बात उन दिनों की है जब मैं प्रोमोशन और ट्रांसफर पर पंजाब के नंगल शहर से चंडीगढ़ पहुंचा था. कंपनी ने मेरे लिए सैक्टर 8 में एक अच्छे मकान की व्यवस्था कर दी थी. मकान में कारपेट ग्रास का लौन था, खूबसूरत फूलों की क्यारियां थीं. नए मकान में पहुंचने पर सामने की कोठी से लगभग 30 वर्ष की महिला किरण मुझ से मिलने आई, ‘‘मुझे जब से पता चला था कि इस मकान में आप रहने आ रहे हैं तो आप से मिलने की बहुत उत्सुकता थी. आप का इस शहर में स्वागत है. मैं सामने वाली कोठी में अपने पति और 1 छोटी बच्ची राखी के साथ रहती हूं.’’ मैं खुश था कि कोई साथ तो मिला. मेरी पत्नी वीना गर्भवती होने के कारण अपने मायके नंगल में ही रुक गई थी.

मैं ने किरण को बताया, ‘‘मेरी पत्नी अभी नंगल में ही है. डिलिवरी के बाद चंडीगढ़ ले आऊंगा.’’ किरण थर्मस में चाय ले कर आई थी. चाय को 2 कपों में डालते हुए बोली, ‘‘आशा है आप को चाय पसंद आएगी. मैं चाय अच्छी बना लेती हूं. मेरे पति उमेश को मेरे हाथों की बनी चाय बहुत अच्छी लगती है,’’ यह कहते हुए वह जिस सोफे पर मैं बैठा था उसी पर मेरे पास बैठ गई, ‘‘कांतजी, मैं ने आप का नाम बाहर लगी नेमप्लेट पर पढ़ लिया है. बहुत सुंदर नाम है आप का. मैं औपचारिकता में बिलकुल यकीन नहीं रखती हूं, इसीलिए बिना किसी हिचकिचाहट के आप के साथ बैठ गई हूं. इस से अपनेपन का एहसास होता है. हम साथसाथ चाय पीते हैं और एकदूसरे के साथ जानपहचान बनाते हैं.’’

‘‘थैंक्यू. मुझे भी आप का इस बेबाक तरीके से आना अच्छा लगा. वीना भी आप से मिल कर बहुत खुश होगी,’’ मैं ने किरण की ओर निहारते हुए कहा. किरण जाने से पहले मुझे अपने घर आने का निमंत्रण दे गई, ‘‘कल रविवार है. उमेश घर पर ही होंगे. कल लंच हमारे साथ ही करिएगा.’’ मैं ने हामी भर दी. मुझे अपनी पत्नी की गैरमौजूदगी खल रही थी. इसलिए किरण के परिवार से मेलजोल ने सोने में सुहागा का काम किया. किरण भी मेरी मौजूदगी में बेहद खुश रहती थी.  दूसरे दिन लंच पर मेरा उमेश से परिचय हुआ. सीधे, सरल और मिलनसार स्वभाव के उमेश शीघ्र ही मेरे घनिष्ठ मित्र बन गए. उन के घर मैं उन की गैरमौजूदगी में भी आताजाता रहता. उन्हें इस बात पर कोई एतराज नहीं था. उन्हें मालूम था किरण ऐसी है ही. किरण अपने चंचल स्वभाव से किसी को भी खासकर अपने हमउम्र पुरुषों को आकर्षित कर लेती थी. सजनेसंवरने में वह काफी समय बिताती थी और परपुरुषों के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर उसे बहुत अच्छा लगता था. इस विषय में उमेश रूखे थे. तभी तो किरण के इतना सजनेसंवरने के बावजूद कभी उन के मुंह से उस के लिए तारीफ के शब्द नहीं निकल पाते थे. किरण को यह बहुत खलता था.

मैं ने किरण की इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाया. जब भी वह शृंगार कर मेरे सामने आती मेरे मुंह से यह वाक्य अनायास ही फूट पड़ता, ‘‘बहुत सुंदर लग रही हो.’’

खुश हो कर वह थैंक्यू कहती, ‘‘बस, कांतजी ऐसे ही तारीफ करते रहना.’’ जब भी वह मेरे घर आती नई साड़ी में सजीसंवरी होती. उस के पास हर रंग की साडि़यां थीं. हर बार वह अच्छा पोज देती और मैं मुसकराते हुए मोबाइल में उस के विलक्षण रूप को कैद कर लेता. उस ने मुझ से वादा लिया था कि जब कई सारे फोटो शूट हो जाएं तो मैं उन सब की 1-1 कौपी उसे भेंट कर दूं. मैं ने मुसकरा कर हामी भर दी थी.

एक दिन किरण ने मांग की, ‘‘कांतजी, अपनी पत्नी वीना का फोटो दिखाएंगे?’’

मैं ने अपने मोबाइल पर वीना का फोटो दिखाया तो बोली, ‘‘हां, सुंदर है,’’ फिर कुछ क्षण रुक कर बोली, ‘‘लेकिन मुझ से थोड़ी कम.’’ मैं ने यह मानते हुए कहा, ‘‘हां, वह सीधी और सरल है. शृंगार तो बहुत कम करती है,’’ मैं ने नोट किया कि इस बात पर वह बहुत खुश हुई. मेरी कोठी में रामलाल नामक नौकर काम करता था. अकसर किरण दिन के समय मेरे घर आ कर रामलाल से सफाई का काम करवा देती थी. दिन का खाना मैं औफिस में ही खाता था. रामलाल द्वारा रात का खाना तैयार होने के बावजूद कई बार किरण अपने घर से खाना भिजवा देती थी. किरण ने अपने बेटी राखी के लिए आया रखी थी. मैं जब भी शाम के समय उस के घर फोन कर के जाता था वह आया को बाजार कुछ खरीदने के लिए भेज चुकी होती थी. उस का कहना था हम दोनों की प्राइवेसी बनी रहे तो अच्छा होगा. वैसे भी उमेश का मार्केट में कपड़ों का शोरूम था. वे सवेरे 9 बजे जा कर रात 8 बजे के बाद ही लौटते थे. मेरा किरण से मिलनाजुलना और काफी समय साथ बिताना आसान होता चला गया. जब भी मैं उस के घर पहुंचता वह मुख्यद्वार पर इंतजार करती मिलती. मेरे पहुंचते ही कभी वह मुझे ‘हग’ कर के प्यार करती तो कभी मैं उसे प्यार करने की पहल करता. संबंध प्रगाढ़ होने के बावजूद हम दोनों ने ही कभी मर्यादा के बाहर जा कर दैहिक संबंध बनाने की चेष्टा नहीं की. इस बात को शायद किरण ने भी भविष्य की संभावनाओं के लिए स्थगित कर रखा था. मेरी ओर से इस बात की उत्सुकता अवश्य थी, क्योंकि वीना की डिलिवरी में अभी समय बाकी था. पति द्वारा नजरअंदाज होने के कारण किरण मुझ से मित्रता बढ़ाने में जोरशोर से लगी थी. जब भी उसे कोई बहाना मेरे घर आने का मिलता था तो उसे कतई छोड़ती नहीं थी. वैसे भी मेरी सेवा के द्वारा मुझे लुभाने का प्रयत्न उस की ओर से जारी था.

मुझे अपनी कंपनी के कार की सुविधा प्राप्त थी. किरण के पति उमेश के पास बाइक थी. एक बार जब कार इस्तेमाल करने के लिए किरण ने अनुरोध किया तो मैं ने उसे साफ शब्दों में समझाया, ‘‘देखो मेरी अच्छी किरण मेरी बात को अन्यथा मत लेना. मैं अपनी औफिस की कार तुम्हें अकेले कहीं जाने के लिए नहीं दे पाऊंगा. हां, कभी जरूरी हुआ तो मैं तुम्हें कार में अपने साथ ले जाऊंगा.’’ वह शीघ्र ही मेरी बात समझ गई थी. दोबारा कभी उस ने कार के लिए अनुरोध नहीं किया. एक दिन शाम के समय जब मैं औफिस से लौटा तो मैं ने देखा ड्राइंगरूम में सैंट्रल टेबल  पर एक गुलदस्ता रखा था. रामलाल से पूछने पर उस ने बताया कि किरण मेम साहब रख गई हैं. कह रही थीं साहब को अच्छा लगेगा. उन्हें बता देना कि मैं आई थी. मैं ने मोबाइल पर किरण को धन्यवाद कहा तो वह बोली, ‘‘कांतजी, जिस दिन आप गुलदस्ता उस टेबल पर रखा देखो समझ लेना मेरी तरफ से संकेत है कि उमेशजी को घर लौटने में देर लगेगी. आप बेफिक्र मेरे पास आ सकते हो.’’ थोड़ी देर में ही मैं किरण के पास पहुंच गया. हलके आसमानी रंग की साड़ी में वह बहुत सुंदर लग रही थी. खुली बांहों में भर कर स्वागत करते हुए मेरा हाथ पकड़ कर ड्राइंगरूम में सोफे तक ले गई, ‘‘कांत, मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि जब से तुम से मित्रता हुई है मेरी खुशी कितनी बढ़ गई है.’’

‘‘तुम बहुत ब्यूटीफुल लग रही हो. लगता है आज तुम ने मेकअप में बहुत समय लगाया है. अगर मेकअप न भी करो तो भी तुम सुंदर लगती हो.’’

‘‘तारीफ करने की कला तो कोई तुम से सीखे. तुम तारीफ करते हुए बहुत अच्छे लगते हो. बैठो जब तक मैं चाय बना कर लाती हूं तुम टीवी पर कोई मनपसंद चैनल लगा लो,’’ कहते हुए उस ने रिमोट मुझे पकड़ा दिया. थोड़ी देर में वह ट्रे में 2 कप चाय और प्लेट में बिसकुट ले आई. फिर मेरे पास बैठ गई, ‘‘कांतजी, अब मैं आप को बता रही हूं कि उमेशजी दुकान के लिए माल लेने दिल्ली गए हैं. कल लौटेंगे. हमारे पास मौजमस्ती के लिए पर्याप्त समय है. जी भर कर मेरे पास रहिए और जो मन में इच्छा हो उसे पूरी कर लीजिए. मैं पूरा सहयोग दूंगी. मैं सच्चे दिल से आप से प्यार करती हूं’’

‘‘मैं आज सीरियस मूड में हूं और तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं. मैं शादीशुदा हूं. वीना मुझे बहुत प्यार करती है. और मैं नहीं चाहूंगा कि उमेश की गैरमौजूदगी का मैं फायदा उठाऊं. वे मेरे अच्छे दोस्त हैं. यह तो तुम्हारे प्यार का रिस्पौंस था जो मैं मित्रता की हद से बाहर तुम्हें कभीकभी ‘हग’ कर लेता था या तुम्हें ‘हग’  करने देता था. मेरी तुम्हें सलाह है, अब हमें खुद पर नियंत्रण लगा लेना चाहिए…’’

इस से पहले कि मैं अपनी बात पूरी कर पाती उलटे उस ने ही मुझे समझाना शुरू कर दिया, ‘‘कांतजी, बी प्रैक्टिकल. मैं आप और आप की पत्नी के बीच में आए बगैर भी तो प्यार कर सकती हूं. यदि हमारा संबंध गुप्त रहे तो हरज क्या है?’’ कहने को वह यह सब कह तो गई, फिर कुछ सोच कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप मुझ से उम्र में काफी बड़े हो. मुझे अभी तक इस तरह समझाने वाला कोई नहीं मिला है. आप से मित्रता और प्यार मेरी जरूरत है. पत्नी का फर्ज मैं उमेशजी के साथ पूरी ईमानदारी से निभा रही हूं और निभाती रहूंगी, लेकिन उन से प्यार कभी नहीं हो पाया है. वे सीधेसरल अवश्य हैं, लेकिन प्यार करने के लिए न तो उन के पास समय है और न ही उन की सोच में प्यार का कोई महत्त्व है. सुखसुविधाओं के अलावा एक स्त्री को शारीरिक सुख की भी चाह होती है,’’ कहती हुई वह भावुक हो गई. आंखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली.

मैं ने उसे गले लगा कर पीठ थपथपाते हुए आश्वासन दिया, ‘‘मेरी मित्रता और प्यार जितना संभव होगा बना रहेगा.’’ वीना की डिलिवरी के समय मैं 1 सप्ताह की छुट्टी ले कर उस के मायके पहुंच गया. उस ने एक प्यारी सी गुडि़या को जन्म दिया. चंडीगढ़ लौट कर पुन: मैं अपने कामकाज में व्यस्त हो गया. किरण और मेरा एकदूसरे के घर आनाजाना पहले जैसा ही था. लगभग डेढ़ माह बाद वीना को उस का भाई चंडीगढ़ मेरे पास छोड़ गया. अभी वीना को देखभाल की जरूरत थी. किरण दिन के समय वीना के पास आ जाती थी और हर काम में उस की मदद करती थी. वीना को भी किरण बहुत अच्छी लगी, तो दोनों जल्दी ही पक्की सहेलियां बन गईं. किरण ने उसे बताया कि उस की शादी 20 की होतेहोते ही हो गई थी. पुरुषों के साथ संबंध में उसे कोई अनुभव नहीं था. उस ने वीना से मेरे बारे में बेबाक तरीके से कहा, ‘‘मुझे कांतजी बहुत अच्छे लगते हैं. कुदरत ने तुम्हारी जोड़ी बहुत अच्छी बनाई है. तुम सुंदर और सरल हो. वे भी प्यार पाने और देने के लिए जल्द ही लोगों की ओर आकर्षित हो जाते हैं…एक बात बताऊं वीना भाभी…कांत का दिल बहुत सहानुभूति और दूसरों की कद्र करने वाला है.’’

वीना ने संक्षेप में बस इतना ही कहा, ‘‘मेरे कर्म अच्छे थे जो वे मुझे मेरे जीवनसाथी के रूप में मिले.’’ वीना के साथ परिचय होने के बाद हम दोनों मित्र परिवारों में मिठाई और उपहारों के आदानप्रदान का सिलसिला शुरू हो चुका था. बर्थडे और शादी की सालगिरह हम दोनों परिवार एकसाथ एक उत्सव की भांति मनाते थे. कभी किरण हमारे घर आ कर किचन में वीना की खाना बनाने में सहायता करती तो कभी घर के सामान की झाड़पोंछ में उस की मदद करती. वह चाहती थी घर के कामकाज का बोझ वीना पर न पड़े. डिलिवरी के बाद धीरेधीरे वीना का स्वास्थ्य बेहतर होता जा रहा था. इस विषय में वह किरण की तारीफ उमेश के सामने करने से नहीं चूकती थी. एक दिन उमेश बोले, ‘‘किरण है ही ऐसी. सब की मदद करने में उसे बहुत खुशी मिलती है. हमेशा मुसकरा कर मदद करने का एहसान भी नहीं जताती है.’’ पहली बार उमेश के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर किरण की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने मुझ से कहा, ‘‘आज पहली बार उमेशजी ने मेरी तारीफ में कुछ शब्द कहे हैं, तो पार्टी तो बनती ही है. आज शाम की चाय हम लोग मेरे घर पर पीएंगे,’’ मैं मान गया.

एक दिन शाम के समय जब मैं औफिस से घर लौटा तो देखा ड्राइंगरूम में टेबल पर गुलदस्ता रखा था. वीना ने बताया, ‘‘किरण यह गुलदस्ता लाई थी. कह रही थी उस का मन मेरे साथ चाय पीने का था. अभी 1 घंटा पहले ही अपने घर गई है.’’ मैं किरण की सांकेतिक भाषा समझ गया. किरण मुझ से अपने घर में मिलना चाहती है. वीना के साथ चाय पीने के बाद मैं ने वीना से कहा, ‘‘मैं औफिस के काम से 1 घंटे के लिए बाहर जा रहा हूं. 7 बजे तक आऊंगा.’’  मैं किरण के घर पहुंचा तो देखा वह मुख्यद्वार पर मेरा इंतजार कर रही थी. बड़ी बेसब्री के साथ मुझे बांहों में भर कर मेरा स्वागत किया. फिर मुसकराते हुए शरारती लहजे में बोली, ‘‘कांतजी, मैं ने आज बहुत दिनों बाद तुम्हें घर बुला ही लिया. उमेश किसी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं. हमें एकांत में बिताने के लिए पर्याप्त समय मिला है. बैठो मैं कुछ बना कर लाती हूं फिर ढेर सारी बातें करेंगे, प्यार भी…’’ मैं गुमसुम बैठा था. मन में विचार था कहीं वीना के प्रति नाइंसाफी तो नहीं है, जो चोरीछिपे मैं किरण से मिलने आया हूं. फिर सोचा जब मैं कुछ गलत नहीं कर रहा हूं तो पछतावा कैसा? बेशक हम दोनों एकांत में हैं, लेकिन आज हम रोमांस का कोई कृत्य नहीं करेंगे. मैं इन खयालों में खोया था कि पता ही नहीं चला कि कब वह मेरा हाथ पकड़ कर अपने बैडरूम में ले गई. बैड पर मुझे बैठाते हुए बडे़ प्यार भरे शब्दों में बोली, ‘‘आज तुम्हें मेरे साथ सोने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए.’’ मैं किंकर्तव्यविमूढ़ बिस्तर पर लेटा शून्य में देख रहा था. तभी किरण के मोबाइल पर फोन आया. उस ने अपने होंठों पर उंगली रख कर मुझे चुप रहने का इशारा किया, ‘‘वीना भाभी का फोन है.’’

‘‘किरण, कांत किसी काम से बाहर गए हैं. मैं उन की गैरमौजूदगी में बोर हो रही थी, इसलिए तुम से बात करने का मन किया,’’ वीना ने कहा.

जवाब में किरण बोली, ‘‘उमेशजी बाहर गए हुए हैं. मैं बस रात का खाना बनाने में व्यस्त थी.’’

‘‘ऐसा करो रात का खाना हमारे यहां ही खा लेना. कांत भी 8 बजे तक लौट आएंगे. थोड़ी गपशप भी हो जाएगी.’’

किरण खुश थी कि थोड़ा और वक्त कांत के साथ बिताने को मिल जाएगा. अत: उस ने हामी भर दी. किरण और मेरे नजरिए में आधारभूत फर्क यह था कि उसे प्यार के साथ दैहिक आनंद की तलाश थी जबकि मैं मन के मिलन का सुख चाहता था. वीना के साथ वैवाहिक सुख अपनी चरम सीमा तक मुझे उपलब्ध हो चुका था. वीना की बेपनाह मुहब्बत के चलते मेरे मन में यह विचार प्रबल हो रहा था कि मुझे किरण के दिल को कोई चोट नहीं पहुंचानी है. थोड़ा प्यार उसे भी दे दूं और वीना के प्रति ईमानदारी भी रहूं. इस में वीना का भी हित है, क्योंकि किरण वीना को बहुत चाहती. मेरे प्यार द्वारा किरण जितनी खुश होगी उतना ही वीना और किरण का संबंध गहरा होगा. अपने इस विचार पर क्षण भर को मुझे हंसी भी आई. एक दिन औफिस से घर आ कर मैं ने अनायास वीना को अपने बाहुपाश में ले कर चूम लिया. वीना के लिए यह अप्रत्याशित था. बोली, ‘‘क्या बात है, आज बहुत प्यार आ रहा है?’’

‘‘तुम ने फोन पर बताया था आज किरण तुम्हारे साथ काफी समय बिता कर शाम को गई है. तुम बहुत खुश दिखाई दे रही हो… मेरी पसंद की साड़ी पहन रखी है. मेकअप भी अच्छा किया है. तुम्हें इतना सुंदर देख कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही हर शाम को सजीसंवरी और प्रसन्न मूड में मिला करो,’’ मैं ने अपने बाहुपाश से उसे मुक्त करते हुए कहा. वीना भी बहुत खुश दिखाई दे रही थी. बोली, ‘‘इतनी तैयारी इसलिए की है कि आज हमारी शादी की सालगिरह है. शायद तुम भूल गए हो. मार्केट जा कर हम दोनों एकदूसरे के लिए गिफ्ट खरीदेंगे. वहीं चायकौफी भी पी लेंगे.’’

‘‘नहीं, मैं भूला नहीं था. मैं ने भी सोच रखा था कि कुछ ऐसा ही करेंगे. मार्केट जा कर कुछ सामान सैलिब्रेट करने के लिए ले आएंगे. किरण को फोन कर लो. अगर वह भी साथ चलना चाहे तो उसे भी साथ ले लेते हैं,’’ मैं ने कहा तो वीना ने तुरंत किरण को फोन कर दिया. तीनों ने रात का भोजन साथ बाहर कर के सालगिरह सैलिब्रेट की. अगले रविवार वीना ने डिनर पर उमेश और किरण को आमंत्रित करते हुए उमेशजी से फोन पर कहा, ‘‘उमेशजी, शादी की सालगिरह वाले दिन हम लोगों ने आप को बहुत मिस किया. वह कमी पूरी करने के लिए आज रात आप किरण के साथ हमारे घर डिनर के लिए आएंगे. हां, कोई गिफ्ट लाने की जरूरत नहीं है. किरण गिफ्ट दे चुकी है.’’ शाम को उमेशजी और किरण जल्दी ही मेरे घर पहुंच गए. पहले की तरह किरण मजैंटा साड़ी में पूरे मेकअप के साथ प्रसन्न मुद्रा में थी. वीना के सामने मैं ने उस की तारीफ करना उचित नहीं समझा. फिर भी किरण ने पूछ ही लिया, ‘‘मैं कैसी लग रही हूं इस साड़ी में?’’ मन नहीं था फिर भी दबे स्वर में मैं ने कहा, ‘‘अच्छी लग रही हो.’’

मेरे कुतूहल की सीमा नहीं थी जब दफ्तर से आने पर मैं ने वीना को एक सुंदर साड़ी में पूरे शृंगार के साथ देखा. इस विषय में मैं ने फिलहाल चुप रहना ही बेहतर समझा. उमेश और किरण के घर पहुंचने पर वीना ने कहा, ‘‘उमेशजी, आज का विशेष शृंगार मैं ने आप के लिए किया है, आशा है आप को मैं सुंदर लग रही हूं. बताइए न… मैं चाहती हूं दो शब्द आप मेरी तारीफ में कहें.’’ उमेशजी को यह सब अजीब लग रहा था. मगर वीना के अनुरोध को अनसुना करना भी ठीक न था. अत: बोले, ‘‘भाभी आप बिना मेकअप किए भी और मेकअप किए भी बहुत सुंदर लगती हैं.’’

‘‘बस यही तारीफ आप किरण की भी करने की आदत डाल लीजिए,’’ कह कर उस ने उमेश का हाथ पकड़ लिया और किचन की तरफ ले जाते हुए कहा, ‘‘देवरजी, मैं ने आप के लिए खीर बनाई है. आइए, उस का स्वाद चखाती हूं.’’ किरण और मैं मौन और आश्चर्यचकित हो यह देखते रहे. जब दोनों किचन से वापस आए तो सब ने एकसाथ खाना खाया. चलते समय वीना ने उमेश से बहुत आदर के साथ कहा, ‘‘उमेशजी, स्त्री प्यार की भूखी होती है. उसे प्यार की अभिव्यक्ति होने पर बहुत सुख मिलता है. व्यापार की समृद्धि अपनी जगह और पत्नीपरिवार का सुख अपनी जगह. मेरा कहना मानो आज से किरण की तारीफ करने की आदत डाल लो. आखिर कब तक कांतजी किरण की तारीफ करते रहेंगे. यह काम तो अब आप को ही करना होगा.’’