चेहरा   कितना भी खूबसूरत क्यों न हो समय के साथ स्किन में कुछ बदलाव आना बिलकुल नौर्मल है. कभी स्किन थोड़ी डल और थकी हुई लगने लगती है, कभी ड्राइनैस बढ़ जाती है तो कभी फाइन लाइंस, अनइवन टैक्स्चर और ढीली पड़ती स्किन परेशान करने लगती है. ऐसे में सिर्फ ऊपर से लगाई जाने वाली क्रीम्स और सीरम्स हमेशा काफी नहीं होते. यहीं से मैसोथेरैपी जैसी मौडर्न स्किन रिजुवेनेशन टैक्नीक की जरूरत सम  झ आती है.

नाम सुन कर बहुत सी महिलाओं को लगता है कि यह कोई बहुत कौंप्लिकेटेड या पेनफुल ट्रीटमैंट होगा लेकिन असल में मैसोथेरैपी एक मिनिमली इनवेसिव प्रोसीजर है जिस में स्किन की जरूरत के हिसाब से चुने गए इन्ग्रीडिएंट्स को बहुत कम मात्रा में स्किन की सही लेयर तक पहुंचाया जाता है.

स्किन कंडीशन और ट्रीटमैंट

सीधी भाषा में कहें तो मैसोथेरैपी स्किन तक ऐक्टिव इन्ग्रीडिएंट्स पहुंचाने का एक तरीका है. इस में बहुत बारीक नीडल्स या कुछ स्पैशल डिवाइसेज की मदद से चुने हुए इन्ग्रीडिएंट्स को स्किन की ऊपरी परत के नीचे, तय डैप्थ पर दिया जाता है. क्या इस्तेमाल होगा यह पूरी तरह आप की स्किन कंडीशन और ट्रीटमैंट गोल पर डिपैंड करता है.

उदाहरण के लिए कुछ फेशियल मैसोथेरैपी प्रोटोकाल्स में ह्यालूरोनिक ऐसिड, विटामिंस, अमीनो ऐसिड्स, ऐंटीऔक्सीडैंट्स या दूसरे स्किन सपोर्टिंग इन्ग्रीडिएंट्स इस्तेमाल किए जाते हैं. हर किसी के लिए एक ही ‘कौकटेल’ सही हो ऐसा जरूरी नहीं है. इसलिए अच्छी मैसोथेरैपी की शुरुआत ट्रीटमैंट से नहीं बल्कि स्किन असैसमैंट से होती है.

स्किन की जरूरत

क्लीनिकल रिसर्च में प्रूव होता है कि ह्यालूरोनिक ऐसिडबेस्ड मैसोथेरैपी से स्किन हाइड्रेशन, इलास्टिसिटी और कुछ साइन औफ एजिंग में इंप्रूवमैंट देखा गया है लेकिन रिजल्ट्स हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं क्योंकि यह प्रोडक्ट, टैक्नीक और स्किन कंडीशन पर डिपैंड करता है.

मैसोथेरैपी कोई एक फिक्स्ड इंजैक्शन या एक ही फौर्मूला नहीं है. अलगअलग स्किन कंसर्न्स के लिए अलग फौर्मुलेशंस और टैक्नीक्स इस्तेमाल की जाती हैं. किसी की स्किन बहुत ड्राई है, किसी की डल है, किसी को फाइन लाइंस की प्रौब्लम है तो किसी को ओवरआल स्किन क्वालिटी इंप्रूव करनी है. इसलिए ट्रीटमैंट हमेशा स्किन की जरूरत के हिसाब से होना चाहिए, सिर्फ ट्रेंड देख कर नहीं.

स्किन क्वैलिटी

मैसोथेरैपी का मेन गोल चेहरे को अचानक बदल देना नहीं बल्कि स्किन क्वैलिटी को धीरेधीरे इंप्रूव करना होता है. यह खासतौर पर उन लोगों में हैल्पफुल हो सकती है जिन की स्किन डल और टायर्ड दिखती है, हाइड्रेशन कम लगता है, टैक्स्चर अनइवन है, फाइन लाइंस दिखने लगी हैं या ओवरआल स्किन पहले जैसी फ्रैश नहीं लगती. कुछ स्टडीज में इस से स्किन ब्राइटनैस, हाइड्रेशन और इलास्टिसिटी में इंप्रूवमैंट देखा गया है लेकिन यह डीप रिंकल्स या बहुत ज्यादा सैगिंग स्किन को सर्जिकल ट्रीटमैंट की तरह तुरंत ठीक नहीं करता.

एक कौमन सवाल यह भी होता है कि क्या मैसोथेरैपी से स्किन गोरी हो जाती है? इसे फेयरनैस ट्रीटमैंट सम  झना सही नहीं है. इस का मकसद स्किन को लाइटन करना नहीं बल्कि उसे हैल्दी, हाइड्रेटेड और फ्रैश बनाना होता है. अगर स्किन डल और डिहाइड्रेटेड है तो ट्रीटमैंट के बाद चेहरा नैचुरली ज्यादा ग्लोइंग और रिफ्रैश्ड दिख सकता है लेकिन नैचुरल स्किन टोन बदलना इस का पर्पज नहीं है.

प्लानिंग करें

ट्रीटमैंट से पहले स्किन का प्रौपर असैसमैंट किया जाता है. उम्र, स्किन टाइप, कंसर्न्स, ऐलर्जी, मैडिसिंस और मैडिकल हिस्ट्री सब ध्यान में रखा जाता है. इस के बाद फेस को क्लीन किया जाता है और जरूरत हो तो नबिंग क्रीम भी लगाई जा सकती है. फिर बहुत बारीक नीडल से सिलैक्टेड प्रोडक्ट को छोटेछोटे अमाउंट्स में स्किन के टार्गेटेड एरियाज में दिया जाता है. इस दौरान हलका डिस्कंफर्ट हो सकता है लेकिन यह हर व्यक्ति में अलग होता है.

ट्रीटमैंट के बाद कुछ समय के लिए हलकी रैडनैस, छोटे बंप्स, टैंडरनैस या स्वैलिंग हो सकती है जो आमतौर पर टैंपररी होती है. इसलिए तुरंत हैवी मेकअप या सोशल इवेंट्स की प्लानिंग अवौइड करना बेहतर होता है. आफ्टरकेयर इंस्ट्रक्शन्स फौलो करना बहुत जरूरी है जैसे स्किन को रब न करना और बिना सलाह के ऐक्टिव प्रोडक्ट्स न लगाना.

इस का कोई फिक्स्ड आंसर नहीं है कि कितने सैशंस चाहिए होंगे. यह पूरी तरह स्किन कंडीशन और प्रोटोकौल पर डिपैंड करता है. कई बार एक सीरीज औफ सैशंस की जरूरत होती है और बाद में मैंटेनैंस सैशंस भी रखे जाते हैं और यह भी सच है कि रिजल्ट्स हमेशा परमानैंट नहीं होते क्योंकि स्किन ऐजिंग और लाइफस्टाइल से लगातार प्रभावित होती रहती है.

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