देश में बहुत ऐसे शहर हैं जिन के नाम से साड़ियां मशहूर हैं. वाराणसी ऐसा ही शहर है. यहां की बनारसी साड़ियां पूरी दुनिया में मशहूर हैं. हर तरह के बजट में ये साड़ियां मिलती हैं. साड़ियों के साथ ही साथ वाराणसी की पहचान गंगा के किनारे बने बहुत सारे घाट भी हैं.

सुबह के समय सूर्य की किरणें जब नदी के जल पर पड़ती हैं तो घाटों की शोभा देखते ही बनती है. वाराणसी की सुबह मशहूर है, इसलिए उत्तर प्रदेश में शामेअवध यानी लखनऊ के साथ साथ सुबहे बनारस भी मशहूर है.

अर्द्धचंद्राकार गंगा के किनारे लगभग 80 घाट बने हुए हैं. यह शहर वरुणा और अस्सी नदियों के बीच बसा हुआ है, इसलिए इस को वाराणसेय कहा जाता था. जो बाद में वाराणसी हो गया. अस्सी और वरुणा नदियां तो अब यहां नहीं दिखतीं लेकिन इन की यादें यहां रहने वालों के दिलों में बसी हुई हैं.

वाराणसी भी कला, संस्कृति और शिक्षा का केंद्र है. संगीत इस शहर को विरासत में मिला हुआ है. शास्त्रीय संगीत के बड़े कलाकार यहीं के रहने वाले हैं. काशी हिंदू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए विदेशों से भी छात्र आते हैं. पंडों पुजारियों का आतंक यहां भी कायम है. पर्यटकों को इन से बचने की जरूरत है.

बनारस की कचौड़ी गली

बनारस आएं और यहां की कचौड़ी गली न जाएं, यह हो नहीं सकता. कचौड़ी गली विश्वनाथ मंदिर और मणिकर्णिका घाट के बीच पड़ती है. काफी समय पहले यह वैसी ही थी जैसे दिल्ली में परांठे वाली गली है.

पहले यहां पर 40 से 50 कचौड़ी की दुकानें होती थीं. अब कचौड़ी गली में केवल 4 से 5 दुकानें ही बची हैं. यहां कचौड़ी के साथ साथ क्राफ्ट और बनारसी साड़ियों की दुकानें खुल गई हैं. इस के बाद भी कचौड़ी गली बहुत मशहूर है.

यहीं पास के गणपति गैस्ट हाउस के शंभूनाथ त्रिपाठी कहते हैं, ‘‘देशी पर्यटक ही नहीं, विदेशी पर्यटक भी कचौड़ी गली के प्रशंसक हैं.’’ कत्थक आर्टिस्ट गुजंन शुक्ला कहते हैं, ‘‘कचौड़ी गली से जुड़ी कई और गलियां हैं. कुंज गली में बनारसी साड़ी के साथ कचौड़ी भी बिकती है. इस में राम भंडार, बाबूलाल और भरतशाह की कचौड़ी की दुकानें हैं.’’

अब कचौड़ी के साथ ही साथ यहां की आलू की टिक्की, पानी के बताशे और टमाटर चाट मशहूर हैं. कचौड़ी बनारस का सब से पंसद किया जाने वाला नाश्ता है. ऐसे में हर पर्यटक को यहां की कचौड़ी गली पसंद आती है.