वाह,क्या किस्मत पाई है मोदीजी के सूट ने. बस 1 बार पहना और ओबामाजी के गले लगा और रातोंरात क्व10 लाख से क्वसाढ़े चार करोड़ का हो गया. वैसे ऐसा ही भाग्यशाली सूट हम सब के पास होता है. जी हां, वही शादी वाला सूट जिसे हम सहेज कर रखते हैं अच्छी या बुरी यादों की तरह. जितनी देखभाल उस सूट की एक आम आदमी करता है उतनी शायद मोदीजी ने भी न की होगी. असल में उन्हें टाइम कम मिला. हम ने तो अपनी इस फैमिली धरोहर को 20 सालों से संभाला हुआ है.

चलो, मोदीजी को क्वसाढ़े चार करोड़ मिल गए एक नेक काम के लिए. हमें तो कोई हमारे सूट की असल कीमत ही दे दे तो हम भी उस पैसे को दान में दे देंगे. सच्ची बिलकुल सच्ची. हम इतने में ही खुश हो जाएंगे. उस समय पूरे 5 हजार का था. 1 तोला सोने की कीमत के बराबर. चलो, आज सोना करीब क्व27 हजार है पर हमें इतना नहीं चाहिए. बस 5 हजार ही मिल जाएं तो काफी हैं. हम भी उन्हें नेक काम में लगा देंगे.

फिर दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे कि आखिर इसे खरीदेगा कौन? तो 1-1 कर उन सब के चेहरे आंखों के आगे से गुजरने लगे जिन के हम शादी में गले मिले थे. जब हम ने झुकझुक कर चाचा, मामा, फूफा आदि के पैर छुए थे तो कमर कितनी अकड़ गई थी. अब क्या उन में से कोई भी इसे न खरीदेगा?

अब छूने की बात से याद आई अपने 2 सालों की जो हमें घोड़ी से उतार कर स्टेज तक लाए थे. तब वे दोनों ही तो थे, जो इस सूट के अंगसंग रहे थे. अब उन से ज्यादा इस सूट की कीमत कौन जानता होगा? आखिरकार यह सूट उन के एकमेव जीजा का जो है.

मन ही मन संतुष्ट हो कर हम ने श्रीमतीजी को अपना खयाल ज्यों का त्यों कह सुनाया. उन्होंने पहले तो सारी बातें ध्यान से सुनीं और फिर हमें ऐसी खरीखरी सुनाई कि हम ने तोबा कर ली कि सूट तो क्या हम तो कभी रूमाल बेचने की भी नहीं सोचेंगे. श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘मेरे भाई क्या इतने गएगुजरे हैं, जो आप का उतारा हुआ सूट पहनेंगे? अगर गले लगने से कीमत बढ़ जाती है तो सब से ज्यादा तो हकदार इस के आप के जीजाजी हैं, जो शराब के नशे में शादी वाले दिन से ले कर रिसैप्शन तक आप को गले लगालगा कर नाच रहे थे. जैसे कह रहे हों कि बच्चू अब तुझे पता चलेगा शादी क्या होती है. अपनी ऐसी

बहन मेरे पल्ले बांधी है कि आज तक सांस नहीं आई है. ‘‘मेरे भाइयों ने तो सिर्फ 1 बार गले लगाया होगा और वह भी रीतिरिवाजों के चलते पर तुम्हारे जीजाजी तो सारी खुंदस इस सूट पर ही उतार रहे थे… उन्हें क्यों नहीं बेच देते यह सूट और फिर क्व5 हजार उन के लिए कोई बड़ी बात नहीं है. वे भले ही इटैलियन सूट पहनते हों पर गले तो उन्हीं के लगा था न आप का यह पुश्तैनी सूट.’’

हम ने अपना थूक गिलते हुए जवाब दिया, ‘‘न बाबा न, जीजाजी के बारे में तो सोचना भी मत… उन के तो ड्राइवर तक इस से बढि़या सूट पहनते हैं.’’ यह सुनते ही श्रीमतीजी का गुस्सा कुकर की सीटी की तरह फट पड़ा. ‘‘तो क्या मेरे भाई उन के ड्राइवर से भी गएगुजरे हैं? क्या उन के पास सूटों का अकाल है, जो आप से खरीदें?’’

इतनी खरीखरी सुन कर हम ने सोच चलो जब इतने साल संभाला तो और कुछ साल संभाल लेते हैं. पर मोदीजी के सूट की नीलामी सोने नहीं देती थी. एक दिन श्रीमतीजी को पता नहीं कैसे दया आ गई. बोलीं, ‘‘अच्छा, चलो मैं बाई को दिखाती हूं. गरीब है पैसे नहीं दे पाएगी. पर अपनी तनख्वाह में से कटवाती रहेगी.’’ मुझे उन का सुझाव पसंद आ गया. चलो, कैश न सही ऐसे ही सही. पर यह क्या? श्रीमतीजी ने जैसे ही लक्ष्मी को सूट दिखाया तो वह नाकभौं सिकोड़ कर बोली, ‘‘बीबीजी, आजकल कौन पहनता है ऐसा सूट… यह तो कब का आउट औफ फैशन हो गया है. मेरा मर्द न पहने ऐसा सूट कभी…’’ श्रीमतीजी बड़बड़ाते हुए बोलीं, ‘‘ठीक है… ठीक है… नहीं लेना है तो मत ले पर कम से कम इतनी बेइज्जती भी तो न कर.’’

जाने क्या चोट लगी श्रीमतीजी के अहं को कि उन्होंने कमर कस ली हमारे अति प्रिय सूट से छुटकारा पाने की. दूसरा निशाना उन्होंने बरतन वाली को बनाया. हम खुश हो गए कि चलो एकाध डिनर सैट तो आ ही जाएगा. उसे बेटी को शादी में दे देंगे. चलो कैश न सही ढेर सारे बरतन ही सही. मगर बरतन वाली ने सूट देख कर कहा, ‘‘बीबीजी, यह कहां से लिया आप ने? क्या रघुवीर नगर में जहां पुराने कपड़ों को धोसाफ कर प्रैस कर के बेचा जाता है वहां से लाई हैं? इसे तो कोई भिखारी भी न लेगा.’’

हमें श्रीमती समेत गुस्सा तो बहुत आया पर हम ने उसे कुछ कहे बिना बाहर का रास्ता दिखाया. इतनी बेकदरी हमारे इतने अजीज सूट की. श्रीमतीजी का पारा 7वें आसमान पर पहुंच गया. वे गुस्से से बोलीं, ‘‘आइंदा इस घर में पैर भी मत रखना. रोज मेरा सिर खाती थी कि कोई पुराना कपड़ा हो तो दे दीजिए. और अब तुझे मैं ने इन की जिंदगी का सब से महंगा सूट दिखाया तो तू इसे भिखारियों वाला बोल रही है… दफा हो जा यहां से.’’

हम ने पूछा, ‘‘अब क्या करेंगे?’’

‘‘आप दिल छोटा न करो… कोई बात नहीं हम जमादार को दे देंगे. वह पैसे तो नहीं देगा पर दुआ तो देगा और फिर दुआ की कोई कीमत नहीं होती है,’’ श्रीमतीजी बोलीं.

हम इतने में ही खुश थे कि चलो मोदीजी के सूट की तरह हमारा सूट भी शान से इस घर से निकलेगा. पर यह क्या? श्रीमतीजी सूट के साथ कुछ और भी जमादार को दे रही थीं और कह रही थीं कि इस मनहूस सूट को मेरी नजरों से दूर ले जा. मानों शादी का अभी तक का सारा गुस्सा/खुंदस इसी सूट पर निकाल रही थीं. और जमादार क5 सौ यह कहते हुए मांग रहा था कि बीबीजी इतना भारी सूट उठा कर नहीं ले जा पाऊंगा. घर तक औटो करना पड़ेगा और फिर घर जा कर बीवी की डांट सहनी पड़ेगी वह अलग.

श्रीमतीजी ने 2 सौ दे कर हमारे नीलामी वाले सपने को मटियामेट कर दिया. अब तक हम समझ गए थे कि बड़े लोगों की बड़ी बातें, हम तो अदना आदमी हैं और वह भी शादीशुदा. जमादार खुशीखुशी 2 सौ जेब में डाल कर सूट उठा कर चलता बना. सूट घर से बाहर जा रहा था और हमें हसरत भरी निगाहों से देख रहा था जैसे कह रहा हो कि बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले.