गृहशोभा विशेष

यह मीटिंग सोसायटी के क्लब हाउस में हो रही थी. मीटिंग सिर्फ बहुओं की थी. अब आप कहेंगे कि इस में नया क्या है? सासबहू में तो सदियों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. पीडि़त बहुएं तो घरघर मिल जाएंगी. हां, यह भी ठीक है. मगर ये बहुएं थोड़ा हट कर हैं. पढ़ीलिखी, अपडेट और सास से दूर पति संग अलग आशियाने में आजाद रहने वाली यानी इन की सासें परदेश में बसती हैं या यह भी कह सकते हैं कि ये सासूबाड़ी छोड़ कर परदेश में बसी हुई हैं. फिर दुख काहे का? सास साथ नहीं रहतीं तो फिर कैसी टैंशन? यही तो बात है. ‘सासूमां साथ नहीं तो टैंशन नहीं’ लोग यही समझते हैं. घूमोफिरो मौज करो, जैसी मरजी वैसा जीने का नियम बनाओ. लेकिन जरा रूबी, सोनी, दीपा, स्वीटी, पल्लवी, सोनम, अर्चना, कनक… लंबी लिस्ट है. इन की दुखती रग पर हाथ रखो तो पता चलेगा कि सासें दूर रह कर भी कैसे इन पर हुक्म चलाती हैं और तब इन के दिल पर क्या बीतती है सहज अंदाजा लगा सकती हैं… त्राहित्राहि करती हैं ये बेचारियां. किस से करें फरियाद और कौन सुनेगा इन की फरियाद.

ये होपलैस बहुएं दूसरे शहरों में रहने वाली अपनी सासों से परेशान हो कर आज मीटिंग कर रही हैं. इस मीटिंग का धांसू आइडिया मिसेज अग्रवाल का है. वे यूएसए में रहती हैं. 2 साल बाद त्योहार पर भारत आईं है. होली मिलन समारोह में हंसीठट्ठे के बीच उन्होंने कुबूल किया, ‘‘यहीं से बैठेबैठे मेरी सास अपना शासन चलाती हैं. उफ, मैं तंग आ जाती हूं… कई बार लगता है सात समंदर पार रहने का कोई फायदा नहीं. बिंदी भले ही नहीं लगाती हूं, पर सास का हुक्म सिरमाथे पर लगा कर रहना पड़ता है.’’ हंसीमजाक में जो बात निकली तो दूर तक गई. मैडम सोनम ने ताड़ लिया कि मामला गड़बड़ है. अत: वे मिसेज अग्रवाल के पीछे पड़ गईं. उन्होंने उन से सास के कुछ राज भी उगलवा लिए. वे खुद भी दूसरे शहर में रहने वाली अपनी सासूमां से त्रस्त थीं. आरती अग्रवाल ने प्रस्ताव रखा, ‘‘कल हम लोग क्लब हाउस में मिलें और वहां अपनीअपनी बात रखें. हम सब मिल कर इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करें कि कैसे सासू मां की दखलंदाजी नहींनहीं तीरंदाजी से छुटकारा पाया जाए.’’

सोसायटी की लगभग सारी बहुएं मीटिंग में आ गई थीं. मिसेज अग्रवाल ने मोरचा संभाला, ‘‘अपनीअपनी सासूमां से त्रस्त फ्रैंड्स, आप सब को पता है कि हम यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं? हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, इसलिए सब बिना किसी लागलपेट के अपनीअपनी परेशानी यहां रखें और फिर मिलजुल कर समाधान ढूंढ़ने का प्रयास करें. आप लोग जानती ही हैं कि मैं सात समंदर पार रहती हूं. पता है सासूमां की जिद की वजह से मुझे इस होली पर यहां आना पड़ा. वैसे यहां आ कर घरपरिवार के लोगों से मिलनाजुलना मुझे भी अच्छा लगता है लेकिन फ्रैंड्स इस बार मैं यहां इसलिए नहीं आना चाहती थी. क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. डाक्टर ने 2-3 महीनों तक लंबी यात्रा करने से मना किया था.

सासूमां ने अपने बेटे को औफिस में बारबार फोन कर परेशान कर दिया कि देखो तनु सिर्फ बहाने बना रही है और कुछ नहीं. वह यहां आना ही नहीं चाहती. एक बार नहीं आएगी तो फिर हर बार नए बहाने बनाएगी. बेटे को जाने क्या पाठ पढ़ाया कि उन्होंने टिकट ले कर सीधे मुझे फरमान सुना दिया कि तुम्हें होली मां के साथ ही मनानी है.

इतना ही नहीं, सासूमां रोज वीडियो कौल कर के कोई न कोई हिदायत देती रहती हैं… कभी सुबहसुबह कहती हैं कि आज वृहस्पतिवार है. याद दिला रही हूं… तुम्हें तो कुछ याद रहता नहीं रहता … आज कपड़े मत धोना. और हां, सत्तू के पराठे मत बना लेना. तुम दोनों को बहुत पसंद हैं… जबतब बना लेती हो. वीडियो चैट में वे लंच बौक्स तक देखती हैं कि उस में सत्तू के परांठे तो नहीं हैं. मैं कितनी परेशान हूं बता नहीं सकती… ऐसीऐसी ऊलजलूल बातें करती हैं कि झेलना मुश्किल हो जाता है.

‘‘बेड़ा गर्क हो नैटवर्क कंपनियों का, जिन्होंने हमारी सासों के हाथों में फ्री नैटवर्करूपी मजबूत मिसाइल थमा दी है… क्या बताऊं यहां आने के 2 दिन पहले की बात है. हम लोग डिनर कर रहे थे. बड़े प्यार से इन्होंने खीरा, टमाटर और गाजर का सलाद काटा था. हम लोगों को यह सलाद बहुत पसंद है. सासूमां की नजर उस प्लेट पर पड़ गई. फिर क्या था उन्होंने उसी समय उसे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि रात में ये ठंडी चीजें क्यों खा रहे हो तुम लोग? याद नहीं सोमू को पिछले साल डाक्टर ने रात में सलाद खाने से मना किया था… फिर से सर्दीवर्दी हो गई तो… और तब तक वीडियो चैट करती रहीं जब तक कि हमारा डिनर खत्म नहीं हो गया.’’ ‘‘उफ,’’ सब के मुंह से एकसाथ निकला. यह सब की आह थी.

मिसेज अग्रवाल ने सब की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. जब सब की सांस में सांस आई तो अंकिता ने अपनी बात रखी, ‘‘मेरी सासूमां गांव में रहती हैं, जो अब आधाअधूरा शहर हो गया है. उन का फरमान है कि हर पर्वत्योहार वहीं आ कर उन के साथ मनाएं. शादी के 12 साल बीत गए हैं. यह सिलसिला जारी है. वहां जा कर त्योहार क्या मनाना, सारा दिन किचन में ही बीत जाता है.

‘‘अब बेटियां भी बड़ी हो रही हैं. वे वहां नहीं जाना चाहतीं. वहां हम लोग न तो अपनी पसंद का खा सकते हैं, न ही पहन सकते हैं और न ही मौजमस्ती कर सकते हैं. मैं किसी फैस्टिवल पर अपने हिसाब से घर सजाने के लिए तरस गई हूं. पति से कुछ कहती हूं तो कहते कि निभाना तो पड़ेगा ही. अब जब त्योहार आने वाला होता है, तो मन बुझ जाता है.

औफिस में ज्यादा काम होने की वजह से इस बार होली में इन्हें सिर्फ 2 दिन की छुट्टी मिलने वाली थी. मैं और मेरी बेटियां खुश थीं कि इस बार हम अपने मनमुताबिक होली मनाएंगे. लेकिन आप लोगों ने देखा है न कि सासूमां होली से सप्ताहभर पहले खुद आ गईं और मोरचा संभाल लिया.’’ एक बार फिर सब की आह फिजां में फैल गई.

अब रागिनी ने बड़े दुखी स्वर में राग छेड़ा, ‘‘2-3 महीने पहले की बात है. मेरी ससुराल में दूर के रिश्ते की चाची का निधन हो गया. हमारी शादी को 14 साल हो गए हैं. मैं ने 1 बार भी उन्हें नहीं देखा. यहां तक कि वे किसी शादीब्याह में भी नहीं आती थीं. उन के परलोक गमन के बाद सासूमां का संदेशा आया कि हमारे यहां का रिवाज है कि किसी की मौत के बाद 10वीं तक घर में रोटी नहीं बनती. दालसब्जी में छौंक नहीं लगता. हलदीहींग भी नहीं डालते यानी उबला खाना खाते हैं. मैं ने पति से कहा कि हम ये सारी रस्में कैसे निभा पाएंगे? फिर बच्चों को स्कूल के लिए लंच ले जाना होता है. वे क्या ले जाएंगे, क्या खाएंगे? लेकिन न सास मानीं, न पति. मैं ने जिद ठानी तो पति ने ऐलान किया कि ठीक है, तुम खाना मत बनाओ. मैं खुद बनाऊंगा. अब बताइए मैं क्या करती? यही नहीं हमारी ससुराल में 10वीं के दिन सिर मुड़ाने का रिवाज है. इन्होंने खुद का तो सिर मुड़वाया ही, 7 साल के बेटे का भी मुंडन करवा दिया. वह रोता रहा कि मुझे अपने बाल नहीं कटवाने… मुझे स्कूल में नाटक में भाग लेना है. उन्होंने उस की एक नहीं सुनी…’’

‘‘हाय रे बेचारा बच्चा,’’ सब के मुंह से निकला. कुछ पलों के लिए वातावरण में सन्नाटा छा गया. फिर स्वीटी की स्वरलहरी हवा में तैरने लगी, ‘‘मेरी सास छोटे शहर में रहती हैं. शादी को 2 साल ही हुए हैं और मैं उन की हिदायतों से परेशान हो गई हूं. आप लोग जानती ही हैं कि मैं प्रैगनैंट हूं. वे वहीं से फोन कर कहती हैं कि शाम के समय बाहर न निकलूं. शाम में बुरा साया गर्भस्त शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है. मैं शाम को सैर करने के लिए तरस गई हूं.

‘‘न मैं किसी पार्टी में जा पाती हूं और न थिएटर या मौल में. पति शाम में आते हैं. वे बाहर ले जाना चाहते हैं, लेकिन इसी सोसायटी में रिश्ते की एक ननद रहती हैं. वे सासूमां को सारी इन्फौर्मेशन पहुंचा देती हैं और फिर सासूमां फोन पर मुझे डांटती हैं. पति की भी क्लास लगती है. इसलिए अब पति भी शाम के बाद कहीं नहीं ले जाते. अब तो किसी जरूरी चैकअप के लिए भी शाम में निकलने पर कांप जाती हूं कि न जाने सासूमां का कब कौन सा कहर टूट पड़े.’’

‘‘उफ,’’ एक तो प्रैगनैंट, उस पर सारा दिन घर में अकेली और शाम को दूर बैठी सास मिसाइल दागना शुरू कर देती हैं. लेकिन चारा क्या है.

1-1 कर सभी बहुएं अपनीअपनी मिसाइल रूपी सास का गुणगान करती गईं और साथ ही आह, ओह, हाय, उफ के साथ संवेदनशील खुसुरफुसुर भी करती रहीं. मीटिंग थी कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी और न ही कोई हल निकल पा रहा था. अनीता भाभी बड़ी देर से सिर पर हाथ रख कर कुछ सोच रही थीं. तीर मारने वाले अंदाज में उठीं और बड़े जोश में हवा में हाथ लहरा कर बोलीं, ‘‘लेकिन हमारे पति तो अपनी मां को समझा सकते हैं न… अगर वे लोग उन्हें समझाएं तभी कुछ बात बने… चुगली करने वाले रिश्तेदारों को भी पाठ पढ़ाना पड़ेगा…’’

अभी वो कुछ और कहना चाहती थीं कि अचानक लेकिन कहतेकहते रुक गईं और मुख्य दरवाजे की ओर इशारा करने लगीं. सब ने देखा सलोनी मिश्रा की सास अचानक प्रकट हो गई थीं. भारीभरकम डीलडौल, भराभरा गोलमटोल चेहरा, मोटीमोटी काली आंखें… हरदम अपने साथ छाता रखतीं, हर मौसम में. उस छाते को उन्होंने मिसेज अग्रवाल की ओर ऐसे ताना जैसे मिसाल छोड़ रही हों, ‘‘अरे ओ मैडम, सलोनी कहां है, बताएंगी? इतनी भीड़ में कहां खोजूं उसे… हम इतनी दूर से आए हैं और वह हम से आंखमिचौली खेल रही है… और तुम लोग यहां एकसाथ क्यों जमा हुई हैं. कोई साजिश रच रही हैं क्या? चलोचलो… कोई कामधाम है या नहीं?’’

सलोनी को ढूंढ़ती उन की आंखें ऐसे बाहर निकली जा रही थीं जैसे सब को खा जाएंगी. सलोनी ने तेजी से उठ कर सासूमां के पैर छुए और उन के साथ ही निकल गई. मीटिंग में जैसे भूचाल आ गया हो. अब गु्रप में बंट कर बहुएं खुसुरफुसुर करने लगी थीं… मिसेज अग्रवाल कब कहां गायब हो गई किसी को पता ही नहीं चला. एक मिसाइल ही सब पर भारी पड़ गया.

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