गृहशोभा विशेष

नीली आंखें मैं ने फिल्मों में नायक और नायिकाओं की देखी थीं. वास्तविक जीवन में पहली बार उस की नीली आंखें देखीं जब वह बैंक में मुझे पहली बार मिली थी.

‘‘सर, मैं ब्यूटीपार्लर खोलना चाहती हूं, आप के बैंक से लोन चाहिए.’’ अपने केबिन में बैठा, मैं एक जरूरी फाइल देख रहा था. यह स्वर सुन कर मैं ने अपना चेहरा ऊपर उठाया तो उस 24-25 वर्षीया युवती को देख कर ठगा सा रह गया. टाइट जींस, चुस्त टौप, खुले लहराते बाल, देखने में अति सुंदर, साथ ही, उस की नीली आंखें जिन में न जाने कैसी कशिश और सम्मोहन था कि मैं उन के गहरे समंदर में गोते लगाने लगा.

‘‘सर,’’ उस ने कुछ जोर दे कर लेकिन कोमल स्वर में कहा तो मैं सचेत हो गया, ‘‘हां, कहिए, कैसे?’’

‘‘जी, मेरा नाम मीठी है. मैं ब्यूटीपार्लर खोलना चाहती हूं, आप के बैंक से लोन चाहिए.’’

‘‘कितना लोन चाहिए?’’

‘‘5 लाख रुपए. इस के लिए मुझे क्या औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी,’’ बहुत ही गंभीर और सधे स्वर में उस ने पूछा.

‘‘इस के लिए आप को अपनी किसी प्रौपर्टी के कागजात देने होंगे. एक गारंटर की भी जरूरत पड़ेगी. और हां, वह प्रौपर्टी मुझे देखनी भी पड़ेगी तभी उस के आधार पर कार्यवाही आगे बढ़ेगी.’’

‘‘ठीक है सर, हमारा घर है जो कि मां के नाम है. ऊपरी हिस्से में हम रहते हैं. नीचे के हिस्से में ब्यूटीपार्लर खोलने की सोची है. आप जब चाहें हमारा घर देख सकते हैं,’’ उस ने उत्साहित स्वर में कहा, ‘‘तो सर, आप कब आ रहे हैं हमारा घर देखने?’’

उस का उत्साह, खुशी, लगन, रूपसौंदर्य और नीली आंखें देख कर मन में आया कह दूं कि आज शाम को ही, लेकिन मेरी छठी इंद्रिय ने मुझे सचेत किया कि मैं एक बैंक मैनेजर हूं और मुझे बैंक संबंधी, खासतौर से लोन संबंधी, मामलों में बहुत सूझबूझ, चतुराई, सतर्कता व दूरदर्शिता से काम लेना होगा क्योंकि आजकल बहुत फ्रौड हो रहे हैं.

बैंक में कोई भी जालसाजी या धोखाधड़ी होती है तो पहले बैंक मैनेजर पर ही शक की सूई ठहरती है चाहे उस का कुसूर हो या न हो. इसलिए हर कदम फूंकफूंक कर रखना पड़ता है. यह लड़की अपने यौवन और सौंदर्य के जाल में उलझा कर कहीं मुझ से कोई ऐसा गलत काम न करवा दे कि मैं फंस जाऊं.

‘‘सर, क्या सोचने लगे आप?’’ उस ने मुझे टोका तो मैं अपनी विचारयात्रा को विराम दे कर बोला, ‘‘देखिए, अभी 2-4 दिन मेरे पास वक्त नहीं है, काम ज्यादा है. आप अपना मोबाइल नंबर दे दीजिए, जिस दिन भी फ्री होऊंगा, आप को फोन पर बता दूंगा.’’

‘‘थैंक्यू सर,’’ कहते हुए उस ने अपना मोबाइल नंबर बता दिया और मैं ने शरारत से उस का नंबर अपने मोबाइल में ‘ब्लू आइज’ नाम से सेव कर लिया.

उस के जाते ही मैं फिर से उस की नीली आंखों की गहराई में उतर गया. अपने से आधी उम्र की लड़की के बारे में सोचना मुझे गलत तो लग रहा था, मेरी बेटी भी लगभग उसी की उम्र की थी, लेकिन पता नहीं क्यों उस की नीली आंखों ने मुझ पर क्या जादू कर दिया था कि मेरा मन उस की तरफ बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ा ही जा रहा था और मैं, बेबस व असहाय सा हो गया था.

शाम को घर पहुंचते ही पत्नी चाय बनाने लगी और मैं मुंहहाथ धोने लगा. गरमागरम चाय का कप पकड़ाते हुए वह बोली, ‘‘सुनो, अब खुशी के लिए लड़के देखने शुरू कर दो. पूरे 25 वर्ष की हो गई है. उस का एमबीए भी कंपलीट हो गया है. जौब जब मिलेगी तब मिलती रहेगी लेकिन हमें तो लड़के देखने शुरू कर देने चाहिए.’’

यह सुन कर मुझे लगा कि मैं बूढ़ा हो गया हूं. खुशी की शादी होगी, फिर मैं नाना भी बन जाऊंगा. साथ ही, सोच रहा हूं उस नीली आंखों वाली लड़की के बारे में. मुझे अपने पर शर्म आई.

गृहशोभा विशेष

‘‘पापा, आप कब आए बैंक से?’’ मेरी बेटी ने पूछा.

‘‘बस बेटा, अभी थोड़ी देर पहले.’’ जैसे ही मैं ने उसे बेटा कहा तो उस नीली आंखों वाली की तसवीर मेरे सामने आ गई. अपने मन को हर तरह से काबू किया लेकिन रात को न चाहते हुए भी उंगलियां मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच गईं और ‘ब्लू आइज’ पर उंगली का हौले से दबाव पड़ गया.

‘‘हैलो कौन?’’ इतनी जल्दी फोन उठा लेगी, यह तो मैं ने सोचा भी न था, संभलते हुए बोला, ‘‘मीठीजी, मैं बैंक मैनेजर आनंद बोल रहा हूं. असल में, मैं कल शाम को फ्री हूं, अगर आप चाहें तो अपना घर दिखा सकती हैं.’’

‘‘जरूर सर?’’ वह चहक कर बोली, ‘‘यह तो बहुत अच्छा है. मैं तो खुद चाहती हूं कि जल्दी से जल्दी मेरा लोन पास हो जाए और मेरा ब्यूटीपार्लर खोलने का सपना पूरा हो जाए.’’

‘‘तो ठीक है. आप कल शाम को 5 बजे बैंक आ जाना, मैं आप के साथ चलूंगा.’’

‘‘किस के साथ चलोगे और कहां चलोगे?’’ पत्नी ने पूछा.

उस का इस तरह पूछना, मुझे लगा जैसे उस ने किसी शुभ काम में टोक लगा दी है. सो, झुंझला कर बोला, ‘‘कल बैंक के बाद एक पार्टी के साथ विजिट के लिए जाना है. कहीं मौजमस्ती के लिए नहीं जा रहा.’’

‘‘आप तो बेवजह नाराज हो गए. और हां, अकेले मत जाना, साथ में किसी सहकर्मी को ले जाना. जमाना ठीक नहीं है. एक से भले दो रहते हैं,’’ वह मुझे एक बच्चे की तरह समझाती हुई बोली.

उस की इस नसीहत से मेरा पारा और चढ़ गया, ‘‘हद करती हो तुम? बैंक मैनेजर हूं. अनुभव है मुझे. पहचान है आदमी की, कौन भला है कौन बुरा? और, मेरी किसी से रंजिश या दुश्मनी थोड़ी है जो कोई मुझे नुकसान पहुंचाएगा.’’

‘‘आप को कुछ बताना और राय देना बेकार है. आप तो अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित, ईमानदार बैंक मैनेजर हो. आप जिस संस्था का नमक खाते हो उस के साथ गद्दारी नहीं कर सकते. यह सिर्फ मैं ही जानती हूं लेकिन कोई बाहर वाला नहीं. किसी केस में आप ने नानुकुर की या अपनी असंतुष्टता व असहमति दर्शायी तो सामने वाला आप को प्रलोभन देगा ही और आप पूरी कठोरता से उस निम्न प्रस्ताव को अस्वीकार करोगे. ऐसे में वह आप की इस बात व व्यवहार से चिढ़ जाए व आप को अपना दुश्मन मान ले तब…यही सोच कर डर लगता है और फिर, घर में जवान बेटी है, तो यह डर और सताने लगता है. अब आप ही बताओ, क्या मैं गलत कह रही हूं?’’

‘‘साधना, रिलैक्स यार. मैं बैंक की नौकरी 30 वर्षों से कर रहा हूं. कभी झंझटों या गलत कामों में नहीं फंसा क्योंकि मैं अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले हर काम को पूरी स्पष्टता, सत्यता, पारदर्शिता और ईमानदारी से करता हूं और अपने सामने वाले को पहली मुलाकात में ही अपने व्यवहार, स्वभाव व कार्यशैली से यह दर्शा देता हूं कि मैं गलत नीति और गलत आचरण वाला व्यक्ति नहीं हूं. इज्जत से नौकरी की है, रिटायरमैंट भी पूरे सम्मान के साथ लूंगा.’’

‘‘बस, आप की इसी गांधीवादी विचारधारा पर तो फिदा हूं मैं,’’ कहती हुई वह शरारत से लिपट गई.

जल्दी ही वह गहरी नींद की आगोश में समा गई लेकिन आज नींद मुझ से कोसों दूर थी या यों कहिए नींद मुझ से रूठ कर रात्रिजागरण करवाने पर तुली थी.

शायद, साधना सही कहती है. औरतों की बातें, सलाह पुरुषों को हमेशा गलत लगती हैं. हालांकि ऐसा नहीं है. वे भी सही होती हैं. साधना का डर जायज है. आजकल लोग छोटी सी बात पर ही रंजिश पैदा कर लेते हैं. माना कि मैं बहुत होशियार व समझदार हूं लेकिन फिर भी मुझे और ज्यादा चौकन्ना रहना होगा.

सुबह आंख देर से खुली. साधना ने नाश्ता तैयार कर दिया था और लंच की तैयारी में जुटी थी. फ्रैश हो कर आया तो मोबाइल घनघना उठा. स्क्रीन पर‘ब्लू आइज’ देख कर मन सुहावने मौसम की तरह मदमस्त हो गया.

‘‘हैलो सर, मैं मीठी बोल रही हूं. आज शाम को आप मेरे घर आ रहे हैं न. तो प्लीज सर, डिनर मेरे यहां ही कीजिए. मेरी नानी कहती थीं कि मैं खीर बहुत स्वादिष्ठ बनाती हूं, इसलिए प्लीज…’’

निवेदनभरे मीठे स्वर में उस का आग्रह न ठुकरा सका मैं.

‘‘ठीक है, मैं डिनर आप के यहां ही कर लूंगा.’’

‘‘कहां डिनर कर लेंगे आप?’’ कहते हुए साधना ने कौफी का मग मेरे सामने बढ़ा दिया.

जब भी कोई अच्छी शुरुआत करने की सोचो, यह जरूरी बीच में आ टपकती है. औरत है या बिन मौसम बरसात, मन ही मन कुढ़ गया मैं क्योंकि मैं नीली आंखों वाली के साथ डिनर और खीर का आनंद लेने की सोच रहा था.

‘‘क्या सोचने लगे? और मेरी बात का जवाब भी नहीं दिया.’’

‘‘सोच रहा हूं आज शाम मुंबई के लिए उड़ जाऊं और वहां किसी नीली आंखों वाली हीरोइन के साथ डिनर करूं,’’ अपनी खीझ और कुढ़न को हास्यपरिहास से पेश कर दिया.

यह सुन कर वह खुल कर हंस पड़ी, ‘‘इस उम्र में कोई भूरी, काली, पीली, हरी और नीली आंखों वाली घास भी न डालेगी आप को, डिनर तो बहुत दूर की बात है.’’ उस ने भी मेरी तरह व्यंग्य से जवाब दिया.

‘‘छोड़ो भी यह हंसीमजाक. मैं आज डिनर बाहर ही करूंगा. एक पार्टी के साथ, उस के घर पर ही. बहुत आग्रह किया उस ने, इसलिए मना न कर सका,’’ अपना टिफिन हाथ में लेते हुए बड़ी सफाई से झूठ बोला मैं.

‘‘यह पार्टी जानकारी की है या अपरिचित?’’ उस ने फिर जासूसी की.

‘‘बस, एक बार बैंक में लोन के सिलसिले में मुलाकात हुई है,’’ इस बार सच बोला.

‘‘तो आप उन के यहां डिनर मत करो. जब तक जानपहचान गहरी न हो तो किसी के यहां डिनर पर नहीं जाना चाहिए.’’

‘‘क्यों नहीं जाना चाहिए?’’ मैं ने चिढ़ कर पूछा.

‘‘जमाना ठीक नहीं है. अपना काम निकलवाने के लिए सामने वाला आप के खाने में कुछ ऐसावैसा मिला दे और आप को अपने वश में कर के कुछ आप से गलत काम करा बैठे तो?’’ उस ने चिंता व्यक्त की.

अब मेरा क्रोध सातवें आसमान पर था, ‘‘जमाना तो ठीक है लेकिन तुम मानसिक रूप से ठीक नहीं हो. तभी तो ऐसे वाहियात विचार तुम्हारे मन में आते रहते हैं. खाने में कुछ मिला कर वश में करने की बात तुम्हें बताई किस ने? इतनी पढ़ीलिखी होने के बावजूद यह अंधविश्वास? मेरी तो समझ से परे है. अगर खिलानेपिलाने से वश में करने के नुसखे कामयाब होते तो आज हर सास अपनी बहू की गुलाम होती, पति अपनी पत्नी का सेवक और हर बौस अपने मातहतों के हाथों की कठपुतली बन जाता.

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‘‘साधना, अपने दिमाग का इस्तेमाल करो, ये सब पाखंडी बाबाओं और मौलवियों के पैसा कमाने के साधन हैं. वे अपनी दुकानें चलाने के लिए अपने एजेंटों को ग्राहक फंसाने का काम सौंपते हैं. सब का अपनाअपना कमीशन होता है. अपने दिमाग का न इस्तेमाल करने वाली जनता से ही इन का खुराफाती बिजनैस फलफूल रहा है.’’

क्रोध और झुंझलाहट से बड़बड़ाता हुआ मैं बाहर आ गया और स्कूटी स्टार्ट कर के बैंक के लिए चल पड़ा.

साधना की बेतुकी बातों से मूड चौपट हो चुका था. बैंक में घुसते ही केबिन में रखा लैंडलाइन फोन बज उठा. जोनल औफिस से आने वाला बैंक में इस समय का नियमित फोन था. मैं ने ‘‘हैलो, गुडमौर्निंग सर’’ कहा और उधर से भी हैलो हुई, थोड़ी औपचारिक बातें हुईं और मेरी बैंक उपस्थिति दर्ज हो गई.

मैं अपने कार्य में लग गया. तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी. स्क्रीन पर ब्लू आइज देख कर लगा, अब मूड औन हो जाएगा.

‘‘सर…’’

‘‘आज शाम को तुम्हारे घर चलूंगा और डिनर भी करूंगा,’’ उस की पूरी बात सुने बिना मैं बोल पड़ा.

‘‘लेकिन सर, आज…’’

उस के घबराए स्वर को भांप कर मैं ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘सर, आज सुबह ही मम्मी को हार्टअटैक आया है. वे अस्पताल में भरती हैं,’’ कहती हुई वह लगभग रो पड़ी.

‘‘कौन से अस्पताल में हैं?’’ लेकिन उस के जवाब देने से पहले ही फोन कट गया. मेरे मिलाने पर वह उठा नहीं रही थी. शायद, अस्पताल में परेशान और व्यस्त होगी, यह सोच कर मैं ने फिर फोन नहीं किया.

शाम को भी उस का मोबाइल स्विच औफ था. 2 दिनों से उसे लगातार फोन करता रहा लेकिन उस का मोबाइल स्विच औफ ही मिला.

तीसरे दिन रविवार को उस का फोन आया. मन आशंकित हो उठा, न जाने कैसी खबर हो?

‘‘सर…’’

‘‘कमाल हो तुम भी, मैं लगातार 2 दिनों से तुम्हें फोन कर रहा हूं और तुम्हारा मोबाइल स्विच औफ जा रहा है,’’ मैं ने लगभग डांटते हुए, अधिकारपूर्वक उस से कहा लेकिन दूसरे ही क्षण मुझे आत्मग्लानि हुई कि मैं ने उस की मां की तबीयत के विषय में नहीं पूछा. धीरे से बोला, ‘‘सौरी मीठी, अब तुम्हारी मां की तबीयत कैसी है?’’

‘‘मम्मी ठीक नहीं हैं, सर. अस्पताल में दौड़धूप व उन की देखभाल में इतनी व्यस्त रही कि मोबाइल चार्ज करना ही भूल गई. और हमारा अपना है ही कौन जो मेरे फोन पर मेरी मम्मी का हाल पूछता. इस शहर में थोड़े समय पहले ही तो शिफ्ट हुई हैं हम मांबेटी.’’

‘‘क्या? तुम लोग अभी थोड़े वक्त पहले ही शिफ्ट हुई हो इस शहर में? और इतनी जल्दी खुद का मकान भी ले लिया जिस के आधार पर तुम बैंक से लोन लेना चाहती हो?’’ ऐसे नाजुक मौके पर भी मैं ने अपना बैंक वाला दिमाग दौड़ा लिया. मन में सोचा, मुझे बेवकूफ समझ रही है कल की लड़की. सोच रही है अपने नाम की तरह ही मीठी बातों में फंसा कर मुझ से लोन पास करवा लेगी.

‘‘सर, बात थोड़ी गंभीर है. फोन पर नहीं बता सकती. मुझे आप की मदद की सख्त जरूरत है. अगर आप मेरे घर आएंगे तो मेरी मम्मी से भी मिल लेंगे और मैं आप को अपनी बात खुल कर बता सकूंगी. मैं अपने घर का पता आप को अभी एसएमएस करती हूं.’’

जल्दी ही उस के पते का एसएमएस भी आ गया. उस का घर मेरे घर से काफी दूर था. एक बार को लगा, कहीं यह नीली आंखों वाली अपनी मां के साथ मिल कर मेरे खिलाफ कोई साजिश तो नहीं रच रही? नहीं, मैं नहीं जाऊंगा, आखिर मेरी उस से पहचान ही कितनी है? फिर अंदर से आवाज आई, इंसानियत के नाते बीमार को देखने जाना चाहिए. शायद वास्तव में उसे मेरी मदद की जरूरत हो? साधना को भी साथ ले जाऊंगा.

लेकिन दूसरे ही पल खयाल आया, अगर साधना को साथ ले गया तो मामला और पेचीदा हो सकता है. सुंदर और जवान लड़की को देख कर कहीं वह मेरे और उस के संबंधों को ले कर कोई गलत धारणा न बना ले और मुझ पर अधिक निगाह रखने लगे. हो सकता है मेरी जासूसी भी करे. आफत मेरी ही आएगी. इसलिए उसे साथ ले जाने का विचार त्याग  दिया और उस के घर जाने के लिए खुद को पूरी तरह से सतर्क व चौकन्ना कर लिया. साधना से कह दिया कि विजिट के लिए एक पार्टी के साथ जा रहा हूं.

उस का घर ढूंढ़ने में बहुत परेशानी हुई. काफी वक्त लग गया जबकि लगातार उस से मोबाइल पर घर की सिचुएशन पूछता रहा था. वह मुझे अपने घर के दरवाजे पर ही मिल गई. बेहद तनावग्रस्त, चिंतित और दुखी लगी. मुझे देख कर भरे स्वर में बोली, ‘‘थैंक्यू सर, प्लीज आइए,’’ कहती हुई मुझे अंदर ले गई जहां एक छोटे से कमरे में उस की बीमार मां लेटी थीं.

लगभग 50 वर्षीया एक महिला पलंग पर लेटी थीं, मुझे देख कर वे उठने का प्रयास करने लगीं. मैं ने रोक दिया, ‘‘प्लीज, आप लेटी रहिए.’’

‘‘मम्मी, आप बैंक मैनेजर आनंदजी हैं. अपने ब्यूटीपार्लर के लिए मैं लोन के सिलसिले में इन से मिली थी.’’

‘‘आनंदजी, प्लीज आप इस के ब्यूटीपार्लर के लिए लोन पास करवा दीजिए, जिस से यह आत्मनिर्भर हो जाए,’’ कमजोर स्वर में जब वे बोलीं तो मीठी ने उन्हें चुप कराते हुए कहा, ‘‘प्लीज मम्मी, आप बोलिए मत, मैं बात कर लूंगी, आनंदजी से.’’

‘‘सर, आप क्या लेंगे चाय या कौफी?’’ मीठी ने पूछा तो मैं ने कहा, ‘‘मीठी, मैं यहां चाय या कौफी पीने नहीं आया हूं. मैं तो तुम्हारी मां को देखने आया हूं. अब उन की तबीयत कैसी है? उन्हें हुआ क्या है?’’

मेरे यह पूछने पर वह असहज हो गई. फिर अपनी मां को दवाई खिलाती हुई बोली, ‘‘मम्मी, आप यह दवाई खा कर आराम करो. मैं आनंदजी को अपना घर दिखाती हूं. इसी के आधार पर हमें लोन मिलेगा.’’

मुझे उस का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा. इस की मां की तबीयत खराब है और इसे लोन की पड़ी है.

वह मुझे ऊपर एक कमरे में ले गई जो बहुत ही कलात्मक ढंग से सजा था और वहां सिर्फ एक बैड पड़ा था. बैड के अलावा वहां बैठने के लिए कोई कुरसी या स्टूल न था. लिहाजा, मुझे सकुचाते हुए उसी बैड पर बैठना पड़ा.

‘‘सौरी सर, मैं मम्मी के सामने आप को कुछ बता नहीं सकती थी, इसलिए आप को ऊपर ले कर आई हूं. इस समय मैं ने उन्हें वह दवाई दे दी है जिस से उन्हें गहरी नींद आ जाएगी.’’

यह सुन कर मेरी घिग्घी बंध गई. आखिर, यह लड़की कहना क्या चाहती है?

‘‘सर, हम लोग अलीगढ़ के नहीं, बल्कि आगरा के हैं. आगरा में हमारा छोटा सा खुशहाल परिवार था. मैं मीठी, मेरी मम्मी ममता और पापा मनोज. पापा ताजमहल में गाइड थे. उन के सपने बहुत ऊंचे थे. वे विदेश जा कर खूब पैसा कमाना चाहते थे. उन की इस चाहत और सपने को पूरा किया अमेरिका की सेरेना ने जो ताजमहल घूमते वक्त अपने गाइड की नीली आंखों की गहराई में इस कदर डूब गई कि उन्हें अपना बना कर ही दम लिया. वह बहुत अमीर थी, पापा यही तो चाहते थे. मम्मी बहुत रोईंगिड़गिड़ाईं, मेरा हवाला दिया लेकिन पापा नहीं पिघले. सेरेना ने हम मांबोटी को 15 लाख रुपए दे दिए या यों कहो, हमारे पापा की कीमत हमें दे दी. वे 15 लाख रुपए पा कर भी हम गरीब थे क्योंकि हमारे पापा हमारे पास नहीं थे.

‘‘औपचारिकता पूरी हो जाने के बाद पापा उस के साथ अमेरिका चले गए हमेशा के लिए. हम मांबेटी ने आगरा शहर छोड़ने का मन बना लिया. जिस प्रेम के प्रतीक ताजमहल की वजह से हमारा घरसंसार चलता था, हम सब मुहब्बत से रहते थे, उसी की वजह से हमारा सबकुछ हम से छिन गया क्योंकि हमारी दुनिया थे हमारे पापा. उन्होंने हमें बेशक भुला दिया था लेकिन हम उन्हें नहीं भुला सके थे, इसलिए हम आगरा में रहना ही नहीं चाहते थे.

‘‘हम अलीगढ़ आ गए. बरसों पहले जब नानाजी की पोस्टिंग अलीगढ़ में थी तब मम्मी यहां रही थीं, इसलिए उन्होंने अलीगढ़ को चुना. हम किराए के मकान में रहने लगे. हमें लगा ये 15 लाख रुपए धीरेधीरे खत्म हो जाएंगे. इसलिए हम ने एक ब्रोकर की मदद से 10 लाख रुपए का यह छोटा सा घर ले लिया. डेढ़ लाख रुपए में घर का जरूरी सामान खरीद लिया, 3 लाख रुपए मेरी शादी के लिए मम्मी ने गहने खरीद लिए और बाकी 50 हजार रुपए बैंक में जमा कर दिए.

‘‘मां ने घर का खर्चा चलाने के लिए एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली और ट्यूशन भी पढ़ाने लगीं. मैं कालेज के बाद ब्यूटीपार्लर का कोर्स करने लगी. इस कार्य में मैं पारंगत हो गई, तो सोचा, क्यों न घर के नीचे वाले हिस्से में ब्यूटीपार्लर खोल लूं. कमाई अच्छी होगी, घर की घर में भी रहूंगी.

‘‘लेकिन मम्मी, पापा की बेवफाई सह न सकीं और दिल की मरीज हो गईं. उन्हें अटैक पड़ा तो एंजियोग्राफी से पता चला उन की 2 आर्टरीज ब्लौक हैं. डाक्टरों ने एंजियोप्लास्टी के लिए बोला है. इस का खर्चा लगभग 2-3 लाख रुपए तो होगा ही. बस, इसी वजह से परेशान हूं कि इतना पैसा इतनी जल्दी कैसे मैनेज करूं? यह सब मम्मी को बता कर परेशान नहीं करना चाहती.’’

मेरे दिमाग ने सचेत किया, इस के झांसे में मत आना. हो सकता है यह सब मनगढ़ंत कहानी हो. मैं बोला, ‘‘मीठी, इस मामले में मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?’’

‘‘सर, मैं चाहती हूं अगर आप किसी भी तरह 3 लाख रुपए का इंतजाम करवा दें तो मैं आप का एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी. 50 हजार रुपए मैं अपने अकाउंट से निकाल लूंगी,’’ आशाभरी नजरों से उस ने मुझे ताकते हुए कहा.

लेकिन मैं अंदर से मजबूत था और उस की भावनाओं के जाल में फंसने वाला नहीं था. ‘‘मीठी, 3 लाख रुपए तो बहुत होते हैं. 10-20 हजार रुपए की रकम होती तो मैं अभी दे देता. 3 लाख रुपए तो मेरे खाते में भी नहीं है,’’ मैं ने झूठ बोला हालांकि मैं जानता था कि उसे पता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं क्योंकि एक बैंक मैनेजर के खाते में 3 लाख रुपए नहीं होंगे, ऐसा नहीं हो सकता.

‘‘सर, मैं आप से पैसा नहीं, बल्कि सहयोग मांग रही हूं. आप मेरे गहने गिरवी रखवा कर पैसा दिलवा दें क्योंकि ऐसा काम कोई भरोसेमंद इंसान ही कर सकता है.’’

‘‘तुम मुझ पर किस आधार पर विश्वास कर रही हो? तुम तो सिर्फ एक बार ही मुझ से मिली हो.’’

‘‘उम्र भले ही कम हो मेरी लेकिन वक्त और हालात ने मुझे इतना परिपक्व कर दिया है कि इंसान की नीयत और फितरत को पहचानने में कभी गलती नहीं करती हूं,’’ आत्मविश्वास से भरे स्वर में वह बोली.

मेरी जिज्ञासा बढ़ी और मुसकरा कर बोला, ‘‘जरा मेरी नीयत और फितरत तो बताओ.’’

‘‘सर, आप परीक्षा ले रहे हैं मेरी. लेकिन मैं सच जरूर बताऊंगी.’’

मैं मन ही मन थोड़ा डर गया, पता नहीं मेरे बारे में क्या बताए? लेकिन मैं हंस कर बोला, ‘‘हांहां, बताओ, जरा मैं भी तो सुनूं मेरे बारे में क्या धारणा है तुम्हारी?’’

‘‘आप बहुत ही नेकदिल और ईमानदार इंसान हैं लेकिन मुझे ले कर आप थोड़ा आशंकित व भयभीत हैं. कहीं मैं आप के साथ फ्रौड या धोखा न कर दूं.’’

हालांकि वह सच कह रही थी लेकिन मैं ने कहा, ‘‘नहीं, मीठी तुम गलत बोल रही हो, ऐसा कुछ भी नहीं है.’’

‘‘नहीं सर, आप अपनी जगह ठीक हैं. 3 लाख रुपए की रकम कोई छोटीमोटी तो है नहीं जो किसी अजनबी को दे दी जाए. अगर आप की जगह मैं होती तो शायद मैं भी हिचकिचाती. लेकिन आप मेरे गहने ले जाइए और अपने किसी परिचित व विश्वसीनय सुनार से उन की जांच करवा लीजिए. और फिर पैसा दिलवा दीजिए. मैं मम्मी की जल्दी से जल्दी एंजियोप्लास्टी कराना चाहती हूं.’’

मैं ने मन में सोचा जब यह लड़की अपने कीमती गहने मुझे सौंप रही है, सिर्फ मुझ पर विश्वास कर के तो इंसानियत के नाते मुझे भी इस की मदद करनी चाहिए.

‘‘ठीक है, मेरा एक खास परिचित ज्वैलर है. वह यह काम भी करता है. मैं अभी उस से फोन पर बात कर के देखता हूं.’’

‘‘सर, अगर पैसा आज ही मिल जाए तो बेहतर होगा. कल सुबह ही टैक्सी कर के मम्मी को दिल्ली ले जाऊंगी.’’

मैं ने ज्वैलर से बात की तो उस ने हां कर दी. मैं ने मीठी से पूछा, ‘‘गहने घर पर हैं या लौकर में?’’

‘‘मैं ने कल ही गहने और कैश लौकर से निकाल लिए थे, पता नहीं कब जरूरत पड़ जाए,’’ कहती हुई वह एक बैग ले आई और सारे गहने दिखा दिए.

‘‘चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं ने ज्वैलर को टाइम दे दिया है.’’

‘‘मैं क्या करूंगी वहां जा कर? आप हो तो सही.’’

‘‘नहीं मीठी, तुम्हें चलना पड़ेगा. गहने कितने वजन के हैं? कितने रुपए के हैं. लिखापढ़ी, रसीद बहुतकुछ होता है. जल्दी चलो और अपनी मां को भी बता दो.’’

‘‘सर, मुझे आप पर पूरा भरोसा है, प्लीज आप जल्दी जाइए.’’

‘‘मीठी, मुझे यह ठीक नहीं लग रहा. उस ज्वैलर को इन गहनों के बारे में क्या बताऊंगा? तुम साथ होगी तो मुश्किल नहीं होगी.’’

‘‘कह देना, एक दूर की रिश्तेदार के हैं, बीमारी की वजह से आने में असमर्थ हैं,’’ कहती हुई वह मुसकरा पड़ी.

मन में आया कह दूं कि तुम दूर की नहीं, मेरे दिल की रिश्तेदार हो.

गहनों का बैग ले कर मैं तुरंत निकल पड़ा. इस दौरान साधना के पचासों फोन आए लेकिन मैं ने रिसीव नहीं किए. हर बार काट दिए. रास्ते में फिर फोन बजा. मुझे पता था कि उसी का होगा. सुबह का निकला और लगभग शाम हो चली, चिंता तो कर रही होगी, इसलिए स्कूटी साइड में रोक कर बात की.

‘‘अरे, सुबह से कहां हो आप? एक कप चाय पी कर निकले हो. फोन करना तो दूर, मेरा फोन भी काट रहे हो. कहीं किसी मुसीबत में तो नहीं हो,’’ वह घबराए और आशंकित स्वर में बोली.

‘‘नहीं साधना, मैं किसी मुसीबत में नहीं हूं. बस, हुआ यों, मैं जिस पार्टी के साथ था उस की मां की अचानक तबीयत खराब हो गई तो मानवता के नाते मैं उस के साथ अस्पताल में हूं. तुम परेशान मत हो,’’ बड़ी सफाई से झूठ बोलते हुए मैं ने उसे आश्वस्त कर दिया.

ज्वैलर्स की दुकान पर पहुंच कर जैसे ही गहनों का बैग खोला तो ज्वैलर शरारत से मुसकरा कर बोला, ‘‘बैंक मैनेजर साहब, किस का लौकर तोड़ दिया?’’

‘‘अरे यार, बात यह है कि…’’

‘‘जुए में बुरी तरह हार कर भाभी के गहने चुरा लाए हो. लेकिन याद रखो दोस्त, जैसे ही भाभी को पता चलेगा, वे तुम्हें रुई की तरह धुन देंगी,’’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह फिर शरारत पर उतर आया था.

‘‘अरे भाई, यह मस्तमजाक छोड़ो. पहले मेरी बात सुनो. मेरे एक दूर के रिश्तेदार हैं जो बहुत बीमार हैं. उन्हें तुरंत दिल्ली के एक अस्पताल में ले जाना है, जहां उन का औपरेशन होना है. ये गहने उन्हीं के हैं. उन्हें पैसों की सख्त जरूरत है. इन की जल्दी से जांच कर लो कि असली हैं या नकली? अगर असली हैं तो इन्हें गिरवी रख कर कितना पैसा मिल जाएगा.’’

वह शीघ्र ही गहनों की शुद्धता की जांच करने लगा और बोला, ‘‘गुरु, शुद्ध खालिस सोने के हैं.’’

‘‘क्या कीमत होगी इन की?’’

उस ने जल्दी ही गहनों को तोल कर बताया, लगभग 3 लाख रुपए के हैं. मैं पूरे 3 लाख रुपए दे दूंगा क्योंकि किसी जरूरतमंद बीमार के लिए चाहिए और आप मेरे खास परिचित भी हो. उस ने गहनों की लिखापढ़ी, लिस्ट, रसीद सबकुछ देते हुए पूरे 3 लाख रुपए भी दे दिए.

रुपए ले कर निकला तो बाहर गहरा अंधेरा हो गया था. मैं ने स्कूटी मीठी के घर की तरफ दौड़ा दी. अपना मोबाइल भी स्विच औफ कर लिया क्योंकि मुझे पता था साधना बारबार फोन करेगी. घर जा कर कह दूंगा कि बैटरी डिस्चार्ज हो गई थी. उस के घर पहुंचतेपहुंचते रात हो चुकी थी.

वह दरवाजे पर खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी. मुझे जल्दी से ऊपर कमरे में ले गई, ‘‘सर, काम बना?’’

‘‘हांहां, बन गया. पूरे 3 लाख रुपए हैं, गिन लो,’’ कहते हुए मैं ने उसे नोटों का बैग थमा दिया.

‘‘थैंक्यू सर,’’ कहती हुई वह भावावेश में मुझ से कस कर लिपट गई. मैं हक्काबक्का रह गया. यह अप्रत्याशित स्थिति मेरे लिए अकल्पनीय थी. इस के लिए मैं तैयार न था. लेकिन उस के जिस्म की गरमी, सांसों की तेज रफ्तार…मैं खुद पर काबू न रख सका और उसे बेतहाशा चूमने लगा.

– क्रमश:

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