Interview: अमीरा शाह मैट्रोपोलिस हैल्थकेयर लिमिटेड की प्रमोटर और कार्यकारी अध्यक्ष

अमीरा शाह मैट्रोपोलिस हैल्थकेयर लिमिटेड की प्रमोटर और कार्यकारी अध्यक्ष हैं. अमीरा ने मैट्रोपोलिस की भारत और अफ्रीका में दूसरी सबसे बड़ी डायग्नोस्टिक श्रृंखला बनाई है.

March 1, 2026

Interview: अमीरा शाह मैट्रोपोलिस हैल्थकेयर लिमिटेड की प्रमोटर और कार्यकारी अध्यक्ष हैं. अमीरा ने मैट्रोपोलिस की भारत और अफ्रीका में दूसरी सबसे बड़ी डायग्नोस्टिक श्रृंखला बनाई है.

मैट्रोपोलिस डायग्नोस्टिक्स आज भारत के 700 से अधिक शहरों में काम कर रही है. अमीरा के अद्भुत कौशल और परिश्रम को देखते हुए उन्हें 2021 के लिए हैल्थकेयर में अर्नस्ट ऐंड यंग ‘ऐंटरप्रन्योर ऑफ द ईयर’ पुरस्कार मिला, जिसे पिछले 20 वर्षों में पाने वाली केवल 3 महिलाओं में से वे एक हैं और सब से कम उम्र की भी.

इतना ही नहीं, फोर्ब्स एशिया द्वारा उन्हें ‘एशिया की पावर बिजनैस वूमन’ में भी नामित किया गया. साथ ही बिजनैस टुडे और फॉर्च्यून इंडिया द्वारा ‘व्यवसाय में 50 सबसे शक्तिशाली महिलाओं’ में शामिल किया गया. अमीरा ऑस्टिन के टैक्सास विश्वविद्यालय से फाइनैंस ग्रैजुएट हैं और हार्वर्ड बिजनैस स्कूल के मालिक / अध्यक्ष प्रबंधन कार्यक्रम (ओपीएम) की पूर्व छात्रा हैं.

आज अमीरा के साथ उनकी ऐजुकेशन और कैरियर जर्नी पर चर्चा करते हुए हम कुछ ऐसे पक्ष सामने लाए हैं, जिन से प्रेरणा ले कर स्टूडेंट्स और उनके मातापिता उनके कैरियर को ध्यान में रख सही फैसले ले सकें.

अपनी फैमिली के बारे में कुछ बताएं. फैमिली ने आप की ऐजुकेशन जर्नी को किस तरह सपोर्ट किया ?

मेरा बचपन बहुत ही अच्छा रहा. मेरे मातापिता दोनों ही डाक्टर हैं जो ऐजुकेशन और हार्डवर्क में बिलीव करते हैं. बचपन से मैं ने उन्हें सुबह 8 बजे से रात के 8 बजे तक काम करते देखा है और इन्हीं ऐथिक्स और वैल्यूज के साथ उन्होंने मेरी परवरिश की. बचपन से मुझे 3 वैल्यूज सिखाई गई ऐजुकेशन, हार्ड वर्क ऐंड हंबलनैस.

साथ ही पेरेंट्स ने कभी भी गर्ल और बौय में फर्क नही रखा.  उन्होंने हमेशा कहा कि हमें नहीं लगता कि गर्ल्स को प्रोटैक्ट करना चाहिए और बौयज को छोड़ देना चाहिए या बॉयज को ज्यादा ऐजुकेशन दें क्योंकि लड़कियां शादी कर के चली जाएंगी.

उन्होंने कहा कि लड़की और लड़का दोनों में सेम पोटेंशियल है और हमारा काम है उन्हें अच्छी वैल्यूज देना. मुझे याद है जब मैं 7-8 दिन हाइक्स पर जाती थी, कभी पेरेंट्स ने नही कहा कि कैसे करोगी? कुछ हो जाएगा तुम्हें, प्रोटैक्शन की जरूरत है या बौयज भी आ रहे हैं बल्कि उन्होंने मुझे फ्रीडम दी, मुझ पर विश्वास रखा.

आप ने अपनी स्कूलिंग कहां से की और फिर हायर ऐजुकेशन में जाने का निर्णय कब लिया ?

मैंने मुंबई के एचआर कालेज से 12वीं कौमर्स में की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका में अप्लाई किया. अपनी खुद की मेहनत पर मैं ने वहां एडमिशन भी पा लिया. मेरे मातापिता ने मेरे पहले साल फीस दी और फिर मैं ने वहां पर एक स्कॉलरशिप ली और एक जौब भी ली, जिस से मैं ने आत्मनिर्भर बन अपने अगले 3 साल का खर्चा स्वयं उठाया जबकि मेरे पेरेंट्स के पास पैसे थे,

मेरी पूरी फीस देने को लेकिन एक इंडिपेंडेंट होने की फीलिंग ने मुझे अपना भार स्वयं उठाने के लिए प्रेरित किया और किसी भी लड़की के लिए मैं इंडिपेंडेंट हूं की फीलिंग होना बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि बेटियों को हमेशा सिखाया जाता है कि पिताजी आप का खयाल रखेंगे, फिर भाई रखेंगे,

फिर हस्बैंड रखेंगे. लेकिन हमें कभी सिखाया नहीं जाता कि कैसे अपने पैरों पर खड़े हों. मगर जब डिपेंडेंट होने का आत्मविश्वास आ जाता है तो बहुत हैल्प होती है. ऐसा नहीं कि आप को किसी और की जरूरत नहीं लाइफ में लेकिन वह जरूरत है लव और ट्रस्ट की तो सैल्फ इंडिपेंडेंट बन मेरी स्कूलिंग, कालेजिंग बहुत अच्छी रही.

मैनेजमैंट के स्टूडेंट्स को स्टडी के दौरान किन चीजों पर सब से ज्यादा फोकस रखना चाहिए?

मुझे लगता है एक नामी कालेज से ज्यादा स्टूडेंट का फोकस रखना ज्यादा जरूरी है. अगर मैं भी अपने पिछले जीवन में जाऊं तो पाऊंगी कि मेरे स्कूल में सब टौपर्स कौन थे और क्या वे लाइफ में सब से आगे हैं ? तो जवाब है नहीं. न ही कालेज के टॉपर्स आज सब से आगे हैं क्योंकि स्कूल और कालेज से मिली ऐजुकेशन बेस बनाने के लिए लेकिन हमारी सक्सैस बहुत सी दूसरी चीजों से आती है.

जैसे हमारी विजडम, डिसिजन पावर, स्किल्स, साथ ही हमारी वैल्यूज, हमारी इंटरपर्सनल स्किल्स, हमारा टीम मैनेजमैंट, पीपल रिलेशनशिप, रिलेशनशिप विद फैमिली. जैसे कोई अपनी ऐकेडमिक के स्कोर से इंजीनियर तो बन जाएगा, लेकिन इंजीनियर चीफ बनने के लिए उस की ऐकेडमिक साथ उस की टीम मैनेजमैंट स्किल्स, रिलेशनशिप, विजडम, डिसिप्लिन की भी जरूरत पड़ेगी जो आप को कालेज में नहीं पढ़ाया जाता.

इसलिए स्टूडेंट्स को अपनी स्किल्स और पर्सनैलिटी पर फोकस करना चाहिए, लाइफ में ऐक्सपीरियंस लेना चाहिए. ऐकेडमिक को स्ट्रॉंगकरने के साथसाथ अपनी स्किल्स प्रैक्टिस और इंटरपर्सनल स्किल पर भी पूरा ध्यान दें.

मैनेजमैंट स्टडी के बाद कैरियर का चुनाव करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

कैरियर डिसाइड करते समय स्टूडेंट्स को अपनी चाह के साथसाथ अपनी कैपेबिलिटी पर भी ध्यान देना चाहिए, जैसे एक स्टूडेंट चाहता है कि मैं इंजीनियरिंग करूं, लेकिन पहले सोचो कि इंजीनियरिंग के लिए आप में वे खूबियां हैं कि नहीं,  साथ ही यह भी सोचना चाहिए कि क्या आप वह कैरियर ऐंजौय कर पाओगे या नहीं क्योंकि 50, 60 साल आप को वही काम करना है.

तो आप को ऐंजौय करने की जरूरत है नहीं तो बोरियत के आते ही आप का अपने काम से जी ऊब जाएगा जो आप के कैरियर में एक बड़ीपरेशानी बन सकता है. इसलिए उस कैरियर का चुनाव करें, जिसे आप ऐंजौय करते हुए अपना पूरा फोकस और हार्डवर्क दे सकें.

दूसरी चीज आप कालेज में जब जाओ तो सिर्फ ऐकेडमिक तक सीमित मत रहो. अपनी दूसरे स्किल्स पर भी काम करो, ऐक्सपीरियंस लो. दोस्त बनाएं, रिलेशनशिप कम्युनिकेशन बनाना सीखें नहीं तो आप आगे काम कैसे सीखोगे? इसलिए ऐकेडमिक के साथसाथ लाइफ ऐक्सपीरियंस और रिलेशनशिप्स का बैलेंस इंपोटेंट है जो स्टूडेंट्स को लाइफ में

 

हैल्थ केयर सैक्टर में कैरियर बनाने और ऐंटरप्रन्योर बनने के बारे में कुछ बताएं?

मैट्रोपोलिस पहले मैट्रोपोलिस था ही नहीं. वह डाक्टर सुशील शाह लैब थी. एक सिंगल लैब जो अच्छी क्वालिटी, सर्विसेज और रैपुटेशन के साथ थी. लेकिन मुझे लगा कि यह अच्छा काम हम पूरे इंडिया में क्यों न करें ताकि सभी पेशेंट को हम बैनिफिट दे सकें और इस को हम कैसे स्केल करें कि एक अच्छे प्रॉफिटेबल बिजनैस के साथ अच्छे ऐथिक और क्वालिटी सर्विसेज भी प्रदान करें.

साथ ही मुझे मैडिकल इंडस्ट्री का वह ज्ञान नहीं जो एक डाक्टर के पास है. तो शुरुआत में डाक्टरों के साथ तालमेल बैठने में बहुत दिक्कत हुई लेकिन जब उन्होंने देखा कि मुझे बिजनैस बनाने का हुनर और पैशन है तो उन्होंने भी बहुत साथ दिया.

उस के बाद जो यूनिट इकौनोमिक्स है, क्वालिटी मैनेजमैंट सिस्टम्स और वे सारी चीजें मैं ने जो बिजनैस स्कूल में सीखीं, वह सब मैं ने मैट्रोपोलिस को बनाने में लगा दिया और एक प्राइवेट प्रैक्टिस को बड़े इंस्टिट्यूशन यानी मैट्रोपोलिस हैल्थकेयर में बदल दिया.

 

ऐंटरप्रन्योर की जर्नी में किस तरह की मुश्किलें आती हैं और इन से उबर कर कैसे सफल ऐंटरप्रन्योर बना जा सकता है?

पहले तो एक जौब करने वाले में और ऐंटरप्रन्योर में बहुत फर्क होता है. ऐंटरप्रन्योर में पैसे कहां से आएंगे कुछ पता नहीं. कोई स्टडी इनकम नहीं, इमोशनली भी बहुत उतारचढ़ाव रहते हैं. अगर सौ ऐंटरप्रन्योर काम करें तो सौ में सब सक्सैस तो होते नहीं हैं. यह बहुत हाई रिस्क हाई रिवार्ड जर्नी होती है.

साथ फीमेल ऐंटरप्रन्योर और मेल ऐंटरप्रन्योर उस में भी फर्क है क्योंकि बहुत कम फीमेल ऐंटरप्रन्योर हैं, जिन के पास वह साइलेंट सपोर्ट सिस्टम है जो मैन को मिलता है. जो नेटवर्क्स मैन के पास है वह वूमन के पास नहीं है. जैसे जब मैन ऐंटरप्रन्योर बन जाता है तो सब काका, मामा, अंकल बोलते हैं, अरे शाबाश बेटा शाबाश, बहुत अच्छा किया, अच्छा काम कर रहे हो. लेकिन फीमेल को कहेंगे,

अरे बेटा क्यों टाइम वेस्ट कर रहे हो, शादी पे फोकस करो, बच्चों पर फोकस करो. साथ प्रोफैशन में भी कई पड़ाव पर लोग आप को इक्वली ट्रीट नही करेंगे. इसलिए यहां फीमेल को यह भेदभाव अपनी वीकनैस नहीं समझना चाहिए, मैं ने कभी नहीं सोचा कि मैं फीमेल क्यों हूं या मैं मेल होती तो मैं यह कर पाती. जो हम से भेदभाव करते हैं यह उन की

प्रौब्लम है मेरी नहीं. मेरा काम है खुद पर फोकस रहना, अपना काम करना और आगे बढ़ना और यही माइंडसैट हर लड़की को रखना चाहिए, तभी वह लाइफ में सक्सैस पाएगी. नई रिसर्च और टैक्नोलॉजी के साथ खुद को अपडेट रखना आज के दौर में कितना जरूरी है?

इस प्रोफैशन में मुझे सब से अच्छा जो लगता है जो मैं टाइम स्पेंड करती हूं, ऐनर्जी स्पैंड करती हूं, उस का क्या रिजल्ट है? हम जो काम करते हैं। वह लाइफ ऐंड डैथ का सवाल है. वह लोगों की पूरी जिंदगी का सवाल है. आज मैट्रोपोलिस न्यू एडवांस रिसर्च में बहुत अच्छा कर रहा है, जैसेकि डीएनए ऐनालिसिस ही ले लीजिए, हमारी लगातर बेहतर बनने की कोशिश,

हमारी रिपोर्ट्स इतना ऐक्यूरेट रिजल्ट दे रही हैं कि डाक्टर को सही वक्त पर बीमारी की असली वजह पता चल जाती है और वे मरीज का समय पर सही इलाज कर पा रहे हैं. लोग हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि आप की वजह से मेरी मम्मी का कैंसर डायग्नोस हुआ टाइम पर और हम उन्हें बचा पाए, या बच्चे को औटिज्म होने वाला है और हम उस को समय पर लिमिट कर पाए,

तो यह सब सुन मुझे बहुत प्राउड फील होता है कि हम लोगों की लाइफ पौजिटिव इंपैक्ट करते हैं और बहुत हमें खुशी मिलती है कि लोगों का ग्रैटीट्यूड मिलता है जो हमारे लिए सब से ज्यादा इंपोर्टेंट है क्योंकि अवार्ड्स मिलते रहते हैं, लेकिन जब लोग आ कर हमें बधाई देते है, हमारे काम को सराहते हैं तो उस खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता.

आज हम मैट्रो सिटीज में हर जगह हैं लेकिन रूरल इंडिया में विलेजेस में अभी तक हमारी प्रेजेंस पूरी नहीं है. मगर हम कोशिश करते रहेंगे कि वहां सही डायग्नोस्टिक मिले क्योंकि आज भी ऐसे बहुत से सैंटर हैं जहां डाक्टर नहीं हैं या जहां डाक्टर हैं वहां दवाइयां नहीं.

इस वजह से रूरल इंडिया में लोगों को बहुत सी बीमारियों को झेलना पड़ता है. इसलिए अब यह हमारा इंटैंट है कि हम ट्राई करें कि पूरे इंडिया में हम अपने डायग्नोस्टिक टूल्स ले कर जाएं, जिस की रिपोर्ट के बेस पर डाक्टर मरीज को सही इलाज दे पाएं.

वूमन ऍपावरमेंट के लिए बेहतर ऐजुकेशन का होना कितना जरूरी है?

वूमन कालेज, औक्सफोर्ड, आईआईएम तो बहुत ऐजुकेटेड हैं पर मुझे नहीं लगता यह पूरी ऐजुकेशन है. यह सिर्फ एक पार्ट है. ऐजुकेशन को वूमन अवेयरनैस और वूमन ऐक्सपोजर से जोड़ा जाए तो ही वह प्रौपर वूमन ऐजुकेशन और ऐंपावरमेंट के बराबर होगी क्योंकि आज भीलड़कियों को इसलिए अच्छे कालेज में पढ़ाया जाता है ताकि उन्हें अच्छी कमाई वाले लड़के के साथ शादी में बांध दिया जाए,

उन से कहा जाता कि पैसा कमाने का काम हस्बैंड का है और तुम घर में बैठो या फिर उन लड़कियों का काम करना सही माना जाता है जिन के पति काम नहीं करते. जबकि यह धारणा ही गलत है. अगर लड़कियों को शिक्षा के साथ बाहर काम करने के लिए ऐक्सपोजर, ऐक्सपीरियंस, अवेयरनैस नहीं मिलेगी तो वे पूरी तरह से ऐजुकेटेड नहीं कहलाएंगी और न ही कभी ऐंपावर हो पाएंगी.

जैंडर इक्वैलिटी को किस नजरिए से देखती हैं?

पहले इक्वैलिटी अपने मन में होनी चाहिए, मैं बहुत लड़कियों को जानती हूं जो कहती हैं कमाना मेरे हस्बैंड का काम है. वे काम करें, वे पैसे बनाएं और मुझे करना है या नहीं यह मेरी चौइस है. लेकिन ऐसा क्यों? पहले तो आप को यह समझना चाहिए कि आप ट्रैडिशनल रिलेशनशिप में है या मौडर्न रिलेशनशिप में. ट्रैडिशनल में आप कह सकते हैं कि आप घर रहना चाहते हैं. लेकिन मौडर्न में आप दोनों बराबर हैं, दोनों वर्किंग हैं और घर की जिम्मेदारी में भी बराबर हैं. इसलिए लड़कियों को जैंडर इक्वैलिटी, समानता की बराबरी की शुरूआत पहले अपने ही मन से करनी चाहिए.

कैरियर ओरिएंटेड महिलाओं को अपने काम के साथ फैमिली भी देखनी होती है. उन के लिए क्या टिप्स देंगी ?

पूरे इंडिया में सिर्फ 18% वूमन और्गनाइज्ड वर्कफोर्स में हैं. मगर जब आप उन महिलाओं को काउंट करें जो सब्जी बेचती हैं, दूध बेचती हैं, फार्मिंग करती हैं तो वूमन का 60% इन्वौल्वमैंट वर्कफोर्स में होगा. 60-70% के पास वूमन काम होगा. रूरल इंडिया में तो बहुत ज्यादा है क्योंकि रूरल इंडिया में वे खेत में काम कर रही होंगी, कुछ छोटी दुकानें चला रही होंगी या कुछ बेच रही होंगी.

विलेज में वे सबकुछ करती हैं, काम भी करती हैं, बच्चों को भी संभालती हैं, खाना भी पकाती हैं. लेकिन यहां मैट्रो सिटी में वूमन बहुत बार ऐक्सट्रीम डिसीजंस ले लेती हैं. जैसे मेरी शादी हो रही है, मैं क्विट करती हूं. लेकिन क्यों क्योंकि मुझे अभी टाइम स्पेंड करना है. घर पर इनलाज के साथ. इस के साथ, उस के साथ. तो मैं उन्हें कहूंगी, आप क्विट मत कीजिए, आप थोड़ा काम करते जाएं.

अगर आप को बच्चे पैदा करने हैं या बच्चों को टाइम देना है तो आप पार्टटाइम काम कीजिए, अब आप 6 महीने मैटरनिटी लीव लें, उस के बाद फुलटाइम नहीं कर पा रहीं तो पार्टटाइम काम कीजिए, आप पार्टटाइम काम करो, नहीं तो घर से फुलटाइम करो. – रजनी प्रसाद

• बॉक्स क्विक इंट्रो जन्मस्थान: मुंबई ऐजुकेशन एच. आर. कालेज, मुंबई, गेजुएशन टैक्सस यूनिवर्सिटी, यूएसए, औनरशिप प्रोग्राम, हार्वर्ड बिजनैस स्कूल, यूके : प्रमोटर और कार्यकारी अध्यक्ष, मैट्रोपोलिस प्रोफेशन लर्निंग

:* बिग ब्रैंड कालेज की रेस में शामिल न हों. अपनी डिसीजन मेकिंग ऐबिलिटी, स्किल्स और डिसिप्लिन पर फोकस कर किसी भी कालेज में बेहतर कर सकते हैं.

* एमबीए के बाद स्टार्टअप की कोशिश तभी करें जब आप लंबे समय तक इकोनोमिक उतारचढ़ाव का सामना करने को तैयार हों. पहले अच्छी जौब ले कर खुद को स्टेबल करना बेहतर होगा.

* एकैडेमिक स्कोर इंप्रूव करने की बजाय स्किल्स इंप्रूव करने और एक्सपोजर लेने की दिशा में काम करें. इस के लिए लाइव प्रोजैक्ट्स पर काम करना, नैटवर्क बनाना, पब्लिक स्पीकिंग स्किल बढ़ाना बेहद जरूरी है. सफल बनाता है.