गृहशोभा विशेष

घंटी बजी तो आर्यन ने उठ कर दरवाजा खोला.

‘‘अरे अर्पिता तुम?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘आर्यन, मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहती थी. इसीलिए बिना बताए चली आई.’’

‘‘अच्छा किया जो आ गईं. आओ अंदर आओ,’’ आर्यन ने कहा और फिर अर्पिता को ड्राइंगरूम में बैठा कर पत्नी नेहा को बुलाने अंदर चला गया.

अर्पिता दिल्ली में अकेली रहती थी. करीब 3 महीने पहले उस की औफिस जाते समय बस में आर्यन से मुलाकात हुई थी. फिर एक दिन शाम को इत्तफाक से उन की मुलाकात बसस्टौप पर हो गई. अर्पिता काफी देर से बस की प्रतीक्षा कर रही थी. आर्यन उधर से अपनी बाइक से गुजर रहा था. उसे देख कर रुक गया. आर्यन के आग्रह पर वह उस के साथ चलने को तैयार हो गई.

‘‘अर्पिता, तुम्हारा यहां कोई रिश्तेदार या परिचित तो होगा न?’’ आर्यन ने यों ही बातोंबातों में पूछ लिया.

‘‘नहीं, मेरा यहां कोई रिश्तेदार या परिचित नहीं है.’’

‘‘कोई बात नहीं, तुम मुझे अपना दोस्त समझ कोई भी जरूरत पड़ने पर बेहिचक कह सकती हो.’’

‘‘हां, जरूर,’’ अर्पिता बोली.

फिर आर्यन ने उसे अपनी फैमिली के बारे में बता दिया.

रात को वह बिस्तर पर लेटी तो आर्यन के बारे में देर तक सोचती रही. उस के साथ उसे मेलजोल बढ़ाना चाहिए या नहीं? हालांकि उसे आर्यन की स्पष्टवादिता पसंद आई थी. ऐसे तमाम पुरुष होते हैं, जो शादीशुदा होते हुए भी लड़कियों से यह कह कर दोस्ती करते हैं कि वे अनमैरिड हैं या फिर ऐसे लोग लड़कियों से दोस्ती करने को उत्सुक रहते हैं जिन की बीवी से अनबन होती है. पर आर्यन के साथ ऐसा कुछ नहीं है. फिर उस के लिए तो अच्छा ही होगा कि यहां कोई परिचित तो रहेगा. फिर दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे. कभीकभार फोन पर बात कर लेते या कभी साथ बैठ कर चायकौफी पी लेते.

आर्यन थोड़ी देर में लौटा. साथ में नेहा भी थी, बोला, ‘‘अर्पिता, ये है मेरी पत्नी नेहा और नेहा ये है अर्पिता मेरी दोस्त.’’

‘‘हाय नेहा,’’ अर्पिता ने मुसकरा कर कहा.

‘‘हैलो,’’ नेहा ने सामने सोफे पर बैठते हुए कहा.

आर्यन भी उस की बगल में बैठ गया. ‘‘ऐक्सक्यूज मी, जरा तनु को देख लूं. कल उस का टैस्ट है,’’ 5 मिनट बाद ही उठते हुए नेहा बोली.

आर्यन अर्पिता से इधरउधर की बातें करने लगा. फिर वह नेहा से चायनाश्ता लाने के लिए बोलने अंदर आया, ‘‘नेहा, ये क्या मैनर्स हैं, तनु को पढ़ाने के बहाने तुम अंदर चली आईं और यहां आ कर मैगजीन पढ़ रही हो. खैर, अब कम से कम चायनाश्ता तो बना ही सकती हो,’’ आर्यन धीरे बोल रहा था, पर अर्पिता तक आवाज स्पष्ट जा रही थी.

‘‘आर्यन, तुम ने पहले तो मुझे नहीं बताया था कि कोई लड़की तुम्हारी दोस्त है?’’ नेहा कह रही थी.

‘‘नेहा, मैं ने तुम्हें अर्पिता के बारे में बताया तो था.’’

‘‘आर्यन, मैं नहीं जानती थी कि तुम दोनों के बीच इतना गहरा रिश्ता है कि वह घर तक आ जाएगी और वह भी मेरे रहते हुए,’’ नेहा ने गुस्से से कहा.

‘‘नेहा, मैं तो तुम्हें समझदार समझता था, पर तुम तो मुझ पर शक कर रही हो,’’ आर्यन ने कहा.

‘‘अब कोई लड़की तुम से घर पर मिलने आए तो मैं क्या सोचूं?’’

‘‘अर्पिता सिर्फ मेरी अच्छी दोस्त है.’’

‘‘दोस्त… हुंह, कोई भी रिश्ता बनाने के लिए यह नाम काफी अच्छा होता है,’’ नेहा ने कहा.

‘‘शटअप, शर्म नहीं आती तुम्हें ऐसी बकवास करते हुए? तुम इतने संकीर्ण विचारों की हो मैं सोच भी नहीं सकता था,’’ आर्यन ने कहा.

‘‘तुम्हें भी तो शर्म नहीं आई पत्नी और बेटी के होते हुए दूसरी लड़की से संबंध…’’ नेहा गुस्से से बोली.

‘‘नेहा बंद करो यह बकवास… जाओ चाय बना दो,’’ आर्यन उस की बात काटते हुए बोला.

‘‘मैं, तुम्हारी प्रेमिका के लिए चाय बनाऊं. कभी नहीं,’’ नेहा ने साफ मना कर दिया.

नेहा को इस वक्त समझाना या उस से रिक्वैस्ट करना बेकार समझ आर्यन स्वयं किचन में चला गया. थोड़ी ही देर में चाय की ट्रे ले कर वह ड्राइंगरूम में आया.

‘‘आर्यन, तुम क्यों परेशान हुए?’’ अर्पिता बोली. आर्यन व नेहा की बातें सुन उस का मन कसैला हो उठा था, पर अपने हावभाव से वह प्रकट नहीं होने देना चाहती थी कि उस ने उन की बातें सुन ली हैं. वह आर्यन को अपने सामने शर्मिंदा नहीं होने देना चाहती थी.

‘‘अर्पिता, तनु को 1-2 लैसन समझ में नहीं आ रहे थे. नेहा उसे उन्हें समझा रही है. कल उस का टैस्ट है इसलिए मैं ने ही चाय बना ली,’’ आर्यन ने होंठों पर मुसकान लाते हुए कहा.

‘‘चलो, आज तुम्हारे हाथ की चाय पी जाए,’’ अर्पिता कप उठाते हुए बोली.

चाय पी कर वह जरूरी काम याद आ जाने का बहाना कर लौट आई. अर्पिता रास्ते भर नेहा के बारे में सोचती रही. आर्यन कहता था कि बहुत समझदार है नेहा. लगता है अभी तक उसे नहीं समझ पाया… आज नेहा ने जैसा व्यवहार किया उस से तो यही लगता है कि कितने संकीर्ण विचारों की है वह… खैर, चाहे जैसी भी हो आर्यन की पत्नी है. यदि उसे पसंद नहीं तो आर्यन से कोई संबंध नहीं रखेगी वह. उस की वजह से उन के रिश्ते में कोई दरार पड़े यह ठीक नहीं.

अर्पिता को गेट तक छोड़ आर्यन अंदर आया तो अंदर का दृश्य देख कर दंग रह गया. नेहा, जल्दीजल्दी वार्डरोब से अपने कपड़े निकाल कर बैग में रखती जा रही थी. उस का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था.

‘‘नेहा, यह क्या कर रही हो तुम?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मैं अब आप के साथ नहीं रह सकती. अच्छा होगा हम अपने रास्ते अलग कर लें.’’

‘‘नेहा, यह क्या बेवकूफी भरी हरकत कर रही हो?’’ आर्यन ने कहा.

‘‘बेवकूफी मैं नहीं कर रही आप ने की है, जो पत्नी के रहते हुए दूसरी लड़की से संबंध बनाया.’’

‘‘चुप रहो जो मन में आ रहा है बोलती जा रही हो,’’ आर्यन चिढ़ कर बोला.

‘‘सचाई कड़वी ही लगती है. मैं बहुत शरीफ समझती थी आप को, पर आप की असलियत क्या है, अब जान गई हूं,’’ नेहा भी तेज स्वर में बोली.

‘‘नेहा, क्यों बेवजह बात का बतंगड़ बना रही हो?’’ आर्यन ने उसे समझाना चाहा.

‘‘मैं बात का बतंगड़ नहीं बना रही हूं सच कह रही हूं.’’

‘‘नेहा, मेरी बात समझने की कोशिश करो. अर्पिता केवल…’’ आर्यन ने बात पूरी भी नहीं की थी कि नेहा बीच में ही बोल उठी, ‘‘मुझे सफाई देने की कोशिश मत करो प्लीज.’’ फिर नेहा बैग की जिप बंद करते हुए बोली, ‘‘चलो तनु,’’ और उस ने तनु की कलाई पकड़ ली.

‘‘नेहा, तुम्हें जाना है तो जाओ. तनु को मत ले जाओ. वैसे भी उस के टैस्ट चल रहे हैं,’’ आर्यन ने कहा.

‘‘अच्छा मैं यहां अपनी बेटी को आप दोनों की रंगरलियां देखने के लिए छोड़ दूं,’’ नेहा आंखें तरेर कर बोली.

गृहशोभा विशेष

आर्यन से नेहा की ये बातें बरदाश्त न हुईं तो उस ने गुस्से में आ कर एक चांटा नेहा के गाल पर जड़ दिया.

‘‘कब से समझाने की कोशिश कर रहा हूं, पर तुम हो कि मानने को तैयार ही नहीं हो,’’ उस ने कहा.

‘‘देखा, एक सड़कछाप आवारा लड़की के लिए अपनी पत्नी को मारने में भी शर्म नहीं आई,’’ नेहा रोते हुए चीखी.

‘‘नेहा, तुम ने बदतमीजी की हद कर दी.’’

‘‘हद मैं ने नहीं तुम ने की है,’’ नेहा बोली और फिर बैग उठा कर तनु को खींचते हुए बाहर निकल गई.

आर्यन जानता था कि इस वक्त नेहा उस की कोई बात नहीं मानेगी, इसलिए फिर कुछ न बोला. सोचा 1-2 दिन में गुस्सा ठंडा हो जाएगा तो खुद ही लौट आएगी.

लेकिन 1 हफ्ता गुजर गया, मगर नेहा न तो लौट कर आई और न ही उस ने फोन किया.

इधर अर्पिता ने आर्यन से फोन पर बात करना भी बंद कर दिया था. बसस्टौप पर बस की प्रतीक्षा करते समय भीड़ के पीछे कोने में जा कर खड़ी हो जाती थी ताकि आर्यन उसे देख न सके. जब से आर्यन से उस की फ्रैंडशिप हुई थी तब से अर्पिता उस से सारी बातें शेयर करती थी. कोई प्रौब्लम होती तो वह उस का हल भी सुझा देता. पर अब वह फिर से अकेली हो गई थी, इसलिए फिर से डायरी को अपना दोस्त बना लिया था.

धीरेधीरे नेहा को गए हुए 15 बीत गए तो आर्यन को फिक्र होने लगी. वह सोचता था कि नेहा स्वयं गुस्सा हो कर गई है, उसे स्वयं आना चाहिए. पर अब अपनी ही बातें उसे बेतुकी लगने लगी थीं. नेहा की जगह स्वयं को रख कर देखा तो सोचा शायद वह भी वही करता जो नेहा ने किया. नेहा उसे सचमुच बहुत प्यार करती है. तभी तो अर्पिता की दोस्ती सहन न हुई. खैर, जो हो गया वह हो गया. वह स्वयं नेहा को फोन करेगा और जा कर उसे ले आएगा. मन ही मन निश्चय कर आर्यन उठा और अपने फोन से नेहा का नंबर डायल करने लगा.

नेहा के फोन की रिंग जाती रही, पर फोन रिसीव न हुआ. फिर आर्यन ने नेहा के घर का लैंडलाइन नंबर मिलाया.

टैलीफोन की घंटी बजी तो फोन नेहा की मम्मी सीमा ने उठाया बोलीं, ‘‘हैलो.’’

‘‘हैलो, मम्मीजी नमस्ते. नेहा से बात करनी है… कहां है वह?’’ आर्यन ने बेहद आदर से कहा.

‘‘नेहा को तुम से कोई बात नहीं करनी है और बेहतर होगा कि तुम दोबारा फोन न करो,’’ सीमा ने कहा.

‘‘मम्मीजी, पर क्यों? मेरी बात तो सुनिए पहले प्लीज…’’ आर्यन की बात पूरी नहीं हुई थी कि सीमा ने रिसीवर रख दिया.

‘‘किस का फोन था सीमा?’’ नेहा के पापा नरेश ने पूछा.

‘‘आर्यन का. नेहा से बात करना चाहता था,’’ सीमा ने बताया.

‘‘तो फिर फोन काट क्यों दिया तुम ने?’’ नरेश ने पूछा.

‘‘मैं ने मना कर दिया,’’ सीमा ने गर्व से कहा.

‘‘मना कर दिया पर क्यों? नेहा को आए 15 दिन हो गए हैं… अब उसे जाना चाहिए,’’ नरेश ने कहा.

‘‘नेहा के रहते हुए आर्यन ने दूसरी लड़की से संबंध बना रखा है. फिर नेहा वहां क्यों जाए?’’ सीमा ने रोष में भर कर कहा.

‘‘देखो आर्यन को मैं अच्छी तरह जानता हूं. मेरे बचपन के दोस्त का बेटा है. वह ऐसी हरकत कभी नहीं कर सकता. जरूर नेहा को कोई गलतफहमी हुई है,’’ नरेश ने कहा.

‘‘वह लड़की नेहा के रहते हुए घर आती है,’’ सीमा ने कहा.

‘‘देखो, इस संबंध में हमें आर्यन से बात करनी चाहिए. यदि वह सचमुच गलत होगा तो हम उसे समझाएंगे,’’ नरेश ने कहा.

‘‘आर्यन कोई छोटा बच्चा नहीं है, जो उसे समझाया जाए. उस के पास अपना दिमाग नहीं है क्या?’’

‘‘सीमा, ऐसे तो मामला और बिगड़ जाएगा. तुम सोचो दोनों के बीच की दूरी इस तरह तो और बढ़ जाएगी. कहीं आर्यन तलाक के बारे में न सोचने लगे,’’ नरेश ने आशंका व्यक्त की.

‘‘बात बिगड़ती है तो बिगड़ने दो. नेहा अनाथ नहीं है. हम सब उस के साथ हैं. वह कहीं नहीं जाएगी. उसे और उस की बेटी को जिंदगी भर रख सकती हूं मैं,’’ सीमा ने कहा.

‘‘बात को समझने की कोशिश करो. इस सब से क्या फायदा? क्यों अपनी जिद के कारण नेहा का घर उजाड़ने पर तुली हो? तुम्हें तो उसे समझाबुझा कर पति के घर भेजना चाहिए,’’ नरेश ने कहा.

‘‘मैं उन मांओं में से नहीं हूं, जो बेटियों को बोझ समझती हैं. मैं ने नेहा को बहुत नाजों से पाला है. उस के ही घर में उस की सौतन आए यह मुझ से कभी बरदाश्त नहीं होगा.’

‘‘तुम हर बात में जिद क्यों करती हो? नेहा से भी तो पूछ लो वह क्या चाहती है?’’ नरेश ने कहा.

‘‘नेहा इतनी समझदार होती तो उसे ये दिन न देखने पड़ते. वह तो आंख मूंद कर पति पर भरोसा किए बैठी रही. उस के सीधेपन का फायदा उठा कर ही तो आर्यन मटरगश्ती करने लगा.’’

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी,’’ पत्नी के सामने हमेशा की तरह चुप हो जाने वाले नरेश ने कहा. वे जानते थे कि सीमा से बातों में कोई नहीं जीत सकता. दूसरों की बातों को कुतर्कों से काट कर अपनी बात ही सही साबित करना उन की आदत है.

बात न बढ़े, लड़ाईझगड़ा न हो, घर में अशांति न फैले इसलिए वे हमेशा चुप हो जाते थे, किंतु बेटी का बसाबसाया घर सीमा की जिद व नेहा की बेवकूफी से उजड़ जाने की आशंका से डर कर बोल उठे थे. किंतु इस बार भी पत्नी के कुतर्कों ने उन्हें परास्त कर दिया.

नेहा कमरे में बैठी मम्मीपापा की बातें सुन रही थी. उसे लगा मम्मी सही कह रही हैं. न आर्यन को फोन करेगी न खुद जाएगी. तब उसे पता चलेगा. उस की इस अकड़बाजी से उस का विवाहित जीवन टूट भी सकता है, इस की उसे कोई चिंता न थी.

धीरेधीरे 7 महीने गुजर गए. आर्यन ने भी अब फोन करना छोड़ दिया था. महल्ले से ले कर परिचितों, रिश्तेदारों में यह खबर फैल गई कि पता नहीं क्यों नेहा मायके में पड़ी है. पति के पास नहीं जा रही है. लोग मिलने पर उस से सवाल भी पूछने लगे थे कि क्यों वह मायके में रह रही है? अत: धीरेधीरे नेहा लोगों से कतराने लगी थी. उस ने कहीं निकलना व परिचितों, रिश्तेदारों से मिलना छोड़ दिया था.

अब नेहा को आर्यन की याद सताने लगी थी. उसे लगता कि उसे आर्यन को इस तरह छोड़ कर नहीं आना चाहिए था. कम से कम उसे एक बार अपनी गलती सुधारने का मौका तो देना चाहिए था.

नेहा, आर्यन व अर्पिता के संबंधों के बारे में सोचती. अब तो वह घर पर नहीं है. उन दोनों को तो और छूट मिल गई… दोनों को ही रोकनेटोकने वाला कोई नहीं. कहीं ऐसा न हो कि सचमुच आर्यन उस से तलाक ले कर अर्पिता से शादी कर ले. आखिर इतने दिनों से न उस ने फोन किया न लेने आया. जरूर अर्पिता से उस की घनिष्ठता और बढ़ गई होगी. तभी तो अब फोन तक नहीं करता.

यह सब सोच मन ही मन कुढ़ती रहती नेहा. पर स्वयं अपनी तरफ से ईगो के कारण आर्यन को फोन नहीं करती. गलती आर्यन ने की और झुके वह. इस में उसे अपना अपमान लगता. उस का अभिमान जिसे वह अपना स्वाभिमान समझ रही थी वही उस का सब से बड़ा दुश्मन बन बैठा था.

नरेश ने बेटी को एकाध बार समझाने की कोशिश की थी पर वह ध्यान ही नहीं देती थी.

‘‘देखा नेहा, आर्यन को तुम्हारी कोई फिक्र नहीं. उसे तो बस अर्पिता से ही मतलब है. सचमुच उन दोनों में संबंध न होता तो वह तुम्हें इस तरह इग्नोर न करता. इतने दिनों से तुम्हारी खोजखबर लेने की भी जरूरत न समझी उस ने,’’ सीमा उसे और भड़कातीं.

‘‘मम्मी, मैं क्या करूं, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा,’’ नेहा बोली.

‘‘बेटी, उस ने तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया है. आर्यन को इस का मजा जरूर चखाना चाहिए. मैं किसी अच्छे वकील से बात करती हूं. तलाक का नोटिस पहुंचेगा तो उस का दिमाग ठिकाने आ जाएगा. उस पर दहेज के लिए तुम्हें प्रताडि़त करने और दूसरी स्त्री से संबंध रखने का आरोप लगेगा तब पता चलेगा.’’

‘‘मम्मी, यह सब करने की क्या जरूरत है? कोई आसान सी तरकीब निकालो न, जिस में ज्यादा परेशानी न हो. कोर्टकचहरी का चक्कर बहुत खराब होता है,’’ नेहा ने घबरा कर कहा.

‘‘नेहा, तुम बहुत भोली हो, जब तक वह खूब परेशान नहीं होगा तब तक सुधरेगा नहीं. देखना तुम कैसे मजबूर हो जाएगा तुम्हारे सामने गिड़गिड़ा कर माफी मांगने के लिए… फिर कभी जिंदगी भर किसी दूसरी लड़की की तरफ आंख उठा कर देखने की हिम्मत नहीं करेगा.’’

‘‘हां, आप ठीक कहती हैं मम्मी,’’ नेहा ने इस सब का परिणाम सोचे बिना कहा.

कुरियर वाले ने औफिस में आर्यन के पर्सनल नाम का लिफाफा पकड़ाया तो सोचने लगा क्या है इस में? उतावलेपन से पैकेट खोला, पर उस में से निकले पेपर को पढ़ते ही होश उड़ गए. तलाक के पेपर्स थे. उस पर ऐसे इलजाम लगाए गए थे वह उन के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता था. उस ने तुरंत नेहा का नंबर डायल किया, पर उधर से फोन काट दिया गया. आर्यन ने फिर लैंडलाइन पर मिलाया. रिसीवर सीमा ने ही उठाया.

‘‘मम्मीजी, नेहा कहां है मुझे उस से जरूरी बात करनी है,’’ आर्यन ने कहा.

‘‘वह घर में नहीं है,’’ सीमा ने झूठ बोल कर फोन काट दिया.

‘‘आर्यन परेशान हो उठा. जरा सी बात का इतना बड़ा बखेड़ा हो जाएगा, उस ने कभी सोचा भी न था. और नेहा को क्या हो गया, जो उस से बात भी नहीं कर रही. जाने किस के बहकावे में आ कर इतना बड़ा कदम उठा लिया. जरूर मम्मी के इशारे पर चल रही है, जो बददिमाग हैं. आर्यन शुरू से जानता था उन्हें. तभी तो नरेश अंकल हमेशा उन के सामने चुप रहते थे. किंतु यह नहीं पता था कि पूरी बात जाने बिना ही अपनी बेटी का घर उजाड़ने को तैयार हो जाएंगी.’’

‘‘क्या हुआ आर्यन, बहुत परेशान हो?’’ उस के सहयोगी व मित्र निशांत ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं यार,’’ आर्यन ने कहा.

‘‘कुछ तो जरूर है, पर मुझे नहीं बताना चाहते हो तो मत बताओ. बता देते तो हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद कर पाता,’’ निशांत ने कहा तो आर्यन ने चुपचाप पेपर्स उसे थमा दिए.

‘‘अरे यार, यह तो सरासर अन्याय है तुम्हारे प्रति. बिना कुछ किए इतना बड़ा इलजाम लगाया गया है तुम पर. लेकिन एक बात बताओ यह अर्पिता का चक्कर क्या है… वह तो केवल तुम्हारी दोस्त है न?’’ निशांत बोला.

‘‘है कहां, थी. उस से तो उसी दिन से मुलाकात या फोन पर बात नहीं हुई जिस दिन से नेहा मायके गई है,’’ आर्यन ने बताया.

‘‘खैर, तुम परेशान मत हो कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा,’’ निशांत ने उसे आश्वासन दिया.

शाम को आर्यन औफिस से जल्दी निकल आया. सोचा किसी अच्छे वकील से मिल कर इस समस्या का समाधान निकाला जाए. वह मानसिक रूप से बहुत परेशान था, उसे तो उस गुनाह की सजा मिल रही थी, जो उस ने किया ही नहीं था. विचारों का ज्वारभाटा उठ रहा था. मन में इतनी उथलपुथल मची थी कि सामने से आती कार भी न दिखाई दी और उस की बाइक उस से टकरा गई.

लंचटाइम में अर्पिता सहयोगियों के साथ बैठी लंच कर रही थी. तभी उस के फोन की घंटी बजी. स्क्रीन पर नंबर देखा तो आर्यन का फोन था.

इतने दिनों बाद आर्यन उसे क्यों फोन कर रहा है? अब उन के बीच कोई संबंध नहीं रहा. फिर उसे फोन करने का मतलब?

अर्पिता ने फोन रिसीव न किया, पर जब लगातार घंटी बजती रही तो अटैंड कर ही लिया.

‘‘हैलो?’’ वह धीरे से बोली.

‘‘अर्पिता, मैं यहां नवजीवन हौस्पिटल में हूं. औफिस से लौटते वक्त मेरा ऐक्सीडैंट हो गया. यदि तुम आ सको तो आ जाओ,’’ आर्यन ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं आती हूं,’’ अर्पिता बोली व फोन बंद कर दिया. ऐक्सीडैंट की खबर सुन कर वह स्तब्ध रह गई. भले ही आर्यन से उस ने संबंध खत्म कर लिया था, किंतु इस दुर्घटना की सूचना ने उसे असहज कर दिया. बौस को बता वह तुरंत औफिस से निकल अस्पताल पहुंच गई. आर्यन बैड पर लेटा था. उस के पैर में फ्रैक्चर हो गया था. हाथों व सिर में भी चोटें आई थीं.

‘‘नेहा कहां है आर्यन?’’ अर्पिता ने आर्यन के आसपास किसी को न देख कर पूछा तो आर्यन ने उसे सब कुछ सचसच बता दिया.

अर्पिता सारी बातें जान आश्चर्यचकित रह गई. आर्यन और नेहा के बीच आज तलाक की बातें शुरू हो गईं और वे भी उस की वजह से और तब जब ऐसा कुछ है भी नहीं. फिलहाल उस ने आर्यन की देखभाल शुरू कर दी.

‘‘अर्पिता, अगर मैं जानता कि नेहा इतने संकीर्ण विचारों की है तो मैं उसे तुम्हारे बारे में बताता ही नहीं,’’ आर्यन ने कहा.

आर्यन दवा ले कर सो गया तो अर्पिता बाहर निकल आई. उस ने कुछ सोचा फिर आर्यन के फोन से नेहा का नंबर ले कर उसे फोन किया व आर्यन के दुर्घटना की सूचना दी. कुछ भी हो नेहा पत्नी थी आर्यन की. अत: घटना की सूचना ने उसे भी दुखी कर दिया. मम्मी किसी रिश्तेदार के घर थीं. अत: वह तनु को ले कर तुरंत दिल्ली रवाना हो गई.

सुबह 9 बजे वह अस्पताल पहुंच गई. अर्पिता को देख उस के तनबदन में आग लग गई. पर फिर आर्यन की स्थिति देख कर परेशान हो उठी.

नेहा के आ जाने पर अर्पिता चली गई. 2 दिन अस्पताल में रहने व सो न पाने के कारण वह बुरी तरह थक गई थी. अत: बिस्तर पर पड़ते ही नींद के आगोश में समा गई. उस दिन संडे था. अर्पिता घर में ही थी कि मोबाइल की घंटी बजी.

‘‘अर्पिता, मैं नेहा, क्या आज घर आ सकती हो?’’ उधर से आवाज आई तो अर्पिता हैरान रह गई कि नेहा ने उसे क्यों बुलाया? शायद आर्यन और उसे ले कर कोई बातचीत करना चाहती हो? कहीं बेवजह लड़ाईझगड़ा तो नहीं करने वाली… कई विचार मस्तिष्क में आनेजाने लगे. फिर भी संयत स्वर में पूछा, ‘‘नेहाजी, क्या मुझ से कोई काम है आप को?’’

‘‘हां, मैं शाम को तुम्हारा इंतजार करूंगी,’’ नेहा ने कहा व फोन काट दिया.

शाम को अर्पिता आर्यन के घर पहुंची.

‘‘अर्पिता, आर्यन अंदर हैं, तुम वहीं चलो मैं आती हूं,’’ नेहा ने कहा.

‘‘कैसे हैं आप?’’ अर्पिता ने अंदर आ कर आर्यन से पूछा.

‘‘अब ठीक हूं,’’ आर्यन ने मुसकरा कर कहा.

‘‘अर्पिता, तुम सोच रही होगी कि मैं ने तुम्हें यहां क्यों बुलाया है?’’ नेहा नाश्ते की ट्रे ले कर अंदर आते हुए बोली.

अर्पिता ने पहले आर्यन, फिर नेहा की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा. उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘अर्पिता, मैं ने तुम्हें व आर्यन को गलत समझा था, तुम्हें उन लड़कियों की तरह समझा था, जो अपने स्वार्थ व मौजमस्ती के लिए युवकों को अपने जाल में फंसाती हैं. फिर वे युवक चाहे शादीशुदा ही क्यों न हों, पर बुरे वक्त में तुम ने इतनी मदद की अस्पताल में आर्यन की देखभाल की, मैं उस से जान गई हूं कि तुम वैसी नहीं हो. तुम तो आर्यन की सच्ची दोस्त हो क्योंकि वे स्वार्थी लड़कियां तुम्हारी तरह बिना स्वार्थ किसी की मदद कर ही नहीं सकतीं.

‘‘मैं ने तुम्हारी डायरी भी पढ़ ली है, जो तुम अस्पताल में भूल आई थीं. उस में लिखी बातें पढ़ कर मैं जान गई हूं कि तुम्हारे और आर्यन के बीच सिर्फ दोस्ती का रिश्ता था और कुछ नहीं और वह भी तुम ने इस वजह से खत्म कर लिया ताकि मुझे बुरा न लगे और मैं बेवकूफ गलतफहमी में तलाक ले कर अपना बसाबसाया घर उजाड़ने की तैयारी कर बैठी थी,’’ कहतेकहते फफक पड़ी नेहा.

‘‘नेहाजी, आप की जगह कोई भी होता तो शायद यही करता,’’ अर्पिता बोली.

‘‘अर्पिता, यदि तुम्हारी डायरी न पढ़ी होती तो जाने क्या होता…’’ नेहा ने सुबकते हुए कहा.

‘‘वक्त रहते सब ठीक हो गया नेहाजी अब तो आप को खुश होना चाहिए.’’

‘‘ठीक कहती हो अर्पिता तुम. आज इतने दिनों बाद मन का बोझ खत्म हुआ है,’’ नेहा ने अर्पिता का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘आर्यन की आंखों में खुशी के भाव साफ नजर आ रहे थे. पत्नी के मन से गलतफहमी जो दूर हो गई थी. महीनों से सूने पड़े घर में नन्ही तनु की चहचहाहट फिर से गूंजने लगी थी. उस का टूटने के कगार पर पहुंच चुका वैवाहिक जीवन बच गया था. साथ ही फिर मिल गई थी उसे अपनी दोस्त अर्पिता.’’

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