आबू की घुमावदार सड़कों और हरीभरी वादियों के बीच बसे उस छोटे से रमणीक स्थल पर मूकबधिरों की सेवा करती सौदामिनी से यों भेंट हो जाएगी, इस की तो मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. गहरा नीला रंग उसे सब से अधिक प्रिय था. गहरे नीले रंग की साड़ी में उस ने सलीके से अपनी दुर्बल काया को छिपा रखा था. हाथ में पकड़े पैन को, रजिस्टर पर तेजी से दौड़ाती हुई मैं उस को अपलक निहारती रह गई.

माथे पर चौड़ी लाल बिंदी और मांग में रक्तिम सिंदूर की आभा इस बात की पुष्टि कर रही थी कि इतना संघर्षभरा जीवन जीने के बाद भी अपने अतीत से जुड़े उन चंद पृष्ठों को वह अपने वर्तमान से दूर रखने में शायद असमर्थ थी. मेज की दराज से उस ने पुस्तकें निकालीं तो मैं ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पुकारा, ‘‘सौदामिनी, पहचाना नहीं क्या मुझे?’’

सौदामिनी चौंकी जरूर थी, पर मुझे पहचान लिया हो, ऐसा भी नहीं लगा था. वह अपनी जगह पर यों ही बैठी रही, न मुसकराई, न ही कुछ बोली. उस का शुद्ध व्यवहार मुझे अचरज में डाल गया था. सोचा, समय का अंतराल चाहे कितना ही क्यों न फैल जाए, इंसान का चेहरा, रूपरंग इतना तो नहीं बदल जाता कि उसे पहचाना ही न जा सके.

चश्मे को पोंछ कर उस ने फ्रेम को कुछ ऊपर खिसका दिया और पहचानने की कोशिश करने लगी. मैं ने फिर याद दिलाया, ‘‘सौदामिनी, मैं हूं, तनु, तुम्हारे अच्युत काका की बेटी.’’

‘‘अरे, तनु तुम? आओआओ, इतने बरसों बाद कैसे आना हुआ?’’ उस ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखते हुए पूछा.

फिर दराज बंद कर के उस ने चाबी का गुच्छा, पास ही खड़े चौकीदार को पकड़ाया और कमरा बंद करने का निर्देश दे कर बाहर निकल आई. कुछ ही कदमों के फासले पर हरीभरी झाडि़यों व लतिकाओं से घिरा हुआ उस का घर था. लौन का गेट खोल कर उस ने बाहर रखी चारपाई को, घुटने मोड़ कर सीधा किया और उस पर मोटी सी दरी बिछा कर बोली, ‘‘अमेरिका में रहते हुए तुम्हारी तो चारपाई पर बैठने की आदत छूट गई होगी? मुश्किल हो तो आरामकुरसी निकाल दूं?’’

‘‘कैसी बातें करती हो? यही सब तो वहां याद आता है…आम का अचार, उड़द की दाल की बडि़यां. सच पूछो तो यहां की मिट्टी की सोंधी महक ही तो बारबार मुझे खींच लाती है.’’

झुर्रीदार चेहरे पर हंसी प्रस्फुटित हुई थी, ‘‘अच्छा, यह तो बताओ, मेरा पता तुम्हें किस ने दिया?’’

‘‘अविनाश और मैं दोनों ही काम पर जाते हैं, इसलिए रोजरोज तो छुट्टी मिलती नहीं है. 5 वर्षों में एक बार आ पाते हैं. कुल मिला कर 3 सप्ताह की छुट्टी मिलती है, उन में 2 सप्ताह तो अम्मा, बाबूजी के पास रामपुर में ही बीत जाते हैं. बाकी एक सप्ताह किसी न किसी पहाड़ी जगह पर ही हम बिताते हैं. इस बार बच्चों ने आबू देखने की जिद की, तो यहीं चले आए.’’

कुछ देर बाद चारों ओर पसरे मौन को मैं ने ही बींधा, ‘‘दरअसल, शारीरिक रूप से अपंग बच्चों पर मैं एक किताब लिख रही हूं. किसी ने तुम्हारे आश्रम का नाम सुझाया, तो यहीं चली आई.’’

मैं ने उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराया. वह चुपचाप गुमसुम सी बैठी रही, जैसे न ही कुछ पूछना चाह रही हो, न ही कुछ कहने की इच्छुक हो. वातावरण कुछ बोझिल सा हो चला था. दिसंबर की ठंडी धूप सामने वाले पेड़ पर जा अटकी थी. ठंडी हवाओं से कुछ सिहरन सी महसूस हुई तो मैं ने शौल ओढ़ ली.

‘‘यहां अकसर शाम को ठंड बढ़ जाती है. चलो, अंदर चल कर बैठते हैं. अब तो अंधेरा भी होने लगा है.’’

दरवाजा खोल कर उस ने मुझे अंदर बिठाया और खुद अलमारी में से कुछ निकालने लगी. पलस्तर उखड़े कमरे में

4 कुरसियां और मेजपोश से ढकी मेज के अलावा, कोने में एक पुराना पलंग था, जिस पर कांच सी पारदर्शी आंखों में तटस्थ सा भाव लिए एक छोटा सा बालक लेटा था. सौदामिनी को देख कर उस के चेहरे पर स्मित हास्य के चिह्न मुखर हो उठे थे. न जाने कौन सी भाषा में वह उस से प्रश्न करता जा रहा था और वह भी उसी की भाषा में उस की जिज्ञासा शांत करती जा रही थी.

मैं एकटक उसे निहारती रह गई. बालों में छिटके चांदी के तार, चेहरे पर पड़ आई झुर्रियों ने उसे असमय ही बुढ़ापे की ओर धकेल दिया था. दुग्ध धवल सा गौर वर्ण आबनूस की तरह काला हो चुका था. भराभरा सा गदराया शरीर संघर्ष करतेकरते दुर्बल काया का रूप ले चुका था.

‘‘यह मानव है, मेरा बेटा, बहुत प्यारा है न?’’ बच्चे के कपड़े बदलते हुए उस ने मुझ से कहा तो मैं चौंकी. कमरे में पसरी सड़ांध मेरे नथुनों में समाने लगी थी. बड़ी मुश्किल से मैं ने उबकाई को रोका. मेरी परेशानी माथे पर पड़ी सिलवटों से जाहिर हो उठी थी. वह शायद समझ गई थी. बोली, ‘‘वैसे तो हमेशा लघुशंका और दीर्घशंका के लिए संकेत देता है. आज ठंड कुछ ज्यादा है न, इसलिए…अच्छा, तुम बैठो, मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

पर मेरा ध्यान कहीं और था, इस पसोपेश में थी कि यह बालक है कौन? जहां तक मुझे याद था, आदित्य के घर से जब वह लौटी थी तो निसंतान ही थी.

सौदामिनी चाय बनाने चली गई तो मैं पास ही पड़ी आरामकुरसी पर आंखें मूंद कर लेट गई. हवा के झोंकों से यादों के किवाड़ धीरेधीरे खुलने लगे तो मन दद्दा की हवेली में भटकने लगा था…

बाबूजी के चचेरे भाई थे, दद्दा. लोग उन्हें राय साहब भवानी प्रसाद के नाम से पहचानते थे. शहर के बीचोंबीच संगमरमर से बनी उन की कोठी की शान निराली थी.

दद्दा ने बड़ा ही निराला स्वभाव पाया, तबीयत शौकीन और अंदाज रईसी वाले. हर काम अपने ही ढंग से करते, न किसी के काम में हस्तक्षेप करते, न ही किसी की टीकाटिप्पणी बरदाश्त करते.

जन्म लेते ही सौदामिनी के सिर से मां का साया उठ गया था. पिता करोड़ों की जायदाद के इकलौते वारिस थे, पर प्यार और अपनत्व का आदानप्रदान करने में गजब के कंजूस. भावनाएं और संवेदनाएं तो उन्हें छू तक नहीं पाई थीं. हर शाम शहर के रईस लोगों के बीच शतरंज की बाजी खेलने वाले दद्दा ने अपनी बेटी के लालनपालन में कहीं कोताही की हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता. हर समय उस पर कड़ी निगरानी रखते थे.

सौदामिनी जरा सा सिसकती, तो दद्दा चिल्लाते. उन की चीखपुकार सुन कर सेविकाएं दौड़ी चली आतीं और बिटिया बिना दुलारेपुचकारे सहम कर यों ही चुप हो जाती. ठोकर खा कर गिरती, तो दद्दा एक ही गति में निरंतर चिंघाड़ते रहते. सेविकाओं की पेशी होती, कोई इधर दौड़ती कोई उधर भागती, और कोई खिलौनों की अलमारी के सामने जा खड़ी हो जाती पर सौदामिनी तो तब तक पिता का रौद्र रूप देख कर ही दहशत के मारे चुप हो चुकी होती थी.

स्कूल या कालेज सौदामिनी कभी गई ही नहीं. इस का कारण था, राय साहब की रूढि़वादी सोच. घर से बाहर बेटियों को निकालने के वे सख्त विरोधी थे. वे सोचते, लड़कों के संग बतिया कर उन की बिटिया कहीं भाग गई तो? पास ही एक मिशनरी स्कूल था, वहीं की एक ईसाई टीचर को उन्होंने सौदामिनी की शिक्षा के लिए नियुक्त कर दिया था. ऐसे में उस की शिक्षा का दायरा हिंदी, अंगरेजी की वर्णमाला तक ही सिमट कर रह गया था.

बेटी के प्रति अपनी आचारसंहिता में नित नए विधानों की रचना करने वाले दद्दा. उस के हर काम, हर गतिविधि पर कड़ी निगरानी रखने लगे.

सौदामिनी हर समय व्याकुल रहती जीवन की उन सचाइयों से परिचित होने के लिए, जिन की चर्चा अकसर वह अपनी सहेलियों से सुन लिया करती थी.

कलकत्ता का राजभोग और मथुरा के पेड़े खाते समय उस का मन कच्चे अमरूद खाने के लिए तरसता. ऐसे में दोपहरी में हम दोनों दद्दा की नजरें चुरा कर पिछवाड़े की बगिया में जा पहुंचतीं. पेड़ पर चढ़ कर कच्चे अमरूद ढूंढ़ने का आनंद वैसा ही था जैसे किसी गोताखोर के लिए मोती ढूंढ़ने का.

एक दिन यह खबर, न जाने कैसे दद्दा के दीवानखाने जा पहुंची. और तब सौदामिनी की पेशी हुई.

पिता का तिरस्कारपूर्ण स्वर सुन कर बालहृदय छलनी हो गया. सहम कर अपना मुंह अपने नन्हेनन्हे हाथों से छिपा कर वह देर तक रोती रही.

सौदामिनी हर समय सहमीसिमटी रहती थी, न हंसती न बोलती. पिंजरे के तार चाहे सोने के हों या लोहे के, कैद तो आखिर कैद ही है.

धीरेधीरे उस का मनोबल गिरता चला गया. हाथपांव पसीने में भीगे रहते, जबान लड़खड़ाने लगी. रात को सोती तो चीखनेचिल्लाने लगती. कई हकीम, डाक्टर और वैद्यों का इलाज करवाया गया, पर सौदामिनी की दशा दिनपरदिन बिगड़ती ही चली गई.

एक दिन दद्दा के मुनीम अपने अनुज, डाक्टर मृदुल को सौदामिनी के इलाज के लिए ले आए. अचानक अपने सामने किसी नए डाक्टर को देख कर राय साहब असमंजस में पड़ गए. एक तो मुनीम का भाई, दूसरा अनुभवहीन. सोचा, जहां बड़ेबड़े डाक्टर कुछ नहीं कर पाए, यह नौसिखिया क्या कर लेगा? बस, यही सोच कर दद्दा चुप्पी साधे रहे.

पर सौदामिनी की ऐसी दशा अम्मा, बाबूजी से सहन नहीं हो पा रही थी. पहली बार अम्मा ने तब दद्दा के सामने मुंह खोला था और न जाने क्या सोच कर वे मान भी गए.

मृदुल की दवा से सौदामिनी की दशा दिनपरदिन सुधरने लगी. मृदुल जानते थे, उस का रोग शारीरिक कम, मानसिक अधिक है. दवा से ज्यादा उसे प्यार और अपनत्व की जरूरत है. उधर सौदामिनी को स्वास्थ्यलाभ मिला, इधर राय साहब के विश्वास की जड़ें मृदुल पर जमने लगीं. वह तेजस्वी व्यक्तित्व और विलक्षण बुद्धि का स्वामी था, सदा अपने आकर्षण में सब को बांधे रखता. घंटों सौदामिनी के पास बैठा रहता.

मृदुल की संवेदनाओं ने न जाने कब अपमान, उपेक्षा और तिरस्कार के वज्र खंड तले सहमीसिमटी सौदामिनी के हृदय की बसंती बयार को सुगंधित झोंके के समान छू कर उस के दिल में प्रेम का बीज अंकुरित कर दिया.

सौदामिनी मृदुल के साहचर्य के लिए हर समय तरसती. उधर मृदुल भी सौदामिनी के ठहाकों, मुसकराहटों और उलझनों से अनजाने ही जुड़ते चले गए.

शुरूशुरू में राय साहब को इस प्रेमप्रसंग की जरा भी जानकारी नहीं मिली. प्यार, स्नेह, आसक्ति जैसी नैसर्गिक भावनाएं उम्र के किसी भी सोपान पर, जीवन के किसी भी मोड़ पर स्वाभाविक रूप से जन्म ले सकती हैं. उन के नियम, विधान के संसार में ऐसा सोचना भी प्रतिबंधित सा था.

ऊंची मानमर्यादा और प्रतिष्ठा के स्वामी राय साहब लाखों का दहेज देने की सामर्थ्य रखते थे. मुनीम के भाई के साथ अपनी इकलौती बेटी को ब्याह कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा पर उन्हें कालिख थोड़े ही पुतवानी थी.

मैं उस प्रेमकहानी को कभी नहीं भूली, जिस की एकएक ईंट, राय साहब ने अपने छल से गिरवा दी थी और रह गया था, एक खंडहर.

कुछ दिनों के लिए सौदामिनी को दद्दा ने उस के ननिहाल भिजवा दिया था. नाना की तबीयत बेहद खराब थी, इसलिए उन की सेवा के लिए कोई तो चाहिए ही था. पिता के बारे में सौदामिनी के मन में कोई दुर्भावना नहीं उपजी और न ही कोई राय बनी. जब तक लौटी, मुनीम और उन का अनुज पूरे दृश्यपटल से ओझल हो चुके थे. मृदुल यों बिना बताए क्यों चले गए, कहां चले गए? इस की जरा भी भनक न सौदामिनी को मिली, न ही हवेली वालों को.

छल, प्रवंचनाओं के छद्म भेदों से दूर सौदामिनी का मन मैला करना कोई बहुत कठिन काम नहीं था. जीवन के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञ भोलीभाली बेटी के सामने दद्दा ने मृदुल के चरित्र का ऐसा घिनौना चित्रण प्रस्तुत किया कि उस का मन मृदुल के प्रति वितृष्णा से भर उठा.

प्रेम में चोट खाए हृदय का दुख समय के साथ ही मिटता जाएगा, यह सभी जानते थे. दद्दा भी जानते थे कि वक्त बड़े से बड़े जख्म भर देता है. समय बीतता गया. सौदामिनी के रिसते घाव भरने लगे.

विश्वास, अविश्वास के चक्रवात में उलझी सौदामिनी अब एक बार फिर प्रेम का घरौंदा बनाने के लिए सुनहरे स्वप्न संजोने लगी थी. इस घर से भावनात्मक रूप से वह जुड़ी ही कब थी, जो यहां मन रमता? करोड़पति पिता ने करोड़पति परिवारों की खोज शुरू कर दी थी. रिश्तों की कमी न थी. पर दद्दा को हर रिश्ते में कोई न कोई खामी नजर आती ही थी.

आखिर एक दिन बड़ी ही जद्दोजेहद के बाद उन्हें दीवान दुर्गा प्रसाद का इकलौता बेटा आदित्य अपनी सौदामिनी के लिए उपयुक्त लगा. आदित्य डाक्टर था, व्यक्तित्व का ही नहीं, कृतित्व का भी धनी था.

अतीत के सारे दुखद प्रसंगों को भूल कर सौदामिनी खुद को कल्पनाओं के मोहक संसार में पिरोने लगी थी.

दोनों ही पक्षों ने दिल खोल कर खर्चा किया था. दीवान साहब की प्रतिष्ठा का अंदाजा बरात में आए लोगों की भीड़ देख कर लगाया जा सकता था. जीवनपर्यंत सुखदुख का साथी बने रहने का संकल्प ले कर सौदामिनी ने ससुराल की देहरी पर कदम रखा था.

रात्रि की नीरवता चारों ओर पसरी हुई थी. सभी मेहमान अपनेअपने कमरों में सो चुके थे. कमरे के बाहर उस की सास तारिणी सामान को सुव्यविस्थत करने में जुटी हुई थीं. रात्रि का तीसरा पहर भी ढलने को था. लेकिन आदित्य का दूरदूर तक कहीं पता न था.

सुबह की पहली किरण के साथ आदित्य कमरे में लौटे तो सौदामिनी और भी सिमट गई.

वे बिना कोई भूमिका बांधे पास ही पड़ी कुरसी पर बैठ गए और बोले, ‘सौदामिनी, हमारे समाज में मातापिता बेटे के लिए पत्नी नहीं, अपने लिए कुलवधू ढूंढ़ते हैं, गृहलक्ष्मी ढूंढ़ते हैं,’ आदित्य के स्वर में ऐसा भाव था, जिस ने सौदामिनी के मन को छू लिया.

‘मैं किसी और को प्यार करता हूं. सूजी नाम है उस का…मेरे ही अस्पताल में नर्स है. तुम्हें बुरा तो लगेगा, पर मैं सच कह रहा हूं. मैं ने तो तुम्हें एक नजर देखा भी नहीं था. कई बार मैं ने इस विवाह का विरोध किया, पर मां न मानीं. सच पूछो तो उन्होंने भी तुम्हारी धनसंपदा को ही पसंद किया है, तुम्हें नहीं,’ इतना कह कर आदित्य दूसरे कमरे में चले गए थे और छोड़ गए थे सूनापन.

कल्पना का महल खंडित हो चुका था. सौदामिनी अपनी जगह से हिली, न डुली. उसे लगा, वह जमीन में धंसती चली जा रही है. ऐसे समय में कोई नवविवाहिता कह भी क्या सकती है. बस, आदित्य के अगले वाक्य की प्रतीक्षा करती रही. वे लौट आए थे, ‘इस घर में तुम्हें सारे अधिकार मिलेंगे, पर मेरे हृदय पर अधिकार सूजी का ही होगा. उसे भुलाना मेरे वश में नहीं,’ आदित्य की आंखों में भावुकता से अश्रुकण छलक आए.

सौदामिनी सोच रही थी, अगर उस के दिल पर उस का अधिकार नहीं तो इस घर में रह कर क्या करेगी? किलेनुमा उस हवेली में वह खुद को कैदी ही समझ रही थी.

कुछ ही देर में आदित्य की मां थाल में नए वस्त्र और आभूषण ले कर आईं, जिन्हें अपने शरीर पर धारण कर के उसे आगंतुकों से शुभकामनाएं लेनी थीं. सौदामिनी ने मां का लाड़प्यार कभी देखा नहीं था, सुना जरूर था कि मां का हृदय विशाल होता है, एक वटवृक्ष की तरह, जिस की छाया तले न जाने कितने पौधे पुष्पित, पल्लवित होते हैं. बस, यही सोच कर उन का हाथ पकड़ कर सौदामिनी सिसक उठी, ‘मांजी, सबकुछ जानते हुए भी, आप ने मेरा जीवन बरबाद क्यों किया? आप को उन की प्रेमिका से ही उन का विवाह करवाना चाहिए था.’

तारिणी ने अपना हाथ छुड़ाते हुए रुखाई से कहा, ‘बहू, रिश्ते जोड़ते समय खानदान, जात, वर्ग, परंपरा जैसी कई बातों को ध्यान में रखना पड़ता है.’

कांपते स्वर में उस ने इतना ही कहा, ‘चाहे इन सब बातों के लिए किसी दूसरी लड़की के जीवन की सारी खुशियां ही दांव पर क्यों न लग जाएं?’

‘ऐसा कुछ नहीं होता, बहू. पत्नी में सामर्थ्य हो तो साम, दाम, दंड, भेद जैसा कोई भी अस्त्र प्रयोग कर के अपने पति का मन जीत सकती है.’

सास ने कहा, ‘देखो सौदामिनी, तुम इस घर की बहू हो. इस घर की मानमर्यादा तुम्हें ही बना कर रखनी है. समाज में हमारा नाम है, इज्जत है. आदित्य और सूजी के संबंधों पर परदा पड़ा रहे, इसी में तुम्हारी भलाई है और हम सब की भी. किसी को इस विषय में कुछ भी पता नहीं चलना चाहिए. तुम्हारे ससुर दीवान साहब को भी पता नहीं चलना चाहिए. वे दिल के मरीज हैं. उन का ध्यान रख कर ही मैं ने तुम्हें इस घर की बहू बनाया है, वरना सूजी ही आती इस घर में. अगर उन्हें कुछ हो गया तो इस का उत्तरदायित्व तुम पर ही होगा.’

सभी का अपनाअपना मत था. कोई मजबूरी जतला रहा था, कोई धमकी दे रहा था. सौदामिनी को समाज के कठघरे में खड़ा करने वाले उस के तथाकथित संबंधी, उस की भावनाओं से सर्वथा अनभिज्ञ थे. राय साहब के साम्राज्य की इकलौती राजकुमारी का अस्तित्व ससुराल वालों ने कितनी बेरहमी से नकार दिया था.

नववधू अपमान का घूंट पी कर रह गई थी. न जाने क्यों, उस दिन मृदुल बहुत याद आए थे, ‘क्यों छोड़ कर चले गए उसे यों मझधार में? कम से कम एक बार मिल तो लेते, कुछ कहनेसुनने का मौका तो दिया होता.’

दीवान साहब नेक इंसान थे. एक बार सौदामिनी के जी में आया कि वह उन से सबकुछ कह दे, पर सहज नहीं लगा था. वह होंठ सीए रही थी.

– क्रमश:

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