Religion controversy : दिल्ली हाई कोर्ट ने एक नोटिस जारी कर के सभी निचली अदालतों को कहा है कि वे हस्बैंड या वाइफ की जगह ‘स्पाउस’ शब्द का इस्तेमाल करें और फादर व मदर की जगह ‘पेरैंट’ का. इस का फायदा यह होगा कि हर मामले में सिर्फ पति या पिता के नाम से ही किसी की पहचान नहीं होगी.
सदियों से लगभग सभी धर्मों ने ऐसा अरेंजमैंट कर रखा था कि किसी भी जने की पहचान केवल उस के पिता या पति से हो. पिता के न होने पर भी मां का नाम नहीं आता था और हस्बैंड के मरने या छोड़ जाने के
बाद भी पत्नी को सिर्फ पिता या मृत पति का नाम ढोना पड़ता था.
जैसे किसी संपत्ति को उस के मालिक के नाम से जाना जाता है वैसा ही विवाहित औरतों के साथ या बच्चों के साथ होता था. जिन बच्चों का जन्म बिना पिता की पहचान के होता था उन्हें जीवनभर एक अभिशाप सहना पड़ता था. यह धर्म की साजिश थी. समाज ने इसे जम कर भुनाया जबकि राज्य या प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कौन किस का क्या है. राजा या सरकार को तो टैक्स से मतलब होता था या गुनहगार की पहचान से.
उस भेदभाव का नतीजा यह है कि आज 2026 में भी औरतें हर मामले में पतियों या पिता का मुंह ताकती हैं. कोई भी फैसला लेना हो, कोई भी डौक्यूमैंट साइन करना हो, वे पिता या पति का मुंह ताकती हैं. उन की रजामंदी पर ही फैसला कर पाती हैं.
हाई कोर्ट का फैसला केवल अदालतों की बाउंड्री तक रह जाएगा या आगे घरों तक चला जाएगा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता पर जैसेजैसे औरतों को धर्मों की बिछाई गई जंजीरोें से मुक्ति मिल रही है, ये फैसले काम के हैं. यह न भूलें कि धर्मों के दुकानदारों के लिए औरतें अपने देवीदेवताओं, पैगंबरों और जनकों से ज्यादा इंपौर्टैंट नजर आती हैं. वे ही धर्मों की फाइनैंसर भी हैं और वे ही सब से बड़ी प्रौपर्टी भी हैं. औरतों को काबू में रख कर उन से धर्मगुरुओं और अपने मेल डिवोटीज के लिए उपहार में देना धर्मों ने 2000-2500 सालों से बड़ी सफाई से किया है.
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