ऐंबैसेडर कार को कौन नहीं जानता. यह नाम किसी परिचय का मुहताज नहीं है. भारत की सब से मजबूत कार के रूप में पहचानी जाने वाली ऐंबैसेडर कार को भारत सरकार का अधिकृत वाहन माना जाता रहा है. पुलिस और सेना में भी इस का रुतबा कायम रहा है. नेताओं से ले कर अभिनेता तक ऐंबैसेडर सभी की पसंदीदा कार रही है, लेकिन बदलते वक्त और बढ़ती आधुनिकता ने इस कार की मांग, अहमियत और रुतबे को न केवल प्रभावित किया, बल्कि इस के अस्तित्व को ही खत्म कर दिया.

24 मई को पश्चिम बंगाल के उत्तरपारा में स्थित हिंदुस्तान मोेटर्स ने घटती बिक्री औैर हर महीने 7-8 करोड़ के हो रहे घाटे की वजह से ऐंबैसेडर के उत्पादन कार्य को हमेशा के लिए बंद कर दिया, जिस के साथ ही इस का नाम इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया.

एक वक्त था जब लोगों के बीच यह कार स्टेटस सिंबल हुआ करती थी. जिस घर में यह कार होती, उस घर के लोगों को समृद्घशाली समझ जाता. भारतीय लोकतंत्र में भी इसे शानोशौकत का प्रतीक समझ जाता. लेकिन वक्त बदलने के साथसाथ किसी ढलती उम्र के अभिनेता की तरह ऐंबैसेडर कार की भूमिका भी बदलती चली गई. धीरेधीरे यह कार टैक्सी और दूल्हादुलहन को ढोने के काम आने लगी.

लेकिन ऐंबैसेडर को झटका तब लगा जब सरकारी महकमे ने सुरक्षा कारणों से ऐंबैसेडर की जगह दूसरी गाडि़यों का इस्तेमाल शुरू कर दिया. सब से पहले 2003 में अटल बिहारी बाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने ऐंबैसेडर की जगह बीएमडब्ल्यू को चुना. इस के बाद धीरेधीरे कर के सभी नेताओं ने अपनीअपनी पसंद की विदेशी गाडि़यों को चुनना शुरू कर दिया.

पिछले कुछ सालों से तो सरकारी विभाग में ऐंबैसेडर कारों की खरीद लगभग शून्य ही हो गई थी. साथ ही आम जनता ने भी ऐंबैसेडर को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था. बस यहीं से ऐंबैसडर के बुरे दिन शुरू हो गए.  

देश में प्रथम स्वदेशी कार बनाने वाली हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड ने 1942 में ऐंबैसेडर का उत्पादन शुरू किया था. तब से अब तक के बीच कई नई देशीविदेशी कार कंपनियां नई तकनीकों से लैस अपनीअपनी कार मौडलों को पेश कर चुकी हैं, जिन के मुकाबले ऐंबैसेडर में बहुत से बदलावों की जरूरत थी. लेकिन इन जरूरतों को कंपनी पूरा नहीं कर सकी जिस के चलते इस कार को आने वाले वक्त में इतिहास के पन्नों में दफन होना पड़ेगा.