Career in Fashion : दीपिका गोविंद ने इंडियन ऐडमिनिस्ट्रेशन ऐग्जाम की तैयारी करते समय अपना रुझान फैशन डिजाइन की तरफ देख कर एनआईएफटी यानी निफ्ट से डिजाइनिंग की शिक्षा ले अपना सफर शुरू किया. आज दीपिका इंडिया की नामी डिजाइनर हैं, जिन्होंने अपना खुद का ब्रैंड भी बनाया. उन की इस जर्नी के माध्यम से गृहशोभा उन स्टूडैंट्स के लिए कुछ एडवाइज ले कर आई है जो फैशन डिजाइनिंग में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं:
फैशन डिजाइन में अपने स्पैशलाइजेशन का चयन कैसे करें?
आप पहले ही डिसाइड नहीं कर सकते हैं कि आप किस में बेहतर हैं. आप को पहले जनरल डिजाइन पर फोकस करना होगा फिर आगे के 3-4 वर्ष में आप अपना बैस्ट स्पैशलाइजेशन जान पाते हैं. चाहे वह वूमेन अपैरल हों, मैंस या ब्राइडल, साथ ही बहुत कम स्टूडैंट्स हैं जो अपने स्पैशलाइजेशन से आगे कोई इन्डिविजुअल डिजाइन या ब्रैंड क्रिएट कर रहे हैं. आज बहुत से स्टूडैंट्स प्रोग्राम के बाद क्लोथिंग ब्रैंड में जा रहे हैं, जहां ब्रैंड के स्तर, उन के फिक्स्ड स्टैंडर्ड के हिसाब से ही आप को काम करना होता है. इसलिए वहां कुछ अलग हट कर क्रिएट करने का स्कोप नहीं है.
आज ही सब्सक्राइब करें सरिता
आपके लिए स्पेशल छूट

फैशन वर्ल्ड की कौन सी ऐसी चीजें हैं जो एक कालेज प्रोग्राम में नहीं बताई, सिखाई जातीं?
मैं कई डिजाइन स्कूलों में स्टूडैंट्स के पोर्टफोलियो जज करने जाती हूं. वहां देखती हूं कि डिजाइन स्कूल प्रौपर टैक्सटाइल नौलेज नहीं देते हैं जोकि सही नहीं है. आज बहुत सारे डिजाइनर और स्टूडैंट्स को टैक्सटाइल की नौलेज ही नहीं है. वे बहुत कम फैब्रिक्स के बारे में जानते हैं. एक प्रोजैक्ट में किसी एक फैब्रिक को ले कर कुछ क्रिएट किया, उस के बारे में बताया, सिर्फ इतना ही काफी नहीं है. दूसरा कालेज स्टूडैंट्स को ऐक्सपोजर नहीं देते, जिस वजह से उन्हें पता नहीं चलता कि बाहर इंडस्ट्री में क्या चल रहा है. इसलिए कालेजों को डिजाइनर हब से जुड़ना चाहिए ताकि इवेंट, ऐक्सपर्ट क्लासेज, गैस्ट स्पीकर्स, ट्रेनिंग प्रोग्राम हों. ब्रैंड और डिजाइनर के साथ मिल कर इंडस्ट्री विजिट भी दें ताकि स्टूडैंट्स को इंडस्ट्री, उस के काम का और वर्क कल्चर का ऐक्सपोजर मिल सके. इस तरह स्टूडैंट्स स्किल्स, उन के आर्ट अपग्रेड होते हैं और आज के समय में खासकर हमारी इंडस्ट्री में समय के साथ अपग्रेड होना बहुत जरूरी है, साथ ही कंपनी रिक्रूटमैंट भी कम होती है इसलिए स्टूडैंट्स को पहले से इंडस्ट्री का ऐक्सपोजर मिलना बहुत जरूरी है.
कालेज का बड़े फैशन हब जैसे मुंबई, दिल्ली के पास होना फायदा देता है?
कालेज का बड़े फैशन हब के पास होने से फर्क तो पड़ता है जैसेकि मुंबई में बने कालेज को फैशन ट्रैंड्स को बदलते देखने और सम?ाने में आसानी होगी, वहीं बैंगलुरु में बहुत बड़े ब्रैंड हैं तो यहां स्टूडैंट्स को ब्रैंड्स में सीखने, जुड़ने का मौका मिलता है जो उन कालेज को नहीं मिलता जो किसी रिमोट लोकेशन या फैशन इंडस्ट्री से दूर हैं.
अपनी डिजाइन शुरू करने से पहले इंटर्नशिप या डिजाइनर के पास काम सीखना क्यों है जरूरी?
बहुत से डिजाइन स्कूलों में इंटर्नशिप नहीं है जो किसी भी स्टूडैंट्स के लिए ठीक नहीं. इसलिए अगर इंटर्नशिप है तो उसे लो और दूसरा कि नहीं है तो पहले किसी डिजाइनर के पास काम सीखो. इस से आप को समझ आएगा कि डिजाइन लौंचिंग, नैटवर्क, सोर्सिंग कैसे काम करती है. एक ब्रैंड को किस तरह क्रिएट और बरकरार रखा जाता है. तो फिर आगे जा कर आप को अपने ब्रैंड को लौंच करने में पहले से बहुत सी जानकारी, तैयारी होगी, साथ ही यहां कैरियर के शुरुआती दिनों की गलतियां जानी और सुधारी जा सकती हैं, जिस से आप का अपना काम और निखर सकता है.
स्टूडैंट्स को अपनी डिजाइनिंग के साथ और कौन सी स्किल्स पर काम करना चाहिए?
एक अच्छे डिजाइनर में प्रेजैंटेशन स्किल्स जरूर होनी चाहिए. जिस तरह की डिजाइन है उसी से मैच होती प्रेजैंटेशन करें जैसे सिंपल डिजाइन के साथ बहुत जैजी प्रेजैंटेशन अच्छी नहीं दिखती.
दूसरा यह कि कभी भी क्वालिटी से कंप्रोमाइज न करें. गारमैंट्स देखने में जितने सुंदर हों वे पहनने में भी उतने ही कंफर्टेबल और सुंदर हों. इसलिए फैब्रिक, सिलाई, फिनिशिंग पर भी पूरा ध्यान दें.
तीसरा समय के साथ सीखें और बदलाव करें. फैशन एक जरीया है मौजूदा सोशल इकौनोमिक सिचुएशन ऐंड साइकोलोजिकल सिचुएशन को दिखाने का यानी यह दिखाता है कि सोसाइटी में क्या हो रहा है जैसे असीमैट्रिकल नैक डिजाइन जो एक रिबेलियस सोच को दर्शाता है कि नैक स्ट्रेट ही क्यों हो. ओवरसाइज्ड दर्शाता है कि मुझे बौडी फिट कपड़ों की परवाह नहीं मुझे रिलैक्स्ड होना पसंद है. तो एक डिजाइनर में सोशल सिचुएशन को देखतेसमझते अपनी डिजाइनें क्रिएट करनी चाहिए. यहां एक बहुत बड़ा उदाहरण है कोको शनेल, जिस ने वर्ल्ड वार के बाद प्रसिद्धि प्राप्त की.
उस समय औरतें बहुत बड़े बौलरूम गाउन, हैवी स्कर्ट पहनती थीं, जिस में बहुत कपड़ा लगता था. लेकिन वार के बाद यह सब महंगा हो गया. तब कोको ने उस समय की जरूरत को देख कर कम फैब्रिक में औरतों के लिए ड्रैसेज तैयार कीं जो कम फैब्रिक में इजी और कंफर्टेबल थीं, साथ ही आर्टिफिशियली ज्वैलरी भी ट्रैंड में लाई क्योंकि हर औरत रियल ज्वैलरी अफोर्ड नहीं कर सकती थी.
सोशल, इकनौमिक और साइकोलोजिकल सिचुएशन को देखसमझ कर कोको ने अपनी रिबेलियस सोच के साथ एक क्रिएटिव काम किया और देखिए आज कैसे दुनिया का एक सब से बड़ा ब्रैंड क्रिएट किया. इसलिए स्टूडैंट्स जो डिजाइनर बनना चाहते है उन के लिए अपनी सोसाइटी की सिचुएशन को समझ कर डिजाइन क्रिएट करनी बहुत जरूरी हैं.
भविष्य में फैशन इंडस्ट्री में क्या स्कोप रहेगा?
आज फैशन इंडस्ट्री में डिजाइनिंग के साथ टैक्सटाइल, अपैरल मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन प्रोडक्शन, रिटेल, ब्रैंडिंग आदि में भी बहुत ज्यादा स्कोप हैं.
आज इंडियन मार्केट में भी बहुत स्कोप हैं. आप अपने देश के पहनावे, टैक्सटाइल, क्राफ्ट में ही बहुत कुछ कर सकते हैं जैसे विंटेज सिल्क. मुझे याद है मैं ने एक सिल्क मिल के लिए बहुत पहले काम किया था. उस समय उन की मिल की कंडीशन ठीक नहीं थी, वर्कर्स के पास काम नहीं था. मिल बंद होने जा रही थी. तब एक डिजाइनर के तौर पर मैं ने कुछ नया करने की सोची और सिल्क साड़ी में प्योर गोल्ड से डिजाइनिंग की जो लोगों को बहुत पसंद आई और आज वह मिल बहुत अच्छा काम कर रही है. उन की गोल्ड साडि़यां बहुत डिमांड में हैं.
इसी तरह स्टूडैंट्स भी फैब्रिक के साथ कुछ डिजाइन क्रिएट करें. डिजाइन के साथ टैक्सटाइल में भी बहुत स्कोप हैं. आज नैचुरल फैब्रिक की बहुत डिमांड है, साथ ही न्यू ऐज फैब्रिक की भी जैसे एक कंपनी टैन्सेल नैचुरल वुड पल्प से फैब्रिक बना रही है. मैं खुद भी फैब्रिक्स बनाती हूं जो दूसरों को मार्केट में अवेलेबल नहीं होते. इस तरह हम डिजाइन और क्वालिटी दोनों को मैंटेन करते हैं.

