के गुनाहों की सजा वह क्यों भुगते? पर तब मेरा बस नहीं चला था. घटनाएं और हालात इंसान के अपने वश में कहां होते हैं?

लेकिन अब मुसकान मेरे घरआंगन में आने को बेताब है. ऐसा लग रहा है, जैसे टेढ़ेमेढ़े रास्तों को पार कर वह मेरे द्वार पर दस्तक दे रही है और कह रही है कि अब तो स्वीकार करेंगी न मुझे?

परंतु यदि अतुल को मुसकान के अतीत के बारे में पता चला तो हो सकता है वे इनकार कर दें या संभव है कुछ कह दें. नहीं, मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी.

मन में संकल्प ले कर सुबह उठी तो अतुल मौर्निंगवाक से लौट आए थे. मुझे चुपचाप देख कर बोले, ‘‘कल कहां गई थीं? बच्चे कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे थे.’’

मैं शांत भाव से उन्हें निहारने लगी थी. संभव कमरे से गया तो अतुल ने मेरा हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘उस सुदूर अतीत की स्मृतियां ताजा करने गई थीं? मैं जानता हूं मुसकान बसु की बेटी है. बसु और रवि की संतान है.’’

‘‘तुम्हें कैसे मालूम?’’ भविष्य की दुश्चिंताओं से घिरी मेरी जबान लड़खड़ने लगी थी.

‘‘बसु की छवि स्पष्ट झलक रही है उस के मुखमंडल पर… मैं तो उसी दिन जान गया था जिस दिन हम शुभेंदु से मिलने गए थे.’’

‘‘इस विषय में संभव से कुछ मत कहिएगा.’’

‘‘नहीं, उसे कभी कुछ मालूम नहीं होगा. वह मुसकान और उस की मां का भूला हुआ अतीत होगा.’’

आज संभव और मुसकान के ब्याह का निमंत्रणपत्र मेरे हाथ में है. मुसकान आज खुश है. बेहद खुश. अब तो मुझे विवाह की मधुर बेला का बेसब्री से इंतजार है.