गृहशोभा विशेष

अब तक आप ने पढ़ा

पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाली संगीता पृथ्वीराज नाम के एक काल्पनिक चरित्र को ले कर खोई रहती थी. उस की इस हरकत से उस की सहेलियां भी परेशान रहा करती थीं. संगीता अपने नाम को बदल कर संयोगिता रखना चाहती थी. एक बार वह दौड़तीहांफती कालेज से लौटी और अपनी सहेलियों से उस काल्पनिक पृथ्वीराज के हकीकत में मिलने का दावा करने लगी.

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‘‘आजक्या हुआ मालूम है?’’ उस दिन घर लौटते ही संगीता का उत्साह छलक पड़ा.

‘‘क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘पृथ्वी अचानक ही कहने लगा कि तुम्हारा नाम संयोगिता होना चाहिए था. क्या जोड़ी बनती हमारी.’’

‘‘अच्छा? फिर तूने क्या कहा?’’

‘‘मैं क्या कहती? मेरे मन की बात उस की जबान पर? मैं तो दंग रह गई. सच मन को मन से राह होती है. फिर तो मैं ने उसे सब कुछ विस्तार से बताया कि मैं अपना नाम बदल कर संयोगिता रखना चाहती थी पर पापा नहीं माने. वह मेरी बात तुरंत समझ गया. कहने लगा कि वह आगे से मुझे संयोगिता ही बुलाएगा. फिर मैं ने भी कह दिया कि मेरा भी एक सपना है कि मेरा पृथ्वीराज मुझे इतिहास वाले पृथ्वीराज की तरह घोड़े पर उठा कर ले जाए और सब देखते रह जाएं.’’

‘‘हाय, फिर क्या बोला वह?’’ सपना अपनी स्वप्निल आंखों को नचाते हुए बोली.

‘‘एक क्षण को तो वह चुप रह गया. फिर बोला कि उसे तो घुड़सवारी आती ही नहीं. पर मेरे लिए वह कुछ भी करेगा. वह घुड़सवारी भी सीखेगा और मुझे उठा कर भी ले जाएगा. लोग तो प्यार में आकाश से तारे तक तोड़ लाने तक की बात करते हैं. वह क्या इतना भी नहीं कर सकता?’’

अगले दिन संगीता ने हमें पृथ्वीराज से मिलवाया. उस का सुदर्शन व्यक्तित्व देख कर हम तीनों ठगे से रह गए.

‘‘तो आप तीनों हैं संगीता की अंतरंग सहेलियां. आप तीनों के बारे में संगीता ने इतना कुछ बताया है कि मैं बिना किसी परिचय के भी आप तीनों को पहचान लेता,’’ उस ने हमें हमारे नामों से बुला कर हैरान कर दिया.

‘‘इस में खूबी मेरी नहीं संगीता की है. उस ने जिस तरह मुझे आप के नामों से परिचित कराया उस में भ्रमित होने का कोई अवसर ही नहीं था,’’ उस ने हंसते हुए कहा. पता नहीं उस के व्यक्तित्व में कैसा आकर्षण था कि हमें लगा ही नहीं कि हम उस से पहली बार मिले.

‘‘संगीता को बचपन से ही पृथ्वीराज से बहुत लगाव रहा है. अच्छा हुआ जो उसे आप मिल गए.’’

‘‘जी हां, बताया था उस ने. वह तो अपना नाम भी बदल कर संयोगिता रखना चाहती थी पर सफल नहीं हुई. मैं ने उसे समझाया कि मेरे लिए तो संयोगिता ही रहेगी. वह इतने से ही प्रसन्न हो गई.’’

‘‘आप तो उस के लिए घुड़सवारी भी सीख रहे हैं. हम ने तो दांतों तले उंगली दबा ली,’’ सपना ने उस की प्रशंसा की.

‘‘मैं तो बस प्रयास कर रहा हूं. पर काम मुश्किल है. सच तो यह है कि मुझे घोड़ों से बहुत डर लगता है.’’

‘‘दाद देनी ही पड़ेगी कि संगीता की पसंद की जो आप उस के लिए इतना कठिन कार्य भी करने को तैयार हो गए,’’ सपना अपनी स्वप्निल आंखों को दूर कहीं टिकाते हुए बोली.

‘‘मैं भी कम खुश नहीं हूं जो मेरी भेंट संगीता से हो गई,’’ अपने मनभावन को खोजतेखोजते पृथ्वीराज भी सिर से पांव तक संगीतामय हुआ प्रतीत हुआ हमें.

हम कौफीहाउस में साथ कौफी पी कर लौट आए. पर संगीता और पृथ्वीराज एकदूसरे की आंखों में आंखें डाले वहीं बैठे रहे.

घर में मम्मी हमारी प्रतीक्षा कर रही थीं, ‘‘कहां थीं तुम तीनों? मैं कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूं? यह समय है घर लौटने का? और संगीता कहां रह गई? मुझे तो तुम लोगों के लक्षण कुछ ठीक नहीं लग रहे?’’

‘‘आ जाएगी अभी. आज उस की ऐक्स्ट्रा क्लास है. कुछ कह रही थी न वह आज सुबह?’’ मैं ने सपना और नीरजा से प्रश्न करने का दिखावा किया.

‘‘आप पार्क में घूम आइए न. तब तक संगीता भी आ जाएगी,’’ मैं ने मां के गले में बांहें डाल कर उन्हें शांत करना चाहा.

‘‘तू नहीं समझेगी. बेटियों की जिम्मेदारी कंधों पर हो तो पार्क में मन लगेगा? मेरा काम केवल तुम्हारे खानेपीने का प्रबंध करना ही नहीं है, बल्कि तुम्हारी गतिविधियों पर नजर रखना भी है,’’ मां को इतना गंभीर मैं ने पहले कभी नहीं देखा था.

‘‘ठीक कहा आप ने आंटी. इन तीनों के लक्षण तो मुझे भी ठीक नहीं लगते. पर आप चिंता न कीजिए, मैं इन पर कड़ी नजर रखती हूं,’’ संगीता मम्मी के पीछे खड़ी मंदमंद मुसकराते हुए उन की हां में हां मिला रही थी.

‘‘कहां थी अब तक? मेरी तो जान ही सूख गई थी,’’ मां अब भी नाराज थीं.

‘‘कालेज के अलावा और कहां जाऊंगी आंटी? मैं तो आप के डर से दौड़ती हुई घर आई हूं.’’

‘‘तू तो मेरी प्यारी बेटी है. तू तो कुछ गलत कर ही नहीं सकती. पर क्या करूं, मन में सदा डर लगा रहता है. अब तू आ गई है तो मैं पार्क में घूमने जा रही हूं,’’ कह मां सैर करने चली गईं.

नीरजा आगबबूला हो उठी, ‘‘सुन लिया तुम दोनों ने? प्रेमरस में डुबकी संगीता लगाए और डांट हम खाएं. यह सब मुझ से नहीं सहा जाएगा. संगीता सुधर जा नहीं तो मैं आंटी को सब कुछ बता दूंगी. फिर तू जाने और तेरा काम,’’ नीरजा ने धमकी दी.

‘‘उस की जरूरत नहीं पड़ेगी. आज से ठीक 4 दिन बाद पृथ्वीराज मुझे घोड़े पर बैठा कर ले जाएगा. बिलकुल इतिहास की संयोगिता की तरह और तुम सब देखती रह जाओगी. अब वह घुड़सवारी में दक्ष हो गया है. समझ में नहीं आ रहा कि मेरे सपनों का राजकुमार जब पूरी तरह सजधज कर मेरे सामने आ खड़ा होगा तो मैं उस का स्वागत कैसे करूंगी? मैं तो रहस्यरोमांच से भावविभोर हो उठी हूं,’’ संगीता आंखें मूंदे अपने स्वप्नलोक में खो गई. पर हमें लगा मानों कमरे की हवा थम गई हो. कुछ क्षणों के लिए हम में से किसी के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला. ‘‘बहुत हो गया. मैं अब चुप नहीं रहूंगी. अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है. मैं तो अब तक सब कुछ इस का बचपना समझ कर चुप थी. पर अब मैं आंटी को सब कुछ सचसच बता दूंगी. फिर वे जानें और संगीता,’’ नीरजा क्रोधित हो उठी.

‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी. तुम क्या समझती हो कि मैं तुम्हारे अंकुश के विषय में कुछ नहीं जानती जिस के साथ तुम घंटों लाइब्रेरी में बैठी रहती हो… और क्लासें बंक कर के सिनेमा देखने जाती हो?’’ संगीता भी उतने ही क्रोधित स्वर में बोली.

‘‘कौन है यह अंकुश?’’ मैं और सपना दंग रह गए.

‘‘नीरजा से पूछो न, जो सदा मुझे उपदेश देती रहती है.’’

‘‘मैं कौन सा डरती हूं. अंकुश दोस्त है मेरा.’’

‘‘पृथ्वीराज भी मेरा दुश्मन तो नहीं है?’’ संगीता ने तर्क दिया.

‘‘तुम दोनों अपनी बहस बंद करो तो मैं कुछ बोलूं?’’ मैं ने दोनों को टोका.

‘‘कहो, क्या कहना है तुम्हें?’’ दोनों ने कहा.

‘‘यही कि मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे कारण मेरी मम्मी को दुख पहुंचे. मैं उन्हें सब सच बता दूंगी.’’

‘‘तू चिंता न कर मैं स्वयं उन्हें सब बता दूंगी,’’ संगीता ने आश्वासन दिया. उस के बाद हम सांस रोक कर उस घड़ी की प्रतीक्षा करने लगे जब संगीता पृथ्वीराज का राज मां को बताने वाली थी.

2 दिन बाद संगीता कालेज से लौटी तो बड़ी गमगीन थी.‘‘क्या हुआ?’’ उसे दुखी देख कर हम ने पूछा तो उत्तर में संगीता फफक उठी.

‘क्या हुआ?’’ सपना दौड़ कर पानी ले आई. हम ने किसी प्रकार उसे शांत किया.

‘‘कल घुड़सवारी करते समय पृथ्वीराज घोड़े से गिर पड़ा… बहुत चोट आई है,’’ संगीता ने हिचकियों के बीच बताया.

‘‘है कहां वह?’’ हम ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘नर्सिंगहोम में. उस के मातापिता भी आ गए हैं. पता नहीं उन्हें कैसे मेरे और पृथ्वीराज के संबंध के बारे में पता चल गया. उन्होंने मुझे बहुत बुराभला कहा,’’ उस के आंसू थम ही नहीं रहे थे.

गृहशोभा विशेष

तब तक नीरजा चाय बना लाई और मैं उस का सिर अपने कंधे पर टिका कर उसे सांत्वना देने लगी. अब तक हम उस की प्रेम कहानी को मजाक समझ कर हंस कर टाल देते थे पर आज अचानक लगा कि संगीता तो सचमुच गंभीर है. बात अब पृथ्वीराज के मातापिता तक पहुंच चुकी थी.

‘‘मैं तो कहती हूं कि इस प्रेमकथा को यहीं समाप्त कर दो. इसी में हम सब की भलाई है,’’ अंतत: मौन नीरजा ने तोड़ा.

‘‘क्या कह रही हो तुम? संगीता की तो जान बसती है पृथ्वीराज में,’’ सपना ने आश्चर्य प्रकट किया.

‘‘हां, पर इस के चक्कर में इस के प्रेमी की जान भी जा सकती थी… फिर क्या होता इस की जान का?’’ नीरजा की बात कड़वी जरूर थी पर थी सच.

‘‘मैं अपने फैसले स्वयं ले सकती हूं. कृपया मुझे अकेला छोड़ दो,’’ संगीता ने आंसू पोंछ लिए. अब संगीता पढ़ाई में कुछ इस तरह जुट गई कि उसे दीनदुनिया का होश ही नहीं रहा. न पहले की तरह हंसतीबोलती न हमें हंसाती.

गनीमत है कि पृथ्वीराज को अधिक चोट नहीं आई थी. फिर भी उसे कालेज आने में 6 सप्ताह लग गए.

‘‘अब तेरे पृथ्वीराज की भविष्य की क्या योजना है?’’ एक दिन सपना ने संगीता से पूछ ही लिया.

‘‘हम ने इस विषय पर बहुत बात की. पृथ्वी तो फिर से घुड़सवारी शुरू करना चाहता है पर मैं ने ही मना कर दिया,’’ संगीता गंभीरता से बोली.

‘‘पर तेरा संयोगिता वाला स्वप्न?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

‘‘मैं अपने स्वप्न के लिए पृथ्वीराज को खोने का खतरा तो नहीं उठा सकती न. वैसे भी यह 21वीं सदी है. अब सपनों के राजकुमार घोड़े पर नहीं, बाइक पर आते हैं,’’ संगीता हंसी.

संगीता की हंसी में न जाने कैसी उदासी थी कि हम सब भी उदास हो गए पर कुछ कह कर हम उसे और उदास नहीं करना चाहते थे. संगीता अपनी पुस्तकों में डूब गई पर हम चाह कर भी अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे थे.

‘‘बेचारी संगीता, न जाने उस की खुशियों को कैसे ग्रहण लग गया,’’ सपना अचानक भावुक हो उठी.

‘‘क्या कह रही हो. संगीता की नादानी तो पृथ्वीराज को भी ले डूबी. बड़ी संयोगिता बनने चली थी. ऐतिहासिक चरित्र… मुझे तो पृथ्वीराज पर तरस आता है. संगीता प्रेम में कुएं में कूदने को कहती तो क्या कूद जाता वह?’’ नीरजा व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोली.

वार्षिक परीक्षा सिर पर थी. प्रैक्टिकल, प्रोजैक्ट और थ्यौरी की तैयारी के बीच हम संगीता की प्रेम कहानी को लगभग भूल चुके थे. अंतिम पेपर के बाद हम बसस्टैंड पर खड़े अपनी सखियों से विदा ले रहे थे. भविष्य के सपनों में डूबे सब के मन में अजीब सी उदासी थी. हमारी कुछ सहपाठिनें तो इस अवसर पर अपने आंसू रोक नहीं पा रही थीं. फूटफूट कर रो रही थीं. तभी वहां अजीब सा शोर उभरा. घोड़े की टापें सुनाई दीं. इस से पहले कि हम कुछ समझ पाते घोड़ा हमारी आंखों से ओझल हो गया.

‘पृथ्वीराज… पृथ्वीराज…’’ नीरजा चीखी पर हमारी समझ में कुछ नहीं आया.

‘‘क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘होना क्या है? पृथ्वीराज संगीता को उठा ले गया. देखा नहीं? घोड़े पर आया था. नीरजा अब भी कांप रही थी,’’ हमारा डर के मारे बुरा हाल था. हम घर पहुंचे तो हांफ रहे थे. मैं तो मम्मी को देखते ही रोते हुए उन से लिपट गई. सिसकियां थीं कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

मम्मी ने हमें समझाबुझा कर शांत किया. पर जब हम ने सिसकियों के बीच टूटेफूटे शब्दों में उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने सिर थाम लिया.

‘‘इतनी बड़ी बात छिपा ली तुम सब ने? मेरा सिर तो सदा के लिए झुका दिया तुम ने… और वह संगीता… कितना नाज था मुझे उस पर. उस ने एक बार भी अपने मातापिता के संबंध में नहीं सोचा कि उन पर क्या बीतेगी. क्या करूं अब?’’

‘‘करना क्या है? पुलिस में रिपोर्ट लिखवाओ वरना संगीता का पता कैसे चलेगा?’’ मैं बोली.

‘‘पता है. तुम सब की होशियारी देख ली मैं ने. लड़की का मामला है, बहुत सोचसमझ कर कदम उठाना पड़ता है. पहले तो संगीता के मातापिता को सूचित करना पड़ेगा. पता नहीं बेचारों पर क्या बीतेगी. फिर जैसा वे कहेंगे वैसा ही करेंगे.’’ पर पुलिसकचहरी तक पहुंचने की नौबत नहीं आई. संगीता के मातापिता के पहुंचने से पहले ही संगीता का फोन आ गया था. इस बार दोनों को घोड़े से गिर कर चोट आई थी और दोनों ही नर्सिंगहोम में भरती थे. अब तो प्रेम कहानी ने बेहद जटिल रूप धारण कर लिया था. दोनों पक्षों के दर्जनों संबंधी आ जुटे थे और अपनाअपना पक्ष ले कर दूसरे पक्ष को दोषी ठहराने में जुटे थे. बीचबीच में हम तीनों को भी जी भर कर कोसा जाता कि हम ने सारी बात को तब तक छिपाए रखा जब तक पानी सिर से नहीं गुजर गया. हम मूर्ति बन सारी लानतें सह रह थे. अचानक एक दिन चमत्कार हो गया. न जाने कैसे दोनों पक्ष इस निर्णय पर पहुंच गए कि पृथ्वीराज और संगीता को खुला छोड़ना खतरे से खाली नहीं. अत: दोनों का विवाह ही एकमात्र समाधान है. दोनों बहुत गिड़गिड़ाए. पृथ्वीराज ने तो यहां तक कहा कि अपने पैरों पर खड़े हुए बिना वह विवाह मंडप में पैर भी नहीं रखेगा पर किसी ने दोनों की एक न सुनी और चट मंगनी पट विवाह की घोषणा कर दी. विवाह के अवसर पर पृथ्वीराज और संगीता ने लंगड़ाते हुए विवाह की रस्में पूरी कीं. स्वागत भोज के अवसर पर सपना से नहीं रहा गया. बोली, ‘‘जीजाजी, आप तो बड़े छिपेरुस्तम निकले? पैर तुड़वा लिए पर संगीता का सपना पूरा कर के ही माने.’’

‘‘यह राज की बात है किसी से कहना मत.’’

‘‘राज की बात? मैं कुछ समझी नहीं,’’ सपना बोली.

‘‘हम अपने घर वालों से विवाह की अनुमति लेने जाते तो जाति के नाम पर न जाने कितनी हायतोबा मचाते. अब देखो उन्होंने स्वयं हमें घेर कर विवाह करवा दिया,’’ पृथ्वीराज अपने विशेष अंदाज में मुसकराया. संगीता की आंखों में भी शरारत भरी मुसकान थी.

‘‘संगीता, सचमुच तुम इस खुशी की हकदार हो,’’ पहली बार नीरजा ने संगीता की प्रशंसा की. उस की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे.

हम उस का दर्द भलीभांति समझते थे. उस का मित्र अंकुश कब का उसे छोड़ कर किसी और के साथ प्रेम की पींगें बढ़ा रहा था. पर आज का दिन तो केवल संगीता के नाम था और हम सब कुछ भूल कर उस के विवाह का जश्न मना रहे थे.