विकासकी दर क्या होती है, यह बात सुलभा की समझ से बाहर थी. वह मां से पूछ रही थी कि मां, विकास की दर बढ़ने से महंगाई क्यों बढ़ती है? मां, बेरोजगारी कम क्यों नहीं होती? मां यानी शालिनी चुप थी. उस का सिरदर्द यही था कि उस ने जब एम.ए. अर्थशास्त्र में किया था, तब इतनी चर्चा नहीं होती थी. बस किताबें पढ़ीं, परीक्षा दी और पास हो गए. बीएड किया और अध्यापक बन गए. वहां इस विकास दर का क्या काम? वह तो जब छठा वेतनमान मिला, तब पता लगा सचमुच विकास आ गया है. घर में 2 नए कमरे भी बनवा लिए. किराया भी आने लगा. पति सुभाष कहा करते थे कि एक फोरव्हीलर लेने का इरादा है, न जाने कब ले पाएंगे. पर दोनों पतिपत्नी को एरियर मिला तो कुछ बैंक से लोन ले लिया और कार ले आए. सचमुच विकास हो गया. पर शालिनी का मन अशांत रहता है, वह अपनेआप को माफ नहीं कर पाती है.

जब अकेली होती है, तब कुछ कांटा सा गड़ जाता है. सुभाष, धीरज की पढ़ाई और उस पर हो रहे कोचिंग के खर्च को देख कर कुछ कुढ़ से जाते हैं, ‘‘अरे, सुलभा की पढ़ाई पर तो इतना खर्च नहीं आया, पर इसे तो मुझे हर विषय की कोचिंग दिलानी पड़ रही है और फिर भी रिपोर्टकार्ड अच्छा नहीं है.’’

‘‘हां, पर इसे बीच में छोड़ भी तो नहीं सकते.’’

सुलभा पहले ही प्रयास में आईआईटी में आ गई थी. बस मां ने एक बार जी कड़ा कर के कंसल क्लासेज में दाखिला करा दिया था. पर धीरज को जब वह ले कर गई तो यही सुना, ‘‘क्या यह सुलभा का ही भाई है?’’

‘‘हां,’’ वह अटक कर बोली. लगा कुछ भीतर अटक गया.

‘‘मैडम, यह तो ऐंट्रैंस टैस्ट ही क्वालीफाई नहीं कर पाया है. इस के लिए तो आप को सर से खुद मिलना होगा.’’

सुभाषजी हैरान थे. भाईबहन में इतना अंतर क्यों आ गया है? हार कर उन्होंने उसे अलगअलग जगह कोचिंग के लिए भेजना शुरू किया. अरे, आईआईटी में नहीं तो और इतने प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज खुल गए हैं कि किसी न किसी में दाखिला तो हो ही जाएगा.

हां, सुलभा विकास दर की बात कर रही थी. वह बैंक में ऐजुकेशन लोन की बात करने गई थी. उस ने कैंपस इंटरव्यू भी दिया था, पर उस का मन अमेरिका से एमबीए करने का था. बड़ीबड़ी सफल महिलाओं के नाम उस के होस्टल में रोज गूंजते रहते थे. हर नाम एक सपना होता है, जो कदमों में चार पहिए लगा देता है. बैंक मैनेजर बता रहे थे कि लोन मिल जाएगा फिर भी लगभग क्व5 लाख तो खुद के भी होने चाहिए. ठीक है किस्तें तो पढ़ाई पूरी करने के बाद ही शुरू होंगी. फीस, टिकट का प्रबंध लोन में हो जाता है, वहां कैसे रहना है, आप तय कर लें.

रात को ही शालिनी ने सुभाष से बात की.

‘‘पर हमें धीरज के बारे में भी सोचना होगा,’’ सुभाष की राय थी, ‘‘उस पर खर्च अब शुरू होना है. अच्छी जगह जाएगा तो डोनेशन भी देना होगा, यह भी देखो.’’

रात में सुलभा के लिए फोन आया. फोन सुन कर वह खुशी से नाच उठी बोली, ‘‘कैंपस में इंटरव्यू दिया था, उस का रिजल्ट आ गया है, मुझे बुलाया है.’’

‘‘कहां?’’

‘‘मुंबई जाना होगा, कंपनी का गैस्टहाउस है.’’

‘‘कब जाना है?’’

‘‘इसी 20 को.’’

‘‘पर ट्रेन रिजर्वेशन?’’

‘‘एजेंट से बात करती हूं, मुझे एसी का किराया तो कंपनी देगी. मां आप भी साथ चलो.’’

‘‘पर तुम्हारे पापा?’’

‘‘वे भी चलें तो अच्छा होगा, पर आप तो चलो ही.’’

सुभाष खुश थे कि चलो अभी बैंक लोन की बात तो टल गई. फिर टिकट मिल गए तो जाने की तैयारी के साथ सुलभा बहुत खुश थी.

सुभाष तो नहीं गए पर शालिनी अपनी बेटी के साथ मुंबई गई. वहां कंपनी के गैस्टहाउस के पास ही विशाल सत्संग आश्रम था.

‘‘मां, मैं तो शाम तक आऊंगी. यहां आप का मन नहीं लगे तो, आप पास बने सत्संग आश्रम में हो आना. वहां पुस्तकालय भी है. कुछ चेंज हो जाएगा,’’ सुलभा ने कहा तो शालिनी सत्संग का नाम सुन कर चौंक गई. एक फीकी सी मुसकराहट उस के चेहरे पर आई और वह सोचने लगी कि वक्त कभी कुछ भूलने नहीं देता. हम जिस बात को भुलाना चाहते हैं, वह बात नए रूप धारण कर हमारे सामने आ जाती है.

उसे याद आने लगे वे पुराने दिन जब अध्यात्म में उस की गहरी रुचि थी. वह उस से जुड़े प्रोग्राम टीवी पर अकसर देखती रहती थी. उस के पिता बिजनैसमैन थे और एक वक्त ऐसा आया था जब बिजनैस में उन्हें जबरदस्त घाटा हुआ था. उन्होंने बिजनैस से मुंह मोड़ लिया था और बहुत अधिक भजनपूजन में डूब गए थे. उस के बड़े भाई जनार्दन ने बिजनैस संभाल लिया था. वहीं सुभाष से उन की मुलाकात और बात हुई. उस के विवाह की बात वे वहीं तय कर आए. उसे तो बस सूचना ही मिली थी.

तभी वह एक दिन पिता के साथ स्वामी उमाशंकर के सत्संग में गई थी. उन्हें देखा था तो उन से प्रभावित हुई थी. सुंदर सी बड़ीबड़ी आंखें, जिस पर ठहर जाती थीं, वह मुग्ध हो कर उन की ओर खिंच जाता था. सफेद सिल्क की वे धोती पहनते थे और कंधे तक आए काले बालों के बीच उन का चेहरा ऐसा लगता था जैसे काले बादलों को विकीर्ण करता हुआ चांद आकाश में उतर आया हो.

शालिनी के पिता उन के पुराने भक्त थे. इसलिए वे आगे बैठे थे. गुरुजी ने उस की ओर देखा तो उन की निगाहें उस पर आ कर ठहर गईं.

शालिनी का जब विवाह हुआ, तब उस के भीतर न खुशी थी, न गम. बस वह विवाह को तैयार हो गई थी. पिता यही कहते थे कि यह गुरुजी का आशीर्वाद है.

विवाह के कुछ ही महीने हुए होंगे कि सुभाष को विशेष अभियान के तहत कार्य करने के लिए सीमावर्ती इलाके में भेजा गया. शालिनी मां के घर आ गई थी.

तभी पिता ने एक दिन कहा, ‘‘मैं सत्संग में गया था. वहां उमाशंकरजी आने वाले हैं. वे कुछ दिन यहां रहेंगे. वे तुम्हें याद करते ही रहते हैं.’’

उस की आंखों में हलकी सी चमक आई.

‘‘उन के आशीर्वाद से ही तुम्हारा विवाह हो गया तथा जनार्दन का भी व्यवसाय संभल गया. मैं तो सब जगह से ही हार गया था,’’ पिता ने कहा.

एक दिन वह मां के साथ सत्संग आश्रम गई थी. वहां उमाशंकर भी आए हुए थे इसलिए बहुत भीड़ थी. सब को बाहर ही रोक दिया गया था. जब उन का नंबर आया तो वे अंदर गईं. भीतर का कक्ष बेहद ही सुव्यवस्थित था. सफेद मार्बल की टाइल्स पर सफेद गद्दे व चादरें थीं. मसनद भी सफेद खोलियों में थे. परदे भी सफेद सिल्क के थे. उमाशंकर मसनद के सहारे लेटे हुए थे. कुछ भक्त महिलाएं उन के पांव दबा रही थीं.

‘‘आप का स्वास्थ्य तो ठीक है?’’ मां ने पूछा.

‘‘अभी तो ठीक है, लेकिन क्या करूं भक्त मानते ही नहीं, इसलिए एक पांव विदेश में रहता है तो दूसरा यहां. विश्राम मिलता ही नहीं है.’’

शालिनी ने देखा कि उमाशंकरजी का सुंदर प्रभावशाली व्यक्तित्व कुछ अनकहा भी कह रहा था.

तभी सारंगदेव उधर आ गया.

‘‘तुम यहां कैसे? वहां ध्यान शिविर में सब ठीक तो चल रहा है न?’’

‘‘हां, गुरुजी.’’

‘‘ध्यान में लोग अधोवस्त्र ज्यादा कसे हुए न पहनें. इस से शिव क्रिया में बाधा पड़ती है. मैं तो कहता हूं, एक कुरता ही बहुत है. उस से शरीर ढका रहता है.’’

‘‘हां, गुरुजी मैं इधर कुरते ही लेने आया था. भक्त लोग बहुत प्रसन्न हैं. तांडव क्रिया में बहुत देर तक नृत्य रहा. मैं तो आप को सूचना ही देने आया था.’’

‘‘वाह,’’ गुरुजी बोले.

गुरुजी अचानक गहरे ध्यान में चले गए. उन के नेत्र मुंद से गए थे. होंठों पर थराथराहट थी. उन की गरदन टेढ़ी होती हुई लटक भी गई थी. हाथ अचानक ऊपर उठा. उंगलियां विशेष मुद्रा में स्थिर हो गईं.

‘‘यह तो शांभवी मुद्रा है,’’ सारंगदेव बोला. उस ने भावुकता में डूब कर उन के पैर छू लिए.

अचानक गुरुजी खिलखिला कर हंसे.

उन के पास बैठी महिलाओं ने उन से कुछ पूछना चाहा तो उन्होंने उन्हें संकेत से रोकते हुए कहा, ‘‘रहने दो, आराम आ गया है. मैं तो किसी प्रकार की सेवा इस शरीर के लिए नहीं चाहता. इस को मिट्टी में मिलना है, पर भक्त नहीं मानते.’’

‘‘पर हुआ क्या है?’’ मां को चैन नहीं था.

‘‘दाएं पांव की पिंडली खिसक गई है, इसलिए दर्द रहता है. कई बार तो चला भी नहीं जाता. शरीर है, ठीक हो जाएगा. सब प्रकृति की इच्छा है, हमारा क्या?’’

‘‘क्यों?’’ उन की निगाहें शालिनी के चेहरे पर ठहर गई थीं, ‘‘आजकल क्या करती हो?’’

‘‘जी घर पर ही हूं.’’

‘‘श्रीमानजी कहां हैं?’’

‘‘जी वे बौर्डर डिस्ट्रिक्ट में हैं, कोई अभियान चल रहा है.’’

‘‘तो कभीकभी यहां आ जाया करो.’’

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं,’’ मां ने प्रसन्नता से कहा था. और फिर उस का सत्संग भवन में आना शुरू हो गया था.

उस दिन दोपहर में वह भोजन के बाद इधर ही चली आई थी. उसे गुरुजी ने अपने टीवी सैट पर लगे कैमरे से देखा तो मोबाइल उठाया और बाहर सहायिका को फोन किया, ‘‘तुम्हारे सामने शालिनी आई है, उसे भीतर भेज देना.’’

सहायिका ने अपनी कुरसी से उठते हुए सामने बरामदे में आती हुई शालिनी को देखा.

‘‘आप शालिनी हैं?’’

‘‘हां,’’ वह चौंक गई.

‘‘आप को गुरुजी ने याद किया है,’’ वह मुसकराते हुए बोली.

वह अंदर पहुंची तो देखा गुरुजी अकेले ही थे. उन की धोती घुटने तक चढ़ी हुई थी.

‘‘लो,’’ उन्होंने पास में रखी मेवा की तश्तरी से कुछ बड़े काजू, बादाम जितने मुट्ठी में आए, बुदबुदाते हुए उस की हथेली पर रख दिए.

‘‘और लो,’’ उन्होंने एक मुट्ठी और उस की हथेली पर रख दिए.

वह यंत्रवत सी उन के पास खिसकती चली आई. उसे लगा उस के भीतर कुछ उफन रहा है. एक तेज प्रवाह, मानो वह नदी में तैरती चली जाएगी. उन्होंने हाथ बढ़ाया तो वह खिंची हुई उन के पास चली आई. और उन के पांव दबाने लग गई. उन की आंखें एकटक उस के चेहरे पर स्थिर थीं और उसे लग रहा था कि उस का रक्त उफन रहा है.

तभी गुरुजी ने पास रखी घंटी को दबा दिया. इस से बाहर का लाल बल्ब जल उठा. उन की बड़ीबड़ी आंखें उस के चेहरे पर कुछ तलाश कर रही थीं.

‘‘शालू, वह माला तुम्हारी गोद में गिरी थी, जो मैं ने तुम्हें दी थी. वह तुम्हारा ही अधिकार है, जो प्रकृति ने तुम्हें सौंपा है,’’ वे बोले तो शालू खुलती चली गई. फिर उमाशंकरजी को उस ने खींचा या उन्होंने उसे, कुछ पता नहीं. पर उसे लगा उस दोपहर में वह पूरी तरह रस वर्षा से भीग गई है. उसे अपने भीतर मीठी सी पुलक महसूस हुई. वह चुपचाप उठी, बाथरूम जा कर व्यवस्थित हुई फिर पुस्तक ले कर कोने में पढ़ने बैठ गई.

सेवक भीतर आया. उस ने देखा गुरुजी विश्राम में हैं. उस ने बाहर जा कर बताया तो कुछ भक्त भीतर आए. तब शालिनी बाहर चली गई. सही या गलत प्रश्न का उत्तर उस के पास नहीं था, क्योंकि वह जानती थी कि गलती उस की ही थी. उसे अकेले वहां नहीं जाना चाहिए था. पर अब वह क्या कर सकती थी? चुप रहना ही नियति थी, क्योंकि वह उस की अपनी ही जलाई आग थी, जिस में वह जली थी. किस से कहती, क्या कहती? वही तो वहां खुद गई थी. विरोध करती पर क्यों नहीं कर पाई? उस प्रसाद में ऐसा क्या था? वह इस सवाल का उत्तर बरसों तलाश करती रही. पर उस दिन सुलभा ने ही बताया था कि मां, मुंबई की पार्टियों में कोल्डड्रिंक्स में ऐसा कुछ मिला देते हैं कि लड़कियां अपना होश खो देती हैं. वे बरबाद हो जाती हैं. मेरी कुछ सहेलियों के साथ भी ऐसा हुआ है. ये ‘वेव पार्टियां’ कहलाती हैं, तब वह चौंक गई थी. क्या उस के साथ भी ऐसा ही हुआ था? वह सोचने लगी कि कभीकभी वर्षा ऋतु न हो तो भी अचानक बादल कहीं से आ जाते हैं. वे गरजते और बरसते हैं, तो क्यारी में बोया बीज उगने लगता है.

फिर सब कुछ यथावत रहा. सुभाष भी जल्दी ही लौट आया. उसे आने के बाद सूचना मिली कि वह पिता बनने वाला है तो वह बहुत खुश हुआ और शालिनी को अस्पताल ले गया. लोगों ने उसे समझाया कि शुरू से ही केयरिंग रहे तो जच्चाबच्चा ठीक रहते हैं, पर शालिनी भीतर से ही सहम गई थी. जब भी सुभाष उसे अंतरंग क्षणों में प्यार में बांधता उस का चेहरा पथरा सा जाता.

‘‘यह क्या हो जाता है, यार तुम्हें?’’ वह चौंक जाता. पर शालिनी जानती थी, कहीं कुछ है, जो भीतर से उसे सालता है.

फिर कभी वह सत्संग आश्रम नहीं गई. सुभाष बारबार कहता कि वहां अच्छे प्रवचन होते हैं, तुम भी चला करो. पर वह यह कह कर मना कर देती कि घर में बहुत काम है, नहीं जाना.

आज जब बेटी सुलभा ने कहा कि मैं तो शाम तक आऊंगी, पास में ही सत्संग आश्रम है, अच्छा पुस्तकालय भी है आप उधर हो आना, तो वह भी दोपहर में तैयार हो कर उधर आ गई.

घने वृक्षों के बीच वह आश्रम था. उस के भव्य भवन के दाहिनी ओर संत महात्माओं की मूर्तियां लगी हुई थीं ओर बायीं तरफ कार्यालय था. भीतर जाते ही बड़े से आंगन में यह भवन खुलता था. सामने बरामदे से अंदर कक्ष में कृष्ण की विशालकाय प्रतिमा थी, जहां भक्तगण नृत्य कर रहे थे. भोग लग चुका था, शयन की तैयारी थी, शाम को फिर दर्शन के लिए खुलना था.

तभी उस की निगाहें सामने लगे बोर्ड पर गईं. उस में विशाल सत्संग होने की सूचना थी. पूछने पर पता चला कि स्वामीजी महाराज संध्या को ही प्रवचन देते हैं. उस ने काउंटर पर बात की तो पता लगा कि सुनने के लिए पहले अनुमति लेनी पड़ती है.

‘‘क्या आप यहां की नहीं हैं?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्या आप हमारे मिशन की कार्यकर्ता हैं?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो फिर आप फौर्म भर दीजिए. जब आप का नंबर आएगा, आप को सूचित कर देंगे. यहां हौल में श्रोताओं के लिए सीटें सीमित हैं. हौल फुल हो चुका है.’’

‘‘ठीक है,’’ वह लौटने लगी.

‘‘रुकिए,’’ भीतर से एक महिला ने आते हुए कहा.

‘‘आप बाहर से आई हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘कितने लोग हैं?’’

‘‘हम 2 हैं, मैं और मेरी बेटी.’’

‘‘ठीक है.’’

‘‘आप को हौल के अंत की लाइन में जगह मिल जाएगी. स्वामीजी पहले तो खुले में बोलते थे, जहां हजारों लोग आते थे, परअब तो हौल में ही बोलते हैं. आप का कोई प्रश्न हो तो लिख कर दे दें.’’

‘‘नहीं, कोई प्रश्न नहीं है.’’

वह चुपचाप अपने गैस्ट हाउस लौट आई. शाम को उस ने पहली बार सुलभा को भी

अपने साथ सत्संग भवन चलने को कहा.

‘‘मां, आप हो आईं?’’ वह चौंकी.

‘‘हां, तुम भी चलो, वहां प्रवचन है.’’

‘‘पर वहां तो जगह नहीं मिलती है.’’

‘‘मिल गई है, 2 सीटें मिल गई हैं, चलो.’’

मांबेटी वहां पहुंचे तो शालिनी ने देखा कि वहां पर उमाशंकरजी ही थे. वे मीरा के प्रेम पर प्रवचन दे रहे थे और उन्हें भक्तों का समूह मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहा था. उन का शरीर अब और भी भर गया था पर आंखें उसी तरह चमक रही थीं. हां, सिर के बाल कुछ झड़ गए थे. मूछें भी सफेद हो आई थीं.

प्रवचन समाप्त हो गया तो प्रश्नोत्तर भी हुआ.

‘‘चल मिल लेते हैं,’’ शालिनी ने सुलभा से कहा.

‘‘मां, भीड़ बहुत है.’’

‘‘तो क्या हुआ, चल.’’

‘‘आप कहां चलीं?’’ उन के मंच के पास पहुंचने पर कार्यकर्ताओं ने टोका. जो लोग आगे बैठे थे, उन के पास सुनहरा बड़ा सा बैज था, पर इन के पास वह नहीं था.

‘‘दर्शन करने.’’

‘‘पर आप…?’’

‘‘हटिए,’’ कह कर शालिनी, सुलभा का हाथ पकड़े हुए मंच पर पहुंच गई.

‘‘बेटी, प्रणाम करो,’’ उस ने भी प्रणाम करते हुए कहा.

उमाशंकरजी के चेहरे पर न जाने कितने व्यूह बनेबिगड़े. उन्होंने आंखें बंद कर लीं, मानो गहरे ध्यान में चले गए हों. भीतर हलचल मची थी, मानो तूफान आ गया हो. हलचल को शांत करते हुए चुप रहे.

‘‘स्वामीजी, मैं शालिनी हूं.’’

उमाशंकरजी ने उसे देखा. वर्षों बाद भी उन्होंने उस के साथ जो कुछ किया था उसे भूल जाना क्या मुमकिन था?

‘‘स्वामीजी, यह मेरी बेटी सुलभा है. इस ने यहीं से आईआईटी किया है और यहीं इस की नौकरी लगी है.’’

‘‘हूं,’’ कह कर उमाशंकरजी ने सुलभा की ओर देखा फिर उस के सिर पर हाथ रखा.

‘‘अभी नौकरी करोगी या आगे पढ़ोगी?’’

‘‘आगे पढ़ना तो चाहती हूं. न्यूयार्क में दाखिला भी हो गया है. वहां से एमबीए करने का इरादा है,’’ शालिनी ने कहा.

‘‘आप लोग कहां ठहरे हैं?’’

‘‘हम पास में ही सीएमजी का जो गैस्ट हाउस है, उस में फर्स्ट फ्लोर पर रूम नं. 101 में हैं.’’

‘‘अरे वह तो सुधांशुजी की बिल्डिंग है.’’

शालिनी चुप रही.

‘‘तुम ने यहीं से आईआईटी किया लेकिन तुम पहले इधर कभी नहीं आईं,’’ वे सुलभा से बोले.

‘‘नहीं, मां किसी सत्संग में नहीं जातीं, न जाने देती हैं. कहती हैं कि एक बार जाना हुआ था. वहां न धर्म था, न अध्यात्म. बस पाखंड ही पाखंड था. मैं ने ही सुबह इन से कहा था कि पास में ही सत्संग आश्रम है, अकेलापन लगे तो वहां हो आना.’’

‘‘हूं,’’ कह कर उमाशंकरजी ने देखा कि शालिनी की आंखों में कोई भाव नहीं था.

पता नहीं क्या चाहती है यह? पता नहीं क्यों आई है यहां? झील में अचानक पड़े पत्थर से उठी लहरों सा उमाशंकरजी का मन अशांत हो गया. कहीं यह डीएनए टैस्ट न करवा दे? आंखें कितनी जल रही हैं. यह चुप ही रहे तो ठीक है.

शालिनी की आंखें, उन के चेहरे पर कील की तरह चुभ रही थीं.

‘‘तो तुम न्यूयार्क नहीं जा रही हो?’’ उन्होंने सुलभा से पूछा.

‘‘नहीं, बैंक लोन तो मिल जाएगा, पर आगे मुश्किल है. सालदो साल रहने का खर्चा है. पापा तो कोशिश कर रहे हैं, पर…?’’

‘‘पर क्या, जाओ. जब इतनी लायक हो तो पढ़ो. तुम्हारी सब व्यवस्था आश्रम कर देगा. वहां ठहरने की, रहने की, सब. न्यूयार्क में भी हमारे भक्त हैं. पटेलजी का न्यू जर्सी में फ्लैट खाली रहता है. न्यू जर्सी पास ही है. वहां से ट्रेन जाती है. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. फ्लाइट तो बौंबे से ही होगी. तैयारी कर लो, वीजा ले आओ.’’

‘‘वाह, गुरुजी की कृपा हो तो ऐसी हो,’’ पास खड़े भक्तजन भावविभोर हो कर बोले.

गुरुजी पुन: ध्यान में चले गए थे. उन से अब बाहर देखा नहीं जा रहा था.

शालिनी ने सुलभा के कंधे पर हाथ रखा. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ घट गया है. वह जानती थी, जिस का जो फर्ज है, वह उसे निभाना ही पड़ता है. पर उस की गलती, क्या वह कभी अपने को माफ कर पाएगी? यह तो उसे चुप रहने का पुरस्कार मिला है. इस पाखंडी ने कितनों को बरबाद किया होगा, किसे पता? आत्मापरमात्मा के नाम से सैकड़ों साल से यही हो रहा है. उसे पति की याद आई, जो इन पाखंडियों से कितना बेहतर है, पर समाज उन के पीछे पागल है. वह जितनी चुप हो गई थी, सुलभा उतनी ही चपल. अमेरिका की बात पर उस का मोबाइल तो बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था. उधर सामने फुटपाथ पर अखबार कह रहा था कि वित्तमंत्री ने कहा है कि विकास की दर 10% हम पा कर ही रहेंगे. शालिनी अपनेआप से बारबार पूछ रही थी कि मेरे लिए क्या यही विकास का रास्ता बचा है?