Stray Dogs : गुरुग्राम ने, जिसे आमतौर पर गुड़गांव ही कहा जाता है, एक नए तुगलकी आदेश में कहा है कि सभी लोगों को अपने पालतू कुत्तों का रजिस्ट्रेशन कराना होगा. यह कदम एकदम बेहूदा और बेकार का है और आम लोगों को परेशान करने वाला है तथा म्यूनिसिपल कौरपोरेशन में रिश्वतखोरी बढ़ाने वाला है.डौग बाइट्स हो रही हैं पर क्या रजिस्ट्रेशन से डौग बाइट्स रुक सकती हैं? स्ट्रे डौग्स पर तो सुप्रीम कोर्ट तरहतरह के आदेश दे रहा है और कुछ फर्क पड़ा है, ऐसा लगता है पर अभी तक घरों में पाले जाने वाले पैट्स का रजिस्ट्रेशन सुप्रीम कोर्ट ने करवाने को नहीं कहा है.
रजिस्ट्रेशन सिर्फ सरकारी बाबुओं की दखलंदाजी को बढ़ाने वाला काम होता है. आम आदमियों को लगता है कि किसी और की किसी चीज की रजिस्ट्रेशन का मतलब है कि वह चीज सुरक्षित और सेफ है तो यह मिसकंसैप्शन है.
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रजिस्ट्रेशन में क्या होगा. मालिक का नाम, पता, पते का प्रूफ, संपत्ति की मिल्कियत या किराएदारी का प्रूफ, मालिक के फोटो, घर के फोटो, सोसायटी का एनओसी यानी नो अब्जैक्शन सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेज मांगे जाएंगे. फिर कुत्ते का कद, वजन, ब्रीड, पहचान की निशानी, आयु, शायद नाम, फोटो 3-4 ऐंगलों से मांगे जाएंगे.
सरकारी फाइलों में यह जमा होगा. म्यूनिसिपल कौरपोरेशन इस का क्या करेगी? क्या राशन कार्ड बनवा कर खाद्य दिलाएगी? नहीं. अगर खो गया तो ढूंढ़ कर लाएगी? नहीं. उस ने किसी को काट लिया तो क्या विक्टिम को मुआवजा देगी? नहीं.
फिर रजिस्ट्रेशन से होगा क्या? यही पता चलेगा न कि शहर में कितने घरों में कुत्ते हैं. मानो पता चल गया कि 13,22,450 हैं तो फिर क्या होगा? हां पैट को गले के पट्टे देने के लिए टैंडर देने के लिए यह फीगर काम आए हो सकता वरना तो यह गिनती बेकार है.
रजिस्ट्रेशन का क्या मतलब होगा कि हर बार पैट जब और बच्चे दे या मर जाए तो फिर कौरपोरेशन में रजिस्टे्रशन कराओ?
शहरों में ढेरों समस्याएं हैं. स्ट्रे डौग्स समस्या हैं. स्ट्रे काउस ज्यादा बड़ी समस्या हैं पर चूंकि वे माता की गिनती में आती हैं, उन का न रजिस्टे्रशन होगा न फौर्म भरा जाएगा जबकि आजकल वे शहरों के लिए ज्यादा बड़ी आफत हैं पर गौ सेवकों के भगवे झंडों और डंडों के कारण किसी बाबू, अफसर की हिम्मत नहीं कि वह उन पर कुछ नियमकानून लागू कर सके.
पैट पालना मौलिक अधिकार है. वे पड़ोसियों को भौंक कर, काट कर, गंद फैला कर परेशान कर सकते हैं पर जब शहरों में गंदे रहने की आदत हो, पान की पीक थूकने की आदत हो, देवीदेवताओं की टूटी मूर्तियों का पेड़ों के नीचे गंद करने की आदत हो, भंडारों के बाद ढोनापत्तल फेंकने की आदत शहर को हो तो इन मूक साथियों को बाबुओं के हवाले करने का क्या मतलब है? क्या यह सिर्फ रिश्वतखोरी का एक और जरीया नहीं है? क्या पैट क्लीनिक भाव रजिस्ट्रेशन कराने वाले दलाल रखने लगेंगे जो फार्म भरवाएगा, ऊपरी और असली फीस देगा और लोग नाहक अपने जिगर के टुकड़े का वार्षिक विवरण देते नजर आएंगे.
