उत्तर प्रदेश: शाम-ए-अवध तो सुबह-ए-बनारस

By Shailendra Singh | 2 January 2017

पर्यटन के शौकीनों के लिए उत्तर प्रदेश में हर रंग और मिजाज के पर्यटन स्थल मौजूद हैं. सियासत, संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और आधुनिकता को खुद में समेटे यहां के पर्यटन स्थल सैलानियों को बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं.

उत्तर प्रदेश में घूमने के लिहाज से लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी,  झांसी और आगरा शहर ऐसे हैं जो सर्दियों में पर्यटकों को अच्छे लगते हैं. इस के अलावा कौशांबी, श्रावस्ती, सारनाथ, कुशीनगर और चित्रकूट भी लोग घूमने जाते हैं. लखीमपुर जिले में दुधवा नैशनल पार्क भी लोगों को खूब पसंद आता है. जाड़ों का मौसम घूमने के लिहाज से अच्छा माना जाता है. उत्तर प्रदेश में जाड़ों का मौसम अक्तूबर से मार्च तक का माना जाता है.

उत्तर प्रदेश के किसी भी पर्यटन स्थल तक पहुंचने के लिए अच्छे साधन हैं. इन में हवाई यात्रा के साथसाथ रेल और बस यात्रा भी शामिल हैं. उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम ने बससेवा के जरिए पर्यटन स्थलों को एकदूसरे से जोड़ रखा है. खास शहर में पर्यटन विभाग के होटलों के साथसाथ नए बन रहे मौल और पार्क भी खूब लुभाते हैं. अवधी खाने के साथ बड़े नाम वाले रेस्तरां में भी खाना मिल जाता है.

धार्मिक स्थलों पर घूमते समय सावधान रहें. यहां पर कई किस्म के पंडे पूजापाठ के बहाने घूमने वालों को फंसाने की कोशिश करते हैं. चढ़ावा चढ़ाने के लिए तरहतरह का लालच देते हैं. इस के बहाने ठगने का प्रयास करते हैं. कई बार पर्यटक इन के  झांसे में पड़ जाते हैं. विदेशी मेहमान इन के खास निशाने पर होते हैं.

नवाबी शहर लखनऊ

घूमने के लिहाज से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ बहुत ही साफसुथरी और ऐतिहासिक जगह है. नवाबी शासनकाल और अंगरेजी शासनकाल में बनी इमारतें वास्तुकला का बेजोड़ नमूना हैं. नवाबी काल में अवध के अदब और तहजीब का विकास हुआ. लखनऊ की रंगीनियों और शानोशौकत के किस्से भी खूब चटखारे ले कर सुने और सुनाए जाते हैं.

बदलता लखनऊ आज मैट्रो सिटी के रूप में आगे बढ़ रहा है. इस के बावजूद अपनी पुरानी नजाकत और नफासत को भी इस शहर ने संभाल कर रखा है. यह शहर अब सियासी तेजी और फैशन के बदलते अंदाज के लिए भी जाना जाता है.

लखनऊ की शाम का जादू शामेअवध के नाम से जाना जाता है. लखनऊ में पश्चिमी खाने से ले कर देशी खाने तक का निराला स्वाद लिया जा सकता है. लखनऊ में खाने के लिए चाट, समोसे, कचौड़ी, कुल्फी के अलावा कबाब और बिरयानी का स्वाद लिया जा सकता है. हजरतगंज बाजार बहुत ही मशहूर है. यहां मनोरंजन के लिए कई अच्छे मल्टीप्लैक्स सिनेमा हौल खुल गए हैं. खरीदारी करने के लिए मौल खुल  गए हैं, जहां पर एक ही जगह पर सारा सामान मिल जाता है. लखनऊ आने वाले लोग चिकन की कढ़ाई वाले कपड़े और गुलाब रेवड़ी जरूर खरीदते हैं.

लखनऊ को बागों और पार्कों का शहर भी कहा जाता है. यहां पर कई अच्छे पार्क बने हुए हैं. सब से अच्छा बोटैनिकल गार्डन पार्क है. यहां पर गुलाब सहित तमाम दूसरे पौधों की कई किस्में देखने को मिल जाती हैं. इस के अलावा हाथी पार्क, गौतम बुद्ध पार्क, नदिया किनारे पार्क, पिकनिक स्पौट, लोहिया पार्क और डा. अंबेडकर पार्क भी घूमने के लिहाज से अच्छी जगहें हैं. मौजमस्ती के लिए आनंदी वाटर पार्क भी है. जाड़ों में घूमने वालों के लिए पर्यटन विभाग यहां लखनऊ महोत्सव के अलावा कई आकर्षक कार्यक्रम कराता है. हजरतगंज, अमीनाबाद और गोमतीनगर में घूमने व खरीदारी करने की तमाम जगहें हैं.

लखनऊ घूमने जो भी आता है वह सब से पहले बड़ा इमामबाड़ा यानी भूलभुलैया जरूर देखना चाहता है. यह लखनऊ की सब से मशहूर इमारत है. इस इमारत का पहला अजूबा 49.4 मीटर लंबा और 16.2 मीटर चौड़ा एक हौल है. इस में किसी तरह का कोई खंभा नहीं है. इस के एक छोर पर कागज फाड़ने जैसी आवाज भी दूसरे छोर पर आसानी से सुनी जा सकती है. इस इमारत का दूसरा अजूबा 409 गलियारे हैं. ये सब एक जैसे दिखते हैं और समान लंबाई के हैं. ये सभी एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. इन में घूमने वाले अकसर रास्ता भूल जाते हैं. इसीलिए इस को भूलभुलैया कहा जाता है.

इमामबाड़ा से थोड़ी दूर पर एक छोटा इमामबाड़ा बना हुआ है. दूर से यह इमामबाड़ा ताजमहल जैसा दिखता है. बड़े इमामबाड़े और छोटे इमामबाड़े के बीच के रास्ते में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं. इन को पिक्चर गैलरी, घड़ी मीनार और रूमी दरवाजा के नाम से जाना जाता है. इन सब जगहों पर जाने के टिकट बड़े इमामबाड़े से ही एकसाथ मिल जाते हैं. रेजीडैंसी लखनऊ की ऐतिहासिक इमारत है. इस की दीवारों पर आज भी आजादी की लड़ाई के चिह्न मौजूद हैं. यहां बना खूबसूरत लौन इस की खूबसूरती को विशेष आकर्षण प्र्रदान करता है. जाड़ों में घूमने वालों को लौन पर बैठना बहुत अच्छा लगता है. रेजीडैंसी के करीब ही शहीद स्मारक बना हुआ है. 1857 में शहीद हुए वीरों की याद में इसे गोमती नदी के किनारे बनवाया गया था. जाड़ों में यहां पर नौका विहार का मजा भी लिया जाता है. लखनऊ की शान है विधानसभा की खूबसूरत इमारत.

लखनऊ का चिडि़याघर बहुत ही आकर्षक बना हुआ है. बच्चों को घुमाने के लिए छोटी रेलगाड़ी का इंतजाम किया गया है. चिडि़याघर के अंदर एक राज्य संग्रहालय भी है जिस में ऐतिहासिक सामानों को रखा गया है. यह जाड़ों में घूमने की सब से खास जगह है.

वाराणसी

वाराणसी शहर गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है. इस को घाटों का शहर भी कहा जाता है. सुबह के समय सूर्य की किरणें जब नदी के जल पर पड़ती हैं तो इन घाटों की शोभा देखते ही बनती है. वाराणसी की सुबह बहुत मशहूर है. इसीलिए उत्तर प्रदेश में शामेअवध के साथसाथ सुबहेबनारस भी मशहूर है. अर्द्धचंद्राकार गंगा के किनारे लगभग 80 घाट बने हुए हैं.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए विदेशों से भी छात्र आते हैं. पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रत्येक विषय की उच्च स्तरीय पढ़ाई होती है. यह एशिया का सब से बड़ा आवासीय विश्व- विद्यालय है. भारत कला भवन इस विश्वविद्यालय की शोभा है. इस की कलावीथिका में अनेक कलाकृतियां रखी हैं. वाराणसी में तैयार होने वाली साडि़यों को बनारसी साड़ी के नाम से जाना जाता है.

वाराणसी के पास बसे भदोही शहर का कालीन उद्योग भी बहुत खास है. धार्मिक खासीयत वाले वाराणसी शहर में पंडों और पुजारियों की अराजकता भी बहुत होती है. ये लोग यहां आने वालों को धार्मिक अनुष्ठान में फंसाने की कोशिश करते हैं.

काशी नरेश शिवोदास द्वारा बनवाया गया काशी विश्वनाथ मंदिर दशाश्वमेध घाट के पास बना हुआ है. यहां तक पहुंचने के लिए संकरी गलियों से हो कर गुजरना पड़ता है. इस मंदिर में दर्शकों की भीड़ अधिक होने के कारण गंदगी बहुत रहती है. संकरी गलियों का लाभ उठा कर  चोरउचक्के लोगों का सामान साफ कर देते हैं. घूमने वालों को इस बात से सावधान रहना चाहिए.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 2 किलोमीटर दूर गंगा नदी के उस पार स्थित रामनगर किला काशी नरेश का पैतृक निवास है. इस किले में एक संग्रहालय भी है जहां पर राजसी ठाटबाट के प्रतीक तीर, तलवार, बंदूकें और कपड़े रखे हैं.

वाराणसी से 10 किलोमीटर दूर बसा हुआ सारनाथ सम्राट अशोक के स्तूपों वाला शहर है. इसी स्तूप पर बने शेरों को भारत सरकार के राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न के रूप में लिया गया है. यहां का हराभरा बाग और फूलों का बगीचा घूमने वालों का मन मोह लेता है. यहां पर मूलगंध कुटी भी देखने वाली जगह है. यहां के पुरातात्विक संग्रहालय में बौद्ध प्रतिमाओं और शिलालेखों को भी देखा जा सकता है.

रानी लक्ष्मीबाई की झांसी

 झांसी शहर आजादी की नायिका रानी लक्ष्मीबाई के नाम से जाना जाता है. उत्तर प्रदेश का रहने वाला बच्चाबच्चा  झांसी की रानी के बारे में मशहूर कविता ‘बुंदेले हरबोलों के मुख हम ने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मरदानी वह तो  झांसी वाली रानी थी’ को जानतासम झता है. पठारी क्षेत्र होने के नाते जाड़ों में झांसी घूमने का अपना अलग ही मजा है. रानी लक्ष्मीबाई  का किला इस शहर की सब से खास जगह है. 1857 में आजादी की लड़ाई में अंगरेजों ने जिस किले पर गोले बरसाए थे, वह आज भी वैसा का वैसा खड़ा हुआ है. बंगरा की पहाडि़यों पर बना यह किला 1610 में राजा वीर सिंह जूदेव द्वारा बनवाया गया था. यह किला शान से आज भी खड़ा है और अपनी बहादुरी के किस्से सुनाता प्रतीत होता है.

18वीं शताब्दी में  झांसी और उस के किलों पर मराठों का अधिकार हो गया था. मराठों के अंतिम शासक गंगाराव थे जिन की मृत्यु 1853 में हो गई थी. इस के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने शासन की बागडोर संभाल ली थी.  झांसी का किला अपनी अद्भुत कला के लिए जाना जाता है. इस किले में अष्टधातु की बनी ‘कड़क बिजली’ और ‘भवानी शंकर’ नामक 2 तोपें आज भी रखी हैं. ये तोपें महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता का आज भी बखान करती नजर आती हैं.

इस किले यानी रानी महल को पहले बाई साहब की हवेली के नाम से जाना जाता था. यह महल शहर के बीच में बना हुआ है. इस का निर्माण रघुनाथ राव और महारानी लक्ष्मीबाई के समय में हुआ था. इसी वजह से इस को बाद में रानी महल कहा जाने लगा. इस महल में रंगबिरंगी चित्रकारी देखने को मिलती है. इसे देख कर प्राचीन शिल्पकला के बारे में पता चलता है. किले में बड़ीबड़ी दालानें बनी हैं. इन में पत्थर की कारीगरी की गई है. दीवारों में भी प्राचीन कला का नमूना देखने को मिलता है. इतना पुराना होने के बाद भी आज यह महल पहले जैसा ही दिखता है.

इस किले का भी आजादी की लड़ाई से पुराना रिश्ता है. इसी महल में रह कर महारानी लक्ष्मीबाई ने अंगरेजों के खिलाफ लोहा लेने की योजना बनाई थी. अब इस रानी महल में पुरातात्विक विभाग का संग्रहालय है जिस में बुंदेलखंड के चांदपुर और दुधई से जमा की गई प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं.

प्रेम की नगरी आगरा

ताज नगरी आगरा उत्तर प्रदेश का ही नहीं भारत का एक बहुत ही खास पर्यटन स्थल है. यहां जो भी आता है विश्वविख्यात ताजमहल को देखने जरूर जाता है. सफेद संगमरमर से बनी इस इमारत को जाड़ों में देखने का अपना अलग ही मजा है. पूरी इमारत के पास मखमली घास का मैदान है जहां पर बैठ कर धूप का मजा लिया जा सकता है. इस के पीछे यमुना नदी बहती है.

आगरा में ताजमहल के अलावा भी घूमने वाली कई दूसरी जगहें हैं. यहां पर खरीदारी करते समय सावधानी बरतनी चाहिए. दुनिया के 7 आश्चर्यों में ताजमहल का नाम भी दर्ज है. इसे देखने के लिए देशीविदेशी पर्यटकों का साल भर तांता लगा रहता है. ताजमहल के सामने बैठ कर वे फोटो खिंचवाना नहीं भूलते हैं. ताजमहल के साथ फतेहपुरी-सीकरी भी घूमने की अच्छी जगह है.

पर्यटन के शौकीनों के लिए उत्तर प्रदेश में हर रंग और मिजाज के पर्यटन स्थल मौजूद हैं. सियासत, संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और आधुनिकता को खुद में समेटे यहां के पर्यटन स्थल सैलानियों को बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं.

उत्तर प्रदेश में घूमने के लिहाज से लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी,  झांसी और आगरा शहर ऐसे हैं जो सर्दियों में पर्यटकों को अच्छे लगते हैं. इस के अलावा कौशांबी, श्रावस्ती, सारनाथ, कुशीनगर और चित्रकूट भी लोग घूमने जाते हैं. लखीमपुर जिले में दुधवा नैशनल पार्क भी लोगों को खूब पसंद आता है. जाड़ों का मौसम घूमने के लिहाज से अच्छा माना जाता है. उत्तर प्रदेश में जाड़ों का मौसम अक्तूबर से मार्च तक का माना जाता है.

उत्तर प्रदेश के किसी भी पर्यटन स्थल तक पहुंचने के लिए अच्छे साधन हैं. इन में हवाई यात्रा के साथसाथ रेल और बस यात्रा भी शामिल हैं. उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम ने बससेवा के जरिए पर्यटन स्थलों को एकदूसरे से जोड़ रखा है. खास शहर में पर्यटन विभाग के होटलों के साथसाथ नए बन रहे मौल और पार्क भी खूब लुभाते हैं. अवधी खाने के साथ बड़े नाम वाले रेस्तरां में भी खाना मिल जाता है.

धार्मिक स्थलों पर घूमते समय सावधान रहें. यहां पर कई किस्म के पंडे पूजापाठ के बहाने घूमने वालों को फंसाने की कोशिश करते हैं. चढ़ावा चढ़ाने के लिए तरहतरह का लालच देते हैं. इस के बहाने ठगने का प्रयास करते हैं. कई बार पर्यटक इन के  झांसे में पड़ जाते हैं. विदेशी मेहमान इन के खास निशाने पर होते हैं.

नवाबी शहर लखनऊ

घूमने के लिहाज से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ बहुत ही साफसुथरी और ऐतिहासिक जगह है. नवाबी शासनकाल और अंगरेजी शासनकाल में बनी इमारतें वास्तुकला का बेजोड़ नमूना हैं. नवाबी काल में अवध के अदब और तहजीब का विकास हुआ. लखनऊ की रंगीनियों और शानोशौकत के किस्से भी खूब चटखारे ले कर सुने और सुनाए जाते हैं.

बदलता लखनऊ आज मैट्रो सिटी के रूप में आगे बढ़ रहा है. इस के बावजूद अपनी पुरानी नजाकत और नफासत को भी इस शहर ने संभाल कर रखा है. यह शहर अब सियासी तेजी और फैशन के बदलते अंदाज के लिए भी जाना जाता है.

लखनऊ की शाम का जादू शामेअवध के नाम से जाना जाता है. लखनऊ में पश्चिमी खाने से ले कर देशी खाने तक का निराला स्वाद लिया जा सकता है. लखनऊ में खाने के लिए चाट, समोसे, कचौड़ी, कुल्फी के अलावा कबाब और बिरयानी का स्वाद लिया जा सकता है. हजरतगंज बाजार बहुत ही मशहूर है. यहां मनोरंजन के लिए कई अच्छे मल्टीप्लैक्स सिनेमा हौल खुल गए हैं. खरीदारी करने के लिए मौल खुल  गए हैं, जहां पर एक ही जगह पर सारा सामान मिल जाता है. लखनऊ आने वाले लोग चिकन की कढ़ाई वाले कपड़े और गुलाब रेवड़ी जरूर खरीदते हैं.

लखनऊ को बागों और पार्कों का शहर भी कहा जाता है. यहां पर कई अच्छे पार्क बने हुए हैं. सब से अच्छा बोटैनिकल गार्डन पार्क है. यहां पर गुलाब सहित तमाम दूसरे पौधों की कई किस्में देखने को मिल जाती हैं. इस के अलावा हाथी पार्क, गौतम बुद्ध पार्क, नदिया किनारे पार्क, पिकनिक स्पौट, लोहिया पार्क और डा. अंबेडकर पार्क भी घूमने के लिहाज से अच्छी जगहें हैं. मौजमस्ती के लिए आनंदी वाटर पार्क भी है. जाड़ों में घूमने वालों के लिए पर्यटन विभाग यहां लखनऊ महोत्सव के अलावा कई आकर्षक कार्यक्रम कराता है. हजरतगंज, अमीनाबाद और गोमतीनगर में घूमने व खरीदारी करने की तमाम जगहें हैं.

लखनऊ घूमने जो भी आता है वह सब से पहले बड़ा इमामबाड़ा यानी भूलभुलैया जरूर देखना चाहता है. यह लखनऊ की सब से मशहूर इमारत है. इस इमारत का पहला अजूबा 49.4 मीटर लंबा और 16.2 मीटर चौड़ा एक हौल है. इस में किसी तरह का कोई खंभा नहीं है. इस के एक छोर पर कागज फाड़ने जैसी आवाज भी दूसरे छोर पर आसानी से सुनी जा सकती है. इस इमारत का दूसरा अजूबा 409 गलियारे हैं. ये सब एक जैसे दिखते हैं और समान लंबाई के हैं. ये सभी एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. इन में घूमने वाले अकसर रास्ता भूल जाते हैं. इसीलिए इस को भूलभुलैया कहा जाता है.

इमामबाड़ा से थोड़ी दूर पर एक छोटा इमामबाड़ा बना हुआ है. दूर से यह इमामबाड़ा ताजमहल जैसा दिखता है. बड़े इमामबाड़े और छोटे इमामबाड़े के बीच के रास्ते में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं. इन को पिक्चर गैलरी, घड़ी मीनार और रूमी दरवाजा के नाम से जाना जाता है. इन सब जगहों पर जाने के टिकट बड़े इमामबाड़े से ही एकसाथ मिल जाते हैं. रेजीडैंसी लखनऊ की ऐतिहासिक इमारत है. इस की दीवारों पर आज भी आजादी की लड़ाई के चिह्न मौजूद हैं. यहां बना खूबसूरत लौन इस की खूबसूरती को विशेष आकर्षण प्र्रदान करता है. जाड़ों में घूमने वालों को लौन पर बैठना बहुत अच्छा लगता है. रेजीडैंसी के करीब ही शहीद स्मारक बना हुआ है. 1857 में शहीद हुए वीरों की याद में इसे गोमती नदी के किनारे बनवाया गया था. जाड़ों में यहां पर नौका विहार का मजा भी लिया जाता है. लखनऊ की शान है विधानसभा की खूबसूरत इमारत.

लखनऊ का चिडि़याघर बहुत ही आकर्षक बना हुआ है. बच्चों को घुमाने के लिए छोटी रेलगाड़ी का इंतजाम किया गया है. चिडि़याघर के अंदर एक राज्य संग्रहालय भी है जिस में ऐतिहासिक सामानों को रखा गया है. यह जाड़ों में घूमने की सब से खास जगह है.

वाराणसी

वाराणसी शहर गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है. इस को घाटों का शहर भी कहा जाता है. सुबह के समय सूर्य की किरणें जब नदी के जल पर पड़ती हैं तो इन घाटों की शोभा देखते ही बनती है. वाराणसी की सुबह बहुत मशहूर है. इसीलिए उत्तर प्रदेश में शामेअवध के साथसाथ सुबहेबनारस भी मशहूर है. अर्द्धचंद्राकार गंगा के किनारे लगभग 80 घाट बने हुए हैं.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए विदेशों से भी छात्र आते हैं. पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रत्येक विषय की उच्च स्तरीय पढ़ाई होती है. यह एशिया का सब से बड़ा आवासीय विश्व- विद्यालय है. भारत कला भवन इस विश्वविद्यालय की शोभा है. इस की कलावीथिका में अनेक कलाकृतियां रखी हैं. वाराणसी में तैयार होने वाली साडि़यों को बनारसी साड़ी के नाम से जाना जाता है.

वाराणसी के पास बसे भदोही शहर का कालीन उद्योग भी बहुत खास है. धार्मिक खासीयत वाले वाराणसी शहर में पंडों और पुजारियों की अराजकता भी बहुत होती है. ये लोग यहां आने वालों को धार्मिक अनुष्ठान में फंसाने की कोशिश करते हैं.

काशी नरेश शिवोदास द्वारा बनवाया गया काशी विश्वनाथ मंदिर दशाश्वमेध घाट के पास बना हुआ है. यहां तक पहुंचने के लिए संकरी गलियों से हो कर गुजरना पड़ता है. इस मंदिर में दर्शकों की भीड़ अधिक होने के कारण गंदगी बहुत रहती है. संकरी गलियों का लाभ उठा कर  चोरउचक्के लोगों का सामान साफ कर देते हैं. घूमने वालों को इस बात से सावधान रहना चाहिए.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 2 किलोमीटर दूर गंगा नदी के उस पार स्थित रामनगर किला काशी नरेश का पैतृक निवास है. इस किले में एक संग्रहालय भी है जहां पर राजसी ठाटबाट के प्रतीक तीर, तलवार, बंदूकें और कपड़े रखे हैं.

वाराणसी से 10 किलोमीटर दूर बसा हुआ सारनाथ सम्राट अशोक के स्तूपों वाला शहर है. इसी स्तूप पर बने शेरों को भारत सरकार के राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न के रूप में लिया गया है. यहां का हराभरा बाग और फूलों का बगीचा घूमने वालों का मन मोह लेता है. यहां पर मूलगंध कुटी भी देखने वाली जगह है. यहां के पुरातात्विक संग्रहालय में बौद्ध प्रतिमाओं और शिलालेखों को भी देखा जा सकता है.

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